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माओवादी बंदूक की नोक पर बात करना चाहते हैं
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माओवादी बंदूक की नोक पर बात करना चाहते हैं

अगर माओवादी आदिवासियों का हित चाहते हैं तो उनकी बस्तियों में अमन का होना भी ज़रूरी है, क्योंकि इसके बिना कोई विकास कार्य नहीं किया जा सकता. क्रॉस फायरिंग के माहौल में सड़क या पुल बनाने का काम नहीं हो सकता. माओवादी नेताओं को यह ज़मीनी हक़ीक़त समझनी होगी और सरकार को भी नई सोच के साथ आदिवासियों के कल्याण के लिए लगना होगा. माओवादी मुख में राम-बगल में छुरी वाली कहावत पर चल रहे हैं. ऑपरेशन ग्रीन हंट शुरू किए जाने से घबरा कर संगठन के मुखिया किशन जी ने बातचीत का प्रस्ताव रखा है, पर हमले अभी रुके  नहीं हैं और न दोनों पक्षों के बीच विश्वास का माहौल बना है. केंद्र के 72 घंटे के युद्ध विराम के प्रस्ताव के बदले किशन जी ने 72 दिन के युद्ध विराम का प्रस्ताव भेजा है, पर किसी को उनकी नीयत पर यक़ीन नहीं हो रहा है. यह समझा जा रहा है कि खुद को फिर से संगठित करने और हथियार जुटाने के लिए ही माओवादी समय ले रहे हैं. दूसरी बात यह कि बातचीत के प्रस्ताव पर भी माओवादियों के बीच मतभेद हैं. एक गुट ऑपरेशन ग्रीन हंट के सशस्त्र मुक़ाबले के पक्ष में हैं तो किशन जी की अगुआई वाला दूसरा गुट बातचीत के पक्ष में है. वार्ता के प्रस्ताव पर आम सहमति अपनाने वाले मामले पर भी माओवादी नेताओं के बीच दो दिन तक विचार हुआ. वार्ता का प्रस्ताव आते ही तृणमूल के बागी सांसद एवं गायक कबीर सुमन ने मध्यस्थता का प्रस्ताव भी रख दिया. हालांकि चिदंबरम ने मंत्रालय का फैक्स नंबर भेजकर सीधी वार्ता का लिखित आवेदन भेजने को कहा और इस तरह किसी तीसरे पक्ष के दख़ल का रास्ता बंद हो गया है.

देश के चार राज्यों-पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड और उड़ीसा में शुरू होने वाले ऑपरेशन ग्रीन हंट के मद्देनजर माओवादियों ने नया रुख अख्तियार किया है. उन्होंने केंद्र सरकार के 72 घंटे के युद्ध विराम प्रस्ताव के जवाब में 72 दिनों के युद्ध विराम का प्रस्ताव किया है. लेकिन, इसे उनकी एक रणनीति के तौर पर  देखा जा रहा है.

ऑपरेशन ग्रीन हंट चार राज्यों-पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड और उड़ीसा में शुरू होने वाला है, इसलिए बातचीत के प्रस्ताव पर चारों राज्यों की ओर से प्रतिक्रिया आई है. झारखंड के उप मुख्यमंत्री सुदेश महतो ने युद्ध विराम का स्वागत किया है, जबकि माओवादियों की हिंसक कार्रवाइयों को देखते हुए नवीन पटनायक प्रशासन कोई उम्मीद पालने के पक्ष में नहीं है. बिहार ने यह कहकर मामला लटका दिया है कि किशन जी ने बिहार का नाम नहीं लिया है. चुनावी साल होने के कारण नीतीश कुमार भी फूंक-फूंककर क़दम रख रहे हैं. इसी रणनीति के तहत उन्होंने कोलकाता में गृहमंत्री पी चिदंबरम द्वारा बुलाई गई मुख्यमंत्रियों की बैठक में हिस्सा नहीं लिया. इस मसले पर होने वाली दूसरी बैठक में भी उनके शिरकत करने की उम्मीद नहीं है. कुछ ऐसा ही हाल झारखंड के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का था, पर बीडीओ अपहरण कांड के बाद उनका भी रुख़ गरम हो गया है.

