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मांझी ही नाव डुबोए
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मांझी ही नाव डुबोए

देवभूमि उत्तराखंड के राजनीतिक परिदृश्य में फिल्मी गीत की यह पंक्ति इस समय राजनीति का हर मर्मज्ञ गुनगुना रहा है कि मांझी जब नाव डुबोए, उसे कौन बचाए. वजह यह है कि देहरादून दौरे पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने एक बयान दिया था कि मिशन 2012 के खेवनहार निशंक ही होंगे. राजनीति के जानकारों का कहना है कि जब मिशन 2012 को गडकरी ही ध्वस्त करना चाहते हैं, तो उसे कौन बचा सकता है, क्योंकि पार्टी की नाव के खेवनहार गडकरी ने जिस तरह अपने दो दिवसीय दौरे के दौरान जो दो बयान दिए, वे भाजपा के लिए आत्मघाती एवं कांग्रेस की बांछें खिलाने वाले सिद्ध हुए. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने सूबे के सुस्त पड़े कांग्रेसी नेताओं को घर बैठे मुद्दा परोस दिया है और ऐसी तलवार पकड़ा दी है, जिसे भांज कर वे अपने को चर्चा में बनाए रखेंगे. अफजल गुरु क्या कांग्रेस का जमाई लगता है? जैसे सवाल को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि क्या सरकार ने उसे अपनी बेटी दे रखी है, जो उसकी ह़िफाज़त कर रही है? इस बयान ने नितिन गडकरी को राजनीतिक रूप से अपरिपक्व साबित कर दिया. वहीं घोटालों के आरोपों से घिरी निशंक सरकार के पक्ष में खुलकर उनका बोलना भी इस बात की ओर इशारा कर गया कि पार्टी का मुखिया, जिसे लोग मांझी के रूप में देख रहे हैं, वही जब नाव डुबोने पर आमादा हो तो भला नाव को कौन बचा सकता है.

वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में जनता ने भाजपा को अपनी पहली पसंद बनाया. पूर्व जनरल भुवन चंद्र खंडूरी का बेदाग़ व्यक्तित्व सबके सामने था.इसलिए पार्टी ने भी उन्हें राज्य की बागडोर सौंप दी. खंडूरी ने अपने कार्यकाल में अनुशासित शासन-प्रशासन के साथ-साथ राज्य के खज़ाने की हालत देखते हुए फिज़ूलख़र्ची पर कड़ा रुख़ अपनाया. लेकिन पूर्व जनरल को उन्हीं की पार्टी के कुछ दिग्गज लोगों ने बेवजह बदनाम कर दिया और इससे जनता में ग़लत संदेश गया.

मालूम हो कि यही ग़लती कांग्रेस की नारायण दत्त तिवारी सरकार ने की थी. वह भी ख़ुद पर दो दर्जन से अधिक घोटालों के आरोपों का जवाब नहीं दे सकी थी और जिसके चलते वह चुनाव में जनता का सामना नहीं कर पाई. कांग्रेस की उसी स्थिति का लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिला था. अब वही ग़लती भाजपा ने की है. पार्टी के मुखिया के एक बयान ने राज्य में भाजपा के मिशन 2012 पर क़ालिख़ पोत दी. उत्तराखंड की जनता अब किसी दाग़ी को सत्ता की कुंजी नहीं सौंपना चाहती. निशंक सरकार को बेदाग़ साबित किए बिना उन्हें मिशन 2012 का खेवनहार घोषित करना भाजपा के लिए आत्मघाती सिद्ध हो सकता है. इस आत्मघाती क़दम के लिए सीधे नितिन गडकरी को ज़िम्मेदार माना जा रहा है.

