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नक्‍सलवाद, मीडिया और पुलिसः मीडिया को धमकी हद में रहो
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नक्‍सलवाद, मीडिया और पुलिसः मीडिया को धमकी हद में रहो

सीपीआई (माओवादी) के प्रवक्ता आज़ाद की मुठभेड़ के नाम पर आंध्र प्रदेश पुलिस द्वारा की गई हत्या के बाद अमन एवं इंसाफ़ के पैरोकार सदमे और गुस्से में हैं. इनमें बहुतेरे माओवादियों के हिंसा के रास्ते पर उंगली भी उठाते रहे हैं, लेकिन उससे पहले सरकारों की जनविरोधी नीतियों और उसके प्रतिरोध के बर्बर दमन को ज़रूर कठघरे में भी खड़ा करते रहे हैं. पुलिस-सुरक्षाबल और माओवादियों के बीच जारी हिंसक भिड़ंत में छत्तीसगढ़ का बस्तर और उसमें भी दंतेवाड़ा ज़िला सबसे नाज़ुक इलाक़ा है. स्वामी अग्निवेश एवं दूसरे सामाजिक कार्यकर्ताओं की दंतेवाड़ा यात्रा की ख़बर उन इलाक़ों तक भी पहुंची, जहां मुख्यधारा के तथाकथित मीडिया की पहुंच नहीं है या कहें कि ये इलाक़े उनके हाशिए से बाहर हैं. इस यात्रा ने सबसे ज़्यादा और सबसे पहले प्रभावित आबादी और ख़ासकर बस्तर के आदिवासियों के बीच अमन की आस जगाने का काम किया. हालांकि उन्हें स्वामी अग्निवेश के क़द या उनके काम का अंदाज़ा नहीं था, लेकिन इतनी जानकारी ज़रूर हो गई कि गेरुआ रंग के लिबास में कोई महान संत इसलिए निकला है कि सरकार और माओवादियों के बीच बातचीत का माहौल बने. सुलह का कोई रास्ता निकले, अमन की बहाली हो और आदिवासियों का चैन लौटे. स्वामी अग्निवेश की कोशिशों में माओवादियों की नुमाइंदगी आज़ाद कर रहे थे और उन्हीं की हत्या ने इस दीये को बुझा देने का काम किया. यह सीधा संदेश दिया कि केंद्र सरकार माओवादियों का सफ़ाया चाहती है, उनके साथ बातचीत नहीं.

पत्रकार की ज़िम्मेदारी है कि वह लोगों तक सच को पहुंचाए. सच की तह तक जाने के लिए मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन ख़बर अगर माल भर है तो उसकी डिलीवरी में देरी नहीं की जा सकती. तब उसका सोच-विचार से क्या लेना-देना? तो किस बात की ईमानदारी, कौन सी प्रतिबद्धता, कहां की संवेदनशीलता और कैसे मूल्य, अगर किसी मीडिया समूह का उत्पाद केवल और केवल लाभ कमाने के लिए है, उपभोक्ताओं को सही सूचना देने के लिए नहीं?

आज़ाद के साथ हेमचंद्र की भी हत्या की गई. पहले उन्हें जोनल कमांडर बताया गया, बाद में पता चला कि वह तो पत्रकार थे. इस हत्याकांड की साज़िश किस स्तर पर रची गई. आज़ाद और हेमचंद्र को एक जुलाई की सुबह ग्यारह बजे के आसपास नागपुर में पकड़ा गया और उस रात दस बजे से अगले लगभग चार घंटे के बीच किसी समय मार दिया गया. इस बीच क्या-क्या हुआ, किस तरह हुआ, किसके इशारे पर हुआ? क्या फ़र्ज़ी मुठभेड़ के नाटक का मंचन आंध्र प्रदेश के स्पेशल इंटेलिजेंस ब्यूरो (एसआईबी) ने अपनी मर्ज़ी से किया? अगर हां, तो इसका मतलब यह निकला कि पुलिस, सुरक्षाबलों या एसआईबी जैसी एजेंसियां बेलगाम हैं और अमन के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट हैं. अगर नहीं, तो क्या इसकी पटकथा आंध्र प्रदेश सरकार ने तैयार की, जहां सुलह के लिए चल रही बातचीत के बीच माओवादियों का सफ़ाया कर देने का पुराना इतिहास रहा है. या कि इसके लिए केंद्र सरकार की मंज़ूरी या उसका फ़रमान था? इसमें माओवादियों का सफ़ाया करने की सरकारी जंग के सर्वोच्च कमांडर केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम किस भूमिका में थे? आख़िरकार स्वामी अग्निवेश बातचीत का जो पुल बनाने की तैयारी में थे, उसके एक छोर पर अगर आज़ाद थे तो दूसरे छोर पर चिदंबरम.

