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पाठशाला में कोटा कितना कारगर होगा

पाठशाला में कोटा कितना कारगर होगा

देश में छह वर्ष से चौदह साल की आयु के हर बच्चे को अनिवार्य और निःशुल्क शिक्षा का अधिकार देने वाले क़ानून राइट टू एजुकेशन को उच्चतम न्यायालय ने अपनी मंज़ूरी दे दी है. न्यायादेश के मुताबिक़, अब देश के सरकारी स्कूल और निजी स्कूलों में शिक्षा का अधिकार क़ानून लागू हो गया है. हालांकि मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाड़िया, न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन और स्वतंत्र कुमार की अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि यह क़ानून सरकार से वित्तीय सहायता नहीं ले रहे अल्पसंख्यक स्कूलों और कुछ बोर्डिंग स्कूलों पर लागू नहीं होगा.

देश भर में कई बाल श्रमिकों के लिए स्कूल खोले गए, लेकिन यहां बच्चे नदारद हैं. इन स्कूलों में शिक्षकों के चयन से लेकर स्कूल के इंफ्रास्ट्रक्चर तक सभी सवालों के घेरे में हैं. यहां बेशक सरकारी धन खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन असल मक़सद पूरा होता नहीं दिख रहा है. माननीय उच्चतम न्यायालय ने जो आदेश पारित किया है, उसके मुताबिक़ निजी विद्यालयों में अब ग़रीब बच्चों के लिए 25 फीसदी सीटें आरक्षित होंगी. हालांकि निजी स्कूल प्रबंधन अभी भी इस फैसले को पूरी तरह पचा नहीं पा रहे हैं.

