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मध्‍य प्रदेश: पुलिस बर्बरता के शिकार हुए किसान

मध्‍य प्रदेश: पुलिस बर्बरता के शिकार हुए किसान

भूमि अधिग्रहण के लिए सरकार भले ही एक मज़बूत क़ानून बनाने की बात कर रही हो, लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है. यही वजह है कि देश की सभी राजनीतिक पार्टियां किसानों और मज़दूरों के हितों की अनदेखी करते हुए निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने में जुटी हैं. बात चाहे कांग्रेस शासित महाराष्ट्र की हो या फिर भाजपा शासित मध्य प्रदेश की, हालात कमोबेश एक जैसी ही हैं. मध्य प्रदेश में किसानों की असहमति और भारी विरोध के बावजूद तेज़ी से उनकी उपजाऊ ज़मीन का अधिग्रहण किया जा रहा है. राज्य सरकारें विदेशी कंपनियों को आकर्षित करने के लिए करोड़ों रुपये ख़र्च कर निवेशकों के सम्मान में समारोह आयोजित करती है. समारोह के बाद सरकार और प्राइवेट कंपनियों के बीच क़रार (एमओयू) किए जाते हैं. किसी कारणवश अगर निजी कंपनियां अपनी परियोजनाओं को पूरी नहीं कर पाती है तो सरकार उनका एमओयू रद्द करने की बजाय उसे हर तरह की सुविधा मुहैया कराती है. इसकी वजह यह है कि शासन के जुड़े लोगों का कहीं न कहीं आर्थिक स्वार्थ इसके पीछे छुपा हुआ है. कई राज्यों में तो सरकार ने टेंडर भरने वाली कंपनियों को भी निवेशक बताकर एमओयू पर दस्तख़त कर दिए हैं. वहीं कुछ कंपनियां इस आड़ में किसानों से सस्ती दरों पर ज़मीनें ख़रीद कर उनका उपयोग दूसरे कारोबार में कर रही है. ऐसा ही मामला मध्य प्रदेश का है, जहां मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर इन कंपनियों से चंदा लेने का आरोप लग रहा है. ऐसे आरोपों की गंभीरता तब और ज़्यादा बढ़ जाती है, जब किसानों की अनदेखी करते हुए पुलिस-प्रशासन कंपनी का एजेंट बनता दिख रहा हो और किसान आंदोलन को बेरहमी से दबा रहा हो. प्रशासन की इस एकतरफा कार्रवाई का विरोध जनता दल यूनाइटेड अध्यक्ष और एनडीए संयोजक शरद यादव और लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी (लोसपा) के नेता रघु ठाकुर भी कर रहे हैं. वहीं एकता परिषद के प्रमुख पी वी राजगोपाल ने भी राज्य सरकार की इस कार्रवाई का विरोध किया है. दूसरी तऱफ कांग्रेसी विधायक संजय पाठक इस मुद्दे पर शिवराज सरकार के साथ खड़े नज़र आ रहे हैं. अगर देखा जाए तो यह मामला राजनीति से ऊपर उठकर किसान समर्थक और किसान विरोधी नेताओं के बीच का हो गया है. संजय पाठक जिस विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं, वहां बुजबुजा और डोकरिया में वेलस्पन एनर्जी अपने पावर प्लांट के लिए भूमि अधिग्रहण कर रहा है, जबकि स्थानीय किसान इसका विरोध कर रहे हैं. किसानों का कहना है कि वे अपनी बहु़फसली ज़मीन किसी भी क़ीमत पर नहीं देना चाहते हैं. इसके विरोध में किसानों ने अपने खेत में आत्मदाह करने के लिए चिताएं भी सजा ली हैं. किसानों के इस अहिंसात्मक आंदोलन को कुचलने के लिए पुलिस ने पिछले दिनों उन पर जमकर लाठियां बरसाईं. ऐसी स्थिति में स्थानीय कांग्रेस विधायक संजय पाठक को किसानों के साथ होना चाहिए था, लेकिन वह शिवराज सरकार के साथ खड़े नज़र आए. पुलिस की यह बर्बरता इस बात का संकेत है कि किसान हितैषी का ढोंग रचने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी निजी कंपनियों के हितों की रक्षा कर रहे हैं. ऐसे में उनके लिए राज्य के किसानों का हित कोई मायने नहीं रखता है.

