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पुलिस की तानाशाही और वन गुजरों की जीत

पुलिस की तानाशाही और वन गुजरों की जीत

देश में वनाधिकार क़ानून लागू होने के बावजूद वन क्षेत्र में रहने वाले लोगों को उनके मूल स्थान से भगाने के प्रयास किए जाते रहते हैं, जिससेउन्हें का़फी परेशानी का सामना करना पड़ता है. पिछले दिनों ऐसा ही एक मामला सामने आया. राष्ट्रीय वन-जन श्रमजीवी मंच के वन गूजर नूर जमाल की गिरफ्तारी के विरोध में वन गूजरों और टांगिया गांव की महिलाओं ने बीते 29 जून को सहारनपुर की बेहट तहसील अंतर्गत आने वाले थाना बिहारीगढ़ का घेराव कर पुलिस को उसे बिना शर्त रिहा करने को मजबूर कर दिया. जानकारी के अनुसार, बीते 28 जून को उत्तराखंड स्थित राजाजी नेशनल पार्क अंतर्गत आने वाली मोहंड रेंज की झूठी तहरीर पर उत्तर प्रदेश के  थाना बिहारीगढ़ की पुलिस ने वन गूजर समुदाय के तीन लोगों नूर जमाल, जहूर हसन एवं इरशाद के खिला़फ धारा 332, 186 और 427 के तहत म़ुकदमा दर्ज कर नूर जमाल को गिरफ्तार कर लिया था.

उत्तर प्रदेश सरकार एक ओर वनाधिकार क़ानून के क्रियान्वयन को अपना राजनीतिक एजेंडा मानकर तरह-तरह के आदेश-निर्देश जारी कर रही है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय प्रशासन, पुलिस और वन विभाग सरकार की मंशा पर पलीता लगाने पर तुले हुए हैं. उत्तराखंड में भी इस क़ानून के क्रियान्वयन की प्रक्रिया बाधित की जा रही है, जिसका उदाहरण बिहारीगढ़ की घटना है.

इससे पूर्व 24 जून को जब ये तीनों लोग पार्क क्षेत्र में बसे अपने डेरे पर जा रहे थे, तब मोहंड रेंज के रेंजर महावीर सिंह नेगी ने रास्ते में इन्हें रोक लिया और मारपीट शुरू कर दी. इरशाद अपनी जिस मोटरसाइकिल पर जा रहा था, उसे छीन लिया गया और धमकी दी गई कि अगर जंगल क्षेत्र छोड़कर बाहर नहीं गए तो गोली से उड़ा दिए जाओगे. मामला उत्तराखंड के बुग्गावाला क्षेत्र का होने के कारण रेंजर के खिला़फ थाना बुग्गावाला में उन्होंने तहरीर दी, जिस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई. इधर रेंजर महावीर नेगी ने थाना बिहारीगढ़ के थानाध्यक्ष दिगंबर सिंह से साठगांठ करके महिला वनकर्मी बबलेश की ओर से रिपोर्ट दर्ज करा दी, जिसके आधार पर थाना बिहारीगढ़ पुलिस नूर जमाल को घर से उठाकर थाने ले आई. नूर जमाल की गिरफ्तारी को लेकर पार्क क्षेत्र में बसे वनगूजर और वनटांगिया समुदाय के लोगों में आक्रोश फैल गया.

