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लालबत्ती पर लुटता बचपन
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लालबत्ती पर लुटता बचपन

राजू की उम्र महज़ 5 साल है. नन्हें-नन्हें हाथ-पैर, मासूम चेहरा, नन्हीं आंखें और शरीर पर मैले-कुचैले कपड़े पहने राजू दिल्ली के बाराखंभा चौराहे पर बैठा सिग्नल लाल होने का इंतज़ार कर रहा है. अचानक सिग्नल लाल होता है, गाड़ियां रुकती हैं. झट से वह उठकर गाड़ियों के बीच में जाकर तमाशा दिखाने लगता है. लोहे की रॉड्‌स के बीच से अपने शरीर को मुश्किल से एक से दूसरे पार निकालता है. उसका चेहरा शरीर पर आए ज़ख्म के दर्द को साफ बयां करता है, लेकिन वह कमर हिलाते हुए जल्दी से गाड़ी में बैठे बाबुओं-साहबों से पैसे मांगना शुरू करता है. उसे महज़ दो-चार रुपये मिलते हैं. इतने में सिग्नल हरा हो जाता है और वह निराश होकर बचते हुए भागता है और बगल में बैठकर अगली लालबत्ती का इंतज़ार करने लगता है. बाराखंभा रेडलाइट पर अकेले राजू ही नहीं, बल्कि उसकी मां, बुआ और छोटे-छोटे भाई-बहन यानी पूरा परिवार इसी तरह रोटी के जुगाड़ में लगा रहता है. आज हज़ारों परिवार ऐसे हैं, जिनकी शाम की रोटी इन लालबत्तियों पर तमाशे करके ही चलती है.

आश्चर्य है कि जिन मासूम बच्चों के हाथों में किताब और कलम होनी चाहिए, उन हाथों में आज दूसरों का मनोरंजन करने की ज़िम्मेदारी है. ग्रामीण इलाक़ों में तो हालत यह है कि लाखों बच्चों को किताब-पेंसिल तो दूर, पेट भर खाना भी नसीब नहीं होता. उनके अभिभावक ग़रीबी की वजह से ज़्यादा दिनों तक अपने बच्चों को नहीं पढ़ा पाते. बच्चों के दर-बदर होते और लुटते बचपन के लिए उनके मां-बाप पूरी तरह ज़िम्मेदार हैं, जो उन्हें दुनिया में लाकर उनके नसीब पर सड़कों पर छोड़ देते हैं. ज़िम्मेदार सरकार भी है, जो देश से ग़रीबी मिटाने समेत समस्यारहित राष्ट्र के निर्माण के वादे करती है.

राजू से हमने घंटों बातचीत की. पूरी तरह घुल-मिल जाने पर राजू से उसकी पढ़ाई के बारे में पूछा तो वह मासूमियत भरी नज़रों से तुतलाते हुए बताता है, मां से अक्सर कहता हूं कि मुझे भी पढ़ना है, कॉपी-कलम दो. इस पर वह डांट देती है. कहती है कि खाकर सो जाओ, सुबह रेडलाइट पर जाना है. इतने में राजू पूछ बैठता है, भैया, मां मुझे रोज़ क्यूं भेज देती है, क्यूं नहीं पढ़ने देती? राजू के इस सवाल का हमारे पास कोई जवाब नहीं था. राजू का बड़ा भाई अशोक कहता है कि हमारे माता-पिता भी तमाशे दिखाते थे. उसके बाद वह और अब उसके छोटे भाई-बहन करतब दिखाते हैं, जिन्हें प्रशिक्षण वह ख़ुद देता है. बात करते-करते उसकी आंखें नम हो जाती हैं. वह कहता है कि उसे अबोध छोटे भाई-बहनों को देखकर दु:ख भी होता है, लेकिन क्या करे? अगर ख़ुद तमाशा दिखाएगा तो लोग पैसा नहीं देंगे. छोटे-छोटे बच्चों के तमाशों को देखकर ही लोग हमदर्दीवश पैसे देते हैं, जिससे घर का चूल्हा जलता है. अशोक बताता है कि लालबत्तियों पर पुलिस ख़ूब परेशान करती है. कभी तमाशा दिखाते हुए पकड़ कर पीट देती है तो कभी हवालात में रात भर बंद कर देती है. नतीजतन तमाशा दिखाने के लिए वह स्थान बदलता रहता है. सरकार से मदद मिलने के नाम पर अशोक कहता है कि वह कई बार दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, किरण वालिया और मंगतराम सिंघल जैसे कई मंत्रियों के दफ्तर अपनी फरियाद लेकर गया, लेकिन कभी उसे वहां से भगा दिया गया तो कभी उसकी बात वहां तक पहुंच ही नहीं पाई, पर बाहर सरकारी बाबुओं ने आश्वासन ज़रूर दिए.

