fbpx
Now Reading:
और लाल होगी बंगाल की धरती
Full Article 12 minutes read

और लाल होगी बंगाल की धरती

नए साल का नया सूरज/लाल टहकार

लगा मुझे/सिंदूर की डिबिया सा,

जो दंगे के बाद श्मशान में पड़ा था.

हर तऱफ बिखरी थीं ओस की बूंदें,

अरे वे तो विधवाओं के आंसू थे.

कविता-नया साल मैंने कई साल पहले लिखी थी. ये उसी की शुरुआती लाइनें हैं. वह कोई साल होगा, जब नए साल कासूरज हिंसा एवं रक्तपात से गीली हुई धरती के क्षितिज पर उगा होगा. बंगाल के मौजूदा हालात पर यह कविता बिल्कुल फिट बैठती है. वामपंथियों का यह दुर्ग पिछले तीन-चार सालों से धधक रहा है, पर 2010 के आख़िरी महीने में यहां दिखी अराजकता ने संकेत कर दिया है कि 2011 के विधानसभा चुनाव तक क्या होने वाला है? बंगाल की अगली संभावित मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनाव तक चुप नहीं बैठने वाली. इधर वाममोर्चे ने भी पलट कर खड़े होने की रणनीति अपना ली है. पक्ष-विपक्ष दोनों की रणनीतियों के संकेत बहुत डरावने हैं. इनमें नया रंग केंद्र सरकार की वजह से भी आ रहा है, जिसमें एक प्रमुख घटक है ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस. 2-जी स्पेक्ट्रम की जेपीसी जांच की विपक्षी मांग के साथ शुरुआती सहानुभूति, हाल में पेट्रोल और प्याज की क़ीमतों में वृद्धि का विरोध और राज्य में कांग्रेस को बिना साथ लिए चुनाव लड़ने की धमकियों के पीछे ममता का एक डर भी है कि कहीं जौ के साथ घुन भी न पिस जाए. घोटालों और महंगाई के चलते आज यूपीए का ग्राफ बुरी तरह गिरा हुआ है. राज्य में वाममोर्चा सघन चुनाव प्रचार में जुट गया है. ये गतिविधियां ममता को बेचैन कर रही हैं और वह जीती हुई बाज़ी पलटने की कोई संभावना पैदा नहीं होने देना चाहतीं. 40 दिनों के प्रचार के बाद 13 फरवरी को कोलकाता में वाममोर्चे की एक बड़ी सभा होने वाली है. तृणमूल और कांग्रेस के नेता भी जनता के बीच जाकर आरोपों की सफ़ाई दे रहे हैं. दोनों पक्ष वहीं जा रहे हैं, जहां हिंसक वारदातें होती हैं. दोनों का अपनी जनता के लिए एक ही अप्रत्यक्ष संदेश है, डटे रहे कॉडरो! हम तुम्हारे साथ हैं.

कोलकाता और आसपास के इलाक़ों में वाम छात्र यूनियन का दबदबा क़ायम रहा. ङ्गिर भी यह साङ्ग हो गया कि राज्य में बदलाव की लहर अभी थमी नहीं है या एकदम से पलटने वाली नहीं है. दलीय संघर्ष हो या माओवादी हिंसा, कहीं विराम नहीं दिखता और नहीं दिखती उम्मीद की कोई किरण. 15 दिसंबर को 40 माओवादियों ने पुरुलिया ज़िले के बागबादी गांव पर धावा बोला और घरों से निकाल कर 7 फारवर्ड ब्लॉक कॉडरों की हत्या कर दी.

