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कई रंगों से सजा है शाहजहांपुर रंगमंच
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कई रंगों से सजा है शाहजहांपुर रंगमंच

दिल्ली और लखनऊ के बीचों-बीच बसे शाहजहांपुर ज़िले के सांस्कृतिक परिदृश्य पर दृष्टि डाली जाए तो यहां रंगमंच एक समृद्ध विधा के रूप में स्थापित दिखाई देता है. यहां के रंगकर्मी राष्ट्रीय स्तर पर अपने नाट्य मंचनों से पहचान स्थापित करते दिखाई देंगे. रंगमंचीय इतिहास देखें तो लगभग 100 वर्ष की जानकारी स्पष्ट मिलती है. 20वीं सदीं के शुरुआती सालों में प्राचीन कथाओं, धार्मिक महाकाव्यों और ऐतिहासिक विषय वस्तु व कथानकों पर आधारित नाट्य प्रस्तुतियां होती थीं. सन 1918-20 में हनुमंत परिषद नाम की संस्था की विधिवत स्थापना हुई, जिसमें पुवायां के राजा साहब फतेह सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका थी. उस दौरान परिषद द्वारा मंचित प्रमुख नाटक भक्त प्रहलाद, राजा हरिश्चंद्र, सिकंदर और पोरस, सुल्ताना डाकू, हमीर हठ, राजा मोरध्वज, राजा विक्रमादित्य आदि थे. सन 1930 से 40 के दौर में मुख्य रूप से दो संस्थाएं सामने आईं, कृष्णा क्लब और रामा क्लब. इस संस्था द्वारा मंचित प्रमुख नाटक सिकंदर और पोरस तथा राजा हरिश्चंद्र थे. इसी दौरान शंकर ड्रामेटिक क्लब की स्थापना हुई. कुछ समय बाद रामा क्लब और शंकर क्लब आपस में मिल गए और रामाशंकर ड्रामेटिक क्लब की स्थापना हुई. जिसे निरंकार सहाय मस्त, डॉ. मलिक आदि ने संवारा. यह वह दौर था जब पारसी और नौटंकी शैली का वर्चस्व था. सन 1945 में भगवती सहाय और बाबू निरंकार सहाय मस्त उ़र्फ मस्त बाबू ने आर्डनेंस ड्रामेटिक क्लब का गठन किया. इसमें मोहम्मद सिद्दीकी, रघुवंश नारायण, फजल अहमद, बाबूराम तिवारी आदि के सहयोग से नाटक वीर अभिमन्यु, हमीर हठ, दुर्गादास राठौर, शिव पार्वती, छीन लो रोटी आदि के मंचन किए.

सन 1995 तक शाहजहांपुर के रंगकर्म में एक बड़ा बदलाव आया. जब बिहार प्रांत के नाट्य लेखक राजेश कुमार सरकारी नौकरी के दौरान इस ज़िले में आए. उन्होंने स्थानीय प्रतिभावान युवा रंगकर्मियों को एकत्रित कर स्वयं लिखित नाटकों के मंचन शुरू किए. राजेश के साथ आए रंगकर्मियों में कृष्ण कुमार श्रीवास्तव, शमीम आज़ाद, आलोक सक्सेना, आजम खां, अरविंद चोला आदि ने मिलकर 15 अगस्त 1996 को एक नई संस्था अभिव्यक्ति की स्थापना की.