लेनसेट के 2008 में 20 देशों पर किए गए एक अध्ययन के मुताबिक़, भारत में तमाशबीन बच्चों की संख्या क़रीब 61 मिलियन से अधिक है. इनमें आधे से अधिक (क़रीब 51 फीसदी) बच्चों की उम्र 5 साल से कम है. ऐसा नहीं कि करतब दिखाने वाले सभी बच्चों का यह पेशा वंशानुगत रहा है. चूंकि भीख मांगने पर उन्हें पुलिस द्वारा परेशान किया जाता है, इसीलिए ये बच्चे छोटे-मोटे करतब दिखाकर पैसा मांगते हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक़, केवल राजधानी दिल्ली में 60 हज़ार से ज़्यादा बाल भिखारी हैं. कॉमनवेल्थ गेम्स के चलते दिल्ली में सामाजिक कल्याण विभाग ने भिखारियों की संख्या कम करने के लिए मुहिम छेड़ी. ग़ैर सरकारी संगठनों को यह जिम्मा दिया गया. विभाग ने 1098 नंबर लांच किया, जिस पर कॉल करने पर ग़ैर सरकारी संगठन के अधिकारी आकर उन भिखारियों को हिरासत में ले लेते थे. पापी पेट का सवाल था. ट्रेंड बदला. इन बच्चों को अब आप लालबत्तियों पर भीख मांगते नहीं, बल्कि कार का शीशा साफ करते या फूल-किताबें बेचते पाएंगे. दलाल इन बच्चों का ख़ूब दोहन भी करते हैं. आश्रम रेडलाइट पर किताबें बेचने वाला 10 वर्षीय दीपक बताता है कि वह दिन भर में 500 से 600 रुपये तक की किताबें बेच लेता है. इसके बदले उसका मालिक प्रतिदिन 40 रुपये देता है. दीपक कहता है कि उसके मालिक ने आश्रम में ही एक कमरा लिया है, जहां उसके सत्रह-अट्ठारह दोस्त रहते हैं और वे भी दूसरी लालबत्तियों पर किताबें बेचते हैं.

आश्चर्य है कि जिन मासूम बच्चों के हाथों में किताब और कलम होनी चाहिए, उन हाथों में आज दूसरों का मनोरंजन करने की ज़िम्मेदारी है. ग्रामीण इलाक़ों में तो हालत यह है कि लाखों बच्चों को किताब-पेंसिल तो दूर, पेट भर खाना भी नसीब नहीं होता. उनके अभिभावक ग़रीबी की वजह से ज़्यादा दिनों तक अपने बच्चों को नहीं पढ़ा पाते. बच्चों के दर-बदर होते और लुटते बचपन के लिए उनके मां-बाप पूरी तरह ज़िम्मेदार हैं, जो उन्हें दुनिया में लाकर उनके नसीब पर सड़कों पर छोड़ देते हैं. ज़िम्मेदार सरकार भी है, जो देश से ग़रीबी मिटाने समेत समस्यारहित राष्ट्र के निर्माण के वादे करती है. इन बच्चों को तमाशा करने या भीख मांगने से तो रोका जा सकता है, लेकिन इससे इनके पेट की भूख ख़त्म नहीं हो सकती. पेट की आग शांत करने के लिए ये कभी भीख मांगेंगे, कभी किताब बेचेंगे, कभी तमाशा दिखाएंगे तो कभी ग़लत राह का अनुसरण कर लेंगे. देश में इसी साल राइट टू एजूकेशन एक्ट लागू हो चुका है. प्रधानमंत्री समेत तमाम नेता देश की गली-गली में शिक्षा पहुंचाने का दावा करते हैं. पूरे देश की बात छोड़िए, केवल राजधानी दिल्ली की बाराखंभा रेडलाइट का उदाहरण ले लीजिए, जहां दिन भर सरेआम मासूम बच्चे आपको तमाशा करते नज़र आ जाएंगे.