दिसंबर 2010 में दिखी हिंसक छात्र राजनीति के पीछे भी इसी रणनीति ने काम किया. ममता ने हाल में कहा था कि कॉलेजों के चुनावों में अब तक तृणमूल छात्र यूनियन के उम्मीदवारों को मनोनयन पत्र भरने से भी रोक दिया जाता था. इस बार सभी कॉलेजों में तृणमूल पूरे दमखम के साथ मैदान में उतरी और यही तैयारी वामपंथी छात्र यूनियन स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) की भी थी. हालांकि छात्र हिंसा की पहली घटना में हमला कथित तौर पर तृणमूल की ओर ही हुआ, जब हावड़ा के आंदुल में एक एसएफआई छात्र स्वप्न कोले की पीटकर हत्या कर दी गई. उसके साथ अन्य 10 छात्र भी घायल हुए. स्वप्न की हत्या के ख़िला़फ प्रदर्शन कर रहे एसएफआई एवं तृणमूल के छात्रों के बीच कोलकाता में भी संघर्ष हुआ. महानगर के आशुतोष कॉलेज के छात्र सौविक हाजरा की बायीं आंख फोड़ दी गई. उसका इलाज हैदराबाद में चल रहा है. इस घटना में एसएफआई के 9 छात्र घायल हुए. बताया जाता है कि शारीरिक रूप से विकलांग सौविक को राजनीति में कोई रुचि नहीं थी और वह भीड़ की हिंसा का शिकार हुआ. 20 दिसंबर को उपद्रवियों ने उत्तर 24 परगना ज़िले के बनगांव में तृणमूल कांग्रेस छात्र परिषद के अध्यक्ष शंभू मालाकार को गोली मारकर घायल कर दिया. 22 दिसंबर को आंदुल के उस कॉलेज में चुनाव कराने के लिए चार थानों की पुलिस लगानी पड़ी. स्वप्न को जब मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य एवं विमान बोस जैसे नेताओं ने श्रद्धाजंलि दी तो ममता ने एक दिन पहले लालगढ़ में कथित तौर पर माकपा कॉडरों के हाथों मारे गए तृणमूल कार्यकर्ता सनातन हेम्ब्रम का शव कोलकाता मंगाकर बाकायदा पांच किलोमीटर तक का शोक जुलूस निकाला. दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर लाशों की राजनीति करने का आरोप भी लगाया. माकपा ने कहा कि ममता माओवादियों की लाशें मंगाकर राज्य में अशांति फैला रही हैं. हेम्ब्रम पुलिस अत्याचार के ख़िला़फ बनी पीपुल्स कमेटी (पीसीपीए) का सक्रिय सदस्य था. पुलिस ने भी पुष्टि की है कि कभी झारखंड पार्टी का सदस्य रह चुका हेम्ब्रम पीसीपीए के सिद्धू कान्हू गण मिलीशिया का सदस्य था. माकपा के राज्य सचिव विमान बोस ने हेम्ब्रम को तृणमूल का सदस्य बताने की निंदा की और कहा कि 2009 के लोकसभा चुनावों के बाद से वामदलों के 337 नेताओं एवं कॉडरों के मारे जाने में माओवादियों और तृणमूल दोनों का हाथ है. गत 21 दिसंबर को गरिया दीनबंधु कॉलेज के छात्र काजल किरण मंडल का शव मिलने से सनसनी और बढ़ी. वह तृणमूल छात्र परिषद का सक्रिय सदस्य था और अपने कॉलेज के छात्रसंघ चुनाव में खड़ा हुआ था. उसे माकपा की छात्र यूनियन एएसएफआई से धमकी मिल रही थी और वह दो दिनों से लापता था. 21 को यादवपुर में रेलवे लाइन पर उसका शव मिला. पहले से ही गरमाई राजनीति तब और गरमा गई, जब तृणमूल वालों ने इस छात्र के शव के साथ कोलकाता में जुलूस निकाला. 23 दिसंबर को बर्दवान में रायना के श्याम सुंदर कॉलेज के तृणमूल छात्रसंघ के सैकत निगेल को भी छुरा मारकर घायल किया गया. उसी दिन दक्षिण 24 परगना के पाथेर प्रतिमा में एएसएफआई और तृणमूल छात्रसंघ के बीच हुई झड़पों में 4 छात्र घायल हुए. हिंसक छात्र राजनीति के इस नए दौर ने 70 के दशक के नक्सल आंदोलन में छात्रों की भागीदारी की याद दिला दी. हालांकि उस समय के छात्र आंदोलन का मक़सद था अपना हक़ हासिल करना, लेकिन आज छात्र स़िर्फ राजनीतिक दलों का मोहरा बन गए हैं. छात्र राजनीति में बाहरी उपद्रवी तत्वों का भी प्रवेश हो रहा है. एएसएफआई के दबदबे को क़ायम रख माकपा अपनी लोकप्रियता में गिरावट रोकने की कोशिश कर रही है. विधानसभा चुनाव से तीन-चार माह पहले माकपा अपने कॉडरों का मनोबल नहीं गिरने देना चाहती. 21 तारीख़ को ही राज्य के अधिकतर कॉलेजों में छात्र संसद चुनाव के परिणाम आए और माओवादी प्रभावित इलाक़ों-पश्चिम मिदनापुर, बांकुड़ा और पुरुलिया के अलावा दक्षिण बंगाल के उन कॉलेजों में तृणमूल छात्र यूनियन का 20 साल बाद क़ब्ज़ा हुआ. कोलकाता और आसपास के इलाक़ों में वाम छात्र यूनियन का दबदबा क़ायम रहा. ङ्गिर भी यह साङ्ग हो गया कि राज्य में बदलाव की लहर अभी थमी नहीं है या एकदम से पलटने वाली नहीं है. दलीय संघर्ष हो या माओवादी हिंसा, कहीं विराम नहीं दिखता और नहीं दिखती उम्मीद की कोई किरण. 15 दिसंबर को 40 माओवादियों ने पुरुलिया ज़िले के बागबादी गांव पर धावा बोला और घरों से निकाल कर 7 फारवर्ड ब्लॉक कॉडरों की हत्या कर दी. इनमें एक महिला प्रधान भी थी. बाद में झालदा इलाक़े में पुलिस को पांच लाशें मिलीं. वहां माओवादियों के पोस्टर भी मिले, जिनमें आरोप लगाया गया कि ये लोग सुरक्षाबलों के लिए ख़ु़फियागिरी कर रहे थे.

