fbpx
Now Reading:
पश्चिम बंगालः राजनीतिक उठापटक का दौर जारी

पश्चिम बंगालः राजनीतिक उठापटक का दौर जारी

देश में माओवादियों के ख़िला़फ चल रही जंग को बंगाल की राजनीतिक उठापटक ने काफ़ी उलझा दिया है. आदिवासियों के हितैषियों एवं मानवाधिकारों के बड़े-बड़े झंडाबरदारों का मुखौटा उतर रहा है. बंगाल में हो रही इस हलचल का ख़ामियाज़ा देश के दूसरे हिस्सों को भी भुगतना पड़ रहा है. बिहार के लखीसराय में पुलिस के जवानों को बंधक बनाने की जो कार्रवाई हुई, उसका चस्का नक्सलियों को बंगाल में मिली कामयाबी से लगा. पिछले साल 20 अक्टूबर को माओवादियों ने सांकराइल थाने के ओसी अतींद्रनाथ दत्त को बंधक बना लिया था और उसके बदले सरकार को 20 महिला नक्सलियों को ज़मानत पर रिहा कराना पड़ा था.

ममता का लालग़ढ़ में सभा करना, आंध्र में मारे गए माओवादी नेता आज़ाद की हत्या की जांच की मांग करना, ज्ञानेश्वरी ट्रेन हादसे को किसी बड़े षड्‌यंत्र से जोड़ना माओवाद के नाम पर जघन्य राजनीति नहीं तो क्या है? दोयम दर्जे की इस राजनीतिककथा में ड्रामा, असंवेदनशीलता, निर्लज्जता या वैचारिक अश्लीलता सब कुछ है. तृणमूल के सांसद दिल्ली में गले में पोस्टर टांग कर माकपा कैडरों के शिविर नष्ट करने की मांग करते हैं और उनमें तस्वीरें होती हैं दंतेवाड़ा के नक्सलियों की.

आज की तारीख़ में माओवाद की राजनीति करने के मामले में बंगाल, ख़ासकर उसकी भावी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सबसे आगे हैं. बंगाल में सुरक्षाबलों का संयुक्त अभियान जारी है. अपने समर्थकों की लगातार हत्याओं की वजह से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कैडरों को भी माओवादियों से सीधे लोहा लेना पड़ रहा है. अब ममता इसे माकपाइयों का सशस्त्र शिविर कह रही हैं और केंद्र सरकार का अहम घटक होने के कारण गृहमंत्री पी चिदंबरम भी उनकी हां में हां मिला रहे हैं. अब यह बात छिपी नहीं रही कि ममता पूरी तरह माओवादियों के साथ हैं और उन्हीं के बूते पर पश्चिम मेदिनीपुर, बांकुड़ा एवं पुरुलिया ज़िलों के जंगलमहल में अपनी जड़ और ज़मीन मज़बूत करने में लगी हैं. ममता माकपा कैडरों के पास रखे गए हथियारों की बरामदगी की मांग कर रही हैं, पर दरअसल उन्हीं हथियारों के बूते ही माकपा सुरक्षाबलों की मदद करने के साथ ही नक्सल प्रभावित इलाक़ों में अपने अस्तित्व की जंग लड़ रही है. 3 सितंबर को लालगढ़ के पीराकाटा में पत्रकारों पर हुए कथित माकपाइयों के हमले पर बयान जारी करते हुए ममता ने एक बार ङ्गिर सुरक्षाबलों का अभियान रोकने की मांग की. उन्होंने धरमपुर से भागे लोगों की घर वापसी की तुलना नंदीग्राम दखल से की. मालूम हो कि माओवादियों के अत्याचार से धरमपुर के लोग भागकर कई महीनों से शिविरों में रह रहे थे.

