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राहुल गांधी और उत्तर प्रदेश : मिशन-2012 दूर की कौड़ी
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राहुल गांधी और उत्तर प्रदेश : मिशन-2012 दूर की कौड़ी

उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी ने दिग्विजय सिंह, रीता बहुगुणा जोशी और प्रमोद तिवारी को फ्रंट लाइन के योद्धा के तौर पर नियुक्त किया, जबकि प्रदीप जैन, आरपीएन सिंह एवं जतिन प्रसाद जैसे युवाओं को उन्हें बैकअप देने का काम सौंपा गया. बेनी प्रसाद वर्मा, सलमान खुर्शीद, राजीव शुक्ला एवं श्रीप्रकाश जायसवाल जैसे अनुभवी कांग्रेसियों को रणनीति बनाने और सबके बीच समन्वय बनाए रखने की ज़िम्मेदारी दी गई. राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में जीत पक्की करने की गरज से का़फी पहले से ही जुगत शुरू कर दी थी. उन्होंने जाति आधारित मैप तैयार किया और उस पर सरकार से अमल भी कराया. केंद्रीय कैबिनेट में फेरबदल करके बेनी प्रसाद वर्मा को राज्यमंत्री से केंद्रीय मंत्री बनाया गया. सलमान खुर्शीद को क़ानून मंत्री जैसा अहम पद देना और राजीव शुक्ला को मंत्री बनाना मिशन-2012 की ही कवायद थी, लेकिन राहुल की सारी ज़द्दोजहद कोई रंग लाती नहीं दिख रही. पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव में जो मारामारी हुई थी, बिल्कुल वही कहानी उत्तर प्रदेश में दोहराई जा रही है. राहुल गांधी लगातार पूरी स्थिति पर नियंत्रण रखने की कोशिश में जुटे हैं, बावजूद इसके टिकट बंटवारे से लेकर चुनावी सभावों तक यह गुटबंदी साफ़-साफ़ दिख रही है.

राहुल गांधी के अपने लोग ही उत्तर प्रदेश में उनका खेल खराब करने में लगे हैं. कांग्रेस के कुछ पुराने दिग्गज राहुल गांधी से नाराज़ हैं. वज़ह है राहुल गांधी द्वारा बेनी प्रसाद वर्मा, पी एल पुनिया और राजबब्बर को उनके मुक़ाबले ज़्यादा महत्व दिया जाना. उत्तर प्रदेश में पिछले साल से ही कांग्रेस के पक्ष में चुनावी फिज़ा तैयार करने में लगे ये पुराने कांग्रेसी नेता पिछड़ों के टिकट बंटवारे में बेनी प्रसाद वर्मा को मिल रही अहमियत से चिढ़ गए हैं. कांग्रेसी विपक्षी पार्टियों से जूझने के बजाय आपस में ही असली कांग्रेसी बनाम बाहरी का मुद्दा लेकर सिर-फुटौव्वल कर रहे हैं, जो राहुल गांधी के हसीन सपने यानी मिशन-2012 के लिए घातक साबित हो रहा है.

कभी मायावती के खासम़खास रहे पी एल पुनिया ने अंदर ही अंदर अपनी ही पार्टी के बेनी प्रसाद वर्मा के खिला़फ मोर्चा खोल दिया है. पुनिया के हिमायती इस शिग़ूफे को ज़ोर-शोर से हवा में उछाल रहे हैं कि बेनी प्रसाद वर्मा समाजवादी पार्टी के एजेंट हैं और वह कांग्रेस का नुकसान करने की नीयत से ही इसमें शामिल हुए हैं. इस ज़हर बयानी के नतीजे कांग्रेस की सेहत के लिए कितने विपरीत जा रहे हैं, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब फूलपुर की चुनावी सभा में राहुल गांधी ने बेनी प्रसाद वर्मा को अपने बगल में बैठाया तो इससे तिलमिलाए पुनिया समर्थक राहुल गांधी की मौजूदगी में ही वर्मा के समर्थकों से भिड़ गए. दूसरी तरफ टिकट बंटवारे के मसले पर ही उत्तर प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी और प्रदेश के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी ने एक-दूसरे के खिला़फ तलवारें खींच रखी हैं. इन दोनों नेताओं को कार्यकर्ताओं के सामने भी एक-दूसरे पर चीखने-चिल्लाने से कोई परहेज़ नहीं है. रीता बहुगुणा जोशी और प्रमोद तिवारी के दो गुट बन चुके हैं और दोनों गुट पार्टी की बैठकों में एक-दूसरे पर सरेआम पैसे लेकर टिकट बेचने का इलज़ाम लगाने से नहीं चूकते. अब तो प्रमोद तिवारी के समर्थक उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी के बराबर कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बनाने की मांग करने लगे हैं. इसके लिए वे कांग्रेस के कुछ चुनिंदा बड़े नेताओं से लगातार संपर्क में भी हैं.

