fbpx
Now Reading:
पहले बसाओ फिर उजाड़ो
Full Article 6 minutes read

पहले बसाओ फिर उजाड़ो

समस्तीपुर ज़िले के शिवाजी नगर प्रखंड में मुसहर समुदाय के लोग बसने को ज़मीन नहीं, रहने को घर नहीं, पर सारा जहां हमारा है, के तर्ज़ पर ज़िंदगी गुजार रहे हैं. वे तीन एकड़ जमीन पर किसी तरह झुग्गी-झोपड़ी में रहकर ज़िंदगी की गाड़ी आगे ब़ढा रहे हैं, लेकिन विडंबना देखिए कि इन मुसहर परिवारों की शासन-प्रशासन ने अब तक कोई खबर नहीं ली है.

तटबंध चौड़ीकरण के नाम पर मुसहरों के घरों को उजाड़ा जा रहा है. मगर उन्हें बसाने की बात कोई नहीं करता. हालांकि जब वे धरना-प्रदर्शन या दूसरे रास्ते से उग्र रूप अख्तियार करते हैं तो पुन: उन्हें बसाने की कवायद शुरू होती है, लेकिन एक-दो महीने बाद मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है. यह कैसा न्याय है.

पिछले 40 वर्षों से करेह नदी के सिरसिया-सिरनिया बांध पर घिबाही गांव के सामने बसे इन मुसहरों पर उस समय शामत आ गई, जब तटबंध चौड़ीकरण की योजना स्वीकृत हुई. उसके बाद योजना के तहत चौड़ीकरण का कार्य शुरू हुआ, लेकिन यहां बसे परिवारों के बारे में किसी ने भी नहीं सोचा. मुसहरों के घरों को उजाड़ दिया गया. अब उनके सामने यह समस्या उत्पन्न हो गई कि आखिर जाएं तो जाएं कहां. काफी लंबे समय तक इधर-उधर भटकने के बाद 140 मुसहर परिवारों ने एक रणनीति के तहत घिबाही मठ की ज़मीन पर अपना डेरा डाल लिया. तब से लेकर आज तक वे लोग उसी ज़मीन पर झुग्गी-झोपड़ी डालकर खानाबदोश की तरह जीवन यापन कर रहे हैं. अपनी ज़मीन नहीं रहने के कारण उन्हें सरकारी इंदिरा आवास का लाभ भी नहीं मिल पा रहा है.

Related Post:  4 बच्चों समेत कुएं से मिली मां की लाश, एक दिन पहले लौटी थी ससुराल, हत्या या आत्महत्या ?

फरवरी माह में मठ के महंथ द्वारा अनाधिकृत क़ब्ज़ाधारियों को हटाने और ज़मीन कब्ज़ा करने को लेकर उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की गई थी, जिसमें न्यायालय द्वारा हथौड़ी थाना को उक्त ज़मीन पर से मुसहरों को हटाने का निर्देश दिया गया था. न्यायालय के निर्देश के आलोक में जब दलबल के साथ पहुंची पुलिस ने मुसहरों का घर उजाड़ना चाहा, तो उनके परिवारों ने सामूहिक रूप से पुलिस को खदेड़ दिया. इस घटनाक्रम के बाद मुसहरों ने प्रखंड विकास पदाधिकारी को ज्ञापन सौंपकर सामूहिक आत्महत्या करने की चेतावनी दे डाली. उन्होंने प्रशासन के सामने सामूहिक रूप से नारा बुलंद किया, पहले बसाओ, फिर उजाड़ो. उनके मज़बूत इरादों को भांपकर प्रशासन के तेवर ढ़ीले पड़ गए. फिर शुरू हुई उन्हें बसाने की कयावद, लेकिन विगत एक दो- महीने में ही प्रशासन ने इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया. प्रखंड विकास पदाधिकारी संजय कुमार लाल से जब इस संबंध में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मुसहरों को बसाने के लिए ज़मीन चिन्हित करने का कार्य शुरू हो गया है. यह सब करने में समय तो लगेगा ही. पुलिस द्वारा अवैध क़ब्ज़ाधारी मुसहर परिवारों को उजाड़े जाने के संबंध में प्रखंड विकास पदाधिकारी लाल ने कहा कि यह न्यायालय और पुलिस का मामला है. मुसहर समुदाय के रामविलास सदा, परमेश्वर सदा, हरिकिशुन सदा, जयकिशुन सदा, केदार सदा, महेश सदा, मुनेश्वर सदा, महेश सदा, गुलटेन सदा, परमानंद सदा, चंद्रशेखर सदा, बिंदु सदा आदि ने चौथी दुनिया को बताया कि वर्षों से तटबंध ही हमारा घर-आंगन था. जब हमें उजाड़ा गया तो सचमुच हमलोगों ने घिबाही मठ की ज़मीन पर कब्जा जमाकर झुग्गी-झोंपड़ी बना ली. वैसे भी यह तो सार्वजनिक संपत्ति है. इसी प्रकार राधे सदा, रंजीत सदा, अशोक सदा, त्रिवेणी सदा, मोनू सदा, मो. गोलकी देवी, रामप्रकाश सदा, श्रवण सदा, पीतांबर सदा, दीपेन सदा, बिंदु सदा, फकीर सदा, योगेन्द्र सदा रोते हुए कहते हैं कि मठ की ज़मीन का उपयोग कर महंथ ऐशो-आराम की ज़िन्दगी बिता रहे हैं. हमलोग तो ज़मीन के अभाव में यहां पर झुग्गी-झोंपड़ी बना कर बाल बच्चों के साथ समय बिता रहे हैं. यह कैसा न्याय है कि हमें फिर से उजाड़ा जा रहा है.