पत्रकार की ज़िम्मेदारी है कि वह लोगों तक सच को पहुंचाए. सच की तह तक जाने के लिए मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन ख़बर अगर माल भर है तो उसकी डिलीवरी में देरी नहीं की जा सकती. तब उसका सोच-विचार से क्या लेना-देना? तो किस बात की ईमानदारी, कौन सी प्रतिबद्धता, कहां की संवेदनशीलता और कैसे मूल्य, अगर किसी मीडिया समूह का उत्पाद केवल और केवल लाभ कमाने के लिए है, उपभोक्ताओं को सही सूचना देने के लिए नहीं? जनता को सजग करने का दायित्व निभाना तो बहुत दूर की कौड़ी है. इसीलिए अब पत्रकारिता की दुनिया में ऐसे लोगों की फ़ौज़ और उनकी पूछ बढ़ती जा रही है, जो भले ही पत्रकारिता संस्थानों से निकले हों, लेकिन दिल-दिमाग़ से अंगूठा टेक हैं. लेकिन यह पूरा सच नहीं है. असली सच तो यह है कि मीडिया समूहों में जानने और समझने की आज़ादी की लक्ष्मण रेखाएं पहले से खिंची होती हैं और जिसे लांघना नौकरी से हाथ धो बैठने के हालात पैदा करना होता है. इसकी परिधि मीडिया को संचालित कर रहे कॉरपोरेट समूह के व्यापारिक हितों से तय होती है, सामाजिक हितों से नहीं. पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों उ़र्फ मीडिया के उपभोक्ताओं का अधिकार है कि उन्हें किसी घटना, सवाल या मुद्दे को हर कोण से जांचने-परखने और उसके मुताबिक़ अपनी राय बनाने की सहूलियत मिले. यह तभी मुमकिन है, जब उन्हें सही और पूरी जानकारी मिले. किसी पक्ष या कोण को दबाने या ग़लत तरीक़े या अधूरा रखने से यह मुमकिन नहीं.

फ़िलहाल, लगता यही है कि ज़्यादातर बड़े मीडिया समूह इस सरकारी इशारे को समझ गए हैं कि विकास या राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में विस्थापन, जबरिया भूमि अधिग्रहण, उसके प्रतिरोध और उस पर राज्य दमन जैसे सुलगते मामलों में उपभोक्ताओं के अधिकार को सीमित कर दिया जाए और उससे अप्रभावित समुदायों की राय को एकतरफ़ा बना दिया जाए. सरकारों के लिए अपनी कंपनीपरस्ती के नमक का हक़ अदा करने का रास्ता खुले और जन विरोधी विकास का झंडा लहराए. यह तभी मुमकिन है, जब ऑपरेशन ग्रीन हंट को तेज़ किया जाए और उसे आख़िरी मंज़िल तक पहुंचाया जाए यानी आंध्र प्रदेश के मॉडल को दोहराया जाए कि बातचीत का नाटक करो और उसके पीछे माओवादियों का संहार भी जारी रखो. भले ही प्रभावित आबादी का कचूमर निकले और देश की संप्रभुता जाए भाड़ में. जहां अपने नफे-नुक़सान के मुताबिक़ उड़ान भरने वाले मीडिया समूह और मीडियाकर्मी बिकने के लिए क़तार में हों, वहां सेंसरशिप की भला क्या ज़रूरत?

