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मुख्‍यमंत्री की कुर्सी अभी दूर है
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मुख्‍यमंत्री की कुर्सी अभी दूर है

रेलवे परियोजनाओं के उद्घाटन की हड़बड़ी के कारण एक रोचक वाकया हो गया. 20 मार्च को महाराजा एक्सप्रेस के उद्घाटन समारोह के लिए अख़बारों को जो विज्ञापन जारी किया गया, उसके ऩक्शे में दिल्ली को पाकिस्तान और कोलकाता को बंगाल की खाड़ी में दिखाया गया. जहां हैदराबाद है, वहां खजुराहो लिखा गया था. रेलवे की ज़मीन पर उद्योग लगाने की धकाधक घोषणाओं से ममता अपनी उद्योग विरोध छवि धोना चाहती हैं, पर कोलकाता की सड़कों पर दौड़ती किसी नैनो को देखकर भावुक बंगालियों के मन में कैसी हूक सी उठती है, उन्हें इसका अंदाज़ा नहीं है. सिंगुर में बुझे उम्मीदों के दीये और वहां पसरे सन्नाटे की काली छाया से उबरना ममता के लिए आसान नहीं होगा. पूर्व रेलवे ने हालांकि उस विज्ञापन एजेंसी को प्रतिबंधित कर दिया है, पर इसमें रेलवे की लापरवाही भी साफ हो गई.

पार्टी के संचालन के मामले में मायावती के ऩक्शेक़दम पर चलती हैं ममता. आंतरिक लोकतंत्र का घनघोर अभाव है. सच तो यह है कि ममता पार्टी में नंबर दो का कोई प्रावधान नहीं रखना चाहतीं. कुछ माह पहले उन्होंने पार्टी के सांसद एवं गायक कबीर सुमन को पार्टी में अतिथि कहकर संबोधित किया था. पिछले साल नवंबर में सांसद कोष के पैसे के उपयोग पर पार्टी के स्थानीय नेताओं की दख़लअंदाज़ी के ख़िला़फ इस संवेदनशील कलाकार ने बग़ावत का बिगुल बजा दिया था.

पिछले लोकसभा चुनावों के बाद से ममता बनर्जी को वेटिंग रूम में बैठी मुख्यमंत्री के रूप में भले ही मान लिया गया हो, पर 10 महीने का समय बीतने के साथ ही कई नए समीकरण बनने लगे हैं, जो ममता के लिए ख़तरे की घंटी हैं. बंगाल में विधानसभा चुनाव होने में अभी एक साल का समय बाक़ी है. ज़ाहिर है, अभी चार ऋृतुएं आनी हैं और आख़िरी वसंत ऋृतु में तृणमूल खिलेगा ही खिलेगा, कहा नहीं जा सकता. हो सकता है, बुद्धदेव धूल झाड़ कर फिर खड़े हो जाएं और एक बार फिर लाल पताकाओं से बंगाल का लालकिला सज जाए. लोकसभा चुनावों की बढ़त बरक़रार रखने के लिए ममता कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं. पिछले रेलवे बजट में ममता ने कैबिनेट के सामने 24 बड़ी रेल परियोजनाओं का प्रस्ताव रखा, जिनमें से 14 पश्चिम बंगाल की थीं. कैबिनेट की बैठक में तब इमोशनल सीन पैदा हो गया, जब अपनी बात मनवाने के लिए ममता फूंट-फूंट कर रोने लगीं और आंसुओं की बाढ़ में प्रणव दादा बह गए. संभव है कि कुछ परियोजनाओं को केवल सैद्धांतिक स्वीकृति मिली हो, पर ममता ख़ुश हो गईं, इस उम्मीद में कि उनकी जनता भी ख़ुश होगी. बंगाल की ओर झुकाव की आलोचना हुई तो ममता ने उड़ीसा, आंध्र प्रदेश और गुवाहाटी में रेल वैगन कारखाने लगाने के प्रस्तावों को गिनाकर बचाव किया. पर दाई से पेट छिपाने वाली कहावत की तरह कोई भी देख सकता है कि उन्होंने रेल पर सवार होकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने की कोशिश की है. बाक़ी सब छोड़िए, योजना ख़र्च देखिए. रेलवे का कुल योजना ख़र्च 41426 करोड़ का है, जिसमें से 39000 करोड़ बंगाल की परियोजनाओं पर ख़र्च किया जाना है. इसके अलावा राज्य में 8200 करोड़ की विभिन्न परियोजनाएं निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं. सभी जानते हैं कि लालू प्रसाद के समय से ही रेल किराए नहीं बढ़ रहे हैं, ममता ने भी नहीं बढ़ाया. पर सवाल है कि परियोजनाओें के लिए पैसा आएगा कहां से? क्या ज़्यादातर को योजना आयोग से मंजूरी मिल पाएगी?

