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नक्‍सल क्रांति का एक जनक हताशा से हार गया
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नक्‍सल क्रांति का एक जनक हताशा से हार गया

हताशा ने न जाने कितनी जानें ली हैं, पर अभी हाल में इसने एक ऐसे नेता को अपना शिकार बनाया है, जिसने आज से 43 साल पहले हथियारों के बल पर उस व्यवस्था को बदलने का सपना देखा था, जो किसानों व मज़दूरों का शोषण करती है, उनका हक़ मारती है. इस हताशा के ताजा शिकार हैं, कानू सान्याल. हालांकि भूखों के लिए लड़ने वाले नक्सलियों के ख़ूनी खेल में अब तक क़रीब 65000 लोगों की जानें जा चुकी है. इनमें से बहुत ऐसे थे, जो सशस्त्र क्रांति का न तो मतलब समझते थे और न समझना चाहते थे. सत्ता और सशस्त्र संघर्ष के बीच की क्रॉस फायरिंग में हज़ारों मांगें सूनी हो गईं, हज़ारों बच्चों को स्लेट-पेंसिल के बदले बंदूक़ें थमा दी गईं, उनका बचपन छीन लिया गया. और इस तरह 43 साल बीत गए. पर हासिल क्या हुआ?

सीपीआई-एमएल के दार्जिलिंग ज़िला सचिव जोगेन विश्वकर्मा ने चौथी दुनिया को बताया कि दोपहर का खाना खाकर कॉमरेड सो गए, जबकि उनकी देखरेख करने वाली शांति मुंडा के मुताबिक़ खाना खाकर वह आराम से कुर्सी पर बैठकर अख़बार पढ़ने लगे और दरवाज़ा खुला रखने के लिए कहा. दो घंटे बाद जब शांति लौटी तो उसने दरवाज़े को खुला ही पाया और कानू का शव सीलिंग की हुक में लगी प्लास्टिक की रस्सी से लटका हुआ था. संदेह इसलिए भी बढ़ा कि पैर ज़मीन से सटे हुए थे. दो दिन बाद सिलीगुड़ी में पार्टी के राज्य सचिव सुब्रत बसु ने यह कहकर संदेह बढ़ा दिया कि पार्टी इसे आत्महत्या नहीं मानती और अपने स्तर पर इसकी जांच की जाएगी.

कोई भी सच्चा और ईमानदार आदमी इसकी समीक्षा करेगा तो हताशा घेरेगी ही. और कानू सान्याल भी इससे बच नहीं पाए. 1932 में दार्जिलिंग के कर्सियांग में जन्मे इस 78 वर्षीय नक्सली नेता ने गत 23 मार्च को जलपाईगुड़ी ज़िले के सेफतुल्लाजोट गांव में जब ख़ुदकुशी की, तो सहसा किसी को विश्वास नहीं हुआ. संदेह हुआ कि कहीं यह हत्या तो नहीं? शक़ की वजह भी थी. पिछले कुछ सालों से कानू दिल की बीमारी से जूझ रहे थे. एक साल पहले उन्हें सेरिब्रल अटैक भी हुआ. आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने सरकारी मदद लेने से इनकार कर दिया.

सीपीआई-एमएल के दार्जिलिंग ज़िला सचिव जोगेन विश्वकर्मा ने चौथी दुनिया को बताया कि दोपहर का खाना खाकर कॉमरेड सो गए, जबकि उनकी देखरेख करने वाली शांति मुंडा के मुताबिक़ खाना खाकर वह आराम से कुर्सी पर बैठकर अख़बार पढ़ने लगे और दरवाज़ा खुला रखने के लिए कहा. दो घंटे बाद जब शांति लौटी तो उसने दरवाज़े को खुला ही पाया और कानू का शव सीलिंग की हुक में लगी प्लास्टिक की रस्सी से लटका हुआ था. संदेह इसलिए भी बढ़ा कि पैर ज़मीन से सटे हुए थे. दो दिन बाद सिलीगुड़ी में पार्टी के राज्य सचिव सुब्रत बसु ने यह कहकर संदेह बढ़ा दिया कि पार्टी इसे आत्महत्या नहीं मानती और अपने स्तर पर इसकी जांच की जाएगी. पर एक ही साथ आत्महत्या की बात ज़्यादा सा़फ और सच लग रही है. मौत के तुरंत बाद कानू के छोटे भाई प्रवीर सान्याल ने स्वीकार किया कि वह पिछले कुछ समय से अवसाद से घिर गए थे. रही सही कसर पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने पूरी कर दी. 30 मार्च को आई पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण आत्महत्या ही करार किया गया है. चौथी दुनिया से बात करते हुए उत्तर बंगाल के आईजी के.एल. टामटा ने भी इसकी पुष्टि की. फिर अपने घर में बंद रहने वाले कानू एक तरह से पार्टी में निष्क्रिय थे. स्थानीय स्तर पर उनका कोई दुश्मन होगा, इसकी भी कल्पना नहीं की जा सकती है. पूरे नक्सलबाड़ी इलाक़े में हर दल के लोग उनका सम्मान करते थे. नक्सल प्रभावित इलाक़ों में जब ऑपरेशन ग्रीन हंट चल रहा है और दर्ज़नों लोगों की जानें जा रही हैं, हो सकता है, यह देख-सुनकर उनका अवसाद और बढ़ गया हो. अवसाद इस वजह से भी बढ़ा हो सकता है कि पार्टी में अब उनकी बात नहीं सुनी जा रही थी और वे अब अतिवादी रवैया अपनाने के पक्ष में नहीं थे.

