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सार-संक्षेप: पूर्व कुलपति के खिला़फ अदालत में चालान
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सार-संक्षेप: पूर्व कुलपति के खिला़फ अदालत में चालान

प्रदेश में भ्रष्टाचार की अपसंस्कृति ने शिक्षा के क्षेत्र को भी बुरी तरह प्रभावित किया है. नकलची कुलपति के नाम से बदनाम रहे डॉ. कमलाकर सिंह पर हाल ही में राज्य सरकार के आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो ने एक मामले में धोखा-धड़ी, जालसाजी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत विशेष सत्र न्यायालय में चालान पेश किया है. यह मामला तब का है, जब डॉ. कमलाकर सिंह भोज मुक्त विश्वविद्यालय भोपाल के कुलपति थे. उनके कार्यकाल में विश्वविद्यालय का भवन का निर्माण किया जाना था और इसके लिए सरकार की ओर से 25 करोड़ रुपए की राशि स्वीकृत भी की गई थी. कुलपति डॉ. सिंह ने भवन निर्माण और परिसर के विकास कार्य के लिए एक प्रबंधक बोर्ड का गठन किया, जिसके अध्यक्ष वे स्वयं बने. इसके बाद इस बोर्ड ने अलग से भवन समिति का गठन किया और इसके अध्यक्ष भी कुलपति ही बनाये गये. इस समिति में अधीक्षण यंत्री केसी जैन, राजेश मुखरैया, डॉ. साधना सिंह, संजय मिश्रा व डॉ. एसबी गोस्वामी सदस्य थे. उक्त निर्माण कार्य निविदा के माध्यम से कराने का निर्णय लिया गया था. समिति ने 4 मई 2005 को छह फार्मों को अनुबंध के योग्य माना था. उसके बाद 24 मार्च 2006 को निविदा जमा करने के लिए पत्र भेजा था. उसके बाद तीन फर्मों ने टेंडर फॉर्म ़खरीदे थे, इनमें से मेसर्स जीएमसी प्रोजेक्ट, मेसर्स स्काई लाइन इंजीनियरिंग व मेसर्स बीएस अग्रवाल शामिल थे. एक फर्म का टेंडर प्राप्त होने की वजह से कमेटी ने उसे निरस्त कर नए सिरे से टेंडर बुलाए थे. मेसर्स एनबीसीसी नई दिल्ली, मेसर्स स्काई लाइन इंजीनियरिंग व मेसर्स बीएस अग्रवाल द्वारा 31 मई 2006 को फाइनेंशियल बिड जमा की गई थी. इसने निविदा दर अंकित नहीं की थी पर अंतिम तिथि के निविदा दरें फैक्स के माध्यम से भेजी थी, जिसे कमेटी ने रिकॉर्ड में शामिल कर लिया था, जिसे पंकज राय ने निविदा में शामिल कूटरचित दस्तावेज तैयार किया. मेसर्स एनबीसीसी नई दिल्ली से सांठ-गांठ और धोखाधड़ी कर उक्त कार्य का ठेका 24.8 करोड़ रुपए में मेसर्स बीएस अग्रवाल को दिया था, जो ठेका दिया गया था, उसमें से बाहर निर्माण कार्य में से चार महत्वपूर्ण निर्माण हटा दिए थे. इनमें ऑडोटोरियम का निर्माण, छात्र-छात्राओं के हॉस्टल का निर्माण शामिल है. यह काम भी कमेटी ने मनमाने तरीके से किया था. एनबीसीसी द्वारा प्रस्तुत निविदा दर 33.29 करोड़ की 24.9 करोड़ रुपए कर 25 करोड़ रुपए के अंदर किया गया. सकल निविदा निर्माण हेतु निर्धारित 25 करोड़ की सीमा के अंदर हो जाए. विवेचना में पाया गया कि प्रबंध बोर्ड व बिल्डिंग समिति के अध्यक्ष व सदस्यों ने फर्म एनबीसीसी व बीएस अग्रवाल एवं स्थानीय ठेकेदार प्रकाश बाधवानी व कॉर्नर प्वाइंट से आपराधिक षड़यंत्र रच कर अपने पदों का दुरुपयोग किया. कमेटी के नियमों का उल्लंघन कर उक्त निर्माण कार्य में भारी भ्रष्टाचार किया. आरोप सिद्ध होने के बाद ईओडब्लू ने कमलाकर सिंह व तत्कालीन इंजीनियर पंकज राय के खिला़फ अदालत में चालान पेश किया है. सूत्रों के अनुसार छह लोगों के खिला़फ चालान अभी पेश नही किया गया. उधर डॉ. कमलाकर सिंह व पंकज राय ने एफआईआर निरस्त करने के लिए हाईकोर्ट में याचिका लगाई है, जिस पर बहस चल रही है. जल्द ही इस मामले में निर्णय होने की संभावना है. एफआईआर निरस्त करने की याचिका में भारत सरकार की कंपनी से कम राशि में काम कराने द्वारा जस्टिस बांधवा तथा सीटीई द्वारा जांच में क्लीन चिट दिए जाने का उल्लेख किया गया है. साथ ही इस मामले के सभी काग़ज़ भी लगाए गए हैं.