वैसे तो देश के बच्चों को आठवीं कक्षा तक मुफ्त एवं ज़रूरी शिक्षा का क़ानूनी अधिकार प्राप्त हुए दो साल पूरे हो चुके हैं. वर्ष 2010 के अप्रैल महीने में प्रधानमंत्री ने शिक्षा अधिकार क़ानून-2009 लागू होने की घोषणा की थी. इस क़ानून में कुछ ऐसे कार्यों का ज़िक्र था, जिन्हें तीन साल की अवधि में पूरा करना था. हालांकि इसकी मियाद खत्म होने में महज़ एक वर्ष ही बचा है, लेकिन सरकार की तैयारियों का अवलोकन करें, तो अभी भी इस दिशा में बहुत कुछ करने की आवश्यकता है. आंकड़ों के मुताबिक़, इस व़क्तदेश के विद्यालयों में तक़रीबन छह लाख शिक्षकों की कमी है. इसी तरह विद्यालयों में आधारभूत ढांचे और बुनियादी सुविधाओं की घोर कमी देखी जा रही है, मसलन आज भी देश के विद्यालयों में भवन, स्वच्छ पेयजल की सुविधाएं, शौचालय, पुस्तकालय और खेल के मैदान आदि की कमी है, जिसे इसी एक साल की अवधि में पूरा करना है, लेकिन सरकारी तैयारियां ऐसी नहीं हैं कि उसे सही समय पर पूरा किया जा सके. ग़ौरतलब है कि इस क़ानून को अमल में लाने और इस पर नज़र बनाए रखने का ज़िम्मा राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और प्रदेश स्तर पर राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग पर है, लेकिन अ़फसोस की बात है कि अभी तक केवल चौदह राज्यों में ही ऐसे आयोग बने हैं. विगत दो वर्षों में राष्ट्रीय आयोग के पास देश भर से इस क़ानून के उल्लंघन की क़रीब अढ़ाई हज़ार शिकायतें आई हैं. बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों ने भारत सरकार से इस क़ानून को मज़बूती से लागू करने के लिए अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराने की मांग की है. उल्लेखनीय है कि इस योजना में फिलहाल 65 फीसदी सहयोग केंद्र सरकार दे रही है, जबकि 35 फीसदी हिस्सा राज्य सरकारों को देना होता है. हालांकि राज्य सरकारें चाहती हैं कि केंद्र सरकार अपने अनुदान की राशि में इज़ा़फा करे. लेकिन हक़ीक़त यह भी है कि स़िर्फ धनराशि बढ़ाकर सौ फीसदी लक्ष्य पूरा नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसके लिए केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर ईमानदार पहल नहीं करेंगी. जैसा कि ज्ञात है, शिक्षा का अधिकार क़ानून लागू होने के बाद यह तय हुआ था कि श्रम विभाग ने होटलों, चाय दुकानों, गैराज और काऱखानों में काम करने वाले बाल मज़दूरों को मुक्त कराकर उन्हें विद्यालय में नामांकन के लिए पहल करेगा, लेकिन हक़ीक़त में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. देश भर में कई बाल श्रमिकों के लिए स्कूल खोले गए, लेकिन यहां बच्चे नदारद हैं. इन स्कूलों में शिक्षकों के चयन से लेकर स्कूल के इंफ्रास्ट्रक्चर तक सभी सवालों के घेरे में हैं. यहां बेशक सरकारी धन खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन असल मक़सद पूरा होता नहीं दिख रहा है. माननीय उच्चतम न्यायालय ने जो आदेश पारित किया है, उसके मुताबिक़ निजी विद्यालयों में अब ग़रीब बच्चों के लिए 25 फीसदी सीटें आरक्षित होंगी. हालांकि निजी स्कूल प्रबंधन अभी भी इस फैसले को पूरी तरह पचा नहीं पा रहे हैं. यही वजह है कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में पुनर्विचार करने की मांग की है. ज्ञात हो कि सरकार ने इस क़ानून को वर्ष 2009 में ही लागू कर दिया था, लेकिन निजी स्कूलों ने इसके खिला़फ याचिका दायर करके कहा था कि यह धारा 19 (1) के तहत क़ानून निजी शिक्षण संस्थानों के अधिकारों का उल्लंघन करता है. उनकी दलील थी कि धारा 19 (1) निजी संस्थानों को बिना किसी सरकारी द़खल के अपना प्रबंधन करने की स्वायत्तता देता है. वहीं केंद्र सरकार का इस मसले पर तर्क था कि यह क़ानून सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों की उन्नति में सहायक है. वैसे देखा जाए तो बच्चों को अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा के लिए बने क़ानून के समक्ष का़फी चुनौतियां हैं. इसे लेकर खुद सरकार पसोपेश में दिख रही है. उच्चतम न्यायालय ने तो ग़ैर सरकारी एवं सरकार से मदद न लेने वाले विद्यालयों में भी ग़रीब बच्चों के लिए 25 फीसदी दाखिले की राह आसान कर दी है, लेकिन निजी स्कूलों ने उसके खिला़फ पुनः याचिका दाखिल करने का भी मन बना लिया है. ऐसा माना जा रहा है कि निजी स्कूल संचालक उक्त फैसले में पूर्व के निर्णय को आधार बना सकते हैं, जिन्होंने उनके पक्ष में फैसला दिया