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कश्मीर की जनता न्याय चाहती है
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कश्मीर की जनता न्याय चाहती है

कश्मीर में इस समय स्थिति संतुलित है. पर्यटकों ने बड़ी संख्या में आना शुरू कर दिया है, जो अच्छी बात है. इससे यह महसूस हो रहा है कि पूरा भारत हमारे लिए अच्छा सोच रहा है. अभी पिछले माह गिलानी जी से बात हुई तो उन्होंने कहा कि इस बार ऐसा कुछ नहीं होगा. बशर्ते कुछ ऐसा न हो कि लोग सड़कों पर आने के लिए मजबूर हो जाएं. कश्मीर में दहशतगर्दी के संबंध में यह कहना ग़लत नहीं होगा कि जहां कोई कमज़ोरी होती है, वहां हर आदमी फ़ायदा उठाता है. इसके राजनीतिक कारण भी हैं. कश्मीर में गन कल्चर है, इसलिए वहां कोई भी किसी को भी गोली मार सकता है. वह वजह आपको बाद में बताएगा कि गोली क्यों मारी और बच भी जाएगा. इसी वजह से मासूमों की हत्याएं होती रहती हैं. सेना को स्पेशल पॉवर एक्ट दिया गया है. वह कुछ भी करे, उससे कुछ नहीं पूछा जाएगा, कोई जवाबदेही नहीं होगी. इसलिए सुरक्षाकर्मियों का मनोबल ऊंचा है. जहां वे थप्पड़ और डंडे से काम चला सकते हैं, वहां भी गोली चला देते हैं. पहले पुलिस अधिकारियों के सुरक्षाकर्मियों के पास केवल बंदूक़ें होती थीं, वे गोली चला नहीं सकते थे. आज सुरक्षाकर्मी के पास बंदूक़ भी है, गोली भी है. इसीलिए वह किसी भी आदमी को आतंकवादी बताकर गोली मार देता है, उसे शाबाशी मिलती है. फिर वह क्यों डरे? इस स्थिति से युवा भी प्रभावित हो रहे हैं. जहां थप्पड़, डंडे और लॉकअप की मदद से नियंत्रण पाया जा सकता है, वहां जनता की जान लेने की कोशिश की जा रही है. आज कश्मीर में जो कुछ हो रहा है, उसके लिए का़फी हद तक सेना भी ज़िम्मेदार है. राज्य में 300-400 नौजवान जेलों में बंद हैं, जबकि विधानसभा में उमर अब्दुल्ला ने बताया कि केवल 70-80 नौजवान हिरासत में हैं. उनमें भी 20-22 नौजवान जेल में हैं और बाक़ी रिमांड पर. इससे तो यही लगता है कि हालात बहुत बुरे नहीं हैं. अब मालूम नहीं कि जेलों में बंद नौजवान उतने हैं, जितने उमर अब्दुल्ला बता रहे हैं या जितने अख़बार बता रहे हैं.

उमर कश्मीरी जनता के साथ नरमी से पेश आना चाहते हैं. शायद वह सोचते हैं कि लोग उन्हें नौजवान होने की वजह से बड़ी ज़िम्मेदारी के साथ यहां तक लाए हैं. इसलिए उनकी ज़िम्मेदारी है कि वह लोगों के लिए कुछ करें, लेकिन उनकी नरमी की वजह से उनका दबदबा बन नहीं पा रहा है.

