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कुंभलगढ नेशनल पार्क : फ़िक्र जानवरों की, आदिवासियों की नहीं

कुंभलगढ नेशनल पार्क : फ़िक्र जानवरों की, आदिवासियों की नहीं

राजस्थान में केंद्र सरकार और राज्य सरकार ने हज़ारों लोगों को विस्थापित करने की पूरी तैयारी कर ली है. इस बार विस्थापन का यह खेल किसी उद्योगपति को काऱखाना लगाने के नाम पर ज़मीन मुहैया कराने के लिए नहीं खेला जा रहा. दरअसल,एक उद्यान का दायरा बढ़ाकर उसे राष्ट्रीय उद्यान (नेशनल पार्क) बनाने की ख़ातिर आदिवासियों को उनके घरों से खदेड़ने का फरमान जारी कर दिया गया है. राज्य सरकार की दलील है कि इससे पर्यटन उद्योग तेज़ी से बढ़ेगा और राजस्व में वृद्धि होगी. ग़रीब आदिवासियों के आंसुओं की एवज में विदेशी सैलानियों के गोरे चेहरे पर मुस्कान पैदा कर धन बटोरने की चाहत रखने वाली सरकार का यह कौन सा अर्थशास्त्र है, इसे समझने की ज़रूरत है.

राजस्थान के कुंभलगढ़ राष्ट्रीय उद्यान को नेशनल पार्क का दर्जा मिलने के बाद राजस्थान के राजसमंद, उदयपुर और पाली ज़िले के क़रीब 127 गांवों के हज़ारों लोगों के समक्ष सर छुपाने और रोज़ी-रोटी का संकट पैदा हो गया है. विकास के नाम पर विस्थापन का क्रूर खेल खेलने वाली केंद्र और राज्य सरकार के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि आदिवासियों की जगह जानवरों को आश्रय देने के बाद, इस क्षेत्र में अपनी ज़मीन से बेदख़ल होने वाले लोगों को कहां बसाया जाएगा. ग़ौरतलब है कि कुंभलगढ़ राष्ट्रीय उद्यान के अंतर्गत आने वाले राजसमंद, उदयपुर और पाली ज़िले के दर्जनों गांव आदिवासी बहुल हैं. यहां निवास करने वालों में भीलों और गमेती आदिवासियों की संख्या सर्वाधिक है. कुंभलगढ़ अभ्यारण्य को राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने के बाद इसे अमलीजामा पहनाने की कार्रवाई शुरू कर दी गई है. इस बाबत राजसमंद ज़िला कलक्टर ने अधिसूचना जारी करते हुए इस क्षेत्र में निवास करने वालों से ज़मीन पर रहने के दावे मांगे हैं. चौथी दुनिया से बात करते हुए राजसमंद के ज़िला कलेक्टर डॉ. प्रीतम बी. यशवंत ने वन्यजीव सुरक्षा अधिनियम-1972 की धारा-21 का हवाला देते हुए कहा कि अधिसूचना में राष्ट्रीय उद्यान के क्षेत्र में आने वाले राजसमंद ज़िले के हिस्सों को उत्तरी सीमा, पूर्वी सीमा, दक्षिण सीमा व पश्चिम सीमा में बांटा गया है. कुंभलगढ़ राष्ट्रीय उद्यान परिक्षेत्र में आदिवासियों की बड़ी आबादी वर्षों से निवास करती है. चूंकि यह ज़मीन वन विभाग की है, लिहाज़ा नेशनल पार्क की मंज़ूरी मिलने के बाद उन्हें वहां से हटना होगा, ताकि यहां जानवरों को अच्छी तरह से बसाया जा सके. यह पूछे जाने पर कि 127 गांवों में रहने वाले आदिवासी परिवारों को कहां बसाया जाएगा, इस सवाल का जवाब राजसमंद के ज़िला कलेक्टर नहीं दे सके. इस बारे में जब उप मुख्य वन अधिकारी भंवर सिंह चौहान से पूछा गया तो, उनका जवाब हैरान करने वाला था. चौहान के अनुसार, कुंभलगढ़ राष्ट्रीय उद्यान को नेशनल पार्क का दर्जा मिलने के बाद राजस्थान खासकर मारवाड़ इलाक़े की तस्वीर बदल जाएगी. यहां पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, जिससे लोगों को रोज़गार मिलेगा. नेशनल पार्क आने वाले देशी-विदेशी सैलानियों की संख्या भी बढ़ेगी. उप मुख्य वन अधिकारी भंवर सिंह चौहान से जब यह पूछा गया कि कुंभलगढ़ राष्ट्रीय उद्यान को विकसित करने के बाद वहां रहने वाले हज़ारों आदिवासियों का क्या होगा और वह कहां जाएंगे, इस बात पर उन्होंने ख़ामोशी अख्तियार कर ली.