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तो भी तमाम सिरफ़िरे मीडियाकर्मी हैं जो मानते ही नहीं. उन्हें हवालात में या जेल भिजवा कर समझाया जाता रहा है और इस मामले में छत्तीसगढ़ सबसे आगे रहा है. अब उन्हें समझा दिए जाने की सीधी और खुली धमकी दे दी गई है. इस मामले में भी छत्तीसगढ़ ने पहल की. आज़ाद के साथ हेमचंद्र के मारे जाने के बाद राज्य के पुलिस प्रमुख विश्वरंजन ने रायपुर में आयोजित प्रेस वार्ता में बताया कि हमारे पास माओवादी समर्थक पत्रकारों की सूची है. उन पर ख़ु़फिया एजेंसियों की नज़र है, पुख्ता सबूत मिलते ही उन पर कार्रवाई की जाएगी. किसी मीडियाकर्मी को जंगल में जाने और माओवादी नेताओं का साक्षात्कार लेने से नहीं रोका जा सकता, लेकिन माओवादियों के ख़िला़फ सुरक्षाबलों द्वारा जारी कार्रवाइयों के दौरान उनका जंगल में जाना निश्चित रूप से ख़तरनाक हो सकता है. तो भी जो इस दौरान जंगल में घुसने का जोखिम उठाते हैं और मारे जाते हैं, उनके लिए कुछ नहीं किया जा सकता. मतलब कि हेमचंद्र ने जंगल जाने और माओवादियों से मिलने का जोखिम उठाया और इसका ख़ामियाजा भुगता. जो भी यह हिमाकत करेगा, मारा जाएगा.

विश्वरंजन की धमकी पुलिस को बेझिझक आगे बढ़ो का फ़रमान थी. इसके एक सप्ताह के भीतर ही दंतेवाड़ा ज़िले के एसएसपी एसआरपी कुलकर्णी ने यह सनसनीखेज़ ख़ुलासा कर दिया कि छह जुलाई को कांग्रेसी कार्यकर्ता कम ठेकेदार के मकान पर हुए हमले की साज़िश रचने वाले की शिनाख्त कर ली गई है और वह समेली गांव का वाशिंदा लिंगाराम कोडापी है. उसने बाक़ायदा आतंकवादी कार्रवाइयों का प्रशिक्षण लिया है. लिंगाराम अरुंधति राय और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर के संपर्क में था. आज़ाद को ढेर किए जाने से पहले उसमें जोश भरा गया था कि वह आज़ाद की जगह लेने की क्षमता रखता है. हैरानी की बात यह कि अपना नाम लिए जाने के बावजूद लिंगाराम भूमिगत नहीं हुए. वह मीडिया के सामने पहुंचे और आंसू भरी आंखों से इस इल्ज़ाम को झूठा और ख़ुद को बेगुनाह बताया. उन अनुभवों को सामने रखा जब पिछले सितंबर में अपने गांव से पुलिस ने उन्हें उठाया था और 40 दिनों तक हिरासत में रखा था. बाद में लोगों की पहल पर बिलासपुर उच्च न्यायालय से ही उन्हें रिहाई मिली. ख़ौ़फ इस क़दर था कि अदालत के सामने अपनी ग़ैर क़ानूनी हिरासत पर उन्होंने ज़ुबान बंद रखने में ही भलाई समझी और रिहा होते ही उन्होंने छत्तीसगढ़ भी छोड़ दिया. कुल मामला यह कि पुलिस उन्हें एसपीओ बनाने पर आमादा थी और वह इसके लिए तैयार नहीं थे.

कौन है लिंगाराम

वह नोएडा स्थित एक मीडिया संस्थान के इंस्टीट्यूट के किसी कार्यक्रम से जुड़े हैं. उन्होंने दंतेवाड़ा में पुलिसिया जुल्म के शिकार लोगों को दिल्ली लाने और उनकी दु:खभरी दास्तान को कई मंचों से जगज़ाहिर करने की हिम्मत की थी. वनवासी चेतना आश्रम का उदाहरण काफ़ी है, जिसे सरकारी ज़्यादतियों को सतह पर लाने की हिमाकत करने की तगड़ी सज़ा मिली. हालात इतने बिगड़े कि उसके सचिव हिमांशु कुमार को भेष बदल कर दंतेवाड़ा से भागना पड़ा. इन दिनों वह छत्तीसगढ़ के हालात को बताने के लिए साइकिल यात्रा पर हैं और फ़िलहाल पंजाब में हैं. नंदिनी सुंदर इसलिए आंख की किरकिरी हैं, क्योंकि उन्होंने सलवाजुडूम के ख़िला़फ सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया. जबकि विश्वरंजन उसे आदिवासियों का स्वत: स्फूर्त आंदोलन और गांधीवाद का नया प्रयोग करार देते रहे हैं.