ज़मीनी हक़ीक़त देखकर ही प्रणव मुखर्जी ने डीजल और पेट्रोल की मूल्य वृद्धि वापस लेने से इंकार कर दिया, पर ममता को मुख्यमंत्री की कुर्सी दिख रही है, अर्थव्यवस्था की हालत से कोई मतलब नहीं. तभी तो अपनी बात मनवाने के लिए उन्होंने आंसू बहाने जैसे तिरिया चरित्तर का सहारा लिया. ममता में इतनी राजनीतिक चतुराई नहीं है कि वह बजट में बिहार और राजस्थान का भी थोड़ा ध्यान रखतीं, जहां के लोग बंगाल के हिंदीभाषियों में दो-तिहाई से भी ज़्यादा हैं. ममता लालू की मुखर विरोधी रही हैं और उन्होंने श्वेतपत्र लाकर यह साबित करने की भी कोशिश की कि रेलवे के कायाकल्प के दावे पूरी तरह सच नहीं हैं. पर उन्हें नहीं मालूम, लालू (और साथ में राबड़ी) ने बिहार का भले ही बेड़ा गर्क किया हो, पर रेलमंत्री के तौर पर उनकी लोकप्रियता बरक़रार है. ममता को रवींद्र नाथ टैगोर याद आए, उनके नाम पर ट्रेन चलाने की घोषणा हुई. कोलकाता मेट्रो के सारे स्टेशनों के नाम बंगाल के मनीषियों के नाम पर रख दिए गए हैं. पर उन्हें नहीं लगा कि महाराणा प्रताप, राजेंद्र प्रसाद, भिखारी ठाकुर या नेपालियों के आदि कवि भानु के नाम पर भी किसी स्टेशन का नामकरण किया जाए. तृणमूल के मां, माटी और मानुष के नारे से भी हिंदीभाषियों को थोड़ा खटका लग रहा है और लोग सोच रहे हैं कि यह महाराष्ट्र के मराठी मानुष की तर्ज वाला कोई नारा तो नहीं है.

वैसे हिंदीभाषियों की उपेक्षा या अपमान राजनीतिक रूप से किस कदर नुक़सानदेह है, इसकी एक छोटी सी मिसाल देखें कि कोलकाता में गंदगी बिहार के लोग ही फैलाते हैं, कहने वाले तृणमूल नेता सुब्रत मुखर्जी पिछले आठ सालों से कोई चुनाव नहीं जीत पा रहे हैं. पिछले लोकसभा चुनावों में उन्हें बांकुड़ा से टिकट दिया गया, पर वहां से भी पराजय ही हाथ लगी.

उद्योगों के लिए ज़मीन अधिग्रहण के विवादास्पद मामले से निपटने का विश्वास ममता को इसलिए है कि ज़मीन रेलवे की ही होगी. केंद्रीय विद्यालय और नवोदय विद्यालयों के अलावा 41 में से 9 अस्पताल एवं मेडिकल कॉलेज बंगाल में खोले जाने हैं. 94 आदर्श स्टेशनों में से 32 बंगाल के हैं. क्यों भाई! बंगाल के इतने स्टेशनों को आदर्श बनाने की ऐसी भी क्या ज़रूरत है? रवींद्र नाथ टैगोर के नाम पर हावड़ा एवं बोलपुर में दो संग्रहालय और हावड़ा में ही शंभु मित्रा सांस्कृतिक केंद्र खोले जाने का प्रस्ताव है. पूछा जा सकता है कि इनसे महंगाई और बेरोज़गारी से त्रस्त आम जनता को सच में क्या फायदा होगा?

