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मोदी से मोहभंग के भी मिले संकेत

मोदी से मोहभंग के भी मिले संकेत

गुजरात पर तमाम बहसों और विचारों के हवाले से यह राय निकल कर आती रही थी कि कांग्रेस गोधरा प्रकरण से बाहर नहीं निकल पाई और उसी एस-6 डिब्बे में ही फंस कर रह गई है, जबकि मोदी इससे आगे बढ़ चुके हैं और इसका ख़ामियाजा ही अबतक कांग्रेस को भुगतना पड़ा था. कहा जाता था कि गोधरा कांड के समय कांग्रेस का असर कई नगर महापालिकाओं में था, लेकिन अपने असर वाले इलाकों में भी कांग्रेस दंगों को रोक नहीं सकी थी. जबकि मोदी के पक्ष में विकास का मुद्दा हावी रहा है. 1992 के बाद से राज्य ने काफी तरक्की की है, जिसका श्रेय भाजपा ने मोदी और उनकी ज्योतिग्राम योजना, ई-ग्राम योजना, चिरंजीवी योजना आदि को दिया है. लेकिन जितना काम मोदी करते हैं उससे अधिक उसका ढिंढोरा पीटते हैं, प्रचार करते हैं. पर इस दौरान किसानों की आत्महत्या और हीरा उद्योग से उपजे हज़ारों लोगों की बेरोज़गारी को परे नहीं रखा जा सकता है. इन सवालों में उलझने पर मोदी भी सभी भाजपाइयों की तरह घूम-फिर कर राम का राग अलापने लगे थे.
इस बार के आम चुनाव में मोदी के ऊपर केवल गुजरात ही नहीं महाराष्ट्र और गोवा में प्रचार का भी भार था. उन्होंने लगभग दो सौ लोकसभा क्षेत्रों में सभाएं कीं, पर गुजरात के बाहर वह मात्र 18 सीटों पर ही भाजपा को जीत दिला सके. जबकि राहुल गांधी ने करीब सौ क्षेत्रों में सभाएं कीं और पार्टी को 50 सीटों पर जीत दिलाई. इस बिना पर यह कहा जा सकता है कि मोदी की थोड़ी-बहुत लोकप्रियता, जो उन्होंने अपने बड़बोलेपन के कारण अर्जित की थी, वह गुजरात में भी नहीं चल पाई है. गुजरात में भले ही कांग्रेस की एक सीट कम हुई हो, पर भाजपा भी यहां कोई चकित कर देने जीत दर्ज़ कर पाने में नाकाम रही. जहां पिछली बार के आम चुनाव में भाजपा को राज्य की कुल 26 में से 14 सीटें मिली थीं, तो इस बार राम का नाम जप रहे मोदी फैक्टर ने सिर्फ एक सीट बढ़ाने का फायदा दिया. पिछली बार भाजपा को 47.37 प्रतिशत मत मिले थे, जबकि इस बार 46.52 प्रतिशत वोट ही मिले. यानी वोटिंग प्रतिशत 0.85 कम हुई है. यदि मोदी या उनके कार्यों की लोकप्रियता होती तो भाजपा के वोटिंग प्रतिशत में 0.85 का फर्क़ नहीं दिखता. इस बार भाजपा ने 15 और कांग्रेस ने 11 सीटों पर जीत हासिल की है. पिछली बार कांग्रेस ने राज्य के 26 में से 25 सीट पर ही प्रत्याशी खड़े किए थे, जबकि भाजपा ने सभी 26 सीटों पर. इस बार कांग्रेस ने सभी 26 सीटों पर प्रत्याशी खड़े किए थे, और 11 में उनकी जीत हुई है, पर वोटिंग प्रतिशत में कोई खास फर्क़ नहीं आया है. पिछली बार कांग्रेस को 43.86 प्रतिशत वोट मिले थे और इस बार भी लगभग उतना ही यानी 43.38 प्रतिशत वोट मिले. यहां जीतने वाले मुख्य उम्मीदवारों में गांधीनगर से भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, अहमदाबाद पूर्वी से भाजपा के हरेन पाठक, पोरबंदर से विट्‌ठल भाई रदड़िया हैं. हारने वाले मुख्य नेताओं में केंद्रीय मंत्री दिनशा पटेल और नरेन भाई राठवा हैं. उधर, पंचमहल से केंद्रीय मंत्री शंकर सिह वाघेला को भी मुंह की खानी पड़ी.
इस बार कांग्रेस की सीटें कम होने का कारण कांग्रेसियों में आपसी गुटबंदी कही जा रही है. माना जा रहा है कि शंकर सिंह वाघेला इत्यादि के गुट बन जाने की वजह से पार्टी ठीक से राज्य की स्थितियां संभाल नहीं पाई. पर पूरे देश की स्थितियों में कांग्रेस ने जिस तरह से अपनी सारी कमियों को दूर कर 19 वर्षों बाद अपना प्रभुत्व हासिल किया है, गुजरात में भी भाजपा ज़्यादा समय तक राम नाम नहीं भज सकती.

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