ग़ौर करने वाली एक बात और है कि जिन किसानों के लिए कानू ने नक्सल आंदोलन शुरू किया था, सत्ता में आने के बाद से ऑपरेशन बर्गा और पंचायती सुधारों के ज़रिए वाममोर्चा सरकार ने र्कोंी हद तक शिक़ायतें दूर कर दीं. अगर सिंगुर, नंदीग्राम और लालगढ़ मामले में बुद्धदेव सरकार ने दूरदर्शिता दिखाई होती तो मामला इतना आगे नहीं बढ़ता. ज़ाहिर है न छत्रधर महतो पैदा होते और न किशन जी को बंगाल-झारखंड से यहां आकर मोर्चा संभालना पड़ता. ज़ाहिर है सरकार ने भी अपनी ताक़त का नग्न प्रदर्शन किया और हालात आपके सामने हैं.

वैसे कानू सान्याल माकपा और भाकपा दोनों के विरोधी रहे, पर उनकी मौत के बाद इन दलों ने माना है कि देश में कम्युनिस्ट आंदोलन को आगे बढ़ाने में उनका अहम योगदान रहा है. सीपीआई  के उप महासचिव एस. सुधाकर रेड्‌डी ने कहा है, हालांकि पार्टी सशस्त्र संघर्ष की उनकी विचारधारा से सहमत नहीं थी, पर उन्होंने कम्युनिस्ट आंदोलन को काफी मज़बूती दी. माकपा के पोलितब्यूरो सदस्य सीताराम येचुरी ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है, नंदीग्राम और लालगढ़ के बाद सान्याल यह मान रहे थे कि माओवादियों ने जो तरीक़ा अपनाया है, वह नक्सल आंदोलन शुरू करने के समय के अनुमोदित तरीक़े से अलग हो गया था. कानू के क़रीबी मित्र और दक्षिण बंगाल में पार्टी का मोर्चा संभालने वाले अजीजुल हक ने कहा, उन्हें ऐसा नहीं लगता कि कानू ने ख़ुदकुशी की. हम सबने उनकी हत्या की है, उनकी हत्या वर्तमान समाज ने की है. मरने के बाद भी कानू ने समाज को एक संदेश दिया है.

यह संदेश क्या हो सकता है? यह भी तो हो सकता है कि हिंसा किसी मसले का हल नहीं है. कुछ माह पहले चौथी दुनिया को दिए गए एक साक्षात्कार (जो किसी अख़बार को दिया गया उनका अंतिम साक्षात्कार था) में भी कानू ने इस बात को स्वीकार किया था. आज किसानों व मज़दूरों के सामने वैसी समस्याएं नहीं हैं, जो 40 साल पहले थीं. ज़ाहिर है हिंसा और ख़ून-ख़राबे से कुछ हासिल करने की कोशिश हताशा ही पैदा करेगी.

कभी हर समय घनघनाते रहने वाले कानू सान्याल का फोन (0353-2004020) भी पावर ऑफ हो गया है. हो भी क्यों नहीं, कभी लाखों दिलों में ऊर्जा का संचार करने वाला वह शख्स अब रिसीवर उठाने के लिए मौजूद जो नहीं है.