युवा कांग्रेस भी फूट का अड्डा बन गई है, जिसका बड़ा कारण रहा उसका लोकतांत्रिक ढंग से कराया गया चुनाव. उत्तर प्रदेश को विभिन्न ज़ोनों में बांटकर चुनाव कराए गए, जिनमें कई पदाधिकारी चुनकर आए. यही चुनाव संगठन के लिए कड़वाहट भरे हो गए. चुनाव में हारे हुए सदस्यों ने जीते हुए पदाधिकारियों का साथ देना बंद कर दिया. युवा कांग्रेस में भयंकर गुटबाज़ी शुरू हो गई. आज आलम यह है कि एक गुट का व्यक्ति दूसरे गुट के व्यक्ति से बात तक नहीं करता. सहज सोचा जा सकता है कि जब राहुल गांधी के सपनों को साकार करने वाली यूथ कांग्रेस ही इस क़दर बिखरी हुई है तो वह आमजनों-मतदाताओं को कांग्रेस से क्या खाक जोड़ पाएगी.

दूसरी तरफ 16 साल तक कांग्रेस के व़फादार रहे सभासद राजेंद्र सिंह गप्पू, जो अपनी दावेदारी वाली कैंट विधानसभा सीट से कर रहे थे, उसे रीता बहुगुणा जोशी द्वारा हड़प लिए जाने से नाराज़ होकर समाजवादी पार्टी का दामन थाम चुके हैं. उनका अभियान भी राहुल के चुनावी नाद को धूमिल कर रहा है. राजेंद्र सिंह गप्पू की नाराज़गी पहली सूची जारी होने के बाद ही सामने आ गई थी, पर उस वक़्त राहुल ने इस मसले को तवज्जो नहीं दी, जो अब उनके लिए भारी साबित हो रहा है. उधर राजबब्बर को मीडिया अभियान का ज़िम्मा दिए जाने से भी पार्टी के अंदर नाराज़गी है. कुल मिलाकर प्रदेश कांग्रेस के अंदर चल रही इस खींचतान का नतीजा पार्टी को ज़मीनी स्तर पर भुगतना पड़ रहा है. राहुल गांधी की छात्र राजनीति को बल देने और युवाओं को राजनीति की मुख्य धारा से जोड़ने वाली कवायद भी प्रदेश में नाकाम हो चुकी है. युवक कांग्रेस में ज़बरदस्त दरार पड़ चुकी है. हालांकि कांग्रेस की युवा ब्रिगेड, यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई के बीच पहले से मनमुटाव चल रहा था, पर अब यह नाराज़गी खुलकर सामने आने लगी है और उन्हें राहुल गांधी का भी कोई लिहाज़ नहीं रहा. यही वज़ह है कि जब प्रदेश कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता सुबोध श्रीवास्तव का टिकट कांग्रेस ने काट दिया तो लखनऊ के अमौसी हवाई अड्डे पर यूथ कांग्रेस के सदस्यों ने राहुल गांधी की गाड़ी रोककर बड़े ही तल्ख़ अंदाज़ में अपना विरोध दर्ज कराया. सुबोध लखनऊ के मध्य विधानसभा क्षेत्र से टिकट चाहते थे, लेकिन तीसरी सूची में भी उनका नाम नहीं आया और उनकी जगह हाल में बसपा से आए फाकिर सिद्दीक़ी को टिकट दे दिया गया. इसी बात से नाराज़ होकर उन्होंने पार्टी के सभी पदों से इस्ती़फा दे दिया. अब सुबोध के समर्थक जो कांग्रेस के कार्यकर्ता हुआ करते थे, उन्होंने कांग्रेस के खिला़फ कमान संभाल ली है.

