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महंगाई के नाम पर केवल हो-हल्ला

महंगाई के नाम पर केवल हो-हल्ला

इस समय देश की आम जनता को लग रहा होगा कि का़फी दिनों बाद विपक्षी दल एकजुट होकर उससे जुड़े सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे महंगाई पर संसद के अंदर और बाहर दोनों जगह लड़ाई लड़ रहे हैं. पिछले पांच वर्षों में संसद में नौंवी बार महंगाई पर चर्चा की गई है. वर्ष 2008-09 में देश में 234 मिलियन टन अनाज देश में पैदा हुआ, ऐसे में कमी कैसे हो गई? अर्थशास्त्र का सीधा नियम है कि बाज़ार में कमी होने पर दाम बढ़ते हैं. जब आपके पास पर्याप्त अनाज है तो दाम कैसे बढ़े? ज़ाहिर है, व्यवस्था में ज़बरदस्त गड़बड़ है. किसानों का समर्थन मूल्य 8.5 रुपये बढ़ाया गया तो यूरिया की क़ीमत में 14 रुपये की बढ़ोत्तरी कर दी गई. ऐसे में किसानों को क्या मिला? इसलिए विरोधी दलों को लड़ना ही चाहिए. यह ज़रूरी भी था. अब तक सांप्रदायिकता के नाम पर कांग्रेस दूसरे तमाम विरोधी दलों को भारतीय जनता पार्टी के ख़िला़फ खड़ा करने में सफल होती रही है. पिछले कुछ दिनों से यह हालत बदली है. आपको याद होगा, कुछ माह पूर्व दिल्ली में गन्ने के समर्थन मूल्य और दूसरी ज़रूरी चीज़ों में हुई मूल्य वृद्धि को लेकर सभी विरोधी दलों ने मिलकर सरकार को घेरा था. उस समय भी कांग्रेस ने पूरा प्रयास किया था कि विरोधी दलों की यह एकता लंबे समय तक नहीं चले. बाद में उसे थोड़ी सफलता मिली भी थी, पर वह स्थाई नहीं रही. इसके लिए कांग्रेस ने महिला आरक्षण बिल लाकर भाजपा और वामपंथियों के आगे नया चारा भी डाला, पर वह भी स्थाई नहीं हो सका. सुषमा स्वराज ने सा़फ कह दिया कि महिला आरक्षण पर कांग्रेस को समर्थन केवल एक स्ट्रैटजी की तरह है, उसके बाद फिर महंगाई की बात होगी और सारे विरोधी दल एक स्वर में कांग्रेस की नीतियों का संयुक्त विरोध जारी रखेंगे. यह देखा गया कि सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भाजपा महंगाई को लेकर बहुत आक्रामक हो गई है. ऐसे में वामपंथी दलों, लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद और मुलायम सिंह यादव की पार्टी सपा की मजबूरी हो गई कि वे भाजपा को इसका श्रेय न लेने दें. यही कारण है कि बजट पेश होने के दिन संसद के बाहर भाजपा के साथ न केवल मुलायम सिंह और लालू यादव खड़े दिखे, बल्कि वामपंथी भी उसी मंच पर थे. जहां तक हमें याद है, कांग्रेस के विरुद्ध ऐसी गोलबंदी 1974 के जेपी आंदोलन और वीपी सिंह के मोर्चे के बाद पहली बार दिखी. सुनने में तो यह बहुत अच्छा लगता है कि देश के विरोधी दलों को अचानक ही यह अहसास होने लगा है कि देश में सांप्रदायिकता से बड़ा मुद्दा महंगाई बन गया है. यह सच है कि दंगा कराने वाले तमाम गुंडों, चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान, जब तक पेट की भूख से तड़पते रहेंगे, तब तक दंगा करने का उनमें दम नहीं होगा. इसलिए सबसे पहले भूख का समाधान होना चाहिए.

सबसे ज़रूरी सवाल यह है कि क्या महंगाई केवल कांग्रेस के राज में बढ़ी है? 1977 की जनता पार्टी सरकार को याद करें. उसके पहले कांग्रेस के शासन में भी महंगाई को आसमान छूने वाला बताया गया था, लेकिन जनता सरकार में बाज़ार खुला रहा और महंगाई कम हो गई. तब लोग खुले बाज़ार में 2.30 रुपये प्रति किलो चीनी ख़रीदने लगे थे. दोबारा इंदिरा गांधी सत्ता में आई तो महंगाई बढ़ गई.

लेकिन इससे भी पहले हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि क्या कांग्रेस के ख़िला़फ खड़े इन तमाम विरोधी दलों का विरोध असली है? कहीं ऐसा तो नहीं कि यह सारा कुछ आम आदमी की आंखों में धूल झोंकने के लिए है. सरकार का कहना है कि महंगाई से केवल हमीं परेशान नहीं हैं, क्योंकि महंगाई इस समय अंतरराष्ट्रीय समस्या बन गई है. आपको कुछ साल पहले की बात याद न हो तो बताएं कि इंदिरा गांधी भी अपने जमाने में भ्रष्टाचार को अंतरराष्ट्रीय समस्या बताती थीं. बाद में भ्रष्टाचार को सरकारी कार्यालयों में अनौपचारिक रूप से स्वीकार लिया गया. ऐसा न हो कि आने वाले समय में कांग्रेस महंगाई को भी एक स्वीकार्य व्यवस्था के रुप में स्वीकार करा दे. इसलिए हमें थोड़ा सतर्क होकर इसकी चर्चा करनी चाहिए.

