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मुज़फ़्फरपुर में एनडीए की राह आसान नहीं
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मुज़फ़्फरपुर में एनडीए की राह आसान नहीं

मुजफ्फरपुर में विधानसभा उपचुनाव के परिणाम आने के बाद से लोगों के बीच तरह-तरह के सवाल उठने लगे हैं. जैसे, क्या नीतीश कुमार दोबारा सत्ता में लौट कर आएंगे? हालांकि लोग यह भी बेबाकी से कहते हैं कि सड़कें अच्छी हो गई हैं, स्कूल चकाचक हैं, अस्पतालों की हालत अच्छी है और अपराध कम हुए हैं. फिर भी यह पूछा जा रहा है कि क्या नीतीश फिर से सत्ता में आएंगे या नहीं? हालांकि सवाल यह भी नहीं है कि नीतीश सत्ता में आएंगे या नहीं. असल सवाल तो यह है कि अगर नीतीश कुमार को सत्ता की सीढ़ियों तक पहुंचाने वाले फिर से विधानसभा में लौटकर नहीं आएंगे, तो नीतीश को कौन लाएगा? तमाम फीलगुड के बावजूद विधानसभा उपचुनाव में ज़िले के बोचहां (सुरक्षित) और औराई क्षेत्र में जदयू की क़रारी हार ने पार्टी कार्यकर्ताओं की नींद उड़ा दी है. उपचुनाव के परिणाम को आगामी विधानसभा चुनाव के ट्रेलर के रूप में देखा जाए तो चुनावी संभावनाओं की तराज़ू पर ज़िले के सभी 11 विधायकों को तौलने का सिलसिला शुरू हो गया है. कोई जाति के बटखरे से तौलता है तो कोई पार्टी के विधायकों की उपलब्धियों, विकास योजनाओं और सघन-नियमित जनसंपर्क के आधार पर. पिछले चुनाव में वजनदार नेता बनकर उभरे कई विधायक पांच साल पूरे होने से पहले ही हल्के होने लगे हैं. वर्ष 2005 के विधानसभा चुनाव में ज़िले की 11 में से सात सीटों पर जदयू एवं एक सीट पर भाजपा ने क़ब्ज़ा जमाया था. मुज़फ़्फरपुर विधानसभा क्षेत्र से राजग समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी की जीत हुई थी. राजद स़िर्फ बोचहां (सु.) एवं गायघाट सीटों पर कब्ज़ा बरक़रार रख पाया था. वर्ष 2009 के उपचुनाव में राजद के सुरेंद्र राय ने जदयू से औराई सीट छीन ली और बोचहां (सु.) पर भी क़ब्ज़ा बरक़रार रखा.

तमाम फीलगुड के बावजूद विधानसभा उपचुनाव में ज़िले के बोचहां (सुरक्षित) और औराई क्षेत्र में जदयू की क़रारी हार ने पार्टी कार्यकर्ताओं की नींद उड़ा दी है. उपचुनाव के परिणाम को आगामी विधानसभा चुनाव के ट्रेलर के रूप में देखा जाए तो चुनावी संभावनाओं की तराज़ू पर ज़िले के सभी 11 विधायकों को तौलने का सिलसिला शुरू हो गया है. कोई जाति के बटखरे से तौलता है तो कोई पार्टी के विधायकों की उपलब्धियों, विकास योजनाओं और सघन-नियमित जनसंपर्क के आधार पर.

