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पुस्‍तक अंशः मुन्‍नी मोबाइल – 16
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पुस्‍तक अंशः मुन्‍नी मोबाइल – 16

नाव परिणामों से सब स्तब्ध थे. बुद्धिजीवी और धर्म निरपेक्ष ताक़तें सकते में थीं. वे मतदाताओं का मूड भांप नहीं पाए. सांप्रदायिक ताक़तों को हराने की उनकी सारी अवधारणाएं हवाई साबित हुईं. उनकी मान्यता थी कि गांधी का गुजरात धर्म के आधार पर नहीं बंटेगा, पर ऐसा हुआ. मोदी ने अपने चुनावी एजेंडे में सा़फ कहा था कि यह चुनाव छद्म और ढोंगी धर्मनिरपेक्षतावादियों के ख़िला़फ है. जनता ने उस पर मोहर लगाई. जीत तो जीत होती है. लेकिन उस जीत में दो हज़ार बेगुनाहों की लाशें द़फन हैं.

आनंद भारती इतने मायूस हो गए थे कि उन्हें फोन की घंटी भी दहला देती थी. सड़क पर चलने से भी वह डरने लगे थे. एक शून्य में चले गए थे वह. उनके मित्र दो साल अहमदाबाद में रहने के बाद भी ज़्यादा नहीं थे. दो-चार अख़बारी मित्र थे. उनमें से ही एक पत्रकार मित्र की पत्नी ने उनको ढांढस बंधाया. उन्हें लेकर वह साइकेटिक के यहां गईं.

मोदी को जीत का नशा था. हिंदू ब्रिगेड भी नशे में चूर थी. चुन-चुन कर विरोधियों को निशाना बनाया जा रहा था. मीडिया पहले निशाने पर था. आनंद भारती पर भी हमला हुआ. उन्हें कार से उतार कर पानी से नहलाया गया. पानी के प्लास्टिक पाउचों से मारा गया. फिर छोड़ दिया गया. एक बार फिर इस हमले में उन्हें भारत माता की जय बोलने के लिए मजबूर किया गया.

आनंद भारती सदमे में थे. उनमें असुरक्षा घर कर गई थी. वह रात-रात भर सोते नहीं थे. अकेले रहने पर वह दहशत से घिरे रहते. उनके दफ़्तर का माहौल भी मोदी समर्थकों से भरा था. कोई भी आकर उनको चिढ़ा जाता, आपने मोदी को हराने के लिए टनों काग़ज़ ख़राब कर दिया, लेकिन मोदी का आप कुछ बिगाड़ नहीं पाए.

चपरासी भी आनंद भारती की अनदेखी करने लगा. चाय-पानी भी लगभग उसने उनकी बंद कर दी थी. पूरे दफ़्तर ने षडयंत्र कर उनकी शिक़ायत भी दिल्ली मुख्यालय में कर दी. आरोप था कि वह कुर्सी पर पैर रख कर बैठते हैं. गाली-गलौज करते हैं. उनके रहने से दफ़्तर का माहौल ख़राब हो रहा है. इस पूरे षडयंत्र में मैनेजर भी शामिल था.

आनंद भारती इतने मायूस हो गए थे कि उन्हें फोन की घंटी भी दहला देती थी. सड़क पर चलने से भी वह डरने लगे थे. एक शून्य में चले गए थे वह. उनके मित्र दो साल अहमदाबाद में रहने के बाद भी ज़्यादा नहीं थे. दो-चार अख़बारी मित्र थे. उनमें से ही एक पत्रकार मित्र की पत्नी ने उनको ढांढस बंधाया. उन्हें लेकर वह साइकेटिक के यहां गईं. साइकेटिक को उन्होंने बताया, डाक्टर साहब, आनंद जी काल्पनिक भय से परेशान हैं. हर चीज़ उन्हें डरा रही है. साइकेटिक ने आनंद से भी बात की. सुझाव दिया, आप लोगों से मिलें-जुलें. कोई नहीं बोलता है तो भी पहल कर उसे स्माइल दें. बात की शुरुआत करें. अपने में बंद न रहें. तरह-तरह के नुस्खे उन्होंने बताए.

उन्हें अंदर-अंदर लग रहा था कि हिंदू ब्रिगेड उन पर फिर हमला करेगी. अब तक अपने साथ हुए सारे हमलों और परेशानी की जानकारी वह अपने संपादक को दे चुके थे. संपादक ने अंततः उन्हें दिल्ली वापस बुलाने का फरमान दे दिया. वैसे भी गुजरात अब समाचारों की दुनिया से बाहर होने वाला था.

ट्रांसफर की ख़बर सुनते ही भयग्रस्त और लंबी थकान महसूस कर रहे आनंद भारती की सारी बीमारी काफूर हो गई. उनमें ऐसी चमक दिखी कि मानो उनके साथ कुछ हुआ ही न हो. आनन-फानन में उन्होंने पैकर और मूवर को बुक किया और सामान लदवाकर ट्रक अहमदाबाद से रवाना करवा दिया. ख़ुद अपनी गाड़ी लेकर दिल्ली की ओर चल पड़े. अहमदाबाद जैसे-जैसे छूट रहा था, उन्हें एक ख़ास तरह की ख़ुशी मिल रही थी. दंगों में मारे गए और राहत शिविरों में रह रहे लोग उनकी स्मृतियों के बीच से गुजर रहे थे. शिविरों में आते-जाते कई पीड़ितों से उनके संबंध हो गए थे. शिविर चलाने वाले भी उनके दोस्त बन चुके थे. सबसे विदा लेकर वह वहां से चले थे. ख़ुशी के बावजूद इन सबको छोड़कर जाने का दु:ख भी उन्हें अंदर-अंदर सता रहा था.

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