Related Post:  आपत्त‍िजनक हालत में द‍िखा प्रेमी जोड़ा, पंचायत ने दी सज़ा, सिर मुंडवाकर प‍िलाया पेशाब

सूत्रों की मानें तो सरकार से सहायता नहीं मिलने के कारण मुसहर परिवार के युवा गलत रास्ता अख्तियार करने को मजबूर हैं. ज़िंदगी से नाराज़ ये युवा रोजगार के बदले गुनाह की राह पर चल पड़े हैं. ऐसा नहीं है कि इन सारे तथ्यों से शासन-प्रशासन अनभिज्ञ है, लेकिन सब कुछ जानते हुए भी नियम-कायदे की आड़ में कुछ नहीं कर रहे हैं. अगर समय रहते इन भटके युवाओं को रास्ते पर नहीं लाया गया तो भविष्य में इन्हें संभालना काफी मुश्किल होगा. इस संबंध में घिबाही पंचायत की मुखिया अमीरकला देवी स्वीकारती हैं कि मठ की ज़मीन पर बसे सभी मुसहर परिवार भूमिहीन हैं. बीपीएलधारी रहने के बावजूद इन्हें इंदिरा आवास का लाभ मिलने में भूमिहीन होना बाधक बन रहा है. वैसे 140 मुसहर परिवार प्रखंड में लिखित रूप से सूचना दे चुके हैं कि पहले ज़मीन संबंधी पर्चा मिले तब इंदिरा आवास की राशि. वहीं पूर्व मुखिया अनिल कुमार सिंह दावा करते हैं कि 2001 में बांध पर बसे इन मुसहरों के बारे में प्रशासन को आगाह किया गया था, लेकिन शासन-प्रशासन द्वारा इसे गंभीरतापूर्वक नहीं लिया गया.

Related Post:  दिल्ली: रईसजादे ने पहले लड़कियों से छेड़खानी की फिर लोगों को अपनी गाडी से रौंदते हुए फरार हो गए

एक ओर जहां नीतीश सरकार महादलितों के उत्थान के लिए व्यापक स्तर पर कार्य करने का दावा करती है, वहीं इतनी बड़ी तादाद में मुसहरों का भूमिहीन होना उनके दावे को खोखला साबित करता नज़र आ रहा है. मुसहरों की इन समस्याओं पर नाराज़गी जताते हुए लोजपा के जिलाध्यक्ष सह वारिसनगर के विधायक विश्वनाथ पासवान नीतीश कुमार सरकार पर आरोप लगाते हैं कि वे वोट के लिए घ़िडयाली आंसू बहाते हैं, जबकि हकीकत कुछ और है. मुख्यमंत्री का महादलित प्रेम छलावा के सिवा और कुछ नहीं है. अगर सरकार वास्तव में महादलितों के जीवनस्तर में सुधार लाना चाहती है तो अविलंब इन 140 महादलित परिवारों को बसाने का उपाय ढ़ू़ंढे.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.