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प्राकृतिक रेशों का ताना बाना

प्राकृतिक रेशों का ताना बाना

उत्तर में जबलपुर और दक्षिण में गोंदिया एवं बालाघाट के बीच स्थित है एशिया का सबसे बड़ा नैरोगेज स्टेशन नैनपुर. उत्तर भारत के सूखाग्रस्त इलाक़े से दूर झिरझिराती बारिश की नन्हीं बूंदें नर्मदांचल की भूमि को तर कर रही थीं. धरती पर बिछी हरी घास की चादर, नीरवता से ओतप्रोत गहरी घाटियां, बचे-खुचे जंगल, उफनते बरसाती नाले और नदियां, छाता लेकर खेतों में काम करती जनजातीय महिलाएं, दूर शांत पहाड़ की तलहटी में झोपड़ियों के झुरमुट, छोटे-छोटे स्टेशनों पर बरसात के बीच चाय सुड़कते हुए लोग एवं स्थानीय जनजीवन की झलकी अनायास ही मन मोह लेती है. इस रेल यात्रा में ग्रामीण भारत का जीवंत एवं रोमांचकारी अनुभव देखने को मिलता है. 111 किलोमीटर का सफर क़रीब छह घंटे में तय करने के बाद आख़िरकार छोटी रेल मटकती हुई नैनपुर पहुंच गई. ग़ैर सरकारी संस्था नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वुमेन, चाइल्ड एंड यूथ डेवलपमेंट (एनआईडब्ल्यूसीवाईडी) के प्रतिनिधि भास्कर रमण ने वहां अभिवादन किया और नैनपुर के इतिहास की पोथी उलटनी शुरू कर दी. उल्लेखनीय है कि एनआईडब्ल्यूसीवाईडी की नैनपुर शाखा को डिंडौरी ज़िले के जनजातीय परिवारों को प्राकृतिक संसाधनों से बनने वाले हस्तशिल्प उत्पादों के निर्माण हेतु प्रशिक्षण देने के लिए मध्य प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद की ओर से चुना गया था.

जनजातीय जीवन में स्थानीय संसाधनों के आधार पर अनेक कलात्मक वस्तुएं बनाई जाती रही हैं. लोककला के इन्हीं स्वरूपों की पहचान कर अब उन्हें व्यवसायिक कलेवर में पिरोकर आदिवासियों को आत्मनिर्भर बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं.

घरों में आमतौर पर उपयोग की जाने वाली झाड़ू एक बड़ी सामान्य सी वस्तु है. परंपरागत मान्यताओं के मुताबिक़ तो झाड़ू की पूजा भी होती है, इस बात से शायद आपको स्मरण हो आए कि पैरों से झाड़ू छूने पर मां क्यों रोक दिया करती थीं! नैनपुर के कचरु खडसे एवं रमेश खडसे मूलत: झाड़ू बनाने वाले परिवारों से हैं. इनके बनाई हुई झा़ड़ुओं को हस्तशिल्प का नायाब नमूना माना जा सकता है. 1998 में एनआईडब्ल्यूसीवाईडी के नागपुर स्थित मुख्यालय पर जनजातीय कलाओं को प्रोत्साहित करने के लिए बैठक हुई, जिसमें नैनपुर के भास्कर रमण ने अपने द्वारा बनवाई गई कलात्मक झाड़ुओं को प्रदर्शित किया. बकौल रमण, बाद में हमने 108 किस्मों की झाड़ू बनवाईं, जिनमें से क़रीब 45 झाड़ू अत्यंत लोकप्रिय हुईं. इसी बीच राजधानी के दिल्ली हाट में अपनी इन कलात्मक झाड़ुओं को प्रदर्शित करने का अवसर मिल गया. भास्कर रमण कहते हैं कि वस्तुशास्त्री परंपरा से निकली इस ग्रामीण प्रौद्योगिकी के अनूठे नमूनों का अध्ययन करके हम और भी रोचक जानकारियां इकट्ठी कर सकते हैं तथा इसे एक कला के रूप में स्थानीय आदिवासियों के लिए जीवनयापन का सशक्त माध्यम बनाया जा सकता है.

उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश के जनजातीय क्षेत्रों में अनेक लोककलाएं प्रचलित रही हैं. छत्तीसगढ़ के अलग हो जाने के बाद अनेक जनजातीय कलाएं वहां चली गईं. इसके बावजूद आज भी मध्य प्रदेश जनजातीय समुदायों द्वारा बनाई गईं कलाकृतियों के लिए ख़ासतौर पर जाना जाता है. एक समय था, जब उक्त कलाएं स्थानीय जीवनशैली, परंपरा और संस्कृति के साथ जुड़ी होने के अलावा लोगों के जीवनयापन का भी साधन हुआ करती थीं, लेकिन समय के साथ इनके स्वरूप में परिवर्तन आया है और कुछ कलाएं तो लुप्त होने की कगार पर पहुंच गईं. इन कलाओं एवं कलाकृतियों के निर्माण में स्थानीय संसाधनों और वनोत्पादों का उपयोग एक विशेषता रहा है. दूसरी विशेषता यह है कि इन उत्पादों में जनजातीय जीवन की झलक देखने को मिल जाती है. आज़ादी के पश्चात मध्य प्रदेश के हस्तशिल्प के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ का एक बड़ा नाम था. बस्तर के आदिवासी अंचल का हस्तशिल्प, टेराकोटा, वुडवर्किंग, प्राकृतिक रेशों पर आधारित हस्तशिल्प एवं कच्चे लोहे से बनने वाले हस्तशिल्प ने प्रगति करते हुए विश्व प्रसिद्धि हासिल की. मध्य प्रदेश हस्तशिल्प विकास निगम ने इस संदर्भ में काफी कुछ किया है. छत्तीसगढ़ के गठन के बाद शेष मध्य प्रदेश में पुराने व्यवसायों से हस्तशिल्प कलाओं को खोज निकालने का कार्य शुरू हुआ. पिछले 5 वर्षों के दौरान रीवा की सुपाड़ी कला, बालाघाट के बांस शिल्प, मंडला की पत्ती एवं ढिबरी कला, छिंदवाड़ा ज़िले के सींग निर्मित कलात्मक उत्पादों को प्रोत्साहित करने के प्रयास किए जा रहे हैं.

मध्य भारत के घने जंगलों में विविध वनस्पतियां लघु वनोपज के रूप में मौजूद हैं, जिनसे प्राप्त होने वाले रेशों से विभिन्न प्रकार के हस्तशिल्प का निर्माण किया जा सकता है. घास, अंबाड़ी के रेशे, लेंटाना, खर-पतवार, बांस एवं सन ऐसे ही कुछ प्राकृतिक संसाधन हैं, जो जंगलों में बहुतायत में उपलब्ध हैं. इनका उपयोग करके स्थानीय लोगों के लिए रोज़गार के अवसर सृजित किए जा सकते हैं. केतकी भी इन्हीं में से एक है. वशिष्ठ पुराण के अनुसार, यह पौधा भारतीय है और एक ऋषि की पत्नी के नाम पर इसका नाम केतकी पड़ा. फिलहाल इस पौधे को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई गई है. जानकारों की मानें तो इसके रेशे से न केवल दैनिक उपयोग की वस्तुएं, बल्कि पोर्टेबल स्पिरिट भी बनाई जा सकती है. मध्य प्रदेश में वर्तमान स्थिति यह है कि प्रति वर्ष हज़ारों टन प्राकृतिक रेशों एवं हर्बल वनस्पतियों का उत्पादन आम किसान कर रहा है, परंतु विपणन की समुचित व्यवस्था न होने के कारण इन्हें ईंधन के रूप में इस्तेमाल कर लिया जाता है अथवा बेकार समझ कर फेंक दिया जाता है. अंबाड़ी भाजी की खेती आदिवासी परिवार बड़ी मात्रा में करते हैं. इसकी पत्तियां एवं फल खाद्य पदार्थ के रूप में इस्तेमाल की जाती हैं, परंतु इससे निकलने वाले रेशे का उपयोग नहीं होता. अंबाड़ी भाजी का रेशा कोमल, मज़बूत और टिकाऊ होता है, जिसका हस्तशिल्प में विशेषकर छोटे बैग अथवा पर्स बनाने में उपयोग किया जा सकता है. इसी तरह भिंडी, केला एवं देशी पटसन का भी एक बड़ा रकबा मध्य प्रदेश में है, परंतु इनके रेशे का उपयोग नहीं हो रहा है.

