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रक्षक से भक्षक बन गई यूपी पुलिस
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रक्षक से भक्षक बन गई यूपी पुलिस

यूपी में दलित उत्पीड़न के मामले सबसे ज़्यादा-सत्या बहन, सदस्य राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग. इलाहाबाद में चलती कार में युवती से सामूहिक दुष्कर्म. लखनऊ में बसपा पार्षद ने अभियंताओं पर तानी रिवॉल्वर. आढ़ती की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या. मेरठ में क्रिकेटर सहित दो की हत्या. पुलिस की अवैध वसूली के चक्कर में जीप पलटी, 12 घायल. बिजनौर में सिपाही और दारोगा ने एक दूसरे पर तानी बंदूक. बुलंदशहर के बर्खास्त सिपाही ने लूटे थे ठेकेदार से 13.5 लाख.

चौंकिए नहीं, यह खबरों के शीर्षक हैं, जो पिछले दिनों अखबारों के पन्नों पर प्रमुखता से दिखाई दिए. इन्हें देखकर आपके मन में भी एक सवाल उभर सकता है कि ऐसा सब कुछ हो रहा है तो शासन में बैठे आला अधिकारी आखिर क्या कर रहे हैं? राजधानी लखनऊ में लापरवाही के आरोप में 42 पुलिसकर्मियों का निलंबित किया जाना कहीं न कहीं हमें डराता है और यह सोचने पर मजबूर करता है कि सूबे की पुलिस आखिर किस दिशा में जा रही है. पुलिस की पिटाई से लखीमपुर में एक दलित की मौत हो जाती है तो दोषी पुलिसकर्मियों के विरुद्ध तुरंत कार्यवाही कर दी जाती है, लेकिन शामली में महिलाओं के साथ अपनी मर्यादा लांघने वाले पुलिस अधिकारियों के मामले में चुप्पी कहीं न कहीं प्रदेश शासन पर सवालिया निशान लगाती है. जिन कंधों पर समाज की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, आज वे ही दमन चक्र चलाने को बेचैन हैं. इससे जहां एक ओर यूपी पुलिस का आंतरिक ढांचा कमजोर हो रहा है, वहीं दूसरी ओर वह जनता का विश्वास भी खोती जा रही है.

हरदोई जनपद की बघौली पुलिस ने मात्र आठ वर्ष के बच्चे जगन्नाथ पुत्र रज्जू पर गुंडा एक्ट लगा दिया. आगरा पुलिस ने मासूम इस्माइल को 36 घंटे तक बंधक बनाकर उसे मारा पीटा. कानपुर में जेके कॉटन मिल और एलएमएल के चार मज़दूरों पर रासुका लगा दी गई. इसी तरह जेपी चुनार सीमेंट फैक्ट्री प्रबंधन के विरुद्ध प्रदर्शन कर रहे लोगों को दबाने के लिए पुलिस ने 23 कर्मचारियों पर रासुका लगा दी. लेकिन कमज़ोर नागरिकों पर अपनी बहादुरी दिखाने वाली यूपी पुलिस का दूसरा पहलू यह है कि उसके चार सौ जवान एक डाकू से तीन दिनों तक लोहा नहीं ले सके. पुलिस का असली चेहरा तो जेल के रिकॉर्ड में दज़र्र् है. यहां की विभिन्न जेलों में बंद हैं 375 पुलिस वाले. अपराधियों के दामन पर ख़ून की छीटें दिखें तो बात समझ में आती है, लेकिन यह हालत अगर खाकी वर्दी की हो तो स्थिति का अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं. प्रदेश भर में पुलिसिया तांडव बेध़डक जारी है. थाने बिक रहे हैं. यह कथन किसी ऐरे गैरे का नहीं है, बल्कि खुद यह आरोप सूबे की मुख्यमंत्री मायावती ने सार्वजनिक तौर पर यूपी पुलिस पर लगाया है. सच भी यही है कि गरीबों, किसानों और जरूरतमंद लोगों की कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है. अपराध बेतहाशा बढ़ रहे हैं.

हरदोई के 65 वर्षीय मूलचंद की कहानी यूपी पुलिस के चेहरे को बेनकाब करने के लिए काफी है. मूलचंद ने बताया कि भाई श्यामचरण उर्फ बल्ला, उसकी पत्नी और पुत्र 40 वर्षों से मेरी सेवा करते आ रहे हैं. मैं 65 साल का वृद्ध हूं. न जाने कब मेरी मृत्यु हो जाए, यह सोचकर मैं अपनी जायदाद छोटे भाई श्यामचरण के नाम लिखाने तहसील संडीला गया. मैं अपना बयान सब रजिस्ट्रार को दर्ज़ कराने जा ही रहा था कि इतने में गांव के हींगा मुल्ला, विक्रम, रमेश, जनाका और दिलदार आदि आ गए. वे लोग मुझे मारपीट कर अपने साथ उठा ले गए. हंगामा होने की खबर पाकर मौके पर आई चौकी संडीला की पुलिस हींगा और बल्ला को थाने ले गई. थाने में पहले समझौते की कोशिश चलती रही, उसमें नाकाम रहने पर पुलिस ने हींगा और बल्ला का चालान कर परगनाधिकारी संडीला की अदालत में भेज दिया, ताकि मैं अपनी जमीन जायदाद छोटे भाई के नाम न कर सकूं. मवाना (मेरठ)में सठला-ततीना मार्ग पर मिले तीन शवों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने पुलिस के दावों की कलई खोल दी. पुलिस ने दंपत्ति और बालिका का शव मिलने के बाद उनकी मौत की वजह सड़क हादसा बताते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया था, मगर पोस्टमार्टम रिपोर्ट में तीनों की हत्या किए जाने की पुष्टि हो गई है. पुलिस अधिकारी अब हत्याकांड के जल्द ख़ुलासे का दम भर रहे हैं. अति संवेदनशील इस क्षेत्र में तीन शव मिलने से पुलिस अधिकारियों के होश फाख्ता हो गए थे. आईजी ज्ञानसिंह सहित अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मवाना की तरफ दौड़ पड़े थे. फिर भी पुलिस इसे महज एक सड़क दुर्घटना बताकर अपना पल्ला झा़ड रही थी.

