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मगधः आंगनवाड़ी केंद्रों में बंदरबांट

मगधः आंगनवाड़ी केंद्रों में बंदरबांट

मगध प्रमंडल में बच्चों और गर्भवती महिलाओं को कुपोषण से बचाने के लिये बाल विकास परियोजना के तहत सरकार की ओर से चलाए जा रहे अधिकांश आंगनवाड़ी केंद्रों की स्थिति का़फी दयनीय है. सारी सामग्री और तमाम सुविधाएं उपलब्ध होने के बाद भी आंगनवाड़ी केंद्रों की तस्वीर नहीं बदली. उपलब्ध खाद्य सामग्री का अधिकांश हिस्सा बाज़ार में चला जाता है और मिलने वाली राशि का बंदरबांट हो जाता है. यहां न तो निर्धारित मैन्यू के अनुसार पोषाहार मिल पाता है और न ही आंगनवाड़ी केंद्रों पर मैन्यू बोर्ड है.

भ्रष्टाचार की बहती गंगा में हर कोई हाथ सा़फ करने में लगा है. गया ज़िले में गया शहरी क्षेत्र समेत सभी 25 प्रखंडों में कुल 3334 आंगनवाड़ी केंद्र चल रहे हैं. यहां नियमित संचालन की शिकायतें अक्सर आती रहती हैं. हालांकि, ज़िला प्रोग्राम पदाधिकारी कौशल किशोर प्रसाद ने बताया कि पिछले वर्ष क़रीब एक सौ आंगनवाड़ी केंद्रों में गड़बड़ी की शिकायत आई थी, जिसमें 50 पर कार्रवाई की गई.

पंचायत स्तर से लेकर अनुमंडल स्तर के सरकारी पदाधिकारी व जनप्रतिनिधियों का एक लंबी चेन है, जो आंगनवाड़ी केंद्रों के ज़मीनी स्तर पर सुचारू संचालन में बाधक है. हालांकि इस चेन के माध्यम से काग़ज़ पर केंद्रों के सुचारू संचालन की बात कही जाती है, लेकिन वास्तविकता कुछ और है. यदि निष्पक्ष एजेंसी से इसकी जांच कराई जाए तो बड़े-बड़ों के होश उड़ जाएंगे. लेकिन, ऐसा करना बड़ा मुश्किल लगता है क्योंकि भ्रष्टाचार की बहती गंगा में हर कोई हाथ सा़फ करने में लगा है. गया ज़िले में गया शहरी क्षेत्र समेत सभी 25 प्रखंडों में कुल 3334 आंगनवाड़ी केंद्र चल रहे हैं. यहां नियमित संचालन की शिकायतें अक्सर आती रहती हैं. हालांकि ज़िला प्रोग्राम पदाधिकारी कौशल किशोर प्रसाद ने बताया कि पिछले वर्ष क़रीब एक सौ आंगनवाड़ी केंद्रों में गड़बड़ी की शिकायत आई थी. जिसमें 50 पर कार्रवाई की गई. उन्होंने बताया कि गया ज़िले में 147 मिनी आंगनवाड़ी तथा 242 अतिरिक्त आंगनवाड़ी केंद्र खोलने की स्वीकृति आ चुकी है. इसके लिये नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है. इस योजना के तहत गर्भवती महिलाओं को 9 माह और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को छ: माह तक अनाज मिलता है. पर हकीकत यही है कि सही लाभांवितों की संख्या और कागज पर की गई खानापूर्ति में कोई मेल नहीं है. इसी प्रकार अति कुपोषित बच्चों की मां को प्रतिमाह चार किलो चावल और दो किलो दाल, सब्जी के लिए 8 रुपए, तेल के 80 रुपए और नमक के लिए 10 रुपए दिये जाने का प्रावधान है. फिर भी इसका लाभ नहीं दिया जा रहा है. मैन्यू के अनुसार सोमवार को खिचड़ी, मंगलवार को रसिया, बुधवार को खिचड़ी, गुरूवार को हलवा, शुक्रवार को पुलाव तथा शनिवार को खिचड़ी दिये जाने का प्राधान है. लेकिन शायद ही किसी केंद्र पर इसका पालन होता हो. खिचड़ी में पीला रंग लाने के लिए दाल की मात्रा को कम कर रंग मिला दिया जाता है, जिससे कुपोषित बच्चों के स्वास्थ्य पर खराब असर पड़ने की संभावना अधिक रहती है. अधिकांश केंद्र निजी व जर्जर मकानों में बिना साइन बोर्ड लगाए चल रहे हैं. इन केंद्रों पर बच्चों को बैठने की भी जगह नहीं मिलती. खाना खाने के लिए बर्तन भी उपलब्ध नहीं हैं. बच्चे, बर्तन अपने घर से लेकर आते हैं. सरकारी पदाधिकारियों व जनप्रतिनिधियों की लंबी फौज, निरीक्षण, जांच, कार्रवाई करने की तमाम सरकारी व्यवस्थाओं के बाद भी गया ज़िले के आंगनवाड़ी केंद्रों की तस्वीर बदलने का नाम ही नहीं ले रही है.

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