कोलकाता मेट्रो रेल के विस्तार पर क़रीब 100 करोड़ का ख़र्च आने वाला है. भारी घाटे में चल रही सर्कुलर रेल (कोलकाता के चारों तऱफ चलने वाली रेल सेवा) का भी विस्तार होगा. एक दर्ज़न दुरंत ट्रेनें चलने वाली हैं, जिनमें पांच बंगाल से खुलेंगी. ऑफ सीजन में इन ट्रेनों की कितनी सीटें भरेंगी, यह देखने की बात होगी, क्योंकि इनमें बीच के स्टेशनों के यात्री सवार नहीं हो सकेंगे. महिलाओं के लिए विशेष ट्रेन चलाना भी रेलवे की आर्थिक सेहत के लिए ठीक नहीं लग रहा है. मुंबई को छोड दें तो कोलकाता में इन्हें घाटे में चलना ही चलना है. महिला ट्रेनों में लगभग आधी जगह खाली जा रही है. ज़्यादा बुद्धिमानी होती, अगर सामान्य ट्रेनों में ही एक-दो महिला डिब्बे और जोड़े जाते. हरिपुर के परमाणु संयंत्र का भी ममता विरोध कर रही हैं और जहां भी भूमि का अधिग्रहण होना है, उस उद्योग को वह सहमति नहीं दे रही हैं. तो उनके सत्ता में आने पर क्या केवल रेलवे की ज़मीन पर ही उद्योग लगेंगे? सरकारी घोषणाओं के बारे एक आम राय रहती है कि इनमें से ज़्यादा पूरी नहीं होतीं. ममता अगर सोच लेती हैं कि इन घोषणाओं से जनता उन्हें विकास का पुरोधा मान लेगी तो यह उनकी ख़ुशफहमी ही होगी. ममता की सबसे बड़ी समस्या उनका ढुलमुल रवैया है. उनके पास अपना कोई राजनीतिक दर्शन नहीं है. कई महत्वपूर्ण मसलों पर साफ राय नहीं है. वह विचारों की पटरी बदलती रहती हैं. महिला आरक्षण विधेयक को ही लें. जिन महिलाओं का दिल जीतने के लिए उन्होंने रेल बजट में महिला स्पेशल ट्रेनें चलाई हैं, उन्हीं महिलाओं की क़िस्मत बदलने वाले विधेयक पर उन्होंने वोटिंग का बॉयकाट किया. इस मुद्दे पर र्सों कहिए तो मुस्लिम वोटों के लोभ में वह मुलायम और लालू के साथ हो गईं. क्या बंगाल की महिलाएं इस बदलाव पर निगाह नहीं डालेंगी? इसके पहले भी मुस्लिम वोटों के फैक्टर को देखते हुए ममता बारी-बारी से कभी भाजपा से तो कभी कांग्रेस से चुनावी गठबंधन करती रही हैं.

इस तरह गठबंधन धर्म के पालन में भी ममता को 10 में से चार नंबर ही मिलेंगे. पिछले लोकसभा चुनावों में सीटें देने के मामले पर उन्होंने कांग्रेस को ख़ून के आंसू रुलाए. दक्षिण बंगाल से तो उन्होंने पंजे को घुमाकर बंगाल की खाड़ी में फेंक ही दिया. अभी कुछ माह पहले सिलीगुड़ी नगर निगम चुनाव में मेयर की कुर्सी को लेकर ममता के अड़ियल रवैये ने कांग्रेस को माकपा का समर्थन लेने पर मजबूर किया. कांग्रेस से मनमुटाव की एक ताज़ा मिसाल तब दिखी, जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का मालदा दौरा टल गया. हुआ यह कि गनी खान के नाम पर बनने वाले इंजीनियरिंग संस्थान के आधारशिला समारोह में उनके परिवार वालों ने ममता को निमंत्रित नहीं किया था. कुछ महीनों बाद राज्य में 86 नगरपालिकाओं के चुनाव होने वाले हैं और ममता मोल-तोल में लग गई हैं. पर कांग्रेस के नेताओं ने भी ठान लिया है कि वे अब ममता के आगे नहीं झुकेंगे. दीपा दासमुंशी और अधीर चौधरी ने अभी से बयानबाज़ी शुरू कर दी है. देखिए टकराव की नौबत आती है या मामला आराम से सुलट जाता है.

पार्टी के संचालन के मामले में मायावती के ऩक्शेक़दम पर चलती हैं ममता. आंतरिक लोकतंत्र का घनघोर अभाव है. सच तो यह है कि ममता पार्टी में नंबर दो का कोई प्रावधान नहीं रखना चाहतीं. कुछ माह पहले उन्होंने पार्टी के सांसद एवं गायक कबीर सुमन को पार्टी में अतिथि कहकर संबोधित किया था. पिछले साल नवंबर में सांसद कोष के पैसे के उपयोग पर पार्टी के स्थानीय नेताओं की दख़लअंदाज़ी के ख़िला़फ इस संवेदनशील कलाकार ने बग़ावत का बिगुल बजा दिया था. जनवरी में उन्होंने पुलिस अत्याचार के ख़िला़फ बनी आदिवासियों की समिति के मुखिया छत्रधर महतो की रिहाई की मांग करते हुए अपने माओवादी थीम वाले गीतों की सीडी जारी की. यही नहीं, ममता से बिना पूछे उन्होंने माओवादियों से वार्ता में मध्यस्थता का प्रस्ताव तक कर दिया. यहां तक कि अब वह ममता को उन्हें पार्टी से निकालने की चुनौती दे रहे हैं. 21 मार्च को ही माओवादियों के ख़िला़फ ममता के ढुलमुल रवैये से नाराज़ कबीर ने अपनी ही पार्टी पर माकपा की ही तरह भ्रष्टाचार और हत्या की राजनीति करने का आरोप लगाया है. उनके साथ लेखिका महाश्वेता देवी हैं, जो कभी ममता के साथ थीं. इस तरह ममता का बुद्धिजीवियों से प्रेमालाप भी बंद हो गया है.