विश्वरंजन ज़रा हट के हैं. पुलिस के आला अधिकारी के साथ-साथ वह कवि एवं लेखक भी हैं. साहित्य उनके ख़ून में रहा है. वह उर्दू के जाने-माने शायर फ़िराक़ गोरखपुरी के पौत्र हैं, जिन्हें नेहरू बहुत मानते थे और फ़िराक़ साहब उनसे भी चुटकी लेने में नहीं हिचकिचाते थे. जो फ़िराक़ साहब को महज़ हुस्नो-इश्क़ और वासना के शायर के बतौर जानते हैं, उन्होंने शायद उनके काव्य संग्रह धरती की करवट को नहीं पढ़ा, जिसमें रोटियां, क़ैदी, जागते रहो, माज़ीपरस्त, नई चेतना जैसी नज़्में शामिल हैं और जो लय-ताल की ख़ूबसूरती के साथ ज़ालिम निजाम से बग़ावत करने का पैग़ाम देती हैं. फ़िराक़ साहब को अपनी धारदार नज़्मों के कारण आज़ादी से पहले जेल की हवा खानी पड़ी थी. आज ज़िंदा होते और लिख रहे होते तो जेल में ही होते. विश्वरंजन अपने पितामह से भी बहुत हट के हैं.

यहां दास्ताने आदम नामक उनकी मशहूर लंबी नज़्म के इस पहले बंद को पेश करना मुनासिब होगा. मुनासिब यह भी होगा कि विश्वरंजन इसे दोबारा पढ़ें, उसका अंग्रेजी या तमिल अनुवाद महाबली चिदंबरम को भी भेंट करें, उसे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को भी पढ़ाएं, जो कई बार माओवादियों को देश के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बता चुके हैं और जिनकी अध्यक्षता में 14 जुलाई को हुई बैठक में यह तय किया गया कि चार बुरी तरह अशांत राज्यों में माओवाद विरोधी कार्रवाई की एकीकृत कमान बनाई जाए.

क़ुर्नो के मिटाने से मिटे हैं न मिटेंगे,

आफ़ाते-ज़माना से झुके हैं न झुकेंगे,

उभरे तो दबाने से दबे हैं न दबेंगे,

हम मौत के भी मारे मरे हैं न मरेंगे,

हम ज़िंदा थे, हम ज़िंदा हैं, ज़िंदा रहेंगे.

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बदलाव जनतांत्रिक तरीके से होगा, बंदूक के बल पर नहीं

छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन का मानना है कि नक्सली बंदूक़ के बल पर बदलाव चाहते हैं, जो संभव नहीं है. परिवर्तन के लिए उन्हें जनतांत्रिक रास्ता अपनाना होगा. पेश हैं उनसे हमारे समन्वय संपादक मनीष कुमार की एक लंबी बातचीत के प्रमुख अंश:

आप पर आरोप है कि आपने छत्तीसगढ़ में यह फरमान जारी किया है कि कोई मीडियाकर्मी, कोई अख़बार या टीवी का रिपोर्टर नक्सलियों के साथ खड़ा नज़र आएगा या फिर उनके साथ सहानुभूति रखेगा तो उसके ख़िला़फ कार्रवाई होगी…

यह तो कहा ही नहीं गया है. मैंने टीवी और कई जगहों पर कहा है कि स़िर्फ किसी से बात करने पर कोई कार्रवाई नहीं होगी. कार्रवाई तभी हो सकती है, जबकि हमें कोई पॉजिटिव सबूत मिले कि अमुक शख्स नक्सलियों की मदद कर रहा है.

यह कैसे तय होगा कि फलां मीडियाकर्मी नक्सलियों की मदद कर रहा है? अख़बार में रिपोर्ट लिखने के जुर्म में आप किसी पर कैसे कार्रवाई कर सकते हैं?

स़िर्फ अख़बार में लिखने से यह तय नहीं होगा. वह शख्स तब जर्नलिस्ट नहीं रहेगा, अगर वह नक्सलियों को बंदूक़ पहुंचा रहा है या कुछ और चीज पहुंचा रहा है. फिर वह जर्नलिस्ट का काम नहीं कर रहा होगा न!