किसान का बेटा कहना जितना आसान है उतना ही मुश्किल है किसानों के अधिकारों की रक्षा करना. डोकरिया-बुजबुजा में भूमि अधिग्रहण के ख़िला़फ आंदोलन कर रहे किसानों को जिस तरह बर्बरता से पीटा गया, उसने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की कथनी और करनी के अंतर को सा़फ कर दिया है. राज्य प्रशासन निजी कंपनियों के लिए एजेंट की भूमिका में है. स्थानीय किसानों का अहिंसात्मक आंदोलन शासन बल प्रयोग करके दबा रहा है. वहीं सत्ता और विपक्ष के राजनेता इस अमानवीय व्यवहार के ख़िला़फ कोई कार्रवाई करने की बजाय स़िर्फ आश्वासन दे रहे हैं. क्या यही लोकतंत्र है, जिसमें आम लोगों को महज़ वोट देने का अधिकार है. अगर इसे लोकतंत्र कहा जाता है तो फिर यह शासन का सबसे अच्छा विकल्प कैसे हो सकता है.

बुजबुजा-डोकरिया के पीड़ित किसानों की बात सरकार नहीं सुन रही है. ऐसे में उन्हें भाजपा और  कांग्रेस से इतर दूसरी राजनीतिक पार्टियां एवं सामाजिक संगठनों का एकमात्र सहारा दिखाई दे रहा है. उन्हीं के सहयोग से स्थानीय किसान अपना आंदोलन चला रहे हैं. कुछ समय पहले डोकरिया गांव की एक महिला सुनिया बाई ने पुलिस की बर्बरता से तंग आकर आत्महत्या कर ली. स्थानीय ग्रामीणों, ख़ासकर महिलाओं ने सुनिया बाई का अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया. उनकी मांग थी कि सरकार उन अधिकारियों पर कार्रवाई करे, जिनकी वजह से इस महिला को ख़ुदकुशी के लिए मजबूर होना पड़ा. मध्य प्रदेश शासन-प्रशासन ने महिलाओं के इस विरोध-प्रदर्शन को ग़ैर क़ानूनी ठहराते हुए दमन का सहारा लिया. जब पुलिस ग़रीब-निर्दोष किसानों पर जुल्म ढा रही थी, उस समय मौक़े पर ज़िलाधिकारी अशोक सिंह और पुलिस अधीक्षक राजेश हिंगणकर भी मौजूद थे. बीते 15 नवंबर को निहत्थे ग्रामीणों पर पुलिस ने हमला कर दिया. लाठियों, लात-घूंसों और बंदूक की बटों से असहाय ग्रामीणों को पीटा गया. मानवता की हद उस वक्त ख़त्म हो गई, जब पुलिसकर्मियों ने प्रदर्शनकारी महिलाओं पर भी ताबड़तोड़ लाठियां बरसाईं और उन्हें बेरहमी से सड़कों पर घसीटा. इतना ही नहीं, पुलिसकर्मियों ने सुनिया बाई के शव के साथ भी नरमी नहीं बरती. प्रदर्शन कर रहे लोगों के तंबुओं को भी गिरा दिया गया. इससे अधिक शर्मनाक बात और क्या हो सकती है कि जिस दिन देश की लाखों बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र के लिए व्रत रखे हुई थीं, उसी दिन मध्य प्रदेश के ज़िला कटनी में बहनों के साथ प्रशासन बदसलूकी कर रहा था. कटनी ज़िला प्रशासन ने इस मामले में जनता दल यूनाइटेड के पूर्व विधायक सरोज बच्चन समेत 12 लोगों को गिरफ्तार किया, जिसमें तीन महिलाएं भी शामिल थीं. पुलिस जबरन सुनिया बाई के शव को दूसरी जगह ले गई और उसका दाह संस्कार कर दिया. इस घटना के बाद राज्य विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल घटनास्थल पर पहुंचे, लेकिन उनके पहुंचने से पहले ही पुलिस ने अपने नापाक मंसूबों को अंज़ाम दे दिया था. हालांकि यह कहना मुश्किल है कि अजय सिंह अगर घटनास्थल पर कार्रवाई से पहले पहुंच जाते तो पुलिस की बर्बरता कुछ कम हो जाती, क्योंकि राज्य सरकार यह तय कर चुकी थी कि चाहे कुछ भी हो, कंपनियों को हर हाल में ज़मीन देनी है. जब एनडीए संजोजक शरद यादव की बातों का शिवराज सरकार पर कोई असर नहीं हुआ तो नेता प्रतिपक्ष के आने का उनके ऊपर क्या असर हो सकता है. ग़ौरतलब है कि इस कार्रवाई से महज़ छह दिन पहले शरद यादव डोकरिया-बुजबुजा आए थे. उन्होंने किसानों की जायज़ मांगों का समर्थन भी किया था. शरद यादव ने राज्य सरकार को किसानों के हितों की उपेक्षा करने के लिए चेतावनी भी दी थी, लेकिन राज्य सरकार पर इसका कोई असर नहीं हुआ. आख़िरकार उसे जो करना था, उसने वही किया.