मांगू राम भील को यह समझ में नहीं आ रहा कि वह अपने परिवार के साथ जाए तो जाए कहां. वह कभी अरावली की ऊंची पहाड़ियों की तऱफ देखता है, तो कभी नज़रें झुका कर ज़मीन की तऱफ. अरावली श्रृंखला देखकर शायद, उसे अपने पुरखों की कहानियां याद आ रही हैं, जिनमें उसने सुना था कि किस तरह चित्तौड़ के महाराजा महाराणा प्रताप ने मुग़लों के ख़िला़फ लड़ाई में यहां निवास करने वाले भील आदिवासियों की मदद ली थी. राणा प्रताप का व्यवहार भी भीलों के प्रति मित्रवत रहा. यही कारण था कि सदियों से यहां निवास करने वाले भीलों व अन्य जनजातियों के लोग अपने लोकगीतों में राणाओं व भीलों की वीरता का गुणगान करते हैं, लेकिन अरावली की गोद में कई पीढ़ियों से रहने वाले ह़जारों भीलों को राष्ट्रीय उद्यान के नाम पर बेघर करने की क़वायद शुरू हो चुकी है.

शासन-प्रशासन की इस चुप्पी से यह साबित होता है कि कुंभलगढ़ में सदियों से निवास करने वाले जनजातियों की क़ीमत पर नेशनल पार्क बनाने की घोषणा इस इलाक़े में एक खूनी टकराव को आमंत्रण दे रही है. उल्लेखनीय है कि राजस्थान सरकार ने पिछले साल नवंबर में कुंभलगढ़ राष्ट्रीय उद्यान बनाने की घोषणा की थी, जिसके बाद राजसमंद, उदयपुर और पाली ज़िलों में विरोध शुरू हो गया. सरकार के इस आदेश का तीव्र विरोध वहां के किसान-मज़दूर संगठनों के अलावा मानवाधिकार कार्यकर्ता भी कर रहे हैं. राजसमंद में पेशे से पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता ओमप्रकाश शर्मा का कहना है कि केंद्र और राजस्थान सरकार कुंभलगढ़ नेशनल पार्क के नाम पर इस इलाक़े को नंदीग्राम बनाने की तैयारी कर ली है. शर्मा के मुताबिक़, कुंभलगढ़ राष्ट्रीय उद्यान को नेशनल पार्क बनाने से पहले सरकार ने यह नहीं सोचा कि यहां रहने वाले ग़रीब आदिवासियों का क्या होगा. प्रशासन ने बग़ैर किसी पूर्व तैयारी के इस जगह को खाली करने की सूचना प्रकाशित कर दी. खानापूर्ति के नाम पर ज़िला प्रशासन ने लोगों को दो महीने के भीतर ज़मीन का पट्टा और इससे जुड़े दस्तावेज़ तथा दावा पेश करने को कहा है. सरकार के इस फरमान के बाद इन ज़िलों के लोग हलकान हैं.