सशस्त्र क्रांति, जो विफल हो गई

25 मई, 1967 को नक्सलबाड़ी में भूमि विवाद के बाद एक जमींदार के भाड़े के लोगों ने एक किसान पर हमला किया. किसानों ने एकजुट होकर जमींदारों से लोहा लेने की ठानी. बंगाल पुलिस के जवानों ने 11 किसानों की हत्या कर दी. यहीं से पूरे बंगाल में चारु मजूमदार, जंगल संथाल और कानू सान्याल की अगुवाई में नक्सलवाद की चिंगारी भड़की, जो आज देश की सबसे ख़तरनाक समस्या बन गई है. माओ जे दांग से प्रभावित चारू मजूमदार ने किसानों का आह्वान किया कि वे सरकार और ऊंची जातियों के दबदबे वाली राजनीतिक व्यवस्था को पलट दें. कानू सिलीगुड़ी कोर्ट में रेवेन्यू क्लर्क का काम करते थे, पर केंद्र की ओर से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी पर पाबंदी लगाए जाने के विरोध में तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री विधानचंद्र राय को काले झंडे दिखाने के आरोप में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया. जलपाईगुड़ी जेल में रहने के दौरान ही वे सीपीआई के ज़िला सचिवालय सदस्य चारु मजूमदार से प्रभावित हुए. रिहाई के बाद भारत-चीन युद्ध को लेकर हुए पार्टी के विभाजन के बाद वे सीपीआई-एम में

शामिल हो गए. 1960 व 70 के दशक में बंगाल में उफने नक्सली आंदोलन को मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय ने कुछ ही महीनों में कुचल दिया. 1969 में कानू व चारु ने सीपीआई -एमएल का गठन किया और सशस्त्र क्रांति के ज़रिए बदलाव की मुहिम जारी रखी. सान्याल ने सशस्त्र संघर्ष के लिए खुलेआम चीन से मदद मांगी और वे बीजिंग भी गए, हालांकि यह सा़फ नहीं हो पाया कि चीन ने उनकी किसी तरह से मदद की या नहीं.

कानू सान्याल अगस्त 1970 में भूमिगत रहने के दौरान ही गिरफ़्तार कर लिए गए. पार्वतीपुरम मामले (आंध्रप्रदेश और उड़ीसा के जमींदारों के ख़िला़फ संगठित तरीक़े से बग़ावत को उकसाने के आरोप में), जिसे इतिहास का सबसे बड़ा षडयंत्र कहा जाता है, में कानू को विशाखापत्तनम की जेल में सात साल तक रखा गया. सन्‌ 1977 में पश्चिम बंगाल में जब माकपा की अगुवाई में सरकार बनी तो ज्योति बसु के हस्तक्षेप से उनकी रिहाई मुमकिन हो सकी. रिहाई के बाद कानू ने सशस्त्र संघर्ष का कारवां आगे बढ़ाते हुए कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की आर्गेनाइज़िंग कमेटी (ओसीसीआर) बनाई, जिसका कम्युनिस्टों की मार्क्सवादी लेनिनवादी शाखा में विलय कर दिया गया.

सन 1972 में चारु मजूमदार को गिरफ़्तार कर लिया गया और एक पखवाड़े के बाद ही कोलकाता में पुलिस हिरासत में उनकी मौत हो गई. यह मौत भी अबतक रहस्य बनी हुई है. बताया जाता है कि पुलिस उत्पीड़न की वजह से उनकी मौत हो गई. तीसरे बड़े नेता जंगल संथाल एक दशक तक जेल में रहने बाद जब बाहर आए, हताशा का शिकार होकर शराब के नशे में चूर रहने लगे और किडनी का फेल होना उनकी मौत का कारण बना. 18 जनवरी 2006 को कानू सान्याल की अगुवाई में उनके कॉमरेडों क्षेत्र में बंद चाय बागानों के ख़िला़फ आंदोलन के तहत दिल्ली जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस को रोका तो उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया. 2003 से कानू सीपीआई-एमएल के महासचिव के रूप में काम कर रहे थे. अभी हाल में सिंगुर और नंदीग्राम में राज्य सरकार की भूमि अधिग्रहण नीति की उन्होंने कड़ी आलोचना की थी. हालांकि पिछले कुछ वर्षों से वे सीपीआई-एमएल की ग़लतियों को महसूस करने लगे थे और ऐलान किया कि आतंक से कोई बदलाव नहीं होता और इससे जनता से दूरी बढ़ती है. यही विचार अंततः अवसाद में बदल गया.

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