इतना ही नहीं नवाब रामपुर की नाट्य शाला से संस्था ने क़ीमती पर्दे भी हासिल किए. इनका प्रयोग लगातार फारसी शैली के नाटकों में देखा गया. वर्ष 1965 में आनंद सक्सेना, पीके मुखर्जी, एलएन शर्मा बाल किशन, चंद्र मोहन महेंद्रू, सुशील शर्मा, महेश सक्सेना आदि ने जय नाट्यम नाट्य संस्था का गठन कर कई वर्षों तक पुजारी, ज़माना, फैसला, अंडर सेक्रेट्री, रक्तरेखा एवं चर्चित नाटक नेफा की एक शाम मंचन किया. इन्हें का़फी सराहा गया. सन 1969 में साहू अशोक कुमार बेढ़ब ने युगांतर बाल सेना नाम की एक सांस्कृतिक संस्था बनाई, जिसने शुरूआत में नन्हें बालकों में देशभक्ति, सद्भाव, भाईचारा की विचारधारा विकसित करने के कार्यक्रम किए. बाद में यह संस्था युवाओं के बीच भी आई और संस्था का नाम हो गया युगांतर सांस्कृतिक परिषद. इसमें कलाकार थे- श्रीमती मीना श्रीवास्तव, रामेंद्र मिश्र, गोपाल मेहता, मनोज मंजुल आदि. सन 1980 के दौर में एक पुरानी और मूलरूप से साहित्यकारों की संस्था अनामिका ने आधुनिक रंग मंच से शहर के नाट्यकर्मियों को जोड़ा. इसमें चर्चित कथाकार हृदयेश, आफताब अख्तर, आचार्य नित्यानंद मुग्दल, राजेश्वर सहाय बेदार, मोहिनी मोहन सक्सेना, अचल बाजपेई, राजेंद्र च्यवन, श्यामकिशोर सेठ, चंद्र मोहन दिनेश, सुधीर विद्यार्थी, डा. इजहार सहबाई आदि शामिल थे. सन 1980 में अनामिका द्वारा लखनऊ के रंगकर्मी कमल वरिष्ठ के निर्देशन में रंगमंच प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया. जिसमें अभिनय प्रशिक्षण के साथ-साथ डॉ. असगर वजाहत कृत नाटक इन्ना की आवाज़ और अन्तोन चेखव कृत नाटक गिरगिट तैयार करवाया गया. सन 1984 में लखनऊ से अमरेंद्र सहाय कमर के निर्देशन में अगली कार्यशाला का आयोजन किया गया. इसमें महिलाओं ने भी पहली बार प्रशिक्षण प्राप्त किया. इस कार्यशाला में जगदीश चंद्र माथुर कृत नाटक कोणार्क तैयार किया गया. जिसका स़फल मंचन शाहजहांपुर और वाराणसी में हुआ. सन 1985 में संस्था ने लखनऊ के रंग निर्देशक पीडी वर्मा के निर्देशन में शरद जोशी कृत नाटक एक था गधा… का मंचन किया. इस नाटक को देखने के लिए टिकट ब्लैक में भी बिके. वर्ष 1990 में अनामिका ने जबलपुर से निर्देशक डॉ. विश्वभावन देवलिया के निर्देशन में डॉ. धर्मवीर भारती कृत प्रसिद्ध नाटक अंधा युग का मंचन किया.