सिपाही ने नक्सली को खून देकर बचाया

छत्तीसगढ़ में जहां नक्सली, पुलिस जवानों के खून के प्यासे हैं और हर कदम पर उनके लिए मौत बिछा रखी है, वहीं राज्य पुलिस के एक सिपाही ने घायल इनामी नक्सली को खून देकर उसकी जान बचाई है. छत्तीसगढ़ के सरगुजा में नक्सलियों ने पुलिस दल पर धावा बोला और पुलिस की जवाबी कार्रवाई में एक इनामी नक्सली घायल हो गया, लेकिन पुलिस ने उसका इलाज करवाया और ज़रूरत पड़ने पर उसे खून भी दिया. पुलिस अधीक्षक एनकेएस ठाकुर के अनुसार 7 मई को हमें सूचना मिली कि एक स्थान पर काफी नक्सली मौजूद हैं और वे किसी बड़ी घटना को अंजाम देने जा रहे हैं. सूचना पर पुलिस दल पहुंचा तो नक्सलियों ने हमला बोल दिया, पुलिस की जवाबी कार्रवाई में बाकी नक्सली तो भाग गए, लेकिन दस हज़ार रुपए के इनामी चंद्रिका यादव को घायल छोड़ गए. पुलिस उसे अस्पताल लाई और इलाज कराया. इलाज के दौरान डॉक्टरों ने ओ पॉजीटिव खून की मांग की, लेकिन तत्काल व्यवस्था नहीं होने पर सिपाही वीरेंद्र सिंह ने चंद्रिका को खून दिया. अब चंद्रिका की हालत खतरे से बाहर है.

सहायक नदियां नर्मदा के लिए खतरा बनीं

मध्य प्रदेश की जीवन रेखा कही जाने वाली पवित्र नर्मदा नदी की अनेक सहायक नदियां अब नर्मदा को प्रदूषित और गंदा कर रही हैं. सहायक नदियों के कम होते जलस्तर और बढ़ते प्रदूषण के कारण नर्मदा का जल प्रदूषित हो रहा है. विशेषज्ञ भी चिंतित हैं कि आ़िखर  क्या किया जाए? नर्मदा की सात सहायक नदियां उसके वेग और जलस्तर में बढ़ोतरी करती हैं. अब इन सहायक नदियों का बढ़ता प्रदूषण व भारी कटाव नर्मदा नदी के लिए खतरा बन गया है. नर्मदा कॉलेज के प्रोफेसर और वरिष्ठ खोजकर्ता ओएन चौबे के मुताबिक़ नर्मदा की सबसे बड़ी सहायक नदियों में से एक तवा नदी में सारनी थर्मल पावर हाउस की राख व अन्य रासायनिक कचरा मिलता है. तवा में मौजूद राख व अन्य रासायनिक कचरा नर्मदा में मिल रहा है. इस कारण नर्मदा और तवा दोनों का ही जलस्तर कम हो रहा है. चौबे बताते हैं कि सहायक नदियों में बढ़ते प्रदूषण से अधिकांश नदियां सूखने की कगार पर हैं, जिससे जल स्तर में गिरावट आई है. लगातार जंगलों को सा़फ कर उसमें खेती की संभावनाएं तलाश करना भी एक कारण है, जिसके चलते भूमि का कटाव ज़्यादा हो रहा है. बरसात के समय लाखों मैट्रिक टन मिट्‌टी सहायक नदियों के ज़रिए नर्मदा में मिल रही है. जिले में गंगाजल, हथेड़, तवा, पलकमति, मारू, दुधि सहित अन्य नदियां अत्यधिक प्रदूषित है. प्रदूषण के कारण कैल्शियम, मैग्निशियम जल में भारी धातु का प्रतिशत बढ़ा रही है, जो जल के लिए हानिकारक है. विशेषज्ञों के मुताबिक़ नर्मदा को प्रदूषण मुक्त रखने के प्रयासों के अलावा ज़रूरी है कि नर्मदा की सहायक नदियों के लिए भी प्रयास किए जाए. जंगल की कटाई को रोकने के लिए अभियान चलाया जाए. नर्मदा की सहायक नदियों के लिए लगभग तीन करोड़ रूपए का मास्टर प्लान तैयार किया गया है, लेकिन इस प्लान को शुरू करने में काफी वक़्त लगेगा. ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब तक प्लान शुरू नहीं हो जाता, तब तक नदियों का संरक्षण कैसे संभव हो सकेगा.