जैसा कि द टेलीग्राफ के एसोसिएट एडिटर रशीद किदवई ने चौथी दुनिया को बताया, केंद्र में कोटे के मुताबिक़, ममता 2-3 काबीना मंत्री बनवा सकती थीं, पर उन्होंने केवल ख़ुद को ही इस दर्ज़े में रखा. जैसे कि पार्टी का कोई दूसरा नेता इस क़ाबिल ही नहीं था. जहां तक कांग्रेस से रिश्ते का सवाल है, ममता को समझना चाहिए कि ट्रेन के पिछले डिब्बों की भी अहमियत कम नहीं होती.

तृणमूल के कुछ मंत्रियों ने शिक़ायत की है कि उनके मंत्रालयों के अ़फसर उन्हें भाव नहीं देते. पर दीदी क्या करेंगी, उन्होंने ही तो मंत्रियों को महीने में 15-20 दिन बंगाल में गुजारने को कहा है. लोकसभा चुनावों के बाद से पैदा हुए घनघोर संकट की इस घड़ी में माकपा क्रिकेटर धोनी की तरह कूल रहकर फिर से उठ खड़े होने की कोशिश में है. हालांकि पार्टी लोकप्रियतावाद में यक़ीन नहीं रखती, पर चुनाव क़रीब आने पर करुणानिधि की तरह उपहार बांटने से लेकर दूसरे तरह के लोकप्रियतावर्द्धक क़दम उठा सकती है. हम देख चुके हैं कि राज्य में औद्योगिकीकरण की गति तेज़ करने के लिए उसने मार्क्सवादी सिद्धांतों की बलि दी थी. वाममोर्चा सरकार ने ममता के बंगाली रेल बजट के मुक़ाबले में 22 मार्च को पेश राज्य के बजट को मनभावन रखने की कोशिश की है. कोशिश इसलिए कहेंगे कि ममता की तरह वाममोर्चा के पास कोई पैसे वाला दादा (वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी) नहीं है. सरकार ने बैक फायर करने वाली औद्योगिक नीति को गुडबॉय बोल दिया है और वह फिर से किसानों एवं ग़रीब तबके के लोगों को लुभाने के क़दम उठा रही है. उसने राज्य के पिछड़े मुसलमानों को सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की है और क़ानून व्यवस्था ठीक करने के लिए हज़ारों पुलिसकर्मियों की बहाली भी. अपने कैडरों का मनोबल बढ़ाने के लिए भी पार्टी कई तरह के कार्यक्रम चला रही है और ज़मीनी स्तर पर जनता की नाराज़गी दूर करने के लिए जनसंपर्क चल रहा है. चुनाव तक हर हालत में विवादास्पद मसलों में हाथ न डालने की भी रणनीति पार्टी ने बनाई है. सरकार समय पर चुनाव कराना चाहती है. राज्य के मछली पालन मंत्री एवं सोशलिस्ट पार्टी के नेता किरणमय नंदा ने दो बार कहा है कि इस गठबंधन को सत्ता छोड़ देनी चाहिए और जल्दी से जल्दी चुनाव कराना चाहिए. हालांकि माकपा की रणनीति यह है कि चुनाव अगले साल अप्रैल-मई में ही कराए जाएं और इस बीच ममता की संभावित ग़लतियों का फायदा उठाया जाए. कॉमरेडों को उम्मीद है कि चुनावों में दिखी ममता लहर मई 2011 तक ज़रूर धीमी पड़ जाएगी. मालूम हो कि केवल 1991 में चुनावी ख़र्च बचाने के लिए विधानसभा चुनाव एक साल पहले लोकसभा चुनावों के साथ कराए गए थे. समय के साथ परिवर्तन प्रकृति का नियम है, पर बदलाव का भी एक आधार होता है. माकपा की दुर्गति ज़्यादातर नकारात्मक वोटों की वजह से दिखी है, पर एक साल बाद लाल किले में सेंध लगाने के लिए ममता को जनता का विश्वास जीतना होगा, तभी उनका मां, माटी और मानुष का नारा कारगर हो सकेगा.

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