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हिंसा रोकने की बात कहने के बाद भी माओवादियों के हमले रुके नहीं हैं. 22 फरवरी को माओवादियों ने पुरुलिया ज़िले के बांदवान में दो माकपा कॉडरों की हत्या कर दी और 23 जनवरी को लालगढ़ में सीआरपीएफ के कैंप पर कथित रूप से हमला किया. हालांकि सुरक्षाबलों की गोली से तीन माओवादियों के मारे जाने की ख़बर मिली. इनमें से एक पुलिस अत्याचार के ख़िला़फ बनी संघर्ष समिति के अध्यक्ष लालमोहन टुडू थे. छत्रधर महतो को पकड़े जाने के बाद टुडू को ही संगठन का भार दिया गया था. आरोप है कि सुरक्षाबलों ने उन्हें घर से उठाने के बाद कांटा पहाड़ी में गोली मारकर मुठभेड़ का नाम दे दिया. इसके विरोध में माओवादियों ने 28 फरवरी को चार राज्यों में बंद का पालन किया. पुलिस को उम्मीद है कि टुडू के मारे जाने से माओवादियों और आदिवासियों के बीच दूरी पैदा होगी. प्रशासन के ख़िला़फ रैलियों में अब उतनी भीड़ नहीं होती, जितनी छत्रधर के समय होती थी.

पश्चिमी रेंज के आईजी और माओवादियों के ख़िला़फ अभियान की अगुआई कर रहे कुलदीप सिंह ने चौथी दुनिया को बताया कि माओवादियों के ख़िला़फ हमारा अब तक का अभियान र्सेंल रहा है और विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों एवं पुलिस के बीच पूरा तालमेल है. सिलदा कैंप पर हुए हमले के संबंध में उन्होंने कहा कि इसे दोहराया न जा सके, इसलिए शिविरों की सुरक्षा व्यवस्था और बढ़ा दी गई है तथा माओवादियों द्वारा छीने गए हथियारों की बरामदगी के लिए तलाशी अभियान चलाया जा रहा है. हालांकि 15 फरवरी को सिलदा के ईस्टर्न फ्रंटियर रार्इफल्स के शिविर पर हमले के मामले से सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस के बीच तालमेल की कमी पूरी तरह उजागर हो गई है. अभियान के संबंध में प्रशासनिक मतभेद भी उभर कर सामने आ गए. गृह सचिव अर्द्धेंदु सेन और पुलिस महानिदेशक भूपिंदर सिंह के बीच मतभेद दिखा. हमले के एक दिन बाद गृह सचिव ने कहा कि इस बात की जांच की जाएगी कि हमले के संबंध में तीन घंटे पहले सूचना मिलने के बावजूद चूक कहां हुई और जो अ़फसर दोषी होगा, उसे सजा मिलेगी. इधर भूपिंदर सिंह ने पुलिस का बचाव करते हुए कहा कि इसके लिए कुछ अ़फसरों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि कैंप के जवानों को हर दिन सावधान रहने की हिदायत देने की ज़रूरत नहीं होती. उन्होंने माना कि इस तरह के शिविरों पर हमले की आशंका हर समय है, पर सिलदा कैंप पर हमले के संबंध में कोई अग्रिम सूचना नहीं थी. मालूम हो कि इसके पहले पीराकाटा कैंप पर भी माओवादियों का हमला हुआ था, पर जवानों ने अपनी जवाबी कार्रवाई से उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था. हालांकि दोनों पक्षों ने इस बात को मान लिया कि इस कैंप की जगह ग़लत थी. इसके साथ ही जंगल महल के सारे कैंपों की सुरक्षा के पहलू की समीक्षा की जा रही है. सिलदा में हमला इसलिए संभव हुआ कि वह एक व्यस्त बाज़ार के बीचोबीच लगा था. माओवादी दोपहर से ही जमा होने लगे थे और वे आम जनता में घुल-मिल गए. बताया जाता है कि माओवादियों ने आधा घंटा पहले दुकानें बंद करा दीं.

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लालगढ़ अभियान में तब एक नया मोड़ आया, जब ईस्टर्न फ्रंटियर रार्इफल्स के स्पेशल आईजी विनय कृष्ण चक्रवर्ती ने चेहरे पर काला नक़ाब पहनकर प्रेस कांफ्रेंस की और सिलदा कैंप पर हमले के संबंध में पश्चिम मिदनापुर के एसपी मनोज वर्मा को खरी-खोटी सुनाई. गृह सचिव ने माना कि उनका प्रेस कांफ्रेंस करना सर्विस नियम के तहत नहीं है. सरकार ने तो पहले उन्हें निलंबित करने की बात कही, पर सिलदा कैंप में मारे गए जवानों के परिजनों ने उनके पक्ष में जुलूस निकाला तो सरकार ने उन्हें स़िर्फ कारण बताओ नोटिस जारी किया. हालांकि सिलदा कैंप पर हमले की रिपोर्ट के लिए दो महीने का समय निर्धारित होने से सा़फ लग रहा है कि सरकार किसी को बलि का बकरा बनाने के पक्ष में नहीं है.