सरकारी अस्पतालों में नर्सें नहीं हैं

मध्य प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में नर्सों के 15 हज़ार पद खाली पड़े हैं, लेकिन इन खाली पदों को भरने की सरकार को कोई चिंता नहीं है. वैसे अभी अस्पतालों में लगभग 40 हज़ार नर्सें कार्यरत हैं, लेकिन मरीज़ों की बढ़ती संख्या को देखते हुए नर्सों की यह संख्या कम है. मेडीकल कॉसिंल ऑफ इंडिया के नियमों के अनुसार प्रति पांच मरीज़ों पर एक नर्स होनी चाहिए, लेकिन अस्पतालों में स्थिति इसके विपरीत है. कई अस्पतालों में रात्रि में तो एक नर्स को 25 मरीज़ों की देखभाल करनी होती है और यदि गंभीर केस आ गया, तो डॉक्टरों की सहायता भी करनी होती है. राज्य शासन ने स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग में ब्रम्हास्वरूप की सिफारिश लागू कर दी है, लेकिन चिकित्सा शिक्षा विभाग से संबद्ध अस्पतालों में समिति की सिफारिश लागू नहीं की गई है, इससे इन अस्पतालों में कार्यरत नर्सों को पुराने वेतनमान पर ही वेतन मिल रहा है. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में नर्सों की हालत ज़्यादा खराब रहती है. 24 घंटों की सेवा देने वाले सीएसई में मात्र तीन या चार नर्सें ही होती हैं. इसमें एक-दो नर्सों ने अवकाश ले लिया, तो अन्य बची नर्सों को बारह-बारह घंटे की ड्‌यूटी करनी पड़ती है. इसके साथ ही डिलीवरी, एक्सीडेंट जैसे मामलों में उलझे रहने के कारण इनकी मनोस्थिति बिगड़ी रहती है.

इंजीनियरिंग कॉलेज बने शिक्षा की दुकान

पिछले एक दशक में निजी क्षेत्र में सैकड़ों की संख्या में इंजीनियरिंग कॉलेज खुले हैं, लेकिन इन कॉलेजों में शिक्षा की गुणवत्ता पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया जाता है. यहां केवल मोटी फीस वसूल कर ज़्यादा से ज़्यादा छात्रों को इंजीनियरिंग की डिग्री देने का ही काम किया जाता है. एक तरह से ये कॉलेज इंजीनियरिंग शिक्षा की दुकान बनकर रह गए हैं, लेकिन इन कॉलेजों में अच्छी शिक्षा के लिए न तो कोई आधारभूत ढांचा हैं और न ही अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा सुविधाएं हैं. योग्य शिक्षकों की भी भारी कमी है, क्योंकि इंजीनियरिंग में स्नातकोत्तर और पीएचडी उपाधि प्राप्त योग्य शिक्षक ज़्यादा वेतन मांगते हैं और अधिक वेतन पर शिक्षक रखना आर्थिक रूप से इन कॉलेज के लिए बोझ लगता है, इसलिए स्नातक अर्थात बीई या बीटेक उपाधि प्राप्त शिक्षकों से ही इन कॉलेज में पढ़ाई का काम कराया जाता है. वे भी ऐसे शिक्षक होते हैं, जिन्हें किसी कारण से अधिक वेतन की नौकरी नहीं मिल पाती है. इन स्नातक शिक्षकों का मासिक वेतन 12 से 18 हज़ार रूपए तक ही होता है और इन्हें छह घंटे शिक्षण के अलावा कॉलेज के दूसरे काम भी करने होते हैं. अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद ने इंजीनियरिंग कॉलेजों में शिक्षकों की न्यूनतम योग्यता एमई या एमटेक उपाधि कर रखी है, लेकिन मध्य प्रदेश के 185 निजी इंजीनियरिंग कॉलेज में लगभग 20 हज़ार शिक्षक बीई या बीटेक उपाधि प्राप्त ही हैं. कुछ सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों में भी पार्ट टाईम शिक्षक के रूप में स्नातक इंजीनियरों को नौकरी दी गई है. मध्य प्रदेश तकनीकी कॉलेज संगठन ने हाल ही में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल से मुलाकात कर उन्हें राज्य में तकनीकी शिक्षा की स्थिति के बारे में बताया है, लेकिन लगता है कि राज्य के 185 निजी तकनीकी कॉलेज की मान्यता अब खतरे में पड़ गई है, इनमें लगभग दो लाख 50 हज़ार छात्र शिक्षा पा रहे हैं. पता चला है कि तकनीकी कॉलेज संगठन की ओर से राज्य सरकार को यह दलील दी गई है कि एमई और एमटेक शिक्षकों की भर्ती दो-तीन महिनों में नहीं हो सकती, क्योंकि इतनी ज़्यादा संख्या में स्नातकोत्तर इंजीनियर उपलब्ध ही नहीं हैं. इसलिए इन निजी कॉलेज की मान्यता बचाई जाए और अगले एक-दो वर्ष का उन्हें समय दिया जाए ताकि वे योग्य शिक्षकों की भर्ती कर सकें.