उमर कश्मीरी जनता के साथ नरमी से पेश आना चाहते हैं. शायद वह सोचते हैं कि लोग उन्हें नौजवान होने की वजह से बड़ी ज़िम्मेदारी के साथ यहां तक लाए हैं. इसलिए उनकी ज़िम्मेदारी है कि वह लोगों के लिए कुछ करें, लेकिन उनकी नरमी की वजह से उनका दबदबा बन नहीं पा रहा है. शायद लोग भी उसी का दबदबा मानते हैं, जो सख्ती से पेश आता है. कश्मीर के संकट से पहले जो कुछ हुआ, उससे कश्मीरियों को शिकायत नहीं है, लेकिन संकट के बाद इसे जिस तरह हैंडिल किया गया, उन्हें उससे शिकायत है. पूरी दुनिया ने कश्मीरियों की समस्या को स्वीकार किया. आज भी इस मुद्दे को भारत जिस तरह ले रहा है, जनता को उससे शिकायत है. जिस तरह पिछले साल 111 युवक मारे गए और भारत का जो रवैया रहा, उसके लिए कश्मीरियों को हमेशा शिकायत रहेगी. कश्मीर के राजनीतिक मुद्दे को सरकार उचित ढंग से हल नहीं कर रही है. अभी एक कमेटी बनाई गई थी. उसने जिस तरह काम किया, उसे ठीक कहा जा सकता है. कमेटी कुछ ख़ास लोगों से मिलना चाहती थी, लेकिन वे लोग नहीं मिले. इसके बावजूद कमेटी ने अपने स्तर पर सच जानने की अच्छी कोशिश की. यह नहीं मालूम कि कमेटी की रिपोर्ट क्या है, लेकिन आशा है कि वह एक संतुलित रिपोर्ट होगी.

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कश्मीरी खुद को भारत से अलग मानते हैं. घर में अगर एक आदमी विकलांग हो जाता है तो वह पूरे घर से अलग हो जाता है. उसे हमदर्दी की सबसे अधिक ज़रूरत होती है. इसी तरह कश्मीर की समस्या है, जो उसे पूरे भारत से अलग करती है. उसके साथ जम्मू भी नहीं है. भारत ने कभी कश्मीरियों की बात नहीं सुनी. यह अलग मुद्दा है कि कश्मीरियों की बात ठीक है या ग़लत, लेकिन पहले उनकी बात तसल्ली से सुनी तो जाए. अब वरिष्ठ लोग बातचीत द्वारा मसले को हल करना चाहते हैं. अब मसला नौजवानों के हाथ में नहीं है. इसलिए इसमें थोड़ी स्थिरता आई है. राज्य सरकार ने भी कश्मीर के साथ धोखा किया. शोपियां बलात्कार मामले में मुख्यमंत्री बिना जांच किए कह देते हैं कि दोनों लड़कियों ने एक छोटी सी नाली में आत्महत्या कर ली. इससे तो बेहतर होता कि आप ख़ामोश रहते. आप मुख्यमंत्री होते हुए लोगों की भावनाओं की चिंता किए बिना ऐसी बात बोल देते हैं, जिसमें ज़रा भी सच्चाई नहीं है. आपको इस बात का भी ख्याल नहीं है कि उन बदनसीब लड़कियों के परिवारीजनों पर क्या गुज़री होगी. नौजवान लड़कियों की मौत पर तरह-तरह के संदेह सामने आए होंगे. उनकी मौत को भी तमाशा बना दिया गया.

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2 comments

  • कश्मीर की जनता क्या चाहेगी जब नफरत ओर कट्टरता हद से ज्यादा बढ़ जाए कश्मीर को लेकर कई गलत निर्णय लिए अपने राजसत्ता के भूखे नेताओं ने जिससे कई सच्चे लोगों को मौत मिली इतिहास गवाह हैचाहे श्यामा परसाद मुखर्जी हों या लाल बहादुर शास्त्री इन्हीं सब बातों को लेकर सख्ती जरूरी है

  • I want to point out one thing in this article about the desription kashmiri youth and Bharat.
    This shows the saparation mantality of writer. She must realize kashmiri are also Bhartiya(Indians).If she BLAMES INDIAN ARMY FOR KASMIR SITUATION , WHAT WUOLD SHE SAY ABOUT TERROSISTS. There was no army in kashmir earlier because therewas no terrorism.Army is there because of terrorism. She must undestand it. chauthi duniya should not publish these types of article which supports saparatists

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