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निशाना चूक गया

विकास की लाख रट लगाने के बावजूद शुरू के दो चरणों के मतदान में विकास चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया. जाति के आधार पर होने वाले बिहार के चुनावों की दिशा बदलने के लिए नीतीश कुमार का इस तरफ किया गया कोई भी प्रयास रंग नहीं ला सका. यहां तक की मीडिया के नीतीशीकरण का भी प्रभाव वोटरों पर नहीं पड़ा और बिहार में जातीय ताने-बाने के बीच स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवारों की अपनी छवि के घेरे में वोट पड़े. संतोष की बात यह रही कि चुनावी हिंसा के लिए बदनाम बिहार में कुल मिलाकर शांतिपूर्वक वोट पड़ रहे हैं. पचास फीसदी से ज़्यादा वोट पड़े, जिसका मतलब सा़फ है कि लोगों में उत्साह है और वे कई स्थापित एवं वातानुकूलित कमरों में बैठकर बनाए गए हवाई समीकरणों को तहस-नहस करने के लिए बेताब हैं.

एनडीए को लगने लगा है कि अगर उसका अति पिछड़ा तीर निशाने पर नहीं लगा तो उसे चुनावी नुक़सान हो सकता है, क्योंकि शुरू के दो चरणों के चुनाव में यह सा़फ हो गया कि विकास मुद्दा नहीं बन पाया. लालू प्रसाद एवं रामविलास पासवान के लिए राहत की बात यह रही कि कोसी एवं सीमांचल के इलाक़े में माय समीकरण एकजुट रहा.

चुनाव की अधिसूचना के बाद से ही एनडीए की तऱफ से यह कोशिश शुरू हो गई कि विकास को चुनावी मुद्दा बनाकर लोगों से वोट मांगा जाए. सूबे में बनी कुछ सड़कों, अस्पतालों और स्कूल भवनों को दिखाकर नीतीश कुमार ने वोट मांगने की रणनीति बनाई. अगली सरकार बनने पर घर-घर बिजली देने का वादा भी किया गया. यह रणनीति इसलिए भी ज़रूरी थी कि एनडीए का जातीय ताना-बाना उसे जीत की गारंटी नहीं दे रहा था. राजपूत, भूमिहार एवं ब्राह्मण मतदाताओं से पूरे समर्थन की उम्मीद एनडीए को नहीं थी. इन मतदाताओं की क़ीमत पर अल्पसंख्यकों, अति पिछड़ों और महादलितों को अपने पाले में लाने का पूरा प्रयास हुआ. लेकिन शुरू के दो चरणों का जो रु़ख देखने को मिला, उससे लगता है कि नीतीश कुमार का तीर पूरी तरह निशाने पर नहीं लग पाया. कोशी एवं सीमांचल के इलाक़े में माय यानी मुसलमान-यादव का समीकरण एकजुट दिखा. पिछले चुनाव में इस समीकरण के दरकने का फायदा एनडीए को मिला था. जैसा कि अनुमान था कि मुसलमानों को जहां यह लगा कि कांग्रेस अच्छी स्थिति में है, वहां उन्होंने हाथ का साथ दिया. अति पिछड़े एवं महादलित वोटरों ने इलाक़ों और उम्मीदवारों के अनुसार अपना मतदान किया. एनडीए के लिए यही बात परेशानी खड़ी कर सकती है.

चुनाव की अधिसूचना के बाद से ही एनडीए की तऱफ से यह कोशिश शुरू हो गई कि विकास को चुनावी मुद्दा बनाकर लोगों से वोट मांगा जाए. सूबे में बनी कुछ सड़कों, अस्पतालों और स्कूल भवनों को दिखाकर नीतीश कुमार ने वोट मांगने की रणनीति बनाई. अगली सरकार बनने पर घर-घर बिजली देने का वादा भी किया गया.

