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पश्चिम बंगालः वाममोर्चा की विदाई आसान नहीं
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पश्चिम बंगालः वाममोर्चा की विदाई आसान नहीं

यह एक महज़ संयोग नहीं था कि जिस दिन बिहार विधानसभा चुनावों के परिणाम आ रहे थे, ठीक उसी दिन बंगाल की वाममोर्चा सरकार ने राज्य में पंचायतों की 50 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का फैसला लिया. तमाम झिझक के बावजूद बांग्ला मीडिया के एक हलके में इस बात पर चर्चा हुई कि कामयाबी का बिहार मॉडल बंगाल में भी कारगर हो सकता है. झिझक की चर्चा मैंने इसलिए की कि यहां कुछ साल पहले तक बिहार का प्रसंग केवल नकारात्मक कारणों से ही उठता रहा है, पर अब हालात बदल रहे हैं. सत्ता विरोधी लहर की काट कैसे तैयार की जाती है, इसका रास्ता बिहार ने दिखाया है. थोड़ा विकास, पर बड़ी उम्मीद के मंत्र ने वाममोर्चा को भी बिहार मॉडल अपनाने के लिए प्रेरित किया है. हालांकि हालात बिहार से थोड़े अलग हैं. वहां लालू प्रसाद का राजद लगातार दूसरी बार लोगों का विश्वास जीतने में नाकाम रहा, तो ममता बनर्जी और उनकी पहले वाली पार्टी कांग्रेस के साथ ऐसा छह बार से हो रहा है. पिछले तीन सालों से बंगाल में बदलाव की बयार बह रही है और इसकी काट तैयार करना वाममोर्चा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है. परिवर्तन का सा़फ सिग्नल देने वाले लोकसभा चुनावों के बाद दो-ढाई साल का समय बीता है. इस दौरान बंगाल के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी बहुत सारे उलटफेर हुए हैं. महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे दो कारकों ने उस यूपीए सरकार के ख़िला़फ लोगों का ग़ुस्सा भड़का दिया है, जिसकी तृणमूल एक अहम घटक है. बड़बोली ममता पर रेलवे के दुरुपयोग, माओवादियों से साठगांठ और नीतिविहीनता जैसे आरोप लग रहे हैं. ऐसे हालात ने बंगाल के चुनावों को और रोचक बना दिया है. यानी मैच कीनिया और पाकिस्तान की तरह एकतरफा नहीं, कांटे का होगा.

गोरखालैंड आंदोलन भले ही धधक रहा हो, पर सरकार उत्तर बंगाल के डुआर्स में कुछ हिंदीभाषी स्कूल खोलने की घोषणा कर हिंदीभाषी आदिवासियों का दिल जीतने में ज़रूर कामयाब हुई है. अभी हाल में वाममोर्चा ने स्कूली लड़कियों की यूनीफार्म के लिए चार-चार सौ रुपये देने का ऐलान किया है. ज़ाहिर है, यह घोषणा बिहार में नीतीश की कामयाबी से प्रेरित होकर की गई है. माकपा पोलित ब्यूरो के सदस्य एवं प्रवक्ता मोहम्मद सलीम ने चौथी दुनिया को बताया, सरकार ने अपनी ग़लतियों को खुले तौर पर स्वीकारा है.