दूसरे पुलिस अधिकारियों की तुलना में लोग आपसे कुछ और अपेक्षाएं रखते हैं. आप लेखक हैं, कवि भी हैं. आप अख़बारों में वैचारिक लेख लिखते हैं. क्या आपको नहीं लगता कि आपकी ड्यूटी और आपके विचारों में विरोधाभास है?

मैं एक कवि हूं, संवेदनशील हूं, मैं हिंसा बर्दाश्त नहीं कर सकता. और वैचारिक स्तर पर मैं यह मानता हूं कि नक्सलवाद की जो पूरी विचारधारा है, वह जनतांत्रिक सोच और जनतांत्रिक विचारधारा के ख़िला़फजा रही है. वह एक माओवादी तानाशाही बनाना चाहता है. यह मुझे बोलने की जरूरत नहीं है, वे ख़ुद बोलते हैं. उनका जितना भी साहित्य है, किताबें हैं, उनमें यह बात साफ-साफ लिखी है कि वे हिंसक संघर्ष और हथियारों के जरिए सत्ता पर क़ब्ज़ा करना चाहते हैं. जो जनतांत्रिक सोच है और जिस विचारधारा को लेकर भारत ने आज़ादी की लड़ाई लड़ी, यह सब कुछ उसके बिल्कुल विपरीत जाता है. इसलिए मैं वैचारिक तौर पर उनसे सहमत नहीं हूं.

वैचारिक बहस से दूर ज़मीनी हक़ीक़त तो यह है कि देश के ग्रामीण इलाक़ों में हमारा सरकारी तंत्र विफल हो चुका है. क्या आपको नहीं लगता है कि नक्सलवाद सरकार की गड़बड़ियों का ही नतीजा है?

इसका भी जनतांत्रिक हल ही निकालना पड़ेगा. देखिए, जनतंत्र का भी विकास होना ज़रूरी है. प्रजातंत्र में बदलाव भी जनतांत्रिक तरीक़े से होता है, बंदूक़ के बल पर नहीं होता.

यह बात भी तो सच है कि आज़ादी मिले हुए साठ साल हो गए और अभी भी हमारे गांवों की हालत ख़राब है. वहां ग़रीबी है, बिजली नहीं, पानी नहीं, स्कूल नहीं, स्वास्थ्य सेवाएं नहीं हैं. ऐसे में ग्रामीणों और वनवासियों के पास दूसरा रास्ता क्या है?

दूसरे देशों में गणतंत्र सौ साल और दो सौ साल में विकसित हुआ है. साठ साल में बहुत कुछ हुआ है और बहुत कुछ नहीं हुआ. जो कुछ नहीं हुआ है, उसके लिए हम तानाशाही को तो नहीं ला सकते. यह भी सोचने की बात है कि जहां तानाशाही आई है, वहां क्या हश्र हुआ है.

क्या आपके अंदर का कवि यह मानता है कि सेना से, पुलिस से या सीआरपीएफ से इस आंदोलन को ख़त्म किया जा सकता है?

हम आंदोलन को ख़त्म नहीं कर रहे हैं, हम हिंसा को ख़त्म करने की कोशिश कर रहे हैं. आंदोलन को बिना हिंसा के भी चलाया जा सकता है. आख़िरकार माओवादियों के बहुत से ऐसे संगठन हैं, जो हिंसा का रास्ता छोड़कर प्रजातांत्रिक रास्ते पर उतरे हैं. ऐसा नहीं है कि सारे माओवादी हथियार उठाकर ही काम कर रहे हैं. अगर आप पूरे विश्व में वामपंथी आंदोलनों को देखिए तो ऐसा कई जगह हुआ है कि वामपंथ को जनतांत्रिक तरीक़े से लाने की कोशिश की गई, क्योंकि उन्हें लगा कि आज के युग में हिंसा का रास्ता कारगर साबित नहीं होता.

लेकिन हमारे देश में हिंसक आंदोलन का विस्तार हो रहा है. कुछ साल पहले तक पचास ज़िले थे और अब दो सौ साठ ज़िले ऐसे हैं, जहां नक्सलियों का प्रभाव है. क्या वजह है कि देश में हिंसक आंदोलन का वर्चस्व बढ़ता ही चला जा रहा है?