ममता का लालग़ढ़ में सभा करना, आंध्र में मारे गए माओवादी नेता आज़ाद की हत्या की जांच की मांग करना, ज्ञानेश्वरी ट्रेन हादसे को किसी बड़े षड्‌यंत्र से जोड़ना माओवाद के नाम पर जघन्य राजनीति नहीं तो क्या है? दोयम दर्जे की इस राजनीतिककथा में ड्रामा, असंवेदनशीलता, निर्लज्जता या वैचारिक अश्लीलता सब कुछ है. तृणमूल के सांसद दिल्ली में गले में पोस्टर टांग कर माकपा कैडरों के शिविर नष्ट करने की मांग करते हैं और उनमें तस्वीरें होती हैं दंतेवाड़ा के नक्सलियों की. कई तस्वीरें तो गूगल से नक्सल सर्च करने के बाद पहले ही पेज पर दिख जाती हैं. पी चिदंबरम की ओर से इस मसले पर मासिक प्रेस कांङ्ग्रेंस में चर्चा करने को ममता बड़ी कामयाबी मानती हैं और अगले दिन राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग करती हैं. आख़िर में वाममोर्चा के चेयरमैन विमान बोस को सफ़ाई देनी पड़ती है कि उक्त शिविर माओवादियों के अत्याचार से घर छोड़ने वाले लोगों के लिए बनाए गए हैं. मालूम हो कि संसदीय चुनावों के बाद से नक्सलियों ने 225 माकपा कैडरों का ख़ून किया है. ममता यह भी भूल गईं कि नक्सलियों के ख़िला़फ सुलग रहे गांव वालों के आक्रोश को भी उनकी इन हरकतों से कितना आघात लगेगा. यही नहीं, 2 सितंबर को तृणमूल की कोर कमेटी की बैठक में ममता शिविर के मामले को मुख्य एजेंडा बनाती हैं और नए पुलिस महानिदेशक से मिलने का कार्यक्रम तय करती हैं. ममता को मालूम है कि जंगलमहल में माकपा के 93 शिविर चल रहे हैं. वह 6 सितंबर को केशपुर अभियान, 9 को धरमपुर से लालगढ़ की यात्रा, 13 सितंबर को डीएम-एसपी कार्यालयों के सामने प्रदर्शन, 15 से सासन से भांगड़ तक पदयात्रा, 19 को नानूर और 25 को सिंगुर चलो अभियान का भी कार्यक्रम बनाती हैं. ममता के इन कार्यक्रमों में नक्सल और दलीय हिंसा से प्रभावित इलाक़े भी आते हैं. पिछला अनुभव यही बताता है कि जब-जब ममता के दौरे हुए हैं, ज़्यादातर इलाक़ों में बवाल हुआ है. यह समझने में कोई मुश्किल नहीं है कि आंदोलन करने के अपने संवैधानिक अधिकार के बहाने वह अगले विधानसभा चुनावों तक बंगाल में बवाल को ज़िंदा रखना चाहती हैं.

Related Post:  बंगाल का जंग: प्रशांत किशोर जिस कॉलेज के छात्र हैं, अमित शाह उस कॉलेज के प्रिंसिपल हैं: कैलाश विजयवर्गीय

तृणमूल की मुखिया ममता के व्यस्त कार्यक्रमों की तर्ज पर बंगाल में रेल दुर्घटनाएं व लूटपाट की वारदातें भी नियमित रूप से हो रही हैं. रेलमंत्री होने के नाते उन्हें चिंतित होना चाहिए, पर उन्होंने कह दिया कि उनका घर बंगाल है, दिल्ली नहीं. अब जिन लोगों ने यह बयान सुना है, उन्हें टोकाटोकी नहीं करनी चाहिए, पर एक नज़र तो डाल ही लें. इस साल 28 मई को माओवादियों द्वारा की गई तोड़ङ्गोड़ के कारण पटरी से उतरी ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के 148 यात्री मारे गए तो 19 जुलाई को वीरभूम ज़िले के साइथिया में उत्तरबंग एक्सप्रेस वनांचल एक्सप्रेस से जा भिड़ी और 66 लोग मौत की नींद सो गए. 30 अगस्त को बारुईपाड़ा में तकनीकी ख़राबी के कारण राजधानी का इंजन पटरी से उतर कर चलने लगा. लूटपाट की वारदातों ने भी रेलवे को सुर्ख़ियों में रखा है. 2 अगस्त को बंगाल-झारखंड सीमा पर बारविल-हावड़ा जनशताब्दी एक्सप्रेस की तीन एसी कारों में लूटपाट की गई. 6 अगस्त को दिल्ली जा रही लालकिला एक्सप्रेस में बिहार के वंशीपुर और भलुई के बीच यात्रियों को अपने सामान और नकदी से हाथ धोना पड़ा. बीती 3 सितंबर को गोरखपुर जा रही मौर्य एक्सप्रेस को बंगाल के कुल्टी में लूट लिया गया. इनमें बंगाल एवं बिहार के बाहर हुई दुर्घटनाएं और लूट की वारदातें शामिल नहीं हैं. इस तरह अपने राज्य में एक रेलमंत्री के तौर पर ममता की नाकामयाबी साफ़ झलकती है.