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पिछले दिनों राजसमंद ज़िला मुख्यालय में अखिल भारतीय किसान सभा और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में यहां के हज़ारों आदिवासी किसान इकट्ठे हुए. इन आदिवासियों ने कुंभलगढ़ राष्ट्रीय उद्यान के लिए ज़मीन से बेदख़ली को लेकर अपनी आवाज़ बुलंद की. उदयपुर की गोगुंदा, राजसमंद ज़िले की कुंभलगढ़ व पाली ज़िले की सादड़ी तहसील की क़रीब दो दर्जन पंचायतों के लोगों ने ज़िला कलेक्टर कार्यालय के सामने विरोध प्रदर्शन किया. आंदोलनकारियों का कहना है कि सरकार का यह फैसला उनके स्वाभिमान एवं हितों पर चोट करने वाला है, जिसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, चाहे इसके लिए भील आदिवासियों को अपनी जान ही क्यों न देनी पड़े. नेशनल पार्क के नाम पर हो रही इस बेदख़ली के बाद ग़रीब आदिवासी परिवारों का क्या होगा, वे कहां जाएंगे, क्या करेंगे, क्या खाएंगे, कैसे जीएंगे? इसका जवाब न तो इन ज़िलों के कलेक्टरों के पास है और न ही यहां के वन अधिकारियों के.

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उदयपुर ज़िले के प्रभावित गांव

प्रशासन द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार गोगुंदा तहसील के बागड़, भानपुरा, कांबा, मघा, कोविया, ढिकोड़ा, जोरमा, सिंघाड़ा, बोखाड़ा, दियाण, सायरा, चावड़ावास, भाटों का सायरा, सेमड़, केसर सिंह जी का गुडा, चराओं का गुडा, बटेरी, कुर्रा सूरजपोल, मजावड़ा, माल, और निचला कुर्रा आदि क्षेत्र नेशनल पार्क के दायरे में आएंगे.

राजसमंद ज़िले के प्रभावित गांव

ग्वार, कुंभलगढ़ किला, आरेट, उदावड़, पोखरिया, कोटड़ा, वरदड़ा, दूधालिया, फिंया, कडिया, मानवतों का गुड़ा, सेवंत्री, उमरवास, उदावड़, पोकरिया, कोटड़ा, दूधालिया व भानपुर नेशनल पार्क के दायरे में आएंगे.

ज़मीन का पट्टा वितरित नहीं

कुंभलगढ़ नेशनल पार्क के विरोध में राजसमंद, उदयपुर और पाली ज़िलों से प्रभावित गांवों के लोग अब आर-पार की लड़ाई लड़ने का मूड बना चुके है. आदिवासियों में सरकार के खिला़फ आक्रोश है, लेकिन इन ज़िलों के मौजूदा सांसदों और विधायकों को इसकी कोई फिक्र नहीं है. इन जनप्रतिनिधियों ने नेशनल पार्क के चलते होने वाले विस्थापन के बारे में सरकार के सामने पीड़ित लोगों का कोई पक्ष नहीं रखा है. ग़ौरतलब है कि वर्ष 2006 में वन क़ानून बनने के बाद राज्य सरकार ने महज़ 32 हज़ार वनवासियों को ही आधे-अधूरे पट्टे वितरित किए हैं. बाक़ी बचे लाखों परिवारों का क्या होगा, सरकार के पास इसका कोई जवाब नहीं है.

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सरकार राजस्थान में नक्सलवाद का बीज बो रही है

