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नेताओं के हथियार से नक्‍सली कर रहे प्रहार
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नेताओं के हथियार से नक्‍सली कर रहे प्रहार

बिहार-झारखंड में नक्सली संगठनों की बढ़ी सक्रियता और बेलगाम हरकतों ने जहां सुरक्षा तंत्र को पूरी तरह से हलकान कर रखा है, वहीं आम-अवाम भी उनकी गतिविधियों से पस्त दिख रहा है. बस्तियों-जंगलों में गोलियों की बौछार कर या फिर सड़कों पर बारूदी सुरंगों का विस्फोट कर दहशत फैलाने वाले नक्सलियों ने आम जनता और सरकारी मशीनरी को आतंकित करने का एक नया तरीका ईजाद किया है. नक्सलियों का एक फरमान लाखों लोगों को आतंकित करने के लिए काफी होता है. जब फरमानों का सिलसिला बदस्तूर जारी हो तो फिर आतंक और दहशत के क्या कहने.

नक्सलियों के हर बंद पर भारत की लाइफ लाइन मानी जाने वाली रेलवे की रफ्तार मंद हुई है. इस दौरान लाखों लोगों की जान सांसत में अटकी है. ट्रेनों का रूट बदलना पड़ा. परिचालन के समय को संशोधित करना पड़ा या फिर रात में चलने वाली रेलगाड़ियों को पूरी तरह रद्द करना पड़ा. यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जब कभी भी बंद की घोषणा हुई है, तब रेलवे प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए. नक्सलियों का बंद 24 घंटे से लेकर पूरे सप्ताह तक का रहा है. बंद के कारणों पर नज़र डालें तो साथियों की गिरफ्तारी, मानवाधिकार हनन और ऑपरेशन ग्रीन हंट के विरोध में बंद बुलाया गया.

मिशन 2050 के तहत सांगठनिक विस्तार में लगे नक्सली संगठनों ने आतंक और दहशत फैलाने के लिए राजनैतिक दलों की कार्य पद्धति को बतौर हथियार इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. नक्सली संगठनों ने जिस प्रकार से बंद के आयोजन का सिलसिला शुरू किया है, उससे तो यही लगता है कि वह बंद का कीर्तिमान स्थापित करने में लगे हैं. बीते छह माह में नक्सलियों ने 20 बार बंद कराया और जब कभी नक्सली संगठनों ने बंद की घोषणा की है, तब आम लोगों से लेकर सरकारी अमलों में हड़कंप की स्थिति देखी गई.

नक्सली संगठनों का सर्वाधिक निशाना रेलवे रहा है. नक्सलियों के हर बंद पर भारत की लाइफ लाइन मानी जाने वाली रेलवे की रफ्तार मंद हुई है. इस दौरान लाखों लोगों की जान सांसत में अटकी है. ट्रेनों का रूट बदलना पड़ा. परिचालन के समय को संशोधित करना पड़ा या फिर रात में चलने वाली रेलगाड़ियों को पूरी तरह रद्द करना पड़ा. यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जब कभी भी बंद की घोषणा हुई है, तब रेलवे प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए. नक्सलियों का बंद 24 घंटे से लेकर पूरे सप्ताह तक का रहा है. बंद के कारणों पर नज़र डालें तो साथियों की गिरफ्तारी, मानवाधिकार हनन और ऑपरेशन ग्रीन हंट के विरोध में बंद बुलाया गया. इसके साथ ही अवैध खनन और केंद्र सरकार की कथित जनविरोधी नीतियों के खिला़फ भी बंद का आयोजन किया गया.

वर्ष 2010 में नक्सलियों ने अब तक 22 बंद का आयोजन किया है. वर्ष 2010 में दो जनवरी को नक्सली संगठनों ने 24 घंटे का बंद बुलाया. इस बंद में बिहार, झारखंड और उड़ीसा को शामिल किया गया. इस साल के पहले बंद का कारण सुरक्षा बलों द्वारा कथित तौर पर मानवाधिकारों का हनन था. मानवाधिकार हनन का आरोप लगाने वाले नक्सली संगठनों को शायद इस बात का ज़रा भी एहसास नहीं होगा कि जिस मानवाधिकार की रक्षा के नाम पर उनके द्वारा बंद का आयोजन किया जा रहा है, उससे हज़ारों-लाखों लोगों के मानवाधिकारों का हनन हो रहा है. नपुंसक राजनीतिक व्यवस्था और भ्रष्ट प्रशासनिक व्यवस्था को कारण मानकर अपने आधार के विस्तार में लगे नक्सली संगठनों को यदि मानवाधिकार की चिंता होती तो शायद हथियार के बजाय बातचीत के प्रस्ताव को उनके द्वारा ज़रूर स्वीकारा जाता. 17 जनवरी को माओवादी नेता सुबोध की गिरफ़्तारी के विरोध में 48 घंटे का बंद बुलाया और संपूर्ण बिहार में नक्सलियों ने बंद का फरमान जारी किया. जनवरी के अंतिम सप्ताह में 25 तारीख को नक्सलियों ने तीसरी बार बंद का आयोजन किया और इस बार कारण बना उनके प्रभाव वाले इलाक़ों में पुलिस बलों का कॉम्बिंग ऑपरेशन यानी एक बार फिर नक्सलियों ने अपनी मर्जी लोगों पर जबरन थोपी.