Related Post:  ईश्वरचंद्र विद्यासागर की नई प्रतिमा का ममता ने किया अनावरण, चुनाव के दौरान हुई थी तोड़फोड़

आंध्र में माओवादी आज़ाद के मारे जाने के मामले की जांच की मांग कर ममता ने केंद्र को भी सांसत में डाला, पर उनके बचाव में प्रणव मुखर्जी आगे आते हैं और ऐलान करते हैं कि तृणमूल की मुखिया होने के नाते उन्हें अपने स्वतंत्र विचार रखने की आज़ादी है. मालूम हो कि चिदंबरम ने अपना रुख़ एकदम साफ़ रखा है, इसलिए लीपापोती के लिए प्रणव को मोर्चा संभालना पड़ा. प्रणव ने जो कहा, उसे चिदंबरम के हवाले से नहीं कहलाया जा सकता था. कांग्रेस के लिए ममता अहम हो सकती हैं, पर जिस सरकार के मुखिया नक्सलियों को आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा क़रार दे चुके हों, उस सरकार की एक मंत्री अगर इतना अलग विचार रखती हैं तो फर्क़ कैसे नहीं पड़ेगा? इसी साल 28 मई को ज्ञानेश्वरी ट्रेन को पटरी से उतार कर 148 लोगों की हत्या करने वाले नक्सलियों के प्रति उमड़ा प्रेम क्या शर्मनाक नहीं है? रेलवे को भगवान भरोसे छोड़कर बंगाल की राजनीति में पूरी तरह रम जाने वाली ममता यह कैसी राजनीति कर रही हैं? एक महिला होने के नाते 148 परिवारों की चीत्कार को वह इतनी जल्दी कैसे भुला सकती हैं? लेकिन ममता को तो अगले साल मिलने वाली मुख्यमंत्री की कुर्सी दिख रही है और उन्होंने इसके लिए नैतिकता की सारी सीमाएं लांघ दी हैं. पिछले 27 अगस्त को ज्ञानेश्वरी मामले का एक संदिग्ध अभियुक्त उमाकांत महतो मुठभेड़ में मारा जाता है और ममता इस पर शक़ ही नहीं करतीं, बल्कि बयान जारी करती हैं कि वाममोर्चा सरकार ने उसकी हत्या सबूत मिटाने के लिए कराई है. इस संबंध में एक टीवी ङ्गुटेज भी दिखाई जाती है कि उसकी हत्या माकपा कैडरों ने की है, पर आख़िर में उसका सत्यापन नहीं हो पाता.

सोचने की बात यह है कि बंगाल में यह सब तब हो रहा है, जब माओवादियों के पैर उखड़ रहे हैं. राधानगर की महिलाओं ने जो बिगुल बजाया था, उसकी गूंज नए-नए इलाक़ों तक पहुंच रही है. राधानगर में ही लोगों ने माओवादी कालू महतो को पकड़ कर सुरक्षाबलों को सौंपा. माओवादी आत्मसमर्पण करने लगे हैं. बेलपहाड़ी के माओवादी कैडर भैरव महतो ने हाल में आत्मसमर्पण किया है और यह सिलसिला जारी है. माओवादियों के प्रति नरम रुख़ अपना रहे नीतीश कुमार जैसे राजनेताओं के हश्र से भी सबक लेना चाहिए, जिनके दामन पर लखीसराय बंधक कांड का दाग लग गया. अब इसमें कोई संदेह नहीं कि माओवादियों का बस एक ही दर्शन है हिंसा और ख़ूनख़राबा, जिन्हें एक सामूहिक राजनीतिक एजेंडे के साथ कड़े हाथों से निपटाया जाना चाहिए.