कभी मायावती के खासम़खास रहे पी एल पुनिया ने अंदर ही अंदर अपनी ही पार्टी के बेनी प्रसाद वर्मा के खिला़फ मोर्चा खोल दिया है. पुनिया के हिमायती इस शिगूफे को ज़ोर-शोर से हवा में उछाल रहे हैं कि बेनी प्रसाद वर्मा समाजवादी पार्टी के एजेंट हैं और वह कांग्रेस का नुक़सान करने की नीयत से ही इसमें शामिल हुए हैं. इस ज़हर बयानी के  नतीजे कांग्रेस की सेहत के लिए कितने विपरीत जा रहे हैं, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब फूलपुर की चुनावी सभा में राहुल गांधी ने बेनी प्रसाद वर्मा को अपने बगल में बैठाया तो इससे तिलमिलाए पुनिया समर्थक राहुल गांधी की मौजूदगी में ही वर्मा के समर्थकों से भिड़ गए.

युवा कांग्रेस भी फूट का अड्डा बन गई है, जिसका बड़ा कारण रहा उसका लोकतांत्रिक ढंग से कराया गया चुनाव. उत्तर प्रदेश को विभिन्न जोनों में बांटकर चुनाव कराए गए, जिनमें कई पदाधिकारी चुनकर आए. यही चुनाव संगठन के लिए कड़वाहट भरे हो गए. चुनाव में हारे हुए सदस्यों ने जीते हुए पदाधिकारियों का साथ देना बंद कर दिया. युवा कांग्रेस में भयंकर गुटबाजी शुरू हो गई. आज आलम यह है कि एक गुट का व्यक्ति दूसरे गुट के व्यक्ति से बात तक नहीं करता. सहज सोचा जा सकता है कि जब राहुल गांधी के सपनों को साकार करने वाली यूथ कांग्रेस ही इस क़दर बिखरी हुई है तो वह आमजनों-मतदाताओं को कांग्रेस से क्या खाक जोड़ पाएगी. यही हाल एनएसयूआई का है. मज़े की बात तो यह है कि यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई में हो रही गुटबाज़ी का फायदा समाजवादी युवजन सभा और समाजवादी छात्रसभा जमकर उठाने लगी हैं. वे कांग्रेस से नाराज़ कार्यकर्ताओं का रु़ख अपनी ओर करने में सफल भी हो रही हैं. नतीजतन, हो यह रहा है कि यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई कांग्रेस की मज़बूती के बजाय अगले चुनाव में अपने-अपने प्रत्याशियों को लड़ाने की तैयारी में लग गए हैं. कांग्रेस नेताओं के इन आपसी झगड़ों और गुटबाज़ियों से चुनावी तैयारियां प्रभावित हो रही हैं. बिहार में नेताओं की इसी गुटबाज़ी ने कांग्रेस को मिट्टी में मिला दिया, जहां उसे विधानसभा की 243 सीटों में से स़िर्फ चार सीटें मिल पाईं.

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वैसे तो यह चुनाव चारों मुख्य पार्टियों के लिए महत्वपूर्ण है, पर कांग्रेस के लिए यह खास मायने इसलिए रखता है, क्योंकि यहां राहुल गांधी की निजी प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है. लोकसभा चुनाव में कुछ बेहतर प्रदर्शन के बाद से राहुल का उत्तर प्रदेश का मिशन-2012 शुरू हो गया था, जिसका लक्ष्य उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनवाना था. 2012 आने के साथ अब शायद ही कोई कांग्रेसी यह सोच रहा हो कि पार्टी अपने बूते सरकार बना सकेगी. लिहाज़ा अब मिशन-2012 का मक़सद ज़्यादा से ज़्यादा वहां की सरकार के गठन में अपनी भूमिका निभाना और सम्मानजनक संख्या में विधानसभा सीटें पाना हो सकता है. लेकिन, प्रदेश में पार्टी के जो अंदरूनी हालात हैं, उनमें ऐसा होना भी मुमकिन नहीं दिख रहा. उत्तर प्रदेश में कमान संभालने वाले सभी कांग्रेसी वरिष्ठ हैं और सबकी अपनी दमित इच्छाएं भी हैं. राहुल गांधी की मुश्किल यह है कि वह न तो पार्टी नेताओं की ख्वाहिशों पर लगाम लगा पा रहे हैं और न अपने आक्रामक-मुखर तेवरों से विपक्षी पार्टियों पर करीने से धावा बोल पा रहे हैं. अब तो कांग्रेस के युवराज के पास इतना भी वक़्त नहीं है कि वह डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश करें, लिहाज़ा उनके लिए मिशन-2012 अब दूर की कौड़ी नज़र आ रहा है.

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