आदिवासी क्षेत्र में लोग पटसन भी उगाते हैं, परंतु उचित मूल्य न मिलने और विपणन व्यवस्था एवं स्थानीय स्तर पर प्रौद्योगिकी उपलब्ध न होने से किसानों को इसका पर्याप्त लाभ नहीं मिल पाता. हालांकि वर्तमान में प्लास्टिक नायलॉन के अधिक प्रचलन से इस विषय में किसान जागरूक होते हुए भी प्राकृतिक रेशों के बारे में गंभीर नहीं हैं. मध्य प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के एक सर्वे के अनुसार, झाड़ू बनाने एवं बेचने को 36 हज़ार परिवारों की जीविका का साधन बताया गया है. ऐसे में प्राकृतिक रेशों पर आधारित ग्रामोद्योग जहां रोज़गार के अवसर पैदा करेंगे, वहीं इनकी औद्योगिक इकाई की स्थापना भी संभव हो सकती है. नैनपुर निवासी भास्कर रमण ने पैडल ऑपरेटेड रेस्पाडोर मशीन का निर्माण किया है, जिसके माध्यम से जंगल में उपलब्ध केतकी के रेशों को आसानी से अलग कर लिया जाता है. सूखने पर यह रेशा अत्यंत चमकीला दिखाई देता है. केतकी के पौधे से रेशे को अलग करके कलात्मक वस्तुओं के उत्पादन एवं उन्हें बाज़ार उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है. इसके लिए भारतीय प्रजातियों लीला केतकी एवं पदमा केतकी का उपयोग किया जा रहा है. रेस्पाडोर मशीन से रेशे को अलग किए जाने की प्रक्रिया को विभिन्न सरकारी एवं ग़ैर सरकारी स्तरों पर सराहा गया है. पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए पी जे अब्दुल कलाम ने भी इसका अवलोकन कर तारी़फ की है.

माना जा रहा है कि डिंडौरी ज़िले के अमरपुर विकास खंड के जंगल के किनारे स्थित गांव में मध्य प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के वैज्ञानिकों के सहयोग से शुरू किए गए प्रयास आने वाले कुछ दिनों में चर्चा का विषय होंगे. वर्तमान में 20 कलस्टर ट्रेनर और 100 कारीगरों का चयन करते हुए उन्हें प्रशिक्षण दिया जा रहा है. क्लस्टर डेवलपमेंट के अंतर्गत चार गांवों के विभिन्न स्वयं सहायता समूहों जैसे ज्योति स्वयं सहायता समूह-नांदमाल, आदर्श स्वयं सहायता समूह-समनापुर, रानी दुर्गावती स्वयं सहायता समूह, गोंडवाना स्वयं सहायता समूह, जागृति स्वयं सहायता समूह एवं रानी लक्ष्मीबाई स्वयं सहायता समूह (सभी अमरपुर) और प्रेरणा स्वयं सहायता समूह एवं नर्मदा स्वयं सहायता समूह (दोनों अलौनी) को प्रारंभिक प्रशिक्षण दिया गया है. प्रशिक्षण के तत्काल बाद भारत सरकार हस्तशिल्प विकास निगम से पंजीकरण कराते हुए नवशिल्पी होने के समस्त लाभ जैसे परिचय पत्र, समूह बीमा एवं स्वास्थ्य बीमा आदि लाभ दिए जाएंगे. कारीगर क्रेडिट कार्ड हेतु भी अपेक्षित कार्यवाही की जा रही है. प्रशिक्षित महिलाओं ने अपने मंच का गठन किया है. कुछ महिलाओं ने शहीद रानी अवंतीबाई स्मारक स्थल पर अपने उत्पादन एवं विक्रय केंद्र चलाने के प्रयास किए हैं. मध्य प्रदेश के अनेक किसान एवं आदिवासी शीघ्र ही बाज़ार में उतरने के लिए कमर कस चुके हैं. 72 स्वयं सहायता समूहों की 833 महिलाएं प्राकृतिक रेशों से जुड़ी कला नेचुरल फाइबर आर्ट के विकास के लिए उमरिया, डिंडौरी, मंडला, बालाघाट, सिवनी एवं छिंदवाड़ा आदि ज़िलों में प्रयास कर रही हैं.

