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नक्सलियों की रोकने की कवायद

नक्सलियों की रोकने की कवायद

अभी कुछ दिनों पहले केंद्र सरकार की तऱफ से वनवासियों एवं आदिवासियों के कल्याण और उनके हितों का ध्यान रखने के लिए कई सकारात्मक क़दम उठाए गए हैं तथा अनेक पहल के संकेत भी मिले हैं. भ्रष्टाचार के आरोपों से चौतरफा घिरी और विपक्ष के हमलों से हलकान केंद्र सरकार को अब देश के जंगलों और पिछड़े इलाक़ों में रहने वाले आदिवासियों और जंगल आधारित उत्पादों के सहारे जीवन बसर करने वाले लोगों की याद आई है. केंद्र सरकार की तऱफ से ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि वह जंगली पेड़ों और उससे जुड़े उत्पाद को छोड़कर अन्य जंगली उत्पादों जैसे बांस, महुआ, तेंदू पत्ता आदि का समर्थन मूल्य तय करने के बारे में गंभीरता से विचार कर रही है. सरकार इनकी बिक्री और भंडारण के लिए कृषि उत्पाद और बिक्री कमीशन के अलावा फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया की तर्ज पर संस्थाएं बनाना चाहती है. ये जंगली उत्पाद लाखों वनवासियों के जीविकोपार्जन का एकमात्र साधन हैं, लेकिन पुरानी सरकारी नीतियों में इतनी खामियां हैं कि वनवासियों को अपने वाजिब हक़ के लिए भी खासी मशक्कत करनी पड़ती है. सरकार के इस फैसले के पीछे राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक वजहें तो हैं ही, पर्यावरण संरक्षण भी एक महत्वपूर्ण कारक है. पहली बात तो यह कि सरकार ऐसा करके राजनीतिक तौर पर यह संदेश देना चाहती है कि वह आदिवासियों और जंगल में रहने वाले लोगों के हितों को लेकर गंभीर है. इस राजनीतिक कारण के पीछे हम सोनिया गांधी द्वारा कुछ दिनों पहले पार्टी के मुखपत्र कांग्रेस संदेश में लिखे उनके लेख में इसके संकेत पकड़ सकते हैं. अपने लेख में सोनिया गांधी ने सरकार को जंगली इलाक़ों में समावेशी विकास करने की सलाह दी थी. सोनिया गांधी का उक्त लेख छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ के जवानों की जघन्य हत्या के बाद छपा था. सोनिया गांधी ने अपने लेख में नक्सल प्रभावित इलाक़ों में विकास के कामों पर जोर देने की सलाह दी थी. ऐसा प्रतीत होता है कि केंद्र सरकार ने वहीं से क्यू लेते हुए जंगली उत्पादों का समर्थन मूल्य तय करने की योजना बनाई.

भारतीय वन अधिनियम के तहत अब तक बांस को लकड़ी माना जाता रहा है, जिसकी वजह से किसी को भी बांस काटने के लिए तमाम सरकारी महकमों से इजाज़त लेनी पड़ती है. इस इजाज़त की जड़ से भ्रष्टाचार पनपता है और शोषण की भी नींव पड़ती है. बांस को घास मानने की बहस बेहद लंबी है और काफी समय से चल रही है. वनस्पति विज्ञान में भी बांस को घास ही माना गया है, लेकिन अंग्रेजों के जमाने के क़ानून में बदलाव की फिक्र हमें आज़ादी के 63 सालों बाद हो रही है.