राजनीतिक चक्की में पिसते हैं गुर्जंत जैसे लोग

माओवाद से तो नहीं, पर ममता की मौजूदा राजनीतिक शैली से जुड़ा एक और मामला ज़ोर-शोर से उछला. चपेट में आया पंजाब के संगरूर ज़िले का ट्रक चालक गुर्जंत सिंह. गड्‌डी, गंतव्य और ढाबे के बीच सिमटी उसकी दुनिया में जैसे भूचाल आ गया. उसे क्या पता था कि उस पर बंगाल की भावी मुख्यमंत्री की हत्या का आरोप लगेगा. वह तो ममता बनर्जी को जानता तक नहीं था. पंजाब से प्लास्टिक दाना लेकर चला था और तामलुक में एक ढाबे पर रोटी तड़का खाने के बाद अपनी गड्‌डी दाएं-बाएं कर रहा था. तभी लालगढ़ से लौट रहीं ममता का काङ्गिला गुज़रा और सबसे पिछली एस्कार्ट गाड़ी में टक्कर लगी. ब्रेक ङ्गेल होने के कारण हुए इस हादसे से ममता की कार को भी हल्का झटका लगा और बवाल हो गया. इससे ममता कथित तौर पर घायल भी हो गईं. संसद और आंदोलन छोड़कर कई दिनों तक बिस्तर पर पड़ी रहीं. आज़ाद मामले पर दिए गए बयान से संसद में हंगामा होता रहा और ममता अपने घर में स्वास्थ्य लाभ करती रहीं. पी चिदंबरम को सफ़ाई देनी पड़ी कि आज़ाद मामले पर सरकार के रुख़ में कोई तब्दीली नहीं हुई है. प्रणव दादा ने गुलदस्ता भेजकर ममता के जल्दी स्वस्थ होने की कामना की. हालांकि ममता को कौन सी बीमारी हुई थी, किसी को पता नहीं चला. वैसे राजनीतिक हलके में माना गया कि ममता आज़ाद मामले पर हुए बवाल के शांत होने का इंतज़ार कर रही थीं. ममता अपने लालगढ़ दौरे से पहले कह चुकी थीं कि उनकी जान को ख़तरा है. यह एक संयोग ही था कि बेचारा गुर्जंत चपेट में आ गया. पहले तो पुलिस ने ख़तरनाक तरीक़े से गाड़ी चलाने का मामला दर्ज किया, पर तामलुक के तृणमूल सांसद शिशिर अधिकारी के कहने पर उसके ख़िला़फ हत्या के प्रयास की धारा लगाई गई और मामला सीआईडी के सुपुर्द किया गया. सीआईडी की चुस्ती का आलम यह था कि गुर्जंत को 12 दिन पुलिस लॉकअप में सड़ना पड़ा, क्योंकि सीआईडी ट्रक के ब्रेक ङ्गेल होने संबंधी तकनीकी रिपोर्ट नहीं सौंप पाई. यह वही सीआईडी है, जिसके क़ब्ज़े से सिलीगुड़ी के पास पिंटेल विलेज से गोरखालीग के अध्यक्ष मदन तामांग का हत्यारा निकोल तामांग भाग निकला था. वह अब तक गिरफ़्तार नहीं हुआ है और उसकी गिरफ़्तारी के लिए इनाम का ऐलान किया गया है. गुर्जंत के मामले में कोलकाता से लेकर पंजाब तक सिख समुदाय में क्षोभ की लहर दौड़ गई. कई हलकों से अपीलें की गईं, पर मामला एक भावी मुख्यमंत्री से जुड़ा था, सो क़ानून ने अपना रास्ता अख्तियार किया. कोलकाता की श्री गुरुसिंह सभा के दलजिंदर सिंह की अपील कि गुर्जंत को बलि का बकरा न बनाया जाए, को सुनने वाला कौन है. बलि का बकरा तो हमेशा से आम आदमी ही बनता आ रहा है. वह चाहे गुर्जंत हो या माओवादियों की करतूत से ज्ञानेश्वरी हादसे में मारे गए 148 लोग.

Related Post:  झारखंड के पश्‍चिमी सिंहभूम में मुठभेड़, पुलिस ने एक नक्सली को मार गिराया- हथियारों का ज़खीरा बरामद

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.