अब तक दो प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं. पहली बैठक में रमेश खडसे की वयोवृद्ध मां बयाबाई ने बताया कि नागमणि एवं अनेक नामों से झाड़ू पहले बनाई जाती रही है. इसी तरह शादी में पहनाए जाने वाले छींद की पत्तियों, तने और मुकुट की भी जानकारी मिली. पिंडरई के खडसे परिवार के सदस्यों ने अपना समूह बनाया. गृहलक्ष्मी, महालक्ष्मी, राधिका, सुजाता, कांता, किरण, सुंदरी आदि ने 106 किस्म के झाड़ू और गुलदस्ते बनाए. चित्तेरा कलाकार कचरू परिवार का सबसे बड़ा लड़का है और उसके बनाए झाड़ुओं को 100-125 रुपये में समूह ने ख़रीदा और प्रदर्शनियों के माध्यम से उसका बाज़ार तलाशने की कोशिश की गई. इसी बीच जोली हटगंडी की कोशिश से किरण खडसे को झाड़ू बनाने की कला पर हैंडीक्राफ्ट म्यूज़ियम नई दिल्ली की ओर से कमला देवी बाल पुरस्कार मिला, जिसके तहत उसे प्रतिवर्ष तीन सौ रुपये का वजीफा एक वर्ष तक दिया गया. पिंडरई की झाड़ू से पाद्रीगंज में बनने वाली झाड़ुओं पर भी प्रभाव पड़ा और उनकी गुणवत्ता में सुधार आया. इस तरह क्षेत्र में सर्वाधिक झाड़ू बनाने वाले परिवारों को कलात्मक झाड़ू बनाने की दिशा में मोड़ देने से स्थानीय बाज़ार प्रभावित हुआ और झाड़ू की क़ीमत एक रुपये अधिक हो गई. झाड़ुओं को प्रदर्शनियों के माध्यम से पूरे भारत में प्रदर्शित किया गया, सराहना प्राय: सभी जगह एक सी मिली. कलात्मकता की पहचान स्थापित हुई, किंतु दैनिक जीवन में झाड़ू की अनिवार्यता होते हुए भी अधिक क़ीमत की वस्तु न मानकर टिकाऊपन के चलते कुछ झाड़ुओं ने अच्छा व्यवसाय किया और प्रदर्शनी में आने-जाने में हुआ ख़र्च लगभग निकल आया था. कलाकारों के लिए समर्पित पल्लवी जैन (मुख्य कार्यपालन अधिकारी, मंडला) ने झाड़ुओं को प्रगति मैदान, नई दिल्ली भेजा, जिससे महाकौशल महिला समूह की अंतरराष्ट्रीय पहचान भी बनी. अब तो महालक्ष्मी झाड़ू एवं लक्ष्मी टेबिल लावर ने लंदन और टोक्यो की यात्रा भी कर ली है. हालांकि इस बीच संस्था पर स्थानीय लोगों के व्यवसायिक शोषण के भी आरोप लगे हैं, फिर भी स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर ग्रामीणों के सशक्तिकरण की बात को नकारा नहीं जा सकता, बशर्ते इस पूरे काम की सख्त मॉनीटरिंग के साथ पर्याप्त मार्केटिंग की भी आवश्यकता है.

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