देखिए, बंदूक़ के बल पर वर्चस्व बढ़ाया जा सकता है. मेरा यह मानना है और जिन लोगों ने बस्तर के उन क्षेत्रों में काम किया है, जहां पर इस तरह की हिंसा हो रही है, वे भी जानते हैं और बहुत सारे रिसर्च करने वालों का भी यही मत है कि नक्सलियों का बहुत बड़ा तबका इस डर से उनके साथ है कि अगर वह थोड़ा भी विरोध करेगा तो उसे मार दिया जाएगा. इसलिए हम यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकते कि वे सही हैं.

चाहे छत्तीसगढ़ हो या उड़ीसा, ऐसा क्यों हो रहा है कि कुछ स्वयंसेवी संगठनों, जो जनजागरण का काम कर रहे हैं, के  कार्यकर्ताओं को नक्सली बताकर परेशान किया जाता है. पुलिस उन्हें गिरफ़्तार कर लेती है?

ऐसा सबके साथ नहीं होता है. आज भी बहुत सारी स्वयंसेवी संस्थाएं काम कर रही हैं. कुछ राज्यों में एक-दो या चार या पांच संस्थाओं को बैन किया गया है, क्योंकि उनके ख़िला़फपॉजिटिव सबूत मिले हैं कि वे नक्सलियों की मदद कर रहे हैं. यह कहना ग़लत इसलिए भी है, क्योंकि बहुत सारी वामपंथी स्वयंसेवी संस्थाएं भी काम कर रही हैं, उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती है.

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एक अजीबोग़रीब इत्ते़फाक़ है कि जहां नक्सलियों का प्रभाव है, वे इलाक़े खनिज पदार्थों के भंडार हैं. सरकार के साथ-साथ विदेशी कंपनियां वहां दोनों हाथों से धन बटोर रही हैं, लेकिन वहां रहने वालों को कोई फायदा नहीं पहुंच रहा है…

आप जो कह रहे हैं, उस पर कोई विस्तृत रिसर्च किसी ने नहीं किया है. बस्तर में आज की तारीख़ में एनएमडीसी और बस्तर मिनरल कॉरपोरेशन के अलावा किसी भी मल्टी नेशनल या विदेशी कंपनी को काम नहीं दिया गया है. जहां पर एस्सार की पाइप लाइन जा रही है, वह एनएमडीसी से ख़रीद कर उसके ट्रस्ट को भेजी जा रही है. टाटा को जो स्टील प्लांट बनाने को दिया गया है, आज तक उसके लिए ज़मीन नहीं दी गई है. प्रॉस्पेक्टिंग के लिए भी जो दिया गया, उसमें बस्तर का प्वाइंट वन इलाका शामिल नहीं है. हम तो पुलिस वाले हैं, लेकिन इन बातों की पुष्टि केंद्र और राज्य सरकार के स्तर पर भी की जा सकती है. आपको यह पता होगा कि बस्तर देश का सबसे बेहतरीन जंगली इलाक़ा है और फॉरेस्ट अधिनियम के तहत ज़्यादातर मिनरल उसके अंदर हैं. जंगलों को आप काट नहीं सकते हैं और उसके लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई कमिटी है, जो इसकी अनुमति देती है तो कैसे किसी कंपनी को दिया जा सकता है.

नक्सली इतने ज़िलों में फैले हैं, इतना बड़ा संगठन चला रहे हैं. इसे चलाने के लिए पैसे की ज़रूरत होती है. नक्सलियों के पास इतना पैसा कहां से आता है?

हक़ीक़त यह है कि इनका बहुत बड़ा पैसा अवैध वसूली से आ रहा है. यह उन लोगों को आतंकित करके लिया जा रहा है, जो बेचारे इन इलाकों में काम करते हैं. अगर आप इन गांवों में जाएं तो देखेंगे कि गांववालों का आधा खाना वे ले जाते हैं. पीडीएस से जो मिलता है, उसका आधा ले जाते हैं. उनको देना पड़ता है. उनकी मिलिट्री प्लाटून के लिए देते हैं, उनके मिलिशिया के लिए देते हैं. जहां भी नक्सली हैं, वहां के आदिवासी दे रहे हैं. इसके अलावा जो छिटपुट काम होते हैं, छोटे-मोटे ठेकेदार होते हैं, जो वहीं रहते हैं, उन्हें डराकर पैसा लिया जाता है. यह पूरा आंदोलन वसूली पर आधारित है और ज़्यादातर भूमिगत आंदोलनों में ऐसा ही होता है. इसमें कुछ भी नया नहीं है. विश्व भर में जहां भी इस तरह के आंदोलन हुए हैं, वहां अवैध वसूली होती ही है.

