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जनता के संकेत को समझें
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जनता के संकेत को समझें

बिहार में दूसरे और तीसरे चरण का चुनाव ऐसे क्षेत्रों में था, जो माओवादियों के प्रभाव वाले माने जाते हैं. पोस्टर एवं पर्चों के ज़रिए माओवादी पहले से ही आम मतदाता को मतदान केंद्र तक न पहुंचने की धमकी दे चुके थे. दूसरे चरण के चुनाव के ठीक दो दिन पहले शिवहर ज़िले के श्यामपुर भटहा में माओवादियों ने एक पुल पर विस्फोट कर पुलिस जीप को उड़ा दिया. इस हमले में 6 पुलिसकर्मियों की मौत हो गई. ऐन मतदान के दिन सीतामढ़ी में नक्सलियों ने पोलिंग पार्टी के कुछ सदस्यों को अगवा कर लिया, लेकिन माओवादियों की इस पूरी कवायद का नतीजा क्या निकला? दूसरे चरण में लगभग 53 फीसदी मतदाताओं ने अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल कर ही लिया. वहीं तीसरे चरण के मतदान में भी मतदाताओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और लगभग 54 फीसदी मतदाताओं ने मतदान केंद्रों तक पहुंच कर अपने अधिकार का इस्तेमाल किया. ग़ौरतलब है कि मतदान का यह प्रतिशत पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव से कहीं ज़्यादा रहा. 2005 के अक्टूबर में हुए विधानसभा चुनाव में जहां स़िर्फ 47.36 फीसदी ही मतदान हुआ था, वहीं इस बार यह प्रतिशत 53 से 54 तक जा पहुंचा. दूसरी ओर 2009 के लोकसभा चुनाव में महज़ 43.74 फीसदी वोट ही पड़े थे. इस तरह देखें तो पिछले लोकसभा चुनाव के मुक़ाबले इस विधानसभा चुनाव में लगभग 10 फीसदी अधिक वोट ईवीएम में क़ैद हुए. ज़ाहिर है, वोटों के इस बढ़ते प्रतिशत ने बहुत कुछ सा़फ कर दिया है. बिहार के जागरूक मतदाताओं ने माओवादियों की धमकियों, अपीलों और बुलेट की आवाज़ को बैलेट की ताक़त के आगे कमज़ोर साबित कर दिया.

शुक्रिया बिहार की जनता, क्योंकि आपने माओवादियों की बुलेट का जवाब बैलेट से दिया, उनकी धमकी को आपने सिरे से खारिज़ कर दिया. साबित हो गया कि बिहार में माओवादियों के पास कोई ज़मीनी आधार नहीं है. उनके पास आम जनता का समर्थन नहीं है. आपने उन्हें संकेत दे दिया है कि लोकतंत्र में हथियार के ज़ोर पर सत्ता नहीं मिलती और न ही विनाश के रास्ते पर चलकर विकास का सपना देखा जा सकता है.

दरअसल, दूसरे और तीसरे चरण के चुनाव के दौरान लगभग 54 फीसदी मतदान करके बिहार की जनता ने माओवादियों को एक संदेश दे दिया है. इस संदेश का अर्थ है कि अब माओवादी यह अच्छी तरह समझ लें कि लोकतंत्र में सत्ता बंद़ूक की नली से नहीं निकलने वाली और न वह स़िर्फ ग़रीबों के नाम पर ग़रीबों का ही खून बहाने से मिलने वाली है. ग़रीबों की बात करने वाले माओवादियों ने अगर सबसे ज़्यादा किसी का खून बहाया है तो वह ग़रीबों का ही खून है. तो क्या माओवादी जनता के इस संदेश को समझेंगे कि लोकतंत्र में लोक कल्याण स़िर्फ और स़िर्फ लोकतंत्र में भागीदारी से ही संभव है? बिहार में पिछले पांच सालों के दौरान बनी सड़कों ने वहां की जनता में विकास के साथ-साथ विकास की आस भी जगाई है. बेरोज़गार युवाओं द्वारा ग़लत राह पर क़दम रखना एक आम बात है, लेकिन इन पांच सालों में हज़ारों बेरोज़गारों को सरकारी नौकरियां मिलीं. बिहार के लोगों को सालों बाद विकास दिखा है और वे इस माहौल को माओवादियों की धमकियों से डरकर बर्बाद नहीं करना चाहते. इसी का नतीजा है कि माओवादियों की तमाम धमकियों-अपीलों की परवाह किए बग़ैर जनता ने लोकतंत्र के इस महापर्व में पूरे उत्साह के साथ भागीदारी की.