बीती 13 फरवरी को वाममोर्चा ने कोलकाता के ब्रिगेड परेड मैदान में विशाल जनसभा कर अपनी ताक़त का प्रदर्शन किया और एक तरह से प्रचार अभियान की शुरुआत की. लाखों की तादाद देख थोड़ी घबराईं ममता ने इसे वाममोर्चे की विदाई जनसभा तक कह दिया और उसी जगह पर नई सरकार के शपथ लेने का ऐलान भी किया. ममता के इस आत्मविश्वास की हवा निकालना चाहता है मोर्चा. इसके लिए उसने कई क़दम उठाए हैं. पिछले लोकसभा चुनावों के बाद से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की जो भी समीक्षा बैठकें हुई हैं, उनमें तय हुआ है कि ग़लतियां हुई हैं, उन्हें स्वीकार कीजिए, लोगों से माफी मांगिए और यह महसूस कीजिए कि अभी भी पलट कर खड़े होने की गुंजाइश है. सो वाममोर्चा, ख़ासकर माकपा पलट कर खड़े होने के मूड में आ गई है. लेकिन यह मुमकिन कैसे होगा? बिहार में तो कुछ क्षेत्रों में विकास सा़फ दिखा, पर बंगाल के पिछले पांच साल विध्वंसात्मक राजनीति के साल रहे. इस दौरान बंगाल विकास दर के मामले में भले ही न पिछड़ा हो, पर ठहराव तो सा़फ दिख रहा है. नैनो की विदाई हुई तो उद्योगपति बंगाल आने से बिदक गए. नई औद्योगिक नीति के तहत दनादन हुए क़रार की फाइलों पर गर्द जम गई है. बदलाव की हवा उठने से एक संदेश गया कि अब संक्रांति काल की अशुभ घड़ी में शुभ काम न करना ही ठीक है. बताने की ज़रूरत नहीं कि उद्योगपति वर्ग भी स्थिर राजनीतिक व्यवस्था चाहता है. उसका सोचना स्वाभाविक है कि दो ध्रुवों के बीच पिसने से अच्छा है कि कुछ इंतज़ार कर लिया जाए. यह रही नए उद्योगों की बात. बंद पड़े कारखानों को खोलने जैसे किसी बड़े क़दम का भी ऐलान नहीं हुआ. उत्तर बंगाल के चाय बागान श्रमिकों की बदहाली जस की तस है. माकपा की श्रमिक शाखा का उग्रपंथी रवैया नहीं बदला है. मिसाल के तौर पर हाल का एक छोटा सा उदाहरण लें. बीती 23 ङ्गरवरी को कोलकाता के दमदम रेलवे स्टेशन पर मोबाइल पर बतियाते हुए लेवल क्रासिंग पार कर रहा एक आदमी ट्रेन की चपेट में आ गया. इसके बाद सीटू की स्थानीय हॉकर यूनियन ने स्टेशन मास्टर सहित रेलवे कर्मियों को पीटा और कार्यालय में भी आग लगा दी. इस तरह लाखों की संपत्ति स्वाहा हो गई. क़ानून व्यवस्था के मोर्चे पर भी सरकार को बदनामी झेलनी पड़ रही है. ङ्गरवरी के दूसरे सप्ताह में अपनी बहन को गुंडों के चंगुल से बचाने की कोशिश में बरासात के राजीव दास नामक युवक को जान गंवानी पड़ी. चुनावी मौसम की वजह से मुख्यमंत्री भी उसके घर गए और 2 लाख रुपये का मुआवज़ा दिया. विपक्ष ने भी इस मामले पर ख़ूब राजनीति की.

गोरखालैंड आंदोलन भले ही धधक रहा हो, पर सरकार उत्तर बंगाल के डुआर्स में कुछ हिंदीभाषी स्कूल खोलने की घोषणा कर हिंदीभाषी आदिवासियों का दिल जीतने में ज़रूर कामयाब हुई है. अभी हाल में वाममोर्चा ने स्कूली लड़कियों की यूनीफार्म के लिए चार-चार सौ रुपये देने का ऐलान किया है. ज़ाहिर है, यह घोषणा बिहार में नीतीश की कामयाबी से प्रेरित होकर की गई है. माकपा पोलित ब्यूरो के सदस्य एवं प्रवक्ता मोहम्मद सलीम ने चौथी दुनिया को बताया, सरकार ने अपनी ग़लतियों को खुले तौर पर स्वीकारा है. राजकीय, संगठनात्मक और राजनीतिक स्तर पर भूलों को सुधारने की कोशिश हुई है. ग़लती मानने से ग़ुस्सा कम होता है, इस मनोविज्ञान पर माकपा को पूरा भरोसा है. सलीम ने माना कि सरकार खेती के साथ उद्योगों पर ज़ोर देने की अपनी नीति पर क़ायम है. उद्योग ज़रूरी है, इसलिए ममता बनर्जी भी आजकल उद्योग चाहिए की रट लगा रही हैं. कुछ प्रतिशत वोटों का इधर-उधर होना कितना उलटफेर कर सकता है, इसका आकलन पेशेवर चुनाव विश्लेषक भी ठीक से नहीं कर पाते. राजनीतिक रूप से जागरूक बंगाल के संदर्भ में भी यही बात लागू होती है. सवाल है कि माकपा से नाराज़ चल रहे लोगों का एक हिस्सा अगर फिर साथ हो गया तो हालात कितने बदल सकते हैं? आंकड़ों की बात करें तो पिछले लोकसभा चुनावों में माकपा को सीटों का भले ही नुक़सान हुआ, पर उसके वोट प्रतिशत में थोड़ी ही कमी आई. माकपा की केंद्रीय कमेटी के बयान के मुताबिक़, पिछले लोकसभा चुनावों में राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी को 2004 के 5.33 प्रतिशत के मुक़ाबले केवल .33 प्रतिशत का ही नुक़सान हुआ, हालांकि सीटों का नुक़सान काङ्गी हुआ. इस तरह 2004 की 43 सीटों के मुक़ाबले उसे स़िर्फ 16 सीटें ही हासिल हो सकीं. कमेटी के बयान के मुताबिक़, 2009 के लोकसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल में पार्टी को 1.85 करोड़ और केरल में 67.17 लाख वोट मिले, जबकि वाममोर्चा को बंगाल में 2004 के संसदीय चुनावों में 1.88 करोड़ मत मिले थे. इस तरह बंगाल में उसे स़िर्फ 3 करोड़ वोटों का नुक़सान हुआ है. मत प्रतिशत में बढ़ोत्तरी की वजह से वाममोर्चा को 2004 के 52.72 प्रतिशत के मुक़ाबले 2009 में 43.30 प्रतिशत ही वोट मिले और इस तरह उसे 7.42 प्रतिशत वोटों का नुक़सान हुआ. माकपा का अपने वोटों का हिस्सा भी 38.57 से 33.10 प्रतिशत पर आ गया. कोलकाता के आसपास की सारी सीटें वाममोर्चा हार गया, जिससे साबित होता है कि शहरी युवा और मुसलमानों के वोटों से भी माकपा को महरूम होना पड़ा है. ऐसे हालात में वाममोर्चा पलट कर खड़े होने की रणनीति के तहत दो बातें कर रहा है. वह युवाओं को संदेश दे रहा है कि ममता ने राज्य का औद्योगिक माहौल पूरी तरह तबाह कर दिया है. हर जनसभा में वह नैनो की विदाई का प्रसंग रख रहा है. युवाओं को यह भी बताया जा रहा है कि ज़्यादातर रेल परियोजनाएं हक़ीक़त में नहीं उतरने वालीं और इस संबंध में रेलवे की खस्ताहाल माली हालत का हवाला दिया जा रहा है.