डोकरिया-बुजबुजा में चल रहे इस आंदोलन ने मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार ही नहीं, बल्कि विपक्षी कांग्रेस की भी पोल खोल दी है. पिछले तीन वर्षों से चल रहे इस आंदोलन की ओर किसी का ध्यान नहीं है. विपक्षी नेताओं की नींद तीन साल बाद खुली भी, तो वह स़िर्फ आश्वासन तक सीमित होकर रह गई. स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि कांग्रेसी विधायक संजय पाठक तो वेस्पन एनर्जी के साथ हैं, क्योंकि उन्होंने अपने क़रीबी नाते-रिश्तेदारों को इस प्रोजेक्ट के ठेके वग़ैरह दिला रखे हैं. इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि वेलस्पन एनर्जी के अधिकारियों ने संजय पाठक को कुछ और देने की बात कही होगी, जिसके कारण वह किसानों की अनदेखी कर रहे हैं.

कुछ समय पहले डोकरिया गांव की एक महिला सुनिया बाई ने पुलिस की बर्बरता से तंग आकर आत्महत्या कर ली. स्थानीय ग्रामीणों, ख़ासकर महिलाओं ने सुनिया बाई का अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया. उनकी मांग थी कि सरकार उन अधिकारियों पर कार्रवाई करे, जिनकी वजह से इस महिला को ख़ुदकुशी के लिए मजबूर होना पड़ा. मध्य प्रदेश शासन-प्रशासन ने महिलाओं के इस विरोध-प्रदर्शन को ग़ैर क़ानूनी ठहराते हुए दमन का सहारा लिया. जब पुलिस ग़रीब-निर्दोष किसानों पर जुल्म ढा रही थी, उस समय मौक़े पर ज़िलाधिकारी अशोक सिंह और पुलिस अधीक्षक राजेश हिंगणकर भी मौजूद थे. बीते 15 नवंबर को निहत्थे ग्रामीणों पर  पुलिस ने हमला कर दिया. लाठियों, लात-घूंसों और बंदूक की बटों से असहाय ग्रामीणों को पीटा गया.

