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नीतीश को जगदानंद की सलाह
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नीतीश को जगदानंद की सलाह

नाटक का पात्र मत बनिए, अज्ञानता के लिए माफी मांगिए. राजद सांसद जगदानंद सिंह कम बोलते हैं, पर जब बोलते हैं तो दो टूक. पिछले चुनाव में जब उन्होंने कहा था कि बेटे का नहीं, पार्टी का साथ दूंगा तो सहसा लोगों को यक़ीन नहीं हुआ, लेकिन जब राजद प्रत्याशी ने उनके पुत्र को हरा दिया तो सूबे की जनता ने माना कि जगदा बाबू जो कहते हैं, वह करते हैं. इन दिनों फरक्का बैराज समझौते एवं तिस्ता जल बंटवारे को लेकर प्रदेश के मंत्रियों की बयानबाज़ी से जगदानंद सिंह दु:खी हैं. वह कहते हैं कि मंत्रियों एवं उनके मुखिया की अज्ञानता इस सूबे को ले डूबेगी. जगदानंद सिंह गंगा जल बंटवारे मामले में अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को ख़ारिज करते हुए कहते हैं कि तीस्ता नदी के पानी के साथ बिहार का भी हित जुड़ा है. इस संबंध में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपनी चुप्पी तोड़नी चाहिए. उन्होंने कहा कि सरकार को राज्य के हितों की जानकारी नहीं है. मालूम हो कि बिहार और बंगाल के साथ हुए पूर्व के करार के मुताबिक़ महानंदा बैराज को तीस्ता नदी का पानी मिलना है. इस बैराज से राज्य के कई सीमावर्ती इलाक़ों को पानी मिलेगा, लेकिन तब, जबकि बैराज को ख़ुद पानी मिलना शुरू हो जाएगा.

जगदानंद कहते हैं कि द्वितीय सिंचाई आयोग ने बक्सर में गंगा नदी में पानी की कमी का आकलन किया था. इसलिए बिहार के तत्कालीन सरकार की पूरी कोशिश इस बात की थी कि ऊपर के तटवर्ती राज्य बक्सर में तय सीमा तक पानी दें और बिहार को अपने हिस्से से अधिक अंशदान फरक्का के लिए न करना पड़े.

जगदानंद कहते हैं कि द्वितीय सिंचाई आयोग ने बक्सर में गंगा नदी में पानी की कमी का आकलन किया था. इसलिए बिहार के तत्कालीन सरकार की पूरी कोशिश इस बात की थी कि ऊपर के तटवर्ती राज्य बक्सर में तय सीमा तक पानी दें और बिहार को अपने हिस्से से अधिक अंशदान फरक्का के लिए न करना पड़े. फरक्का में गंगा जल बंटवारा संबंधी 1996 के समझौते का पूर्व और बाद में विरोध करके ही तत्कालीन सरकार ने अपने हितों की रक्षा की थी. वह कहते हैं कि मौजूदा जल संसाधन मंत्री विजय चौधरी को यह मालूम होना चाहिए कि वर्ष 1996 के समझौते के बाद गंगा से पानी लेने का बिहार का हक़ समाप्त हो गया था, तो 2001-02 में तत्कालीन सरकार ने बाढ़ थर्मल पावर प्रोजेक्ट के लिए गंगा से पानी कैसे दिया था? उन्होंने कहा कि कोसी नदी पर बनने वाले उच्चस्तरीय बांध का भारत-नेपाल समझौता ही बिहार की शर्त पर हुआ. चौधरी इस संचिका का अध्ययन करें. नेपाल की मांग कोसी से जल परिवहन की थी और भारत सरकार ब्रह्मपुत्र से परिवहन की बात पर अड़ी थी. कोसी नदी से जल परिवहन की मांग नेपाल से अधिक बिहार के लिए हितकारी थी. कोसी नदी से गंगा के माध्यम से समुद्र तक एक अंतरराष्ट्रीय व्यापार का रास्ता होना उत्तर बिहार के लिए हितकर था. जलाशय निर्माण का रास्ता भी खुल गया, यह हमारे प्रयासों से ही संभव हुआ. ब्रह्मपुत्र के माध्यम से नेपाल को रास्ता देने के बदले कोसी की व्यवस्था बिहार की आर्थिक स्थिति को ऊंचाई पर ले जाने वाली साबित होगी. नेपाल को मात्र एक बंदरगाह मिलेगा, मगर बिहार को कुर्सेला-वीरपुर के बीच अनेक बंदरगाह मिलेंगे. क्या कभी किसी सरकार ने ऐसा सोचा भी था. उन्होंने सरकार पर अनदेखी करने का आरोप लगाते हुए कहा कि वर्तमान सरकार द्वारा तथ्यों को झुठलाने का प्रयास किया जाता है. तीस्ता प्रकरण के माध्यम से ममता बनर्जी को नायक बनाने का प्रयत्न न किया जाए. गंगा से बिहार को पानी मिलता रहे, यह बात भी तत्कालीन सरकार के सिवा कभी किसी की समझ में आया हो तो इसका उदाहरण देना चाहिए. 1996 के समझौते को लेकर वर्तमान मुख्यमंत्री और अटल बिहारी वाजपेयी की भूमिका मात्र प्रशंसक की थी. 1997 से लेकर 2004 तक केंद्र सरकार में मंत्री और 2005 से 2011 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे नीतीश अपनी भूमिका बिहारवासियों के समक्ष कैसे उचित ठहराएंगे? ममता ने आज कुछ किया है, लेकिन इससे अधिक तत्कालीन सरकार ने गंगा एवं गंगा बेसिन की सबसे बड़ी नदी कोसी के बारे में अपनी भूमिका का निर्वाह किया. चौधरी अगर तीस्ता और गंगा के फर्क़ को समझेंगे तो ममता और तत्कालीन सरकार के कार्यों तथा देश में केंद्र और राज्यों की संवैधानिक भूमिका को भी समझ पाएंगे.

