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हिंदी भाषी प्रत्याशी हाशिए पर
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हिंदी भाषी प्रत्याशी हाशिए पर

कोलकाता, हावड़ा, उत्तर 24 परगना ज़िले के उपनगरों, आसनसोल, दुर्गापुर और रानीगंज को मिलाकर बने शिल्पांचल, सिलीगुड़ी और उत्तर बंगाल के चाय बागान क्षेत्रों में हिंदीभाषी वोटर निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं. पंचायतों और नगरपालिकाओं में तो हिदीभाषियों के प्रतिनिधित्व को लेकर शिकायतें कम हैं, पर आबादी के अनुपात में लोकसभा और विधानसभा में उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता. राज्य सरकार में हिंदीभाषियों की भागीदारी न के बराबर दिखती रही है. हालांकि 1977 से पहले ऐसे हालात नहीं थे. कांग्रेसी शासन में विधानचंद राय सरकार में हिंदीभाषी समुदाय के ईश्वरदास जालान को स्थानीय स्वशासन और क़ानून मंत्री बनाया गया था. उसके बाद कांग्रेस की ही सिद्धार्थ शंकर राय सरकार में रामकृष्ण सरावगी राज्य मंत्री के रूप में शामिल हुए थे. 1977 में वाममोर्चा के सत्ता में आने के बाद से किसी हिंदीभाषी को मंत्रालय में जगह नहीं मिल सकी. हिंदीभाषियों का मुद्दा कोलकाता पोर्ट सीट तृणमूल को देने से उठा है. कवितीर्थ विधानसभा सीट पर राज्य कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राम प्यारे राम 6 बार से लगातार चुनाव जीतते आ रहे हैं. परिसीमन के बाद उनकी सीट कोलकाता पोर्ट में समा गई है. कांग्रेस यह सीट मांग रही थी, पर ममता ने इसके बदले कैनिंग ईस्ट सीट दी है. चर्चा है कि ख़ुद प्रणव मुखर्जी ने राम प्यारे के लिए जोर नहीं लगाया.

विधानचंद्र और सिद्धार्थ शंकर की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस एक हिंदीभाषी को मंत्रालय में शामिल कराकर अपनी राष्ट्रीय पहचान क़ायम रख सकती थी. राम प्यारे की जीत तय थी और सीनियर होने के नाते उन्हें मंत्री पद न देना काफी मुश्किल था. तो क्या इस गणित के कारण उनका पत्ता काटा गया? अगर राम प्यारे बग़ावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ते हैं तो तृणमूल को करारा जवाब मिल सकता है. समाजसेवी अभय प्रताप सिंह ने आशंका जताई कि अगर हिंदीभाषियों ने तृणमूल के ख़िला़फ वोट कर दिया तो माकपा के लिए राह आसान हो जाएगी. बिहारी समाज के संचालक मणि प्रसाद सिंह ने कहा कि राम प्यारे वैसे अकेले विधायक थे, जो बिना डरे हिंदीभाषियों के लिए लड़ते थे.

मीडिया के एक हलके में हिंदीभाषी नेता लगनदेव सिंह को बाहुबलियों की सूची में डाल दिया गया. सच तो यह है कि हिंदीभाषियों में लोकप्रिय और माकपा के अनुशासित नेता लगनदेव हावड़ा उत्तर सीट से चार बार विधायक रहे हैं. चौथी दुनिया से बातचीत में उन्होंने टिकट न मिलने पर खुले तौर पर तो नाराज़गी नहीं ज़ाहिर की, पर इलाक़े के हिंदीभाषियों में इसे लेकर भारी निराशा है. अगर इस निराशा ने वोटरों को तृणमूल की ओर जाने को मजबूर किया तो माकपा को तयशुदा जीत वाली सीट हारकर अपने फैसले पर पछताना पड़ सकता है. सनद रहे कि अपने 35 साल के शासन में वाममोर्चे ने उन जैसे सीनियर विधायक को कभी मंत्री नहीं बनाया. जिस तरह ममता ने पिछले लोकसभा चुनावों में कोलकाता की सारी सीटों पर क़ब्ज़ा कर लिया, उसे देखते हुए हावड़ा में एक हिंदीभाषी प्रत्याशी के जीतने से पार्टी को बल मिलता. हालांकि माकपा ने कोलकाता की जोड़ासांको सीट पर लगनदेव की बहन जानकी सिंह को टिकट दिया है. भवानीपुर क्षेत्र में ही ममता का कालीघाट वाला घर आता है और यहां से माकपा ने नारायण जैन को खड़ा किया है, जबकि टीटागढ़ सीट से हिंदीभाषियों में लोकप्रिय डॉ. प्रवीण कुमार का भी टिकट काट दिया गया. ममता ने अपने चुनावी घोषणापत्र में हिंदीभाषी बहुल क्षेत्रों में हिंदी को दूसरी राजभाषा बनाने और अधिक से अधिक हिंदीभाषी स्कूल खोलने का ऐलान किया है. क्षत्रिय समाज, पश्चिम बंगाल के संरक्षक एवं वैसवाड़ा परिषद के अध्यक्ष दुर्गा दत्त सिंह उपेक्षा के लिए हिंदीभाषियों को ही ज़िम्मेदार ठहराते हैं. उनके मुताबिक़, हिंदीभाषी अपनी राजनीतिक ताक़त का सामूहिक इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं. क्षत्रिय समाज से जुड़े दारोगा सिंह का कहना है कि हिंदीभाषी अपनी अपरिहार्यता साबित नहीं कर पा रहे हैं और इसका फायदा दूसरे उठा रहे हैं.

 

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