इसके पहले 5 दिसंबर को बर्दवान में कथित तौर पर माकपा कॉडरों ने एक तृणमूल समर्थक की पत्नी से बलात्कार किया और बाद में उसके शरीर में आग लगा दी. वह अस्पताल में ज़िंदगी और मौत से संघर्ष कर रही है. हालांकि माकपा के ज़िला मुख्य सचिव अमल हालदार ने कहा कि घरेलू झगड़े के बाद उस महिला ने आग लगाई और यह बयान उसने मजिस्ट्रेट के सामने भी दिया. इस वारदात से इस आशंका को बल मिलता है कि बंगाल में इस समय चाहे जिस कारण से ख़ूनख़राबा हो, उसे राजनीतिक रूप देने की कोशिश की जा रही है. 21 दिसंबर को मुर्शिदाबाद ज़िले के खारग्राम में कथित तौर पर माकपा समर्थक उपद्रवियों ने सिराजुदौला उर्फ बापी नामक एक कांग्रेसी ग्राम प्रधान की हत्या कर दी, हालांकि बम फटने से एक हमलावर भी मारा गया. 22 दिसंबर को हावड़ा के चंद्रपुर में माकपा समर्थक शेख शहांगीर को गोली मार दी गई. इस वारदात के बाद वहां छिटपुट हिंसा भी हुई. 26 दिसंबर को पश्चिम मिदनापुर के गोआलतोड़ में बारीन मंडल नामक तृणमूल समर्थक की हत्या कर दी गई. शक है कि इसमें माकपा का हाथ है. उसी दिन ममता ने कोलकाता के धर्मतल्ला में जंगल महल से सुरक्षाबलों को हटाने की अपनी पुरानी मांग दोहराई. उधर दिल्ली में तृणमूल के सांसदों ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलकर अपना दुखड़ा रोया. कोलकाता में राज्यपाल एम के नारायण ने मुख्यमंत्री को बुलाकर हिंसा रोकने के उपाय करने को कहा. यह सब चल ही रहा था कि ममता के दबाव में गृहमंत्री पी चिदंबरम ने मुख्यमंत्री को एक चिट्ठी भी लिख दी, जिसमें क़ानून व्यवस्था की ख़राब हालत के लिए लताड़ लगाई गई और हर्मादवाहिनी को भंग करने को कहा गया है.