वाममोर्चा ने सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गों के लिए निर्धारित 7 प्रतिशत आरक्षण को 17 प्रतिशत कर दिया है और उसमें मुस्लिम समुदाय के पिछड़ों को भी शामिल किया है. मालदा में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की शाखा का शिलान्यास हो चुका है. ममता लहर में सत्ता में आई तृणमूल की पंचायतों के भ्रष्टाचार और नाकामी को भी वाममोर्चा ने मुद्दा बनाया है. वाममोर्चा कोलकाता नगर निगम पर क़ब्ज़ा करने वाली तृणमूल के कामकाज को भी लोगों के सामने रख रहा है और पूछ रहा है कि उसका प्रदर्शन वाममोर्चा बोर्ड के कामों से कितना अधिक या अच्छा है? इन सब कारकों के बूते उसे सत्ता विरोधी लहर रोकने का विश्वास है. मई में हो रहे चुनावों के परिणामों पर न केवल देश, बल्कि अमेरिका जैसे पूंजीवादी एवं चीन जैसे मार्क्सवादी देशों की भी नज़र है. एक वर्ग शुरू से ही यह जानने को उत्सुक रहा कि सोवियत संघ के विघटन के दौर में जब दुनिया के ज़्यादातर हिस्सों से मार्क्सवाद की विदाई हो रही थी तो हर पांच साल पर बंगाल में वामपंथी सरकारें कैसे बनती रहीं? अब जब उसकी विदाई की हवा है तो लोगों की उत्सुकता और बढ़ गई है कि क्या यह वाकई संभव है? पूरे सात बार लगातार चुनकर आती रही वामपंथी सरकार अगर आठवीं बार भी शपथ लेती है तो यह सत्ता विरोधी लहर का भूत भगाने वाली एक ऐतिहासिक घटना होगी और वामपंथी आंदोलन को पूरे देश में नए सिरे से सिर उठाने का मौक़ा मिलेगा. ख़ैर, उपचुनावों एवं पंचायत चुनावों जैसे लीग मैचों का दौर कब का ख़त्म हो गया है. अब तो जंग नॉक आउट चरण में पहुंच गई है. पिछले तीन दशकों में जवान हो चुकी एक पूरी पीढ़ी बंगाल की सत्ता का कप किसे सौंपेगी, यह निर्णायक रूप से बताना भले ही संभव न हो, पर प्रबल दावेदार तो ममता को ही माना जा रहा है.

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