सुरक्षाबलों ने अब माओवादियों को पकड़ने की नहीं, बल्कि उनके ख़ात्मे की रणनीति बनाई है. इसलिए माओवादी कॉडर छिपने के लिए सुरक्षित स्थानों की तलाश कर रहे हैं. जून 2009 में लालगढ़ ऑपरेशन शुरू होने के बाद से राज्य के कुछ आईपीएस अधिकारी माओवादियों से निपटने के लिए आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ मॉडल को अपनाने पर ज़ोर देते रहे हैं. हालांकि सिलदा हिंसा के बाद सरकार ने कड़ाई बरतने को हरी झंडी दे दी है. पश्चिम बंगाल में ऑपरेशन ग्रीन हंट मुख्यतः तीन ज़िलों-पश्चिम मिदनापुर, बांकुड़ा एवं पुरुलिया में शुरू होने वाला है और माओवादियों की रणनीति आसपास के ज़िलों में छिपने की है. वे नदिया, मुर्शिदाबाद, वीरभूम और मालदा ज़िलों में अड्डे बनाने की फिराक़ में हैं. ख़ुफिया सूत्रों के मुताबिक़, नदिया को छोड़कर बाक़ी तीन ज़िलों की सीमाएं झारखंड से लगती हैं और ख़तरा महसूस होने पर कॉडर झारखंड में भी शरण ले सकते हैं. हाल में मुर्शिदाबाद से भी कुछ माओवादियों को पकड़ा गया है. क़रीब छह माह पहले मालदा के युवक सुशांत मुर्मू को लालगढ़ के भीमपुर में पकड़ा गया था.

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राज्यों में अलग-अलग कार्रवाइयों के जरिए माओवादियों से निपटने में पूरी कामयाबी नहीं मिल रही थी, क्योंकि कॉडरों के एक राज्य में वारदात कर दूसरे राज्य में छिपने की रणनीति बाधक बनी हुई थी, पर ऑपरेशन ग्रीन हंट में इस तरह के किसी आवागमन का कोई प्रावधान नहीं बचेगा, क्योंकि ऑपरेशन नक्सल प्रभावित चार राज्यों में एक साथ शुरू होने वाला है.

नक्सलियों ने 72 दिन के युद्ध विराम का ऐलान किया है. अच्छा होता कि वे चुपचाप बिना कोई शर्त रखे वार्ता की मेज पर बैठते और कम से कम 372 दिन के युद्ध विराम की घोषणा करते. इस दौरान यह भी देखना संभव होता कि प्रभावित क्षेत्र की जनता की भलाई के लिए केंद्र व राज्य सरकारें क्या-क्या क़दम उठा रही हैं.

हाल की कुछ प्रमुख नक्सली घटनाएं

17 फरवरी, 2010 :      बिहार के जमुई ज़िले में माओवादी हमले में कम से कम 10 लोगों की हत्या.

15 फरवरी, 2010 :      पश्चिम बंगाल के पश्चिमी मिदनापुर ज़िला स्थित ईस्टर्न फ्रंटियर राइफल्स के सिल्दा कैंप पर हमले में 24 जवानों की मौत.

9 फरवरी, 2010  :      बिहार में नवादा ज़िले के महुलियाटांड गांव में नक्सलियों के हमले में कम से कम आठ पुलिसकर्मियों की हत्या.

7 अक्टूबर, 2009 :      महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में पुलिस पार्टी पर हमला कर 18 जवानों की हत्या.

1 अक्टूबर, 2009 :      बिहार के खगड़िया ज़िले में पांच बच्चों समेत 16 लोगों की मौत.

30 सितंबर, 2009 :     झारखंड में नक्सलियों ने राज्य पुलिस की स्पेशल ब्रांच के इंस्पेक्टर फ्रांसिस इंदुवर को अगवा किया और फिर गला रेत कर उनकी हत्या कर दी.

10 मई, 2009   :      छत्तीसगढ़ के धमतरी ज़िले में गुरिल्ला हमले में 13 लोगों की हत्या.

22 अप्रैल, 2009 :      आम चुनावों के दूसरे चरण से एक दिन पहले बिहार और झारखंड में पांच विभिन्न जगहों पर हमले, कई लोगों की हत्या.

16 अप्रैल, 2009  :      लोकसभा चुनावों के पहले चरण के मतदान में बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में अलग-अलग स्थानों पर 18 लोगों की हत्या.

11 अप्रैल, 2009  :      उड़ीसा के कोरापुट ज़िला में नाल्को प्लांट पर हमले में सीआरपीएफ के छह जवानों सहित कई मज़दूरों की हत्या.

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