अगड़े तो पहले से ही नाराज़ थे, अब जब अति पिछड़ों एवं महादलितों में भी हिस्सेदारी हो रही है तो सांस फूलना स्वाभाविक है. अति पिछड़े एवं महादलित वोटों का पूरा हिस्सा लेने का फायदा न मिलता देख एनडीए ऩेताओं ने इस बिरादरी के सारे नेताओं को मतदाताओं की गोलबंदी में उतार दिया है. बाद के चरणों के चुनाव में अगड़ी जातियों एवं अति पिछड़ों की अहम भूमिका होने वाली है, इसलिए नुक़सान की भरपाई के लिए जातीय तीर भी छोड़े जा रहे हैं. एनडीए को लगने लगा है कि अगर उसका अति पिछड़ा तीर निशाने पर नहीं लगा तो उसे चुनावी नुक़सान हो सकता है, क्योंकि शुरू के दो चरणों के चुनाव में यह सा़फ हो गया कि विकास मुद्दा नहीं बन पाया. लालू प्रसाद एवं रामविलास पासवान के लिए राहत की बात यह रही कि कोशी एवं सीमांचल के इलाक़े में माय समीकरण एकजुट रहा. पिछले चुनाव में एनडीए ने कोशी में राजद का स़फाया कर दिया था, लेकिन इस मतदान के बाद पार्टी की उम्मीद बढ़ी है. खासकर सहरसा, सिहेंश्वर, मधेपुरा, ठाकुरगंज, कोचाधामन और अररिया जैसी सीटों पर राजद एवं लोजपा को का़फी उम्मीदे हैं. इसी तरह समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर में जिस तरह वोट पड़े हैं, उससे राजद एवं लोजपा के नेता उत्साहित हैं. राजद एवं लोजपा ने अगले चरण के चुनाव के लिए अगड़ी जातियों के प्रभाव वाले इलाक़ों पर खास ध्यान देना शुरू कर दिया है. लालू एवं पासवान दोनों इन इलाक़ों में जा रहे हैं और उन्हें यह भरोसा दिला रहे हैं कि अगर सरकार बनी तो उनके मान-सम्मान की पूरी तरह रक्षा की जाएगी. कांग्रेस भी अपने गेम प्लान के हिसाब से चल रही है. कोशी एवं सीमांचल के इलाक़े में पार्टी को जो समर्थन मिला, उससे पटना से लेकर दिल्ली तक के नेता जोश में आ गए. निर्मली, सुपौल, सिमरी बख्तियारपुर, कुशेश्वरस्थान, आलमनगर, बिहारीगंज, किशनगंज एवं मोरवा जैसी सीटों पर कांग्रेस ने उम्मीद बांध रखी है. अगले चरण के चुनावों के लिए कांग्रेस ने अपने चुनाव प्रचार को और भी आक्रामक बना दिया है. पार्टी को लग रहा है कि जिस तरह का समर्थन उसे मिल रहा है, उससे हर हाल में सत्ता की चाबी उसके हाथ में लगनी तय है. हालांकि पार्टी के कुछ नेता इससे ज़्यादा की उम्मीद कर रहे हैं. पार्टी के लिए संतोष की बात यह भी रही कि ज़्यादातर सीटों पर मुक़ाबले को त्रिकोणात्मक बनाने में वह सफल रही. कांग्रेसी नेता इसे प्रदेश में पार्टी के बढ़ते जनाधार के तौर पर देख रहे हैं. कांग्रेस के लिए राहत की बात यह भी है कि उसके प्रदेश के सभी बड़े नेता अपने चुनाव से मुक्त हो गए हैं. इन नेताओं में महबूब अली कैसर, अशोक राम, लवली आनंद, रंजीता रंजन एवं नागमणि शामिल हैं. इसके अलावा भूमिहार बहुल इलाक़ों में ललन सिंह एवं अखिलेश सिंह का प्रचार भी रंग ला रहा है. बाहर से थोपे गए नेताओं की भले ही आलोचना हुई हो, पर चुनावी अखाड़े में इसका फायदा पार्टी को मिलता नज़र आ रहा है. मोरवा, कुर्था, मधुबन, जमुई आदि कई सीटों पर कांग्रेस दौड़ में है. वामदलों एवं निर्दलीय प्रत्याशियों का प्रभाव शुरू के दो चरणों के चुनाव में ज़्यादा नहीं दिखाई पड़ा. इन दो चरणों के रु़ख को देखते हुए भाजपा ने अपने सभी स्टार प्रचारकों को मैदान में झोंक दिया. नाराज़ चल रहे शत्रुघ्न सिन्हा को भी मना लिया गया और उन्हें प्रचार में उतार दिया गया. भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी भी यहां प्रचार में पूरा समय दे रहे हैं. उनकी अध्यक्षता में यह पहला चुनाव है, इसलिए वह यह साबित करने पर तुले हैं कि उनका पद ग्रहण करना पार्टी के लिए शुभ है. भाजपा को नरेंद्र मोदी की कमी इस चुनाव में खलने लगी है. पार्टी नेता भले ही चुनाव के दौरान अपनी नाराज़गी छुपा रहे हैं, मगर यह ज़रूर महसूस कर रहे हैं कि अगर नरेंद्र मोदी होते तो कोशी एवं सीमांचल के इलाक़े में भाजपा को का़फी फायदा मिलता. कुछ नेता बताते हैं कि अगर चुनाव परिणाम गड़बड़ाया तो नरेंद्र मोदी मामले को वे मुद्दा बनाएंगे. भाजपा ने टिकट के मामले में अगड़ों का ध्यान ज़रूर रखा, पर वोट का जो पैटर्न दिख रहा है, उस हिसाब से पार्टी को ज़्यादा लाभ मिलता दिखाई नहीं पड़ रहा है. अब एनडीए की पूरी कोशिश शुरू में हो चुके नुकसान को कम से कम करने की है, क्योंकि राजद एवं कांग्रेस की आक्रामकता उस पर भारी पड़ने लगी है. एनडीए संभलने की कवायद में जुटा है, क्योंकि विकास, अल्पसंख्यकों और अति पिछड़ों का तीर शुरुआती चरण में निशाने पर नहीं लग पाया. बाद के चरणों में कोई चूक न हो, इसके लिए युद्धस्तर पर तैयारी जारी है.

1 comment

  • बहुत देर से कोशिश कर रहा हु, के बिहार चुनाव परिणाम के दिन या उसके बाद का कोई लेख मिल जाये.चुनाव से पहले आप लोग बहुत भोपू लगा कर बदनाम कर रहे थे नितीश जी को, पढ़ कर ऐसा लगता था जैसे आपने कसम खा रखी है की चाहे जो भी हो लालू के खिलाफ एक लफ्ज नहीं निकालेंगे. वैसे मैं फिर कोशिश करता हु शायद कुछ मिल जाये.

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