कहा तो यहां तक जा रहा है कि नीतीश कुमार की राह के रोड़े खुद उनके विधायक हैं. अपनी उपलब्धियां गिनाकर जनता से इन विधायकों के लिए वोट मांगना नीतीश के लिए आसान नहीं होगा. जदयू नेताओं को उम्मीद है कि कुछ विधायकों के टिकट काटकर नीतीश नए चेहरों को आज़माएंगे. अब सवाल यह उठता है कि वह कितने विधायकों का टिकट काटने की हैसियत रखते हैं? टिकट काटने पर यही विधायक बाग़ी प्रत्याशी बनकर पार्टी की मिट्टी पलीद करेंगे. इसका संकेत विधानसभा उपचुनाव में भी मिला. जदयू एवं भाजपा विधायकों की जीत में जिन भूमिहार मतदाताओं के ध्रुवीकरण का बड़ा योगदान था, वही आज एनडीए विधायकों से नाराज़ हैं. रही सही कसर वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव ने पूरी कर दी. बताया जाता है कि लोकसभा चुनाव में मुज़फ़्फरपुर ज़िले में पारू, साहेबगंज, बरूराज और कांटी के एनडीए विधायकों ने वैशाली के जदयू प्रत्याशी विजय कुमार शुक्ला उ़र्फ मुन्ना शुक्ला का विरोध किया. कांटे की टक्कर में मुन्ना शुक्ला की हार ने भूमिहार वोटरों को आहत किया. नाराज़ वोटर विधानसभा चुनाव में हिसाब चुकता कर सकते हैं. इसके अलावा विधायकों द्वारा ठेकेदारी में अपना सिंडिकेट खड़ा करना भी महंगा पड़ सकता है. नीतीश कुमार के लिए कांटी का कांटा निकालना भी आसान नहीं होगा. राज्य मंत्रिमंडल से हटाए जाने के बाद कांटी के विधायक अजीत कुमार खार खाए बैठे हैं. इस्ती़फा देने के बाद अजीत आज तक नीतीश की किसी सभा या बैठक में नज़र नहीं आए. कई अवसरों पर अ़खबारों में उनके जो बयान आए, उनमें शासन-प्रशासन की विफलताओं के प्रति नाराज़गी झलकती रही. क्षेत्र में लगातार बैठकें और जनसंपर्क कर रहे अजीत कुमार के राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद के क़रीब पहुंचने की भी बात कही जा रही है. अगर उन्हें राजद का टिकट नहीं मिला तो वह पुराने घर कांग्रेस में भी लौट सकते हैं. टिकट वितरण में भी जदयू में खासी खींचतान, बग़ावत एवं भीतरघात की पृष्ठभूमि बनेगी. पिछली बार जार्ज फर्नांडीस ने गायघाट में अशोक सिंह को प्रत्याशी बनाया, लेकिन टिकट से वंचित वीणा देवी ने अपने नेटवर्क का इस्तेमाल करके अशोक के रथ को रोक दिया. विधान पार्षद दिनेश प्रसाद सिंह के साथ उनकी पत्नी वीणा देवी एक बार फिर जदयू में शामिल हो चुकी हैं. दिनेश प्रसाद सिंह की मानें तो नेतृत्व ने वीणा देवी को इस बार गायघाट से मौकाका देने का आश्वासन दिया है. अजय सिंह का नाम भी इस क्षेत्र से चर्चा में है. गत लोकसभा चुनाव में जार्ज फर्नांडीस की खुली मदद करने के कारण जदयू से निष्कासित अशोक सिंह जार्ज के सांसद बनने के बाद पार्टी में आ गए हैं और नेतृत्व से अपने रिश्ते सामान्य करने के साथ-साथ गांव-गांव में पकड़ मज़बूत करने में जुटे हैं. रमई राम भले ही बोचहां क्षेत्र से उपचुनाव में हार गए, लेकिन जदयू एक बार फिर उन्हें ही आजमाएगा. सर्वाधिक संकट में म़ुजफ़़्फरपुर के निर्दलीय विधायक विजेंद्र चौधरी हैं. लोकसभा चुनाव में तो उन्हें मात्र 10 हज़ार वोट मिले. अब वह राजद, जदयू, कांग्रेस या लोजपा में से किसी एक नाव पर बैठने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं. मगर, हर जगह उनके नाम पर विरोध है. विधानसभा उपचुनाव में ज़िले की दोनों सीटों पर क़ब्ज़ा जमाने के बाद राजद का आत्मविश्वास बढ़ा है. राजद एक बार फिर अपने गढ़ पर कब्ज़ा ज़माने की ताक में है. लोकसभा चुनाव में राजद प्रत्याशी डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह ने वैशाली सीट पर क़ब्ज़ा जमाया और ज़िले के कई विधानसभा क्षेत्रों में राजद ने बढ़त बना ली. फिलहाल राजद का गायघाट, बोचहां एवं औराई सीटों पर क़ब्ज़ा है. उसे पारू, साहेबगंज, कुढ़नी और कांटी भी आसान टारगेट नज़र आते हैं. राजद के रणनीतिकार कुछ सीटों पर राजपूत-भूमिहार प्रत्याशी खड़ा कर एनडीए की गणित बिगाड़ने की वक़ालत कर रहे हैं. कुढ़नी में वर्ष 2005 के दोनों चुनावों में लोजपा प्रत्याशी शाह आलम सब्बू ने मुस्लिम वोट काटकर राजद के लिए संकट खड़ा कर दिया था. जेल में बंद मनोज कुशवाहा को वोटरों की सहानुभूति भी मिली. लेकिन चार सालों में सहानुभूति समाप्त हो गई. मनोज से नाराज़ समुदायों में कई जातियां शामिल होती चली गईं. पूर्व मंत्री बसावन प्रसाद भगत कुढ़नी से जदयू के टिकट के प्रबल दावेदार हैं, परंतु बाहरी प्रत्याशी पर कुढ़नी के वोटर दोबारा शायद ही विश्वास करेंगे. कुढ़नी से वर्ष 1995 एवं 2000 का चुनाव जीत चुके बसावन भगत की राजनीति अगड़ा विरोधी रही है. ऐसे में जदयू का टिकट पाने पर भी उन्हें अगड़ों का समर्थन मिलने में संदेह है. सकरा में पिछली बार राजद के लालबाबू राम बहुत कम मतों से पराजित हुए थे, लेकिन इन चार सालों में यादव वोटरों से उनकी दूरी बढ़ती चली गई. वोटर जदयू विधायक विलट पासवान से भी बेहद नाराज़ हैं और प्रत्याशी बदले जाने के कयास लगाए जा रहे हैं. साहेबगंज के विधायक राजू कुमार सिंह नाराज़ वोटरों को मनाने में जुटे हैं. वहां राजद द्वारा पूर्व विधायक रामविचार राय को प्रत्याशी बनाया गया तो राजू सिंह को फायदा हो सकता है. वह जनता से पश्चिमी दियारा में दोबारा आतंकराज क़ायम न होने देने का आह्वान करेंगे. राजद एवं लोजपा के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर पेंच फंस सकता है. लोजपा कुढ़नी, कांटी, सकरा सहित कुछ अन्य सीटों की मांग करेगी, परंतु उसके पास कद्दावर प्रत्याशियों का अभाव है. लोकसभा चुनाव में पार्टी ने म़ुजफ़्फरपुर सीट ले ली, लेकिन  राजद से प्रत्याशी उधार लेना पड़ा. राजद नेता डॉ. भगवान लाल सहनी लोजपा प्रत्याशी बने, मगर लोजपा में नेटवर्क की कमी के कारण जदयू के कमज़ोर प्रत्याशी कैप्टन जयनारायण प्रसाद निषाद अंतत: मज़बूत हो गए.