हालांकि सरकार इस घटना की जांच करने की बात कह रही है, लेकिन ऐसा लगता नहीं है कि इस मामले में कुछ हो पाएगा, क्योंकि मुख्यमंत्री से लेकर कृषि और उद्योग मंत्री तक का रवैया ढुलमुल है. सरकार ने आत्महत्या करने वाली सुनिया बाई के पति को आर्थिक मदद तो दी है, लेकिन उसकी ज़मीन पर कंपनी का क़ब्ज़ा करा दिया. आख़िर यह कैसे संभव हुआ कि जिस ज़मीन को वापस पाने के लिए सुनिया बाई ने आत्महत्या की, उसी ज़मीन को उसके पति छक्का गड़ारी ने कंपनी को देने की स्वीकृति दे दी. संभव है, उसे ऐसा करने के लिए प्रशासन ने उसके ऊपर दबाव डाला हो या फिर उसे किसी तरह की धमकी दी गई हो. ग़ौरतलब है कि छक्का गड़ारी से पुलिस ने बयान भी बदलवा दिया है. इसकी सूचना जब आंदोलन में शामिल जदयू के पूर्व विधायक सरोज बच्चन को मिली, तो वह गड़ारी से मिलने के बाद बरही थाने गए. उनके साथ कई किसान और पत्रकार भी थे, लेकिन पुलिस ने सरोज बच्चन के साथ जिस तरह की बदसलूकी की, उससे तो यही लगता है कि जब पुलिस एक पूर्व विधायक के साथ गलत बर्ताव कर सकती है, तो उसने  छक्का गड़ारी के साथ क्या किया होगा. इतना ही नहीं, थाना प्रभारी ने सरोज बच्चन पर थाने पर पथराव करने का झूठा मामला भी दर्ज कर लिया. इस आंदोलन की एक ख़ास बात यह भी है कि यहां वेलस्पन एनर्जी और सरकार ने मिलकर लोगों के बीच फूट डालने की क़वायद भी शुरू कर दी है. यहां के कुछ बेरोज़गार लोगों को गुमराह किया जा रहा है कि पावर प्लांट बनने से उन्हें इस कंपनी में रोज़गार मिल जाएगा. इस वजह से कुछ लोग कंपनी के समर्थन में आ गए हैं. इन लोगों ने वेलस्पन बुलाओ-रोज़गार लाओ जैसे नारे भी लगाने शुरू कर दिए हैं. हालांकि आंदोलन करने वाले लोग इससे निराश नहीं हैं. उनका कहना है कि कंपनी का यह षड्यंत्र कभी कामयाब नहीं हो सकता, क्योंकि लोग अब सच्चाई को समझने लगे हैं.

इतना ही नहीं, कंपनी ने स्थानीय मीडिया को भी अपने पक्ष में करने की कोशिश की है. इस मामले में का़फी हद तक वह कामयाब भी रही है. यही वजह है कि मीडिया में भी आंदोलन से जुड़ी ख़बरों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है. चौथी दुनिया ने इस आंदोलन से जुड़ी ख़बरों को प्रमुखता से प्रकाशित किया, जिसका असर इस क्षेत्र में दिखाई दे रहा है. चौथी दुनिया में पूर्व प्रकाशित ख़बरों की वजह से दूसरे क्षेत्र के किसान भी इस आंदोलन को समर्थन देने के लिए यहां आने लगे हैं. आंदोलन कर रहे किसानों का हौसला पुलिस बर्बरता से पस्त नहीं हुआ है. किसान अभी भी अपनी मांगों पर डटे हुए हैं और आंदोलन जारी रखने की बात कह रहे हैं, लेकिन डर इस बात का है कि अगर सरकार इस ओर ध्यान नहीं देती है तो आने वाले दिनों में हालात भयावह हो सकते हैं. सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि किसानों के सब्र की भी एक सीमा है. अगर अहिंसात्मक तरीक़े से जारी आंदोलन को प्रशासन बल प्रयोग करके दबाता है तो संभव है कि किसान भी हिंसा पर उतारू हो जाएं. अब यह मध्य प्रदेश सरकार को तय करना है कि वह किसानों के हितों की रक्षा करती है या किसानों को आत्महत्या करने या हथियार उठाने के लिए बाध्य करती है.

1 comment

  • chauthiduniya

    पोलिस की गोलियां हिन्हुओं पर ही चलती हैं —- मुसलमानों पर नहीं –वसुन्द्रा राजे के बी जे पी के राज में ४० से अधिक हिन्दू – गुजरों की पोलिस द्वारा हत्याएं —-आग लगाने वाले , तोड़ – फोड़ करने वाले , पोलिस पर पत्थराव करने वाले , हिन्दुओं की ह्त्या करने वाले , बलात्कार करने वाले मुसलमानों की पोलिस द्वारा हत्याएं कभी नहीं —केवल हिन्दुओं की हत्याएं पोलिस द्वारा —–

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