भूटान के चिरांग गोसलिग निवासी प्रताप सिंह के सबसे छोटे पुत्र यम बहादुर के साथ मथुरा पुलिस ने ऐसा सलूक किया कि लोगों की रूह कांप उठे. जयपुर स्थित मिशनरी कॉलेज से निकाले जाने के बाद यम बहादुर भटकता हुआ मथुरा पहुंच गया. यहां चोरों ने उसका बैग और पहनने के कपड़े चोरी कर लिए. मात्र अंडरवियर पहने इस युवक को पुलिस बदमाश समझ कर पकड़ ले गई. चार दिनों तक मथुरा कोतवाली में पुलिस ने उसे बुरी तरह पीटा. यम बहादुर नग्नावस्था में वहां बैठा रहा. किसी ने उसे पहनने के लिए कप़डे का एक टुक़डा तक नहीं दिया. यम बहादुर ने बताया कि वह बदमाश नहीं है, उसका सामान चोरी हो गया है. बाद में मीडिया की कोशिशों से उसके परिजनों तक सूचना पहुंचाई जा सकी. घरवाले अपने बच्चे की यह हालत देखकर दंग रह गए. बड़ौत रेलवे स्टेशन पर पहले टिकट लेने के लिए हुए विवाद में पुलिसकर्मी और जीआरपी जवान आपस में भिड़ गए. जीआरपी ने पुलिसकर्मियों की पिटाई कर उन्हें हवालात में डाल दिया. बाद में जनता ने ही पुलिसकर्मियों को छुड़ाने के लिए रेलवे थाने का घेराव किया.

पुलिस के विरुद्ध बनारस में व्यापारियों द्वारा चलाए गए अनूठे आंदोलन ने बता दिया है कि उत्तर प्रदेश पुलिस किस राह पर चल रही है. शहरों के चौराहे और तिराहे बेचती पुलिस वसूली के बाक़ायदा एंट्री पास भी जारी करती है, ताकि एक बार शुल्क चुकाने के बाद किसी को शिकायत न रहे. अंबेडकर नगर में गाएं पकड़ कर कसाई को सौंपने के मामले में तीन सिपाही निलंबित हो चुके हैं. महोबा में नशेबाज सिपाहियों ने एक पत्रकार को ही पीट दिया. गाज़ियाबाद में संतराम, फैज़ाबाद में रोहित और लखीमपुर में एक अन्य दलित पर कहर बरपाने वाली पुलिस के कारनामे अनंत हैं. प्रदेश कांगे्रस के महामंत्री भानु सहाय कहते हैं कि पुलिस में परिवर्तन की पहल आज की सबसे ब़डी जरूरत है. कुछ वर्ष पहले वाराणसी में एक डिप्टी एसपी शैलेंद्र सिंह ने मा़फियाओं से पुलिस की मिलीभगत का आरोप लगाते हुए अपने पद से इस्ती़फा दे दिया था. विभाग की कलई खोलने वाले इस पुलिस अधिकारी को राजधानी में देर रात उसके घर के दरवाज़े तोड़कर पकड़ा गया. उसके कपड़े तक फाड़ दिए गए.  भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता हृदय नारायण दीक्षित कहते हैं कि अंग्रेजी राज्य के बूढ़े पुलिस ढांचे पर भारत की आंतरिक सुरक्षा का दारोमदार है. कांग्रेस के प्रवक्ता सुबोध श्रीवास्तव का कहना है कि क्षेत्रीय दलों के कारण राजनीतिक दबाव की जो नीति राजनेताओं ने प्रदेश में पिछले 20 वर्षों में बनाई, उसी के चलते अपराधी मस्त और जनता त्रस्त है. इंडियन जस्टिस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. उदितराज कहते हैं कि पुलिस और ब्यूरोक्रेसी को जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए, लेकिन वह अपने स्वार्थ के चलते सत्ता की चेरी बन जाती है. जब तक देश में पुलिस की कार्यप्रणाली पर नज़र रखने वाला एक स्वतंत्र आयोग नहीं बनता, तब तक नागरिक अधिकार इसी तरह रौंदे जाते रहेंगे.

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