चिदंबरम की चिट्ठी से मचा कोहराम

इसमें कोई शक़ नहीं कि चिदंबरम ने ममता के आगे झुकते हुए सरकार को पत्र लिखा और जंगल महल से माकपा की हर्मादवाहिनी (हथियारबंद माकपा कॉडर) हटाने को कहा. हर्मादवाहिनी बांग्ला का शब्द है और पत्र में इस शब्द के प्रयोग से समझा जा सकता है कि ममता ने इसे लिखने को सीधे डिक्टेट किया होगा. हिंदी ज्ञान के मामले में लिख लोढ़ा, पढ़ पत्थर चिदंबरम ने किसी भाषाविद्‌ या प्रणव मुखर्जी से पूछने की ज़हमत नहीं उठाई कि इसका मतलब क्या है. पहली ग़लती तो यह हुई कि पत्र कोलकाता पहुंचने से पहले ही 24 दिसंबर को मीडिया को लीक कर दिया गया. जब पत्र 27 दिसंबर को मुख्यमंत्री कार्यालय पहुंचा तो तुरंत बवाल शुरू हो गया. वाममोर्चा के नेताओं ने कहा कि इसका सीधा मतलब तृणमूल को राजनीतिक फायदा पहुंचाना था. तीन दिनों तक उनसे पत्र पर प्रतिक्रिया मांगी जाती रही, पर वे कुछ बोलने में असमर्थ थे. विपक्ष का उत्साह देखिए कि इस मामले पर विधानसभा में मुख्यमंत्री के ख़िला़फ विशेषाधिकार हनन की नोटिस लाने की भी तैयारी हो चुकी थी. 27 दिसंबर को चला लेटर बम जैसे ही मुख्यमंत्री तक पहुंचा, वामनेता बिफर उठे. इसमें हर्मादवाहिनी शब्द पर गृहमंत्री की मुहर जो लग गई थी. एक दिन पहले मुख्यमंत्री ने एक जनसभा में चिदंबरम से पूछा कि क्या उन्हें ममता और माओवादियों के मेलमिलाप के बारे में पता है? राज्य में क़ानून व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त कहे जाने से भी वाम नेताओं को मिर्ची लगी है. मुख्यमंत्री ने जवाबी पत्र में वही सफ़ाई दी, जिसके बारे में वह पहले से कहते आ रहे हैं. माओवादियों के आतंक से अपना घर-बार छोड़कर भागे वाम कॉडरों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए उन्हें पार्टी कार्यालयों में रखा जा रहा है. संभव है कि सुरक्षा के लिहाज़ से उनके पास कुछ हथियार भी हों. सरकार ने हर्मादवाहिनी जैसे किसी संगठन के सक्रिय होने से साफ़ इंकार किया है. जिस तरह तृणमूल पर माओवादियों से मदद लेने का आरोप लग रहा है, उसी तरह वाम सरकार पर सुरक्षाबलों का दुरुपयोग करने का इल्ज़ाम लगाया जा रहा है. ग्रामीण इलाक़ों में माकपा के कॉडर माओवादियों की हरकतों और उनके अड्डों की जानकारी सुरक्षाबलों को दे रहे हैं. पुरुलिया में फारवर्ड ब्लॉक कॉडरों की हत्या इसी शक़ में हुई. तृणमूल को लगता है कि सुरक्षाबलों की वजह से वामदल जंगल महल के तीन ज़िलों में अपना खोया हुआ जनाधार फिर हासिल कर रहे हैं. वामदल भी प्रचारित कर रहे हैं कि ममता माओवादियों के साथ हैं, इसलिए वह सुरक्षाबलों को हटाने की मांग कर रही हैं.

राज्य का राजनीतिक ध्रुवीकरण ऐसा है कि ममता की काट तैयार नहीं हो पा रही है. वाममोर्चे ने सोचा था कि नैनो के जाने के बाद शहरी मध्य वर्ग का ममता से मोहभंग होगा, पर बाद के चुनावों में ऐसा नहीं दिखा. ममता गठबंधन को लेकर जब-तब कांग्रेस को हड़काती रहती हैं. उन्होंने यहां तक कह दिया कि अगर जंगल महल में सुरक्षाबलों के दुरुपयोग की बात ग़लत साबित होगी तो वह अपना पद छोड़ने के लिए तैयार हैं. ज़ाहिर है, अगले पांच महीनों यानी विधानसभा चुनावों तक सुरक्षाबलों को हटाने का फैसला आत्मघाती होगा. वाममोर्चा ने केंद्र पर आरोप लगाया है कि गृहमंत्री ने तृणमूल का पक्ष लिया और उसी के नज़रिए से हालात का आकलन कर पत्र लिखा. उधर विमान बोस ने कहा है कि अगर तृणमूल अपने मारे गए एवं घायल कॉडरों की सूची पेश करे तो वाममोर्चा भी अपनी सूची सौंपने को तैयार है. गृह मंत्रालय की सूची के मुताबिक़, लोकसभा चुनाव के बाद राज्य में मारे गए और घायल हुए राजनीतिक कार्यकर्ताओं में क्रमशः तृणमूल के 96 एवं 1237, कांग्रेस के 15 एवं 221 और माकपा के 65 एवं 773 कॉडर हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.