था. वैसे देखा जाए तो शिक्षा का अधिकार क़ानून में अभी भी कई पेंच हैं. मिसाल के तौर पर प्राथमिक स्तर पर एक शिक्षक पर 30 बच्चों को पढ़ाने का दायित्व आदर्श स्थिति मानी जाती है, लेकिन दो साल बीत जाने के बाद भी देश के नौ फीसदी स्कूल महज़ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं. क़ानूनी प्रावधान के अनुसार, योग्य और प्रशिक्षित शिक्षकों की बहाली होनी चाहिए, लेकिन 20 प्रतिशत शिक्षक इस कसौटी पर खरा नहीं उतरते. क़ानून के अनुसार, कोई बच्चा अनुत्तीर्ण नहीं किया जाएगा. हालांकि स्कूलों के सामने इस चुनौती के अलावा बीच में पढ़ाई छोड़ने की भी स्थिति बरक़रार है. क्योंकि लगभग सात प्रतिशत बच्चे अब भी बीच में पढ़ाई छोड़ देते हैं. शिक्षा का अधिकार क़ानून लागू होने के बाद सवा पांच लाख अतिरिक्त शिक्षकों की ज़रूरत है. वहीं दूसरी तऱफ प्रारंभिक शिक्षा में कार्यरत कुल शिक्षकों में से 7.74 लाख योग्य एवं प्रशिक्षित ही नहीं हैं, जबकि 5.23 लाख शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं. राज्यों की उदासीनता का आलम यह है कि अभी तक स़िर्फ 29 राज्यों में पढ़ाई के  लिए न्यूनतम दिवस तय किए हैं. कुल मिलाकर देखा जाए तो, सरकार ने अपनी ज़िम्मेदारी दूसरों पर डाल दी है. इसमें कोई शक नहीं कि इससे शैक्षणिक अराजकता और बढ़ेगी, क्योंकि जो अमीर हैं वे ही ग़रीबी का प्रमाण पत्र लेकर आएंगे और सीटें भर देंगे. इस हालत में जिन बच्चों के लिए यह क़ानून बनाया गया है, उनकी भागीदारी कुछ प्रतिशत में ही सिमट कर रह जाएगी. सरकार जो सोचती और करती है, उसमें का़फी अंतर है. उसने पूर्व में भी कई योजनाएं बनाईं, लेकिन दूरदर्शिता के अभाव में वे नाकाम साबित हुईं. अगर सही समय पर और सही तरीक़े से वे लागू होती तो नतीजे आज बहुत अलग होते. ग़रीबों के लिए क़ानून एक बात है और उस क़ानून तक ग़रीब की पहुंच दूसरी बात. आज जिस तरह देश में निजी स्कूल कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं, उसके लिए सरकार पूरी तरह ज़िम्मेदार है. पिछले बीस वर्षों में देश में शिक्षा एक व्यवसाय बन गया है, लेकिन सरकार को इस बात इल्म ही नहीं. एक ज़माने में शिक्षकों को गुरुदेव जैसे आदरसूचक शब्दों का इस्तेमाल होता था, लेकिन अब स्कूलों में ज्ञान बांटने वाले शिक्षक नहीं, बल्कि शिक्षा का कारोबार करने वाले शिक्षा माफिया माननीय बन गए हैं. प्राथमिक स्कूलों की बात तो दूर की बात आज देश में प्राइवेट यूनिवर्सिटी की फसल भी लहलहा रही है, जिसमें खाद-पानी डालने का काम हमारी सरकारों ने ही किया है. ऐसे संस्थानों में ग़रीब छात्रों का शोषण ही होगा, क्योंकि ये तमाम शिक्षण संस्थान बने ही हैं धन उगाही करने के लिए. राजधानी दिल्ली के आवासीय कॉलोनी मसलन वसंत विहार, वसंत कुंज, ग्रेटर कैलाश, डिफेंस कॉलोनी और साकेत में जो स्कूल हैं, वहां पर कहने को ग़रीब बच्चों का दाखिला हो रहा है, लेकिन इन स्कूलों में जिन तथाकथित बच्चों का एडमिशन हो रहा है, वे किसी भी लिहाज़ से ग़रीब नहीं हैं. उनके अभिभावकों को ग़रीबी का प्रमाण पत्र कैसे मिल जाता है, यह भी एक बड़ा सवाल है. सरकार को यह भी जांच करनी चाहिए कि क्या वाक़ई वैसे स्कूलों में पढ़ रहे बच्चे ग़रीब हैं या ग़रीब बच्चों के नाम पर वही अमीर लोग हक़मारी कर रहे हैं, जो अन्य दूसरी योजनाओं में भी लूट मचा रहे हैं. अगर किसी योजना और क़ानून को लागू करने से पहले सरकार उनकी राह में रोड़े अटकाने वाली बाधाओं को दूर करेगी, तभी उसका लक्ष्य पूरा होगा, वरना ऐसी कोशिशें असफल प्रयास ही मानी जाएंगी.

शिक्षा का अधिकार एक नज़र

  • राइट टू एजुकेशन बिल कैबिनेट द्वारा 2 जुलाई, 2009 को स्वीकृत किया गया.
  • राज्यसभा ने इस विधेयक को 20 जुलाई, 2009 को पारित किया.
  • लोकसभा ने इस विधेयक को 4 अगस्त, 2009 को पारित किया.
  • 26 जुलाई, 2009 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली.
  • 27 अगस्त, 2009 को भारत सरकार के राजपत्र में प्रकाशित किया गया.
  • 1 अप्रैल, 2010 से इसे लागू कर दिया गया.

शिक्षा का अधिकार और बाधाएं

  • सरकारी स्कूलों में इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी
  • सवा पांच लाख अतिरिक्त शिक्षकों की ज़रूरत होगी
  • प्रशिक्षित शिक्षकों की घोर कमी
  • स़िर्फ 29 राज्यों ने पढ़ाई के लिए न्यूनतम दिवस तय किए हैं
  • ग़रीबों को चिन्हित करना एक बड़ी चुनौती

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