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नई राजनीति, पुराने नेता
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नई राजनीति, पुराने नेता

एक पखवाड़े के अंदर भारतीय राजनीति में इतने झंझावात, इतने सारे उतार-चढ़ाव. ऐसा अक्सर नहीं होता, कांग्रेस पार्टी के दो-दो मुख्यमंत्रियों को एक के बाद एक अपना पद छोड़ना पड़े और संसद सप्ताहों तक लगातार बाधित होती रहे. कांग्रेस महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के इस्ती़फे को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रही है, लेकिन आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के रोसैय्या के साथ ऐसा क्यों हुआ? कहीं इसकी वजह यह तो नहीं कि दिवंगत मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी के बेटे जगन मोहन ने अपने न्यूज़ चैनल पर सोनिया गांधी का मखौल उड़ाया? अब यदि वह बग़ावत पर उतारू हो गए तो कांग्रेस क्या करेगी? वहीं दूसरी ओर कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा के इस्ती़फे के मामले में भारतीय जनता पार्टी को अपनी हैसियत का अंदाज़ा हो गया. भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की तमाम कोशिशों के बावजूद येदियुरप्पा अपना पद छोड़ने को राजी नहीं हुए. भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी को सुशासन के बारे में अभी काफी कुछ जानने की ज़रूरत है, साथ ही पार्टी के शीर्ष नेताओं के बीच उन्हें अपना कद भी बढ़ाना होगा. बिहार विधानसभा चुनाव में राजग गठबंधन की एकतरफा जीत ने भाजपा को चेहरा बचाने का साधन उपलब्ध करा दिया, लेकिन पार्टी यह अच्छी तरह जानती है कि इस जीत का सारा श्रेय नीतीश कुमार को जाता है. भाजपा का इसमें कोई खास योगदान नहीं है और सच तो यह है कि चुनाव प्रचार में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को शामिल करने के इसके प्रस्ताव को नीतीश ने सिरे से खारिज कर दिया था और अब वह इसके लिए वाहवाही लूट रहे हैं.

तेलंगाना रिपोर्ट से पार्टी हाईकमान को तत्काल अपनी प्रतिष्ठा बचाए रखने में कामयाबी मिल सकती है, लेकिन आने वाले दिनों में आंध्र प्रदेश में पार्टी के लिए मुश्किलें बढ़ेंगी, इसमें कोई संदेह नहीं. नीतीश की जीत ने यह दिखा दिया है कि राज्यों की राजनीति में स्थानीय मुद्दे ज़्यादा प्रभावी होते हैं, न कि राष्ट्रीय मुद्दे. इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए. अमेरिका में पहले से ही ऐसा होता रहा है और भारत जैसे विशाल गणतंत्र में भी ऐसा होना अवश्यंभावी है.

मोदी के प्रचार अभियान में शामिल होने से परिणामों पर क्या असर पड़ता, यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल है, लेकिन यह स्पष्ट है कि नीतीश के सामने भाजपा की एक नहीं चली. इसमें कोई संदेह नहीं कि गुजरात में नरेंद्र मोदी ने काफी काम किया है और एक अच्छे प्रशासक की छवि बनाई है, लेकिन ख़ुद मोदी और भाजपा भी नहीं जानती कि इसके बावजूद वह एक बोझ की तरह क्यों हैं. बिहार चुनावों में मुसलमानों ने राजग गठबंधन के पक्ष में वोट ज़रूर दिया, लेकिन इसकी वजह भाजपा नहीं है. पार्टी जितनी जल्दी इसे समझ ले, उतना ही अच्छा है, अन्यथा उसे लंबे समय तक केंद्र में विपक्ष में बैठने को मजबूर होना पड़ेगा. बिहार चुनाव के लिए प्रचार अभियान जब अपने चरम पर था, तभी आरएसएस प्रमुख के एस सुदर्शन ने सोनिया गांधी पर व्यक्तिगत रूप से निशाना साधते हुए उन पर तमाम तरह की साजिशों में शामिल होने का आरोप लगा दिया. इसका सोनिया पर तो कोई असर पहीं पड़ा, हां इतना ज़रूर हुआ कि संघ के मानसिक दिवालिएपन की बात एक बार फिर सतह पर आ गई. फिर भी हमें यह जरूर मान लेना चाहिए कि बिहार में राजग की जीत यदि किसी के लिए समस्या है तो वह कांग्रेस ही है. कांग्रेस ने इन चुनावों में बड़ा जोखिम लेते हुए सभी 243 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे, जबकि बाक़ी सभी प्रमुख पार्टियां अपने गठबंधन के साझीदार दलों के साथ चुनावी वैतरणी में उतरी थीं. कांग्रेस शायद उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों से पहले राहुल गांधी के करिश्मे को आजमाना चाहती थी. यदि यह सही है तो बिहार चुनाव के परिणाम 2007 के विधानसभा चुनावों की तर्ज पर हैं, न कि 2009 के लोकसभा चुनावों की. राहुल गांधी का करिश्मा लोकसभा चुनावों में तो काम कर सकता है, लेकिन राज्य विधानसभा के चुनावों को प्रभावित करने की ताक़त शायद उनके पास नहीं है.