जंगली इलाक़ों में सक्रिय ठेकेदार और दलाल वहां के उत्पादों की ख़रीद-फरोख्त में मनमानी कर रहे हैं. जंगल के उन उत्पादों के बारे में कोई ठोस सरकारी नीति न होने या फिर दोषपूर्ण सरकारी नियमों की वजह से दलाल चांदी काट रहे हैं और आदिवासियों का जमकर शोषण हो रहा है. उन इलाक़ों में बिचौलिए ही जंगली उत्पादों की क़ीमतें तय करते हैं और भोले-भाले ग़रीब आदिवासियों को उनकी मेहनत के उचित मूल्य से महरूम कर देते हैं. बिचौलियों की यही भूमिका और ज़्यादती उन इलाक़ों में माओवादियों को वनवासियों के बीच अपनी ज़मीन पुख्ता करने का मौक़ा देती है. आदिवासियों के हक़ की बात करके और उनके शोषण के ख़िला़फआवाज़ उठाकर माओवादियों ने आदिवासियों का दिल जीता और उनके बीच अपनी पकड़ भी मज़बूत बनाई. अगर सरकार उन इलाक़ों में जंगली उत्पादों की बिक्री व्यवस्था को दुरुस्त कर और उसके भंडारण के लिए उचित इंतज़ाम कर सके तो यह एक बड़ी सफलता होगी. फूड कॉरपोरेशन जैसी कोई संस्था बनाकर अगर जंगली उत्पादों के उन्हीं इलाक़ों में भंडारण की व्यवस्था हो सके तो आदिवासियों को उनके उत्पादों का ज़्यादा दाम मिल पाएगा. इसका एक बड़ा फायदा यह होगा कि उन इलाक़ों में नक्सलियों और माओवादियों की लोकप्रियता कम होगी और उनको कमज़ोर किया जा सकेगा.

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इस तरह की योजना बनाते समय सरकार को देश के अलग-अलग इलाक़ों के लिए अलहदा योजना बनानी होगी. पूरे देश में अगर एकीकृत समर्थन मूल्य की नीति बनाई जाएगी तो वह दोषपूर्ण होगी, क्योंकि देश के अलग-अलग हिस्सों में इन उत्पादों की आपूर्ति और बाज़ार अलग है. इसके अलावा यह भी ज़रूरी है कि इलाक़े को ध्यान में रखकर वहां इन उत्पादों के भंडारण का इंतज़ाम किया जा सके, ताकि जब बाज़ार में मूल्य अधिक मिल रहा हो, उस व़क्त इन उत्पादों को बेचकर आदिवासियों को ज़्यादा मुना़फा हो. इस व्यवस्था को बनाते व़क्त सरकार को यह भी ध्यान देना होगा कि फूड कॉरपोरेशन की तरह यहां अनियमितताएं और भ्रष्टाचार न हो. अगर सरकार इस तरह की व्यवस्था बनाने में नाकाम रहती है तो आदिवासी और उनके उत्पाद निजी ठेकेदारों और दलालों के चंगुल से मु़क्त होकर सरकारी और अर्ध सरकारी दलालों के चंगुल में फंस जाएंगे. दूसरा अहम बदलाव, जिस पर सरकार विचार कर रही है या यू कहें कि केंद्रीय कैबिनेट ने फैसला ले लिया है, वह यह है कि बांस को लकड़ी न मानकर घास माना जाए, लेकिन इसका नोटिफिकेशन होना अभी शेष है.

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भारतीय वन अधिनियम के तहत अब तक बांस को लकड़ी माना जाता रहा है, जिसकी वजह से किसी को भी बांस काटने के लिए तमाम सरकारी महकमों से इजाज़त लेनी पड़ती है. इस इजाज़त की जड़ से भ्रष्टाचार पनपता है और शोषण की भी नींव पड़ती है. बांस को घास मानने की बहस बेहद लंबी है और काफी समय से चल रही है. वनस्पति विज्ञान में भी बांस को घास ही माना गया है, लेकिन अंग्रेजों के जमाने के क़ानून में बदलाव की फिक्र हमें आज़ादी के 63 सालों बाद हो रही है. अगर बांस को लकड़ी मानने के क़ानून से आज़ाद कर दिया जाता है तो तक़रीबन दस हज़ार करोड़ के बांस आधारित उद्योग से वनवासियों को काफी लाभ मिलेगा और देश में नक्सलियों के बढ़ते प्रभाव को भी कम किया जा सकेगा.

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(लेखक आईबीएन7 से जुड़े हैं)

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