दूसरी तऱफ जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी ने कहा कि फरक्का समझौते का इतिहास बताकर राजद सांसद जगदानंद अपनी और तत्कालीन सरकार की कमियां छिपा रहे हैं. बात दिसंबर 1996 में भारत एवं बांग्लादेश के बीच हुए फरक्का समझौते से संबंधित है. सर्वविदित है कि उस समय बिहार और केंद्र में जनता दल की हुकूमत थी. मुख्यमंत्री लालू प्रसाद और प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा थे. पूर्व जल संसाधन मंत्री ने यह माना कि फरक्का समझौते में बिहार के हितों की अनदेखी की गई. यह सच है कि उस व़क्त बिहार के लिए गंगा नदी में जल की उपलब्धता का ख्याल नहीं रखा गया. मूल प्रश्न यह है कि जब बिहार के हितों के विरुद्ध यह समझौता हो रहा था तो उस समय राज्य एवं केंद्र में सत्ताधारी दल के नेता क्यों मुंह छिपाए बैठे थे, बिहार के हितों के साथ खिलवाड़ क्यों हुआ, राज्य एवं केंद्र सरकार की आख़िर क्या मजबूरी थी? जगदानंद सिंह कहते हैं कि गंगा नदी के पानी को लेकर बांग्लादेश से हुए समझौते के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री से जवाब तलब किया जाना चाहिए. जिस दिन सदन में इस मामले को लेकर बहस हो रही थी, वहां वर्तमान मुख्यमंत्री भी मौजूद थे. वह अन्य विषयों पर तो बोले, लेकिन इस विषय पर एक शब्द नहीं बोले. जगदानंद कहते हैं कि योजनाओं को कार्यान्वित करने वालों पर मुक़दमा नहीं किया जाना चाहिए और राज्य हित में काम करने वालों की आलोचना नहीं होनी चाहिए. दुर्गावती जलाशय नीतीश इसलिए शुरू नहीं कर पाए, क्योंकि जिन भ्रष्ट पदाधिकारियों को मैंने दंडित किया था, उनके सहयोग से वह मुझे जेल भेजना चाहते थे. जगदा बाबू ने मुख्यमंत्री से कहा कि आपका पद बड़ा है, दिल और दिमाग़ को भी बड़ा कीजिए. नाटक का पात्र मत बनिए, क्योंकि तात्कालिक आभा स्थायी नहीं होती.

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  • बिहार से सम्बंधित अधिकांश समाचार पत्र बिहार सरकार की प्रवक्ता जैसा कार्य करते हैं लेकिन चौथी दुनिया बिहार की जनता की आवाज है .

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