बाराखंभा के आसपास का कनॉट प्लेस दिल्ली का सबसे बड़ा पॉश इलाक़ा है. दिन भर न जाने कितने नेताओं की गाड़ियां इस इलाक़े से होकर गुज़रती हैं. मीडिया-कैमरे के सामने ग़रीबी मिटाने, शिक्षा देने और बेरोज़गारी दूर करने जैसे तमाम वादे करने वाले इन नेताओं को जब फोन और लैपटाप से फुर्सत मिलती है तो वे मासूम चेहरों की तऱफ देख 1-2 रुपया उछाल कर आगे बढ़ जाते हैं. सवाल उठता है कि क्या संविधान ने इन बच्चों को जीने का यही अधिकार दिया है? क्या इन्हें शिक्षा पाने का अधिकार नहीं है? अगर देश के नेताओं को सरेआम लालबत्तियों पर तमाशा करते बच्चे नज़र नहीं आते हैं तो फिर गली-गली में शिक्षा के प्रसार-प्रचार की क्या गारंटी है?

आंकड़ों में बाल श्रमिक

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हाल में स्वीकारा है कि भारत में 37 फीसदी लोग ग़रीबी रेखा से नीचे रहते हैं. अभिभावकों की इसी ग़रीबी की वजह से बाल मज़दूरी का जन्म होता है. बाल मजदूरी आज भी पूरे देश के लिए चिंता का विषय है. वैश्विक तौर पर भारत में सबसे ज़्यादा बाल मज़दूर हैं. सरकार ने 14 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए काम करना ग़ैरक़ानूनी बताया है, लेकिन हक़ीक़त में बहुत सारे कारखाने, फैक्ट्रियां, दुकाने, गैरेज, कृषि या अन्य व्यापार हैं, जहां खुलेआम बच्चों से मज़दूरी कराई जा रही है. 21 नवंबर, 2005 को एक एनजीओ कार्यकर्ता ने श्रम विभाग के सहयोग से दिल्ली के सीलमपुर स्थित 100 से अधिक अवैध कारखानों में छापेमारी कर 480 से अधिक बाल श्रमिकों को मुक्त कराया. उसके बाद बाल श्रमिकों से संबंधित ग़ैर सरकारी संगठनों ने दिल्ली सरकार के साथ संगठित होकर इस मामले पर कार्रवाई की योजना बनाई. 1997 में कांचीपुरम में किए गए एक शोध से खुलासा हुआ कि ज़िले में केवल सिल्क बुनने के व्यवसाय से क़रीब 60,000 से ज़्यादा बच्चे जुड़े रहे. जबकि 2007 में रूरल इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट एजूकेशन की सार्थक पहल के बाद इनकी संख्या घटकर क़रीब 4,000 से नीचे पहुंच गई. भारत में स्ट्रीट चिल्ड्रेंस की संख्या भी सबसे ज़्यादा है. एक आंकड़े के मुताबिक़, देश में क़रीब 18 मिलियन से अधिक स्ट्रीट चिल्ड्रेन हैं. वैसे तो देश में बच्चों की भुखमरी, ग़रीबी की विकट स्थिति पर अनगिनत अध्ययन और रिपोर्ट सामने आ चुकी हैं, लेकिन नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे द्वारा 2005-06 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 8 सालों में बच्चों के पोषण संबंधी समस्या में कोई सुधार नहीं हो पाया है. सर्वे के मुताबिक़, भारत में 3 साल से कम उम्र के क़रीब 46 फीसदी बच्चे सामान्य से कम वज़न के हैं. आंकड़े यह भी बताते हैं कि मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में बच्चों की आधी से ज़्यादा आबादी कुपोषण की शिकार है. वैसे बाल मज़दूरी की समस्या केवल हमारे देश की ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व की है. यूनीसेफ के मुताबिक़, पूरे विश्व में 5 से 14 साल के क़रीब 158 मिलियन बच्चे बालश्रम के शिकार हैं. इसमें घरेलू कामकाज से संबद्ध बच्चे शामिल नहीं हैं. सीएसीएल की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 70 से 80 लाख बाल श्रमिक हैं. एक आंकड़े पर ग़ौर करें तो एशिया में बच्चों की आबादी का 22 फीसदी, अफ्रीका में 32 फीसदी, लैटिन अमेरिका में 17 फीसदी एवं यूएस, कनाडा, यूरोप और दूसरे धनी देशों में एक-एक फीसदी हिस्सा मज़दूरी करने के लिए मजबूर है.

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