ख़बरें तो यह भी आ रही हैं कि सरकारी अधिकारी भी नक्सलियों को पैसे दे रहे हैं…

बस्तर में यह नहीं होता है, यह किसी दूसरी जगह की बात हो सकती है. नार्थ ईस्ट के इलाक़ों में उल्फा को लेकर इस तरह की चीजें सामने आई हैं, लेकिन बस्तर में नक्सलियों ने किसी अधिकारी से पैसा लिया हो, यह नहीं हुआ. बस्तर से तो उन्होंने अधिकारियों को ही निकाल दिया तो पैसा किससे लेंगे.

अगर आपको ये सारी बातें मालूम हैं तो इस अवैध वसूली रैकेट को तोड़ने के लिए कोई रणनीति क्यों नहीं बनाई गई?

ऐसा नहीं है. जहां भी पता लगता है, लोग पकड़े भी जा रहे हैं. हमारी जो न्यायिक प्रक्रिया है, उसका भी ध्यान रखना पड़ता है. जब हमें लगता है कि हम इसे अदालत में सिद्ध करने मेंसक्षम हैं तो कार्रवाई करते हैं. ज़ाहिर है कि अंतिम निर्णय तो हम नहीं लेंगे, अदालत ही लेगी.

तो इसका मतलब यह हुआ कि बहुत सारी जानकारियां होने के बावजूद पुलिस कुछ नहीं करती है…

नहीं, हमारा कहना यह नहीं है. हालांकि अपराधी पकड़ा ही जाता है, लेकिन उसे सिद्ध करना पड़ता है. कानूनी प्रक्रिया में जिस न्यायिक व्यवस्था को हम मानते हैं और जितना भी सभ्य समाज है, उसका आधार ही इस बात पर है कि 99 दोषी भले ही छूट जाएं पर किसी एक निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए. इसलिए पूरी प्रक्रिया धीमी होती है, बहुत ही फूंक-फूंक कर कदम उठाना पड़ता है.

नक्सली जिस तरह कभी ट्रेन की लाइनों को उड़ा देते हैं, थानों पर हमले और पुलिसवालों की हत्याएं हो रही हैं, उससे पूरे देश में भय और ख़ौ़फ का माहौल बन गया है. ऐसा लगने लगा है कि हमारा पूरा तंत्र विफल हो रहा है. क्या आप इस ख़तरे को महसूस नहीं करते, क्या आपको इस बात से डर नहीं लगता है?

इतिहास की जो अवधि होती है, वह किसी आदमी के जीवनकाल की नहीं होती है. इसलिए मेरा मानना है कि जैसे-जैसे प्रजातांत्रिक ताक़तें मज़बूत हुई हैं, वैसे-वैसे हिंसक एवं आतंकवादी शक्तियां ख़त्म हुई हैं. यह हमारे देश में भी होगा, क्योंकि हमारे यहां आजादी की लड़ाई भी जनतांत्रिक सोच को आगे रखकर लड़ी गई. ऐसा संभव ही नहीं है कि इस तरह की ताकतें कुछेक हरकतें करके और थोड़ा-बहुत ख़ौ़फ का माहौल बनाकर अपने मकसद में कामयाब हो जाएंगी.

अंत में मैं आपसे फिर एक बार पूछना चाहता हूं कि मीडिया पर प्रतिबंध वाली बात में कितनी सच्चाई है…

यह तो आप यहां के मीडियावालों से ही पूछिए. अगर मीडिया को वहां जाने से रोका जाता है तो ख़बरें कहां से आती हैं? वहां की तस्वीरें कहां से आती हैं? यह तो सिर्फ प्रशासन पर दबाव डालने के लिए एक खास तरह के लोग इस तरह की ख़बरों को प्रचारित कर रहे हैं.

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