अनामिका की इस यात्रा में चंद्रमोहन दिनेश, महेश सक्सेना, असद उल्ला खां, चंद्र मोहन महेंद्रू, राधेश्याम श्रीवास्तव, राजकुमार शर्मा, सुशील शर्मा, खादिम शाहपुरे, मनोज कुमार मंजुल, प्रमोद प्रमिल, सतीश चंद्र सक्सेना, वीएस त्रिवेदी, राधेश्याम सक्सेना, रचना शर्मा, बबिता शुक्ला, वंदना अग्रवाल, सुदर्शन वर्मा, अनिल कक्कड़, ओपी वर्मा, विकास चावला आदि साथ रहे. 1986 में अनामिका के कुछ रंगकर्मियों वीएस त्रिवेदी, चंद्र मोहन महेंद्रू आदि ने मिलकर कोरोनेशन आर्ट थियेटर संस्था की स्थापना की और चंद्र मोहन महेंद्रू के निर्देशन में प्रमोशन नाटक का मंचन किया. 1987 में संस्था ने अनवर सादिक के निर्देशन में रवि वर्मा कृत नाटक दीमक का मंचन किया. बाद में टीम बिखरी और आनंद ने संगीत नाटक अकादमी लखनऊ से बी.एम. शाह से निर्देशन का प्रशिक्षण लेकर अपने निर्देशन में दीमक नाटक का मंचन किया. जिसने पहली बार अखिल भारतीय नाट्य प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ नाटक के साथ-साथ कई अन्य पुरस्कार भी जीते. दीमक नाटक के अब तक 30 से भी अधिक मंचन हो चुके हैं. कोरोनेशन ने तरुण राज के निर्देशन में इतिहास चक्र, विजय शुक्ला के निर्देशन में आला अफसर, राजपाल यादव के निर्देशन में आगा हश्र कश्मीरी कृत पारसी नाटक यहूदी की लड़की का सफलतम मंचन किया.  इस संस्था ने इकतारे की आंख, बैंच शहंशाह इडिपस, गोदान, रामलीला, आह-रे हिंदुस्तान, त्रिशंकु, गज-फुट-इंच, सज़ा-ए-मौत, होली आदि मंचन किए. अभिनेता राजपाल यादव ने इसी संस्था से रंगमंचीय स़फर शुरू किया. सतीश त्रिवेदी, जुनैद खां के अलावा कई अन्य अभिनेता इस संस्था से निकलकर बॉलीवुड में संघर्ष कर रहे हैं. शाहजहांपुर के रंगकर्म को इप्टा की संबद्ध इकाई कोरोनेशन आर्ट थियेटर ने बहुत समृद्ध किया. निर्देशक आनंद ने रंग परंपरा को गति दिया. नुक्क़ड नाटकों के माध्यम से भी जनता में जागरूकता फैलाने का काम किया. देश में आई विपदाओं जैसे भूकंप, सुनामी आदि को लेकर आर्थिक सहायता भी प्रदेश के राज्यपाल को भेजी. एक मौक़े पर संस्था के वालंटियर स्वयं लगभग 100 नग रेलवे से बुक कराकर ज़िलाधिकारी का पत्र लेकर भुज, गुजरात पहुंचे और राहत सामग्री का स्वयं वितरण किया. संस्था से जुड़े रंगकर्मियों की संख्या सैकड़ों में है, पर मुख्य रूप से रचना शर्मा, दिलीप आनंद, राजपाल यादव, कृष्ण कुमार श्रीवास्तव, शमीम आज़ाद, आजम खां, राजेंद्र बघेला, आसिफ सलीम, शाहशुजा खां, आशीष शुक्ला, अजय अवस्थी, गौरव खन्ना, आशुतोश मिश्र, स्व. अजय दीक्षित, संध्या पांडेय, सतीश त्रिवेदी, रमापति द्विवेदी सोती, बबिता बख्श, सोनी राजवंशी, प्रिया सिंह, अभिलाषा, वंदना शर्मा, सुरभि खुराना, शिखा राजवंशी, संगीता यादव, प्रमोद यादव, महेश वर्मा, दीपक तिवारी, अखिलेश रोहरा, सुरेंद्र शर्मा उ़र्फ सोनू, तारिक खान, सूरज राणा, कुलदीप तिवारी, जुनैद खां उर्फ राजा, दामोदर पाल, सचिन श्रीवास्तव, सर्वेंदर राज भदौरिया आदि उल्लेखनीय हैं. सन 1989 में रंगकर्मी वीएस त्रिवेदी ने नव ज्योति नाट्य कला मंदिर की स्थापना कर बिखरती पंखुड़ियां, तमाशा, स्वांग, अरे शरीफ लोग आदि नाटकों के मंचन किए. प्रमोद प्रमिल संस्थापित परिक्रमा द्वारा तमाशा, सिहासन खाली है, एक कुंवारा शादी का मारा, हमें बोलने दो, बकरी, कुणाल, और अग्नि शिखा के मंचन किए गए. मनोज मंजुल संस्थापित अनुभूति द्वारा मेरा नाम मथुरा है, कसाई बाड़ा, एक और द्रोणाचार्य आदि नाटक थे. रामेंद्र मिश्रा संस्थापित सुरभि नाट्य संस्था द्वारा अयोध्या, अब ग़रीबी हटाओ, दहेज आदि नाटक थे. गोपाल मेहता संस्थापित अभिनव संस्था द्वारा इंतकाम, सोपान कला परिषद द्वारा इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर, पांच पैर का सिक्का, सीढ़ियां आदि नाटक थे.