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ज़िले में कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं है और पाने के लिए बहुत कुछ है. राजद, जदयू एवं भाजपा के लोग भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि इस बार कांग्रेस को अच्छे वोट मिलेंगे. उपचुनाव में औराई एवं बोचहां में दस-दस हज़ार वोट बटोर चुकी कांग्रेस कई सीटों पर कड़ी टक्कर दे सकती है. राहुल गांधी के अभियान और प्रत्येक ज़िले की कमान एक-एक कांग्रेसी सांसद को सौंपे जाने की खबर से गांव-गांव में कांग्रेस कार्यकर्ताओं में खासा उत्साह है. सदस्यता अभियान से कांग्रेस कार्यालय की रौनक बढ़ी है. प्रदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष विनीता विजय, विधान पार्षद महाचंद्र प्रसाद सिंह, पूर्व मंत्री हिंद केसरी यादव, पूर्व केंद्रीय मंत्री उषा सिन्हा के पुत्र अनुभव सिंह सहित दो दर्जन से अधिक लोग पार्टी टिकट के प्रबल दावेदार हैं, जिनके समर्थन एवं अन्य संसाधनों की बदौलत कांग्रेस सभी 11 सीटों पर चुनौती देने की तैयारी में है. कांग्रेस की सक्रियता एनडीए के साथ-साथ राजद को महंगी पड़ेगी. राजद को मुस्लिम और एनडीए को अगड़ी जाति के मतों के बड़े हिस्से से हाथ धोना पड़ सकता है.

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