बिहार में कांग्रेस की संभावनाएं तो तभी ख़त्म हो गई थीं, जब जगदीश टाइटलर को प्रभारी बनाकर भेजा गया था. पूरी चुनाव प्रक्रिया के दौरान राज्य में पार्टी का कोई ऐसा नेता नहीं दिखा, जिसकी अपनी कोई पहचान हो. कमोबेश यही हालत गुजरात, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक में भी है. राहुल गांधी ने पार्टी को मज़बूत बनाने के लिए ज़मीनी स्तर पर कितना काम किया है, यह अंदाज़ा लगाना अभी मुश्किल है, लेकिन इतना तय है कि अभी उनकी कोशिशों का कोई परिणाम नहीं दिख रहा. महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के लिए नए मुख्यमंत्रियों का चुनाव जिस अलोकतांत्रिक ढंग से किया गया, उससे यह बात और भी ज़्यादा स्पष्ट हो जाती है. लेकिन जैसा कि आंध्र प्रदेश में देखने को मिल रहा है और भविष्य में महाराष्ट्र में भी देखने को मिल सकता है कि राज्य सरकारों को केंद्र की कठपुतली की तरह चलाने के दिन अब लद चुके हैं. जगन मोहन रेड्डी दोबारा पलटवार करने से नहीं चूकेंगे, क्योंकि वह भी इस बात से अच्छी तरह वाक़ि़फ हैं.

तेलंगाना रिपोर्ट से पार्टी हाईकमान को तत्काल अपनी प्रतिष्ठा बचाए रखने में कामयाबी मिल सकती है, लेकिन आने वाले दिनों में आंध्र प्रदेश में पार्टी के लिए मुश्किलें बढ़ेंगी, इसमें कोई संदेह नहीं. नीतीश की जीत ने यह दिखा दिया है कि राज्यों की राजनीति में स्थानीय मुद्दे ज़्यादा प्रभावी होते हैं, न कि राष्ट्रीय मुद्दे. इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए. अमेरिका में पहले से ही ऐसा होता रहा है और भारत जैसे विशाल गणतंत्र में भी ऐसा होना अवश्यंभावी है. भारत में केंद्रीयकृत विचारधारा का जनक इंग्लैंड को माना जाता है, लेकिन स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रांतीय और राष्ट्रीय मुद्दों के बीच का अंतर वहां भी आम हो चुका है. लेकिन भारतीय राजनीति में न तो कांग्रेस और न ही भाजपा इस नई सच्चाई को मानने के लिए तैयार है.

दोनों ही पार्टियां राज्यों को केंद्रीय स्तर से दिशा निर्देशित करने की कोशिश करती हैं और येदियुरप्पा मामले में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को जिस तरह मुंह की खानी पड़ी, यह उसी का नतीजा है. नरेंद्र मोदी शायद कभी भी राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश न कर सकें और नीतीश कुमार इसके लिए शायद कोशिश भी न करें. डीएमके प्रमुख करुणानिधि तमिलनाडु की राजनीति में किस तरह ख़ुश हैं, यह हम देख ही रहे हैं. अच्छे शासन का सीधा संबंध स्थानीय मुद्दों से होता है, न कि राष्ट्रीय मुद्दों से. भारतीय राजनीति में भी ऐसा हो सकता है कि केंद्र में किसी पार्टी का शासन हो और राज्यों में दूसरी पार्टियों का. ऐसा भी हो सकता है कि कांग्रेस पार्टी आम चुनावों में जीतती रहे, लेकिन राज्यों के विधानसभा चुनावों में उसे बार-बार हारना पड़े. भारतीय राजनीति के इस नए चेहरे के असली नायक तो दो पुराने समाजवादी हैं, लोहिया और जेपी. उनका एकमात्र उद्देश्य कांग्रेस को कमज़ोर करना था, क्योंकि उन्हें लगता था कि पार्टी बदलाव की राह में बाधा है. उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण दशकों तक कांग्रेस का सवर्ण आधारित शासन रहा है. इन दोनों नेताओं ने इसे महसूस किया और कांग्रेस के ख़ात्मे के लिए कमर कस ली. आज जो बदलाव हम देख रहे हैं, उसके बीज लोहिया की कांग्रेस विरोधी

विचारधारा और जेपी के 1975 के आंदोलन द्वारा ही बोए गए थे. राहुल गांधी को भी इसे समझना होगा. उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि भारत में परिस्थितियों में वास्तविक बदलाव में दशकों का समय लग जाता है, यह सालों में नहीं होता.

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