सन 1995 तक शाहजहांपुर के रंगकर्म में एक बड़ा बदलाव आया. जब बिहार प्रांत के नाट्य लेखक राजेश कुमार सरकारी नौकरी के दौरान इस ज़िले में आए. उन्होंने स्थानीय प्रतिभावान युवा रंगकर्मियों को एकत्रित कर स्वयं लिखित नाटकों के मंचन शुरू किए. राजेश के साथ आए रंगकर्मियों में कृष्ण कुमार श्रीवास्तव, शमीम आजाद, आलोक सक्सेना, आजम खां, अरविंद चोला आदि ने मिलकर 15 अगस्त 1996 को एक नई संस्था अभिव्यक्ति की स्थापना की. इस संस्था ने अधिकांशत: राजेश के ही नाटक मंचित किए. जिन्हें कई पुरस्कार प्राप्त हुए. उदाहरणतः आ़खिरी सलाम, अंतिम युद्ध, गांधी ने कहा था, घर वापसी, हवन कुंड, कह रैदास, के साथ-साथ नुक्क़ड नाटक भ्रष्टाचार का अचार, एकल नाटक रसप्रिया, पूस की रात, टोबा टेक सिंह, भेड़िए, वैष्णव की फिसलन, राम की शक्ति पूजा, एक क्लर्क की मौत, पेशावर एक्सप्रेस, मुगलों ने सल्तनत बख्श दी वगैरह के मंचन किए. पिछले दिनों तौकीर वारसी के निर्देशन में रुस्तम सोहराब और मोहन राकेश लिखित आलोक सक्सेना निर्देशित नाटक आषाढ़ का एक दिन, बूथ नं. 51, चंद्र मोहन महेंद्रू निर्देशत सिहासन खाली है, राकेश श्रीवास्तव निर्देशित महाभोज, ज़रूरत है श्रीमती की, मोअज्जम बेग निर्देशित डब्ल्यू.डब्ल्यू.डब्ल्यू.लड़की.काम, बबिता पांडेय के निर्देशन में दो कौड़ी का खेल, गुलिस्तां के निर्देशन में रोमियो जुलिएट, शमीम आज़ाद के निर्देशन में जाति ही पूछो साधु की के मंचन किए. अभिव्यक्ति से जुड़े प्रमुख रंगकर्मी हैं- कृष्ण कुमार कृष्णा, शमीम आज़ाद, आलोक सक्सेना, मो. आजम खां, अरविंद चोला, मोअज्जम बेग, कु. गुलिस्तां, रुचि दीक्षित, मधुमिता डे, संजीव सारांश, रफी खान, संजय सक्सेना, तौकीर वारसी, शाहनवाज खां, रौनक अली, मनीष मुनि, सुरेंद्र संभव, कप्तान कर्णधार, विनती सिंह, मजहर खान, इकराम वारसी, राकेश राज, शाहिद अली, इजलाल खां, शाश्वत दीप, महताब, आमिर, शरीफ आदि. शाहजहांपुर में कुछ अन्य संस्थाएं बनी जिसमें कांस्टेलेशन आर्ट थियेटर, न्यू स्टार थियेटर, जिज्ञासा नाट्य परिषद, ढाई आखर रंगमंडल, आर्डनेंस ड्रामेटिक क्लब समिति, द्वारा कुछ नाट्य प्रस्तुतियां की गई जो कि क्रमशः अंधा कुआं, कोर्ट मार्शल, सूरज का सातवां घोड़ा, सत्य हरिश्चंद्र, सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक आदि थी. बाद में बनी विमर्श संस्था द्वारा मेरा राजहंस घर वापसी आदि नाटकों के मंचन किए गए. इसमें आर्डनेंस ड्रामेटिक क्लब समिति और विमर्श लगातार सक्रिय हैं. चंद्र मोहन महेंद्रू की सरपरस्ती में अनामिका, एक बार फिर सक्रिय हो गई है- चंद्र मोहन महेंद्रू के निर्देशन में एक अधिकारी की मौत, भुवनेश्वर-दर-भुवनेश्वर आदि नाटकों के मंचन किए. वर्ष 2002 में शहर के युवा नाट्य निर्देशक आलोक सक्सेना ने एक नई संस्था संस्कृति की स्थापना की और अपने उस्ताद राजेश कुमार की तर्ज पर रंगकर्म की अलग शुरुआत की. राजेश कुमार के निर्देशन में मार पराजय, आलोक सक्सेना के निर्देशन में विजय तेंदुलकर कृत नाटक घासीराम कोतवाल डा. गिरीश कारनाड कृत अग्नि और बरखा राजेश कुमार कृत घर वापसी इंदुशेखर मिश्रा के निर्देशन में कमबख्त इश्क आदि नाटकों के स़फल मंचन किए. संस्था के रंगकर्मियों में मो. आजम खां, सौरभ अग्निहोत्री, मनोज यादव, आशीष द्विवेदी, स्नेहा संतोषी, गुलिस्तां, आरती सैनी, कप्तान कर्णधार, आलोक पांडेय, रवि सिंह, धर्मेंद्र सिंह, सुदीप शुक्ला, नवल सक्सेना, आरएन त्यागी, आशा सोम, मनोज कार्तिक, रौनक अली, इंदुशेखर मिश्र, नवीन गुप्ता आदि के नाम जुड़ते हैं. शाहजहांपुर अब तक काकोरी कांड के अमर बलिदानी डा. रौशन सिंह, पं. राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां के नामों से जाना जाता था, पर अब रंगमंच के राष्ट्रीय मानचित्र पर भी अपना नाम दर्ज़ करा रहा है. पर इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि आर्थिक विपन्नता यहां के सैकड़ों रंगकर्मियों को निरंतर अखरती है. सरकार को चाहिए कि इस शहर में एक रंगमंडल की स्थापना करे, ताकिरंगकर्म इन रंगकर्मियों की रोज़ी-रोटी का साधन भी बन सके.

  • यहां के पानी में कुछ तो बात है जिससे रंगमंच दिन-ब-दिन समृद्ध हो रहा है
  • हिंदी एकांकीकार भुवनेश्वर ने जन्म लेकर असंगत नाटकों में पहचान बनाई
  • वर्तमान में प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता राजपाल यादव की भी यह धरती है
  • कई रंगकर्मी एन.एस.डी. और बी.एन.ए. से पूर्ण कालिक डिप्लोमा पा चुके हैं

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