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इसके बाद राष्ट्रीय वन-जन श्रमजीवी मंच के बैनर तले राज्यस्तरीय वनाधिकार निगरानी समिति की विशेष आमंत्रित सदस्य रोमा, मंच के सदस्य रजनीश, हरी सिंह, विपिन गैरोला, प्रद्युम्न के साथ दोनों वन समुदायों की महिलाओं ज़ैनब एवं सीता आदि की अगुवाई में 500 से अधिक लोगों ने थाना बिहारीगढ़ का घेराव कर लिया. महिलाओं ने थाना कार्यालय के दोनों दरवाज़े बंद कर पुलिसकर्मियों को यह कहकर क़ैद कर लिया कि जब तक नूर जमाल को बाइज़्ज़त रिहा नहीं किया जाएगा, तब तक पुलिसकर्मियों को भी बाहर नहीं निकलने दिया जाएगा. थाने का बरामदा एक जनसभा स्थल में तब्दील हो गया और वहां रखी मेज़ को मंच बनाकर भाषण दिए जाने लगे. पुलिस मूकदर्शक बनी यह सब देखती रही. किसी की हिम्मत नहीं पड़ी कि वह दमन से उपजे इस जन विरोध का सामना कर सके. थानाध्यक्ष ने मामला अपने हाथ से निकलता देख पड़ोसी थाना फतेहपुर के थानाध्यक्ष और क्षेत्राधिकारी बेहट को बुला लिया. प्रदर्शनकारी महिलाओं ने क्षेत्राधिकारी को घटना और उसके वनाधिकार क़ानून के क्रियान्वयन की प्रक्रिया से जुड़े होने की जानकारी दी तो उन्होंने मामले की सत्यता को समझ कर स्वीकार किया कि थानाध्यक्ष ने एक निर्दोष व्यक्ति को गिरफ्तार किया है. उन्हें बताया गया कि वनाधिकार क़ानून के तहत अब किसी भी वन समुदाय को उसकी मर्ज़ी के बग़ैर वन क्षेत्र से हटाया नहीं जा सकता. इस बारे में नैनीताल उच्च न्यायालय द्वारा वनगूजरों के पक्ष में 2007 में वनाधिकार क़ानून को संज्ञान में लेते हुए आदेश भी जारी किए जा चुके हैं, लेकिन पार्क प्रशासन द्वारा 2008 में जहूर हसन और नूर जमाल के डेरों को लूटकर आग के हवाले कर दिया गया. पार्क प्रशासन लगातार तरह-तरह के हथकंडे अपना कर वन गूजरों को वन क्षेत्र से भगाने की कोशिशें करता रहता है. रेंजर द्वारा महिला से दिलवाई गई तहरीर भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है. उन्होंने सारी बात समझते हुए न स़िर्फ नूर जमाल को बिना शर्त बाइज़्ज़त रिहा किया, बल्कि वन गूजरों की ओर से रेंजर महावीर नेगी के खिला़फ दी गई तहरीर लेते हुए उस पर कार्रवाई करने का आश्वासन भी दिया. इसके बाद सभी लोग नूर जमाल को लेकर मोहंड रेंज कार्यालय पहुंचे. यहां लोगों के आने की खबर पाकर कर्मचारी पहले से ही भाग खड़े हुए, लेकिन लोगों ने रेंज कार्यालय पर प्रदर्शन करते हुए ज़बरदस्त नारेबाज़ी की और दीवारों पर लिखकर चेतावनी दी कि अगर पार्क प्रशासन द्वारा यहां बसे वन गूजर और टांगिया समुदायों का उत्पीड़न नहीं रोका गया तो पार्क निदेशक रसैली सहित सभी कर्मचारियों के खिला़फ ग्राम समितियों की ओर से वनाधिकार क़ानून 2006 की धारा 7 के  तहत कार्रवाई की जाएगी.

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उत्तर प्रदेश सरकार एक ओर वनाधिकार क़ानून के क्रियान्वयन को अपना राजनीतिक एजेंडा मानकर तरह-तरह के आदेश-निर्देश जारी कर रही है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय प्रशासन, पुलिस और वन विभाग सरकार की मंशा पर पलीता लगाने पर तुले हुए हैं. उत्तराखंड में भी इस क़ानून के क्रियान्वयन की प्रक्रिया बाधित की जा रही है, जिसका उदाहरण बिहारीगढ़ की घटना है. राजाजी नेशनल पार्क प्रशासन और उत्तराखंड-उत्तर प्रदेश पुलिस की तानाशाही के खिला़फ महिलाओं के नेतृत्व में किए गए संघर्ष की यह एक बड़ी और महत्वपूर्ण जीत थी.

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