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वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में जनता ने भाजपा को अपनी पहली पसंद बनाया. पूर्व जनरल भुवन चंद्र खंडूरी का बेदाग़ व्यक्तित्व सबके सामने था.इसलिए पार्टी ने भी उन्हें राज्य की बागडोर सौंप दी. खंडूरी ने अपने कार्यकाल में अनुशासित शासन-प्रशासन के साथ-साथ राज्य के खज़ाने की हालत देखते हुए फिज़ूलख़र्ची पर कड़ा रुख़ अपनाया. लेकिन पूर्व जनरल को उन्हीं की पार्टी के कुछ दिग्गज लोगों ने बेवजह बदनाम कर दिया और इससे जनता में ग़लत संदेश गया. इसी बीच हुए संसदीय आम चुनाव में राहुल गांधी की हुंकार के आगे पूर्व जनरल की एक न चली. नतीजतन सूबे से भाजपा का सूपड़ा ही साफ हो गया. युवा मतदाताओं पर राहुल गांधी के बढ़ते प्रभाव का असर यह हुआ कि राज्य की पांचों सीटों पर कांग्रेसी तिरंगा लहरा उठा. सूबे में भाजपा का खाता भी न खुल सका. इससे जनरल के विरोधियों की मुंहमांगी मुराद पूरी हो गई. वास्तव में इस हार के लिए अकेले खंडूरी ज़िम्मेदार नहीं थे, बल्कि इसके पीछे प्रत्याशियों के चयन में टिहरी राजघराने की उपेक्षा के साथ-साथ हरिद्वार जैसी सीट पर एक ग़ैर राजनीतिक व्यक्ति को प्रत्याशी बनाने जैसे कई कारण थे. अवसर मिलते ही राजनीति के घाघों ने दिल्ली दरबार से खंडूरी का पत्ता सा़फ करा दिया. अनुशासन के नाम पर उनसे त्यागपत्र दिलवा दिया गया और डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक को सूबे की बागडोर सौंप दी गई. खंडूरी सरकार की जड़ में मट्ठा डालने का काम उनके मंत्रियों ने ही किया, क्योंकि वे उनके राज में घोटाले नहीं कर पा रहे थे.

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निशंक के नेतृत्व में नई सरकार बनते ही दिग्गजों ने एक बार फिर उत्तराखंड को मॉडल राज्य बनाने का वचन दोहराया, लेकिन खंडूरी के हटते ही शिक्षा, पर्यटन एवं वृक्षारोपण सहित अनेक क्षेत्रों में राज्य को मॉडल प्रदेश बनाने के भाजपा के सपने को भारी धक्का लगा. इन दिनों सूबे में शिक्षा का बुरा हाल है. सरकारी स्कूल भगवान भरोसे चल रहे हैं और सर्व शिक्षा अभियान भी. सौ दिन रोज़गार की गारंटी देने वाली योजना मनरेगा के धन का प्रयोग श्रमिकों के हित में नहीं हो पा रहा है. ग़रीब बच्चों को स्कूल भेजने की कल्याणकारी योजना महज़ काग़ज़ों पर चल रही है. पर्यटन विभाग तो भ्रष्टाचार का पर्याय माना जाता है.इसके मंत्री ने अपनी सेहत तो अच्छी कर ली, लेकिन विभाग की सुध नहीं ली. महाकुंभ 2010 के दौरान मदन कौशिक पर जिस तरह उंगलियां उठीं, उस पर सरकार को स़फाई देते नहीं बन रही है. जनास्था से जुड़ी चार धाम यात्रा भी अव्यवस्था की शिकार हो गई. पर्यावरण एवं वन्यजीवों के लिए विख्यात यह राज्य अब वृक्षों की अंधाधुंध कटान और वन्यजीवों के शिकार के लिए जाना जा रहा है. राज्य के कस्तूरी मृग, बाघ, हाथी एवं गुलदार की बड़ी संख्या में हो रही हत्याओं ने सरकार की मंशा और उसकी सार्थकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं. दून में वृक्षों की कटान के मिले आंकड़े इशारा करते हैं कि अगर सरकार समय पर न चेती तो वह दिन दूर नहीं, जब हरी-भरी वादियों के लिए विख्यात देहरादून रेगिस्तान बन जाएगा. सरकार वृक्षारोपण तो करती है, लेकिन दिखावे के लिए. शहरी क्षेत्रों में सड़कों के मध्य गमलों में कुछ वृक्ष लगाकर उन पर ग्रीन देहरादून का स्लोगन लिख दिया जाता है. महाकुंभ 2010 में भारी घोटाले, विद्युत परियोजनाओं के वितरण एवं स्टर्डिया फैक्ट्री की ज़मीन एकबिल्डर को देने के कारण सरकार आरोपों की गिरफ़्त में है. राज्य के भाजपाई दिग्गजों से लेकर ग्राम स्तर तक के कार्यकर्ताओं को यह आशा थी कि दिल्ली दरबार मिशन 2012 की गंभीरता का ख्याल करके एक बेदाग़ सेनापति भेजेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. राज्य में एक वर्ष बाद चुनाव होंगे. मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के तेवर आक्रामक हैं और वह पूरे जोश में है. ऐसे में गडकरी द्वारा निशंक को अभयदान देना भाजपा के लिए आत्मघाती सिद्ध होगा.

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1 comment

  • मिसन २०१२ की सफलता का प्रयास तभी सफल हो गा जब दागी निसंक को हटाया जाय.

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