चंपारण की मधुबन सीट पर भी मतदान शांतिपूर्ण रहा. यह वहीं मधुबन है जहां कुछ साल पहले माओवादियों ने दिनदहाड़े एक सांसद के घर, पुलिस थाना, बैंक और पूरे बाज़ार पर एक साथ हमला बोल दिया था. 24 घंटे से भी ज़्यादा समय तक पुलिस और माओवादियों के बीच गोलीबारी हुई थी.

उत्तरी बिहार के चंपारण, मुज़फ़़्फरपुर, सीतामढ़ी और दरभंगा जैसे इलाक़ों, जो खुद माओवादियों के मुताबिक़ उनके गढ़ हैं, में मतदान के दौरान लंबी-लंबी कतारों में सुबह से खड़ी महिलाएं, युवा एवं बुज़ुर्ग जिस उत्साह से वोट देने के लिए अपनी बारी का इंतज़ार करते नज़र आए, वह क़ाबिले तारी़फ है. मतदान के दौरान माओवादियों की धमकी का कोई असर देखने को नहीं मिला. शिवहर, जहां मतदान से दो दिन पहले माओवादियों ने 6 पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी थी, वहां भी मतदाताओं की लंबी कतार देखी गई. शिवहर और सीतामढ़ी के मतदाताओं ने माओवादियों की चुनाव बहिष्कार की अपील को सिरे से खारिज़ कर दिया. चंपारण की मधुबन सीट पर भी मतदान शांतिपूर्ण रहा. यह वहीं मधुबन है जहां कुछ साल पहले माओवादियों ने दिनदहाड़े एक सांसद के घर, पुलिस थाना, बैंक और पूरे बाज़ार पर एक साथ हमला बोल दिया था. 24 घंटे से भी ज़्यादा समय तक पुलिस और माओवादियों के बीच गोलीबारी हुई थी.

दरअसल, बिहार के इन ज़िलों में माओवादियों के पनपने के पीछे एक कारण यह भी है कि इन ज़िलों का ज़्यादातर हिस्सा नेपाल की सीमा से सटा है. चंपारण और सीतामढ़ी की सीमाएं नेपाल के वीरगंज एवं जनकपुर से जुड़ी हैं. सालों से यह रिपोर्ट आती रही है कि नेपाल के माओवादियों से बिहार के माओवादियों को सहायता मिल रही है. धन से लेकर हथियारों तक की सहायता. रणनीति बनाने में भी बिहार के माओवादी नेपाली माओवादियों से सलाह लेते हैं. इसके अलावा नेपाल के जंगलों में भी बिहार के माओवादियों को पनाह मिलती रहती है. इन्हीं सब कारणों से पिछले एक दशक के दौरान बिहार के इन क्षेत्रों में माओवादियों की गतिविधियां बढ़ गईं. शुरुआत में न तो लालू यादव और न ही नीतीश कुमार की सरकार ने इस ओर ध्यान दिया. सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों का रु़ख इस समस्या पर लगभग एक जैसा ही रहा और अब भी कमोबेश वही रवैया है.

लेकिन धन्यवाद देना चाहिए बिहार की जनता को. जिस तरह से मतदान के ज़रिए उसने माओवादियों की खोखली ताक़त को बेनक़ाब किया है, वह बिहार और भारत में माओवाद के भविष्य की तऱफ भी इशारा करती है. बिहार की जनता ने सा़फ कर दिया है कि पशुपति से तिरुपति तक लाल गलियारा बना पाना माओवादियों के लिए महज़ एक सपना बनकर रह जाएगा. कम से कम इस गलियारे का रास्ता बिहार से होकर तो बिल्कुल नहीं गुज़रेगा.

माओवादियों के प्रभाव वाले क्षेत्र

शिवहर, रीगा, बथनाहा, सुरसंड, बाजपट्टी, सीतामढ़ी, रुन्नीसैदपुर, बेलसंड, दरभंगा, हायाघाट, सकरा, कुढ़नी, मुजफ्फरपुर, कांटी, वरूराज, कल्याणपुर, नरकटिया, पिपरा, मधुबन, चिरैया, ढाका, मीनापुर, पारू, साहेबगंज,  नरकटियागंज, बगहा, लौरिया, नौतन, चनपटिया, बेतिया, सिकटा, रक्सौल, सुगौली, हरसिद्धि, गोविंदगंज, केसरिया, मोतिहारी, महनार, वाल्मीकि नगर एवं रामनगर.

(दूसरे-तीसरे चरण के दौरान इन्हीं क्षेत्रों में हुए मतदान)

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