राजस्थान के भीलों की वीरता की कहानी हमारे इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों से दर्ज है. मध्य काल में म़ुगलों के ख़िला़फ लड़ाई में भील सेनाओं ने अदम्य वीरता और साहस का परिचय दिया था, लेकिन आज वही भील और अन्य आदिवासी समाज कुंभलगढ़ नेशनल पार्क की वजह से विस्थापित होने की कगार पर पहुंच चुका है. जिस ज़मीन पर उनकी पीढ़ियों ने ग़ुजर-बसर की, अब उसी ज़मीन से उन्हें भगाने की तैयारी हो रही है. विरोध करने पर प्रशासन दो टूक कहता है कि वह शासनादेश का पालन कर रहा है. सरकार के इस फैसले से वनवासी हताश और परेशान हैं. हैरत इस बात की है कि पिछले कई महीनों से राजस्थान में नेशनल पार्क और आदिवासियों के विस्थापन का मुद्दा ज्वलंत है, लेकिन मीडिया और दिल्ली में राजनीति कर रहे नेताओं को इसकी भनक तक नहीं है. केंद्र सरकार समय-समय पर नक्सलवाद और उसके विस्तार को रोकने के लिए प्रभावित राज्य सरकारों के साथ राजधानी दिल्ली में बैठकें करती है, लेकिन जिस तरह कुंभलगढ़ नेशनल पार्क के नाम पर इलाक़े के आदिवासी विस्थापित होंगे, उससे इस क्षेत्र में नक्सलवाद पनपेगा इससे इनकार नहीं किया जा सकता. ग़ौरतलब है कि राजस्थान देश का पहला ऐसा सूबा है, जहां अब तक नक्सलवाद जैसी समस्या नहीं है. हालांकि इस राज्य में जिस तरह का सामाजिक वातावरण बन रहा है, उससे यह कहा जा सकता है कि इस क्षेत्र में नक्सलवाद पनप सकता है. केंद्र और राज्य सरकार की जैसी नीति है, उससे लगता है कि वे राजस्थान के मारवाड़ इलाक़े को नक्सलवाद की आग में झोंकना चाहती हैं. कुंभलगढ़ नेशनल पार्क के दायरे में आने वाले आदिवासी अपनी ज़मीन किसी भी सूरत में नहीं छोड़ना चाहते. वहीं दूसरी तऱफ शासन-प्रशासन हर क़ीमत पर उस जगह को खाली कराने पर अड़ा हुआ है. ऐसे में यहां की शांति भंग होने की आशंका बनी हुई है. सरकार को चाहिए कि वह कोई ऐसा सर्वमान्य हल निकाले, जिससे सरकार यहां के निवासियों की परेशानी भी हल हो जाए और सरकार का मक़सद भी पूरा हो सके.

3 comments

  • आदरणीय सर जी,
    उदारीकरण का झुनझूना लाकर प्रधानमंत्री ने इस देश को ९२ में ही एक नई गुलामी की तरफ मौड़ दिया था..उदारीकरण के साथ पूंजीवाद और साम्रज्यवाद के राक्षश भी देश में घुस गए….अब पर्यटन,शोपिंग माल , मेट्रो ट्रेन्स, ब्रांड उद्योग आदि के नाम पर देश में नए उप निवेश खड़े करने का षड़यंत्र चल रहा हे..अब लोगो को अपने दम पर ही संघर्ष करना होंगे | चोथी दुनिया जिंदाबाद ,
    प्रदीप शर्मा, मंदसौर, मध्य प्रदेश
    २३ अप्रेल २०१२

  • अगर सर्कार अपनेही देश के मुल्निवासिओं को हटाकर व्हों किसी उद्योगपति को जमीं दी जारही हे तो कोई नई बात नहीं हे यह तो हमेसा से होता आया हे और होता रहेगा , उनेह सर्कार ने कभी भी देश का नागरिक नहीं समजा इसी लिए सर्कार जगह जगह अपना महाटुव खोटी जा रही हे ,एसा लगता हे की कांग्रेस के द्जदा दिन नहीं हें .

  • महाराणा प्रताप का जन्म कुम्भलगढ़ के किले में ही हुआ था और भीलों और आदिवासियों(वनवासियों) ने ही उनका साथ दिया था. ऐसे में उन्ही भीलों और आदिवासियों/वनवासियों को विस्थापन की सजा देना महाराणा प्रताप की शाहदत का भी अपमान है. क्या अशोक गहलोत और केंद्र की गूंगी बहरी अंधी सर्कार को इसका कोई आभास है?

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