सात फरवरी को बिहार के मगध जोन में नक्सलियों का बंद रहा और उसके ठीक दो दिन बाद यानी नौ फरवरी को उत्तर बिहार क्षेत्र में 48 घंटे का बंद बुलाया गया. इन दोनों बंद कार्यक्रमों का कारण स्पष्ट नहीं हो सका. 17 फरवरी को बिहार में नक्सलियों ने तीन दिनों का बंद बुलाया. जमुई में पुलिस मुठभेड़ में नक्सलियों की मौत के विरोध में यह बंद आयोजित किया गया था. लालमोहन टुड्डू की हत्या के विरोध में बिहार-झारखंड में 27 फरवरी को बंद बुलाया गया. इससे पुलिस-प्रशासन दिन भर हलकान रहा. माओवादी सत्यानंद और प्रमोद की गिरफ़्तारी के विरोध में आठ मार्च को बिहार-झारखंड में बंद रखा गया. 22 मार्च को पूरे बिहार में 48 घंटे का बंद बुलाया गया. यह बंद ऑपरेशन ग्रीन हंट के विरोध में बुलाया गया था. 24 मार्च को माओवादी राजशेखर रेड्डी की गिरफ़्तारी के विरोध में बिहार-झारखंड में पुन: दो दिन का बंद बुलाया गया. 30 मार्च को माओवादी संगठनों ने पुलिस पर दमनात्मक रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए 24 घंटे का बंद आयोजित किया. पांच अप्रैल को माओवादी पीटर दार की गिरफ़्तारी के विरोध में 24 घंटे तक बंद रखा. चार मई को पुलिस कार्रवाई के विरोध में उत्तर बिहार में नक्सलियों ने 24 घंटे का बंद बुलाया. बंद समाप्ति के 24 घंटे गुजरे भी नहीं थे कि पुन: इसी इलाक़े में छह मई को 48 घंटे का बंद बुलाया गया. 27 मई से नक्सलियों ने ऑपरेशन ग्रीन हंट तथा अवैध खनन के विरोध में काला सप्ताह मनाया तथा सात दिनों तक बिहार के नक्सल प्रभावित इलाक़ों में सरकार विरोधी प्रदर्शनों का सिलसिला चलता रहा. 14 जून को नक्सलियों ने शंभु की गिरफ़्तारी के विरोध में 48 घंटों का बंद बुलाया.

बिहार-झारखंड में नक्सलियों के खिला़फ पुलिस मुठभेड़ों के विरोध में 17 जून को दोनों राज्यों में बंद रखा गया. 25 जून को माओवादी जय पासवान की गिरफ़्तारी के विरोध में बिहार-झारखंड में एक बार फिर 48 घंटे का बंद घोषित किया. 30 जून को बिहार-झारखंड सहित पांच राज्यों में केंद्र सरकार की नीतियों के विरोध में दो दिवसीय बंद बुलाया गया. 7-8 जुलाई को नक्सलियों ने झारखंड बंद का आयोजन किया. आंध्र प्रदेश में पुलिस मुठभेड़ में माओवादी नेता आजाद की मौत के विरोध में माओवादियों ने 30 जुलाई से शहीद सप्ताह मनाने का निर्णय लिया. हालांकि इस बार बंद का आयोजन नहीं किया गया. बीते छह माह में बीस से अधिक बार नक्सलियों ने बंद का आह्वान किया. हर दसवें दिन बुलाए गए बंद से लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा. नक्सली संगठनों को शायद इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि उन्हें अपनी ताक़त का एहसास जो कराना है. और, ताक़त जब बंदूक के बल पर दिखानी हो तो आम लोगों को तो परेशान होना ही पड़ेगा.

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