राशन घोटाला उजागर हुआ

प्रदेश में ग़रीबों को सस्ते दाम पर वितरित किए जाने वाले राशन में भारी घोटाला होता है, इस बारे में लगातार शिकायत मिलने के बाद राज्य सरकार की नींद खुली है और हाल ही में खाद्य विभाग द्वारा कटनी, होशंगाबाद और शाजापुर ज़िलों में राशन की दुकानों की जांच करने से पता चला कि ग़रीबों को दिए जाने वाले राशन का एक बड़ा हिस्सा व्यापारियों की गोदामों में पहुंच रहा है. प्राप्त जानकारी के अनुसार यह राशन घोटाला, राशन की दुकान के मालिकों, अनाज व्यापारियों और सरकार के खाद्य विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से किया जा रहा है. ज़िला कलेक्टरों ने अवैध राशन वितरण के मामले में स्वयं पकड़े हैं. इससे सा़फ हो गया है कि केवल तीन ज़िले नहीं, बल्कि पूरे राज्य में ज़बरदस्त अनाज घोटाला चल रहा है. प्राप्त जानकारी के अनुसार खाद्य संचालनालय द्वारा कटनी, होशंगाबाद और शाजापुर में अवैध खाद्य वितरण करने के मामले में संबंधित अधिकारियों से वसूली की कार्रवाई की जा रही है. कटनी में बग़ैर राशन कार्ड के अनुमान के आधार पर ज़िला खाद्य अधिकारी द्वारा राशन की दुकानों को खाद्यान्न का आवंटन किया जा रहा था. जब प्रकरण की जांच की गई तो पता चला कि संबंधित ज़िला अधिकारी और अन्य अधिकारियों की मिली भगत से लगभग एक करोड़ 72 लाख रूपए की चपत लगाई गई है. इस मामले में खाद्य संचालनालय ने कटनी ज़िला कलेक्टर को इस अनियमितता के लिए दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय करने को कहा है, लेकिन छह माह हो जाने के बाद भी इस संबंध में ज़िला कलेक्टर कटनी के द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई. इसी तरह से शाजापुर में भी ज़िला खाद्य अधिकारी द्वारा भी राशन कार्ड से अधिक खाद्य का आवंटन संबंधित राशन की दुकानों को कर दिया गया, इससे राज्य शासन को तीन लाख रुपए की चपत लग गई है. हाल ही में होशंगाबाद में भी एक ऐसा ही प्रकरण सामने आया है, जिसमें कनिष्ठ खाद्य आपूर्ति अधिकारी ने 62400 का केरोसीन और 18200 रुपए का खाद्यान्न का अधिक आवंटन कर दिया. इस मामले पर तुरंत कार्रवाई करते हुए ज़िला कलेक्टर होशंगाबाद ने संबंधित कनिष्ठ आपूर्ति अधिकारी कादंबिनी धकाते को निलंबित कर दिया. खाद्य संचालनालय द्वारा तीनों ज़िले के संबंधित अधिकारियों से वसूली करने के नोटिस जारी किए जा चुके हैं.

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