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इसके पहले हमें अपने पड़ोसी देशों में बढ़ती महंगाई पर भी एक नज़र डालनी चाहिए. पिछले तीन वर्षों में हमारे सबसे क़रीबी देश बांग्लादेश में महंगाई की दर पांच फीसदी से बढ़कर 18 फीसदी तक जा पहुंची है. दूसरे पड़ोसी पाकिस्तान का हाल भी कम बुरा नहीं है. वहां पिछले तीन वर्षों में 14 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज़ की गई है. नेपाल में आठ फीसदी की बढ़ोत्तरी के कारण लोगों ने नई सरकार के ख़िला़फ अनेक प्रदर्शन किए हैं. कमोबेश ऐसा ही हाल श्रीलंका का भी है. भारत चूंकि अपने सभी पड़ोसियों में सबसे बड़ा है तो हमने इसका पूरा ख्याल रखा है. हमारे यहां मूल्यों में पिछले तीन वर्षों में 80 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज़ की गई है. कई चीज़ों के खुदरा दाम तो 100 फीसदी से भी ज़्यादा बढ़े हैं. ऐसे में हमारे यहां अगर अब भी जनता को यह लगने लगा कि कांग्रेस लगातार उसे लूट रही है और दूसरे विरोधी दलों के लोग बेवजह के मुद्दों पर संसद का समय नष्ट कर रहे हैं, तो वह किसी भी विरोधी दल के नेता को उसके क्षेत्र में घुसने नहीं देगी. इसलिए महंगाई के विरोध में सड़कों पर उतरना उनकी मजबूरी हो गई है.

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अब यहां सबसे ज़रूरी सवाल यह है कि क्या महंगाई केवल कांग्रेस के राज में बढ़ी है? 1977 की जनता पार्टी सरकार को याद करें. उसके पहले कांग्रेस के शासन में भी महंगाई को आसमान छूने वाला बताया गया था, लेकिन जनता सरकार में बाज़ार खुला रहा और महंगाई कम हो गई. तब लोग खुले बाज़ार में 2.30 रुपये प्रति किलो चीनी ख़रीदने लगे थे. दोबारा इंदिरा गांधी सत्ता में आई तो महंगाई बढ़ गई. वी पी सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद फिर महंगाई कम हो गई. फिर कांग्रेस की वापसी हुई और महंगाई ज़्यादा बढ़कर सामने आई. एनडीए के सत्ता में आने के बाद भी महंगाई पर सरकार का पूरा नियंत्रण रहा, लेकिन 2004 में कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद महंगाई का जो ग्राफ बढ़ा, उसने पिछले सारे रिकार्ड तोड़ने का तो जैसे मन ही बना लिया. और, कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए की दोबारा वापसी ने यही परंपरा क़ायम रखी. ऐसे में अगर विरोधी दलों ने जनता को सबसे ज़्यादा कचोटने वाले इस मुद्दे पर भी लंबा आंदोलन नहीं चलाया तो जनता उन्हें कैसे माफ करेगी? इसलिए संसद में या सड़कों पर धरना, प्रदर्शन और जेल भरो जैसे आंदोलन तो करने ही चाहिए.

पर हमारा सवाल यह है कि क्या विरोधी दलों के नेतागण सचमुच देश की आम जनता के लिए दिल से संघर्ष कर रहे हैं? कहीं यह सारा कुछ उनका ड्रामा भर तो नहीं है? प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने यूपीए पर लगातार आरोप लगाए हैं कि चीनी को लेकर सरकार ने 400 करोड़ रुपये का घोटाला किया है. पर भाजपा ने इसमें शामिल अधिकारियों को, जिनकी राय पर कृषिमंत्री ने चीनी का आयात-निर्यात किया, बख्श कैसे दिया? इसके अलावा उन्होंने अब तक कोई कंक्रीट सुझाव सरकार को नहीं दिया है, जिससे भटकती कांग्रेस सरकार को कोई रास्ता भी सूझे, अगर वह ऐसा करना भी चाहे. वामपंथियों ने तो जैसे अंधविरोध को आदत बना ली है, पर उनकी ओर से कोई ठोस सुझाव अभी तक कहीं दिखा नहीं है. तेल की क़ीमत अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से प्रभावित होती है, यह ठीक है. उसके कारण भी क़ीमतों पर असर होता है. पर क्या केवल इसके लिए तेल की क़ीमतें ही ज़िम्मेवार हैं? यहां हमारी ओर से एक सवाल है, आख़िर क्यों क़ीमतों की यह हालत भारत और हमारे आसपास के मुल्कों में है? हम यह मानते हैं कि इसके लिए बाक़ी कुछ और चीज़ों के अलावा हमारी प्रशासनिक व्यवस्था ज़िम्मेवार है, जो सरकार के किसी भी कार्यक्रम को ज़मीन पर उतरने नहीं देती. हमारी जन वितरण प्रणाली भ्रष्ट है. हमारे अधिकारियों को यह पता नहीं है कि एक परिवार को कितना गेहूं, चीनी और चावल चाहिए. अनाजों के भंडार भरे हैं, पर आप उसे बांट नहीं रहे, चाहे अनाज सड़ कर बर्बाद हो जाए. देश में ज़रूरत के अनुसार चीनी रखी जाए, तब उसका निर्यात हो. पर हम सस्ते दर पर निर्यात करते हैं और महंगे दर पर चीनी आयात करते हैं और उस पर भरपूर लाभ कमा कर जनता को खुले बाज़ार में बेचते हैं. इसी से जुड़ा यह सवाल भी है कि जब सारा कुछ हमारे प्रशासक ही करते हैं तो इन्हें पोसने वाली सरकार और सत्ता में रहने वाले राजनैतिक दल को कैसे बख्शा जा सकता है? अगर सभी विरोधी दल पूरी ईमानदारी से एक हो जाएं तो क्या कांग्रेस की सरकार एक दिन भी चल सकती है? पर क्या विरोधी दल ऐसा करने का साहस रखते हैं?

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