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स्‍कूलों में बच्‍चों की सुरक्षा का सवाल
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स्‍कूलों में बच्‍चों की सुरक्षा का सवाल

हाल में उड़ीसा विधानसभा में एक ऐसे मुद्दे को लेकर गहमागहमी बढ़ गई, जिसका सीधा संबंध ग़रीब आदिवासियों की बेबसी और लाचारी की आड़ में उनके शोषण से जुड़ा था. राज्य सरकार द्वारा संचालित जनजातीय विद्यालय, जो ग़रीब एवं पिछड़े आदिवासी छात्रों को शिक्षा का उजाला दिखाने के लिए खोले गए थे, उनके उत्पीड़न का केंद्र बन गए. नवरंगपुर ज़िले के सेवाश्रम आवासीय स्कूल की एक अध्यापिका ने जब स्कूल के पुरुष अध्यापकों द्वारा लड़कियों के साथ बलात्कार एवं उत्पीड़न की सूचना पुलिस को दी तो मामला प्रकाश में आया. इसके बाद स्कूल के प्रिंसिपल ए के साहू और एक अन्य अध्यापक ईश्वर को लड़कियों के साथ बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. बलात्कार पीड़ित दो लड़कियां गर्भवती हैं. बाद में तीन अन्य अध्यापकों को भी हिरासत में ले लिया गया. अपनी परंपराओं से बंधा जनजातीय समाज अब शायद ही इन लड़कियों को स्वीकार करेगा. यदि ऐसा हुआ तो पीड़ित लड़कियों को बहिष्कृत जीवन जीने के लिए बाध्य होना पड़ेगा. इस आशंका के मद्देनजर उड़ीसा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ने इन लड़कियों के लिए शिक्षा और रोज़गार की व्यवस्था करने की मांग की है. लड़कियों के प्रत्येक छात्रावास में महिला वार्डन रखने की मांग भी की गई. राज्य का हर राजनीतिक दल तमाम मतभेदों के बावज़ूद आज इस मुद्दे पर एक साथ खड़ा नज़र आता है. इसी तरह एक मामला केरल के मल्लापुरम ज़िले का है, जिसमें ऑर्थोडॉक्स चर्च द्वारा संचालित हॉस्टल के पादरी को एक नाबालिग लड़की के यौन उत्पीड़न के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. मार्च के पहले सप्ताह में फादर के जी जोसेफ उर्फ फादर हबीब जोसेफ को केरल की एक स्थानीय अदालत में पेश किया गया, जहां उसे जमानत मिल गई. पादरी पर आईपीसी की धारा 354 के तहत किसी महिला के शीलहरण के प्रयास के आरोप लगाए गए थे. पीड़ित लड़की चर्च द्वारा चलाए जा रहे कैथोलिक हायर सेकेंडरी स्कूल की छात्रा है. इस मामले को ध्यान में रखकर अब पुलिस गत वर्ष अक्टूबर में लड़की की बड़ी बहन की कथित तौर पर खाद्य संक्रमण से हॉस्टल में हुई मौत की जांच में जुट गई है, जिसके कुछ दिनों बाद ही नौवीं कक्षा की एक छात्रा ने पादरी पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था.

गत वर्ष जब नेशनल चाइल्ड राइट्‌स पैनल ने स्कूलों में बच्चों के उत्पीड़न से जुड़ी क़रीब 95 शिक़ायतें मिलने का खुलासा किया तो महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ ने भी इस बात पर सहमति जताई. राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के मुताबिक़, पिछले तीन वर्षों में स्कूली बच्चों के उत्पीड़न से जुड़े मामलों में तीन गुना तक वृद्धि हुई है. आखिर वजह क्या है और सरकार इस संदर्भ में खामोश क्यों है?

स्कूलों में बच्चों के उत्पीड़न की घटनाएं प्रतिवर्ष बढ़ रही हैं. यह बात महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ ने भी स्वीकार की है. पिछले साल नेशनल चाइल्ड राइट्‌स पैनल को स्कूलों में बच्चों के उत्पीड़न की 95 शिकायतें मिली थीं. राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के मुताबिक़, स्कूलों में बच्चों पर होने वाले अत्याचारों के दर्ज़ मामलों में बढ़ोत्तरी हो रही है. इनमें यौन शोषण, उत्पीड़न, अपमान, हत्या एवं शारीरिक दंड जैसे मामलों में गत तीन वर्षों में तीन गुना तक वृद्धि हुई है. 2007-08 में 34, 2008-09 में 68 और वर्ष 2009-10 में 21 राज्यों से इस तरह के 95 मामले सामने आए हैं. गत वर्ष पहले स्थान पर उत्तर प्रदेश था, जहां ऐसे 27 मामले सामने आए, जिनमें से 20 शारीरिक उत्पीड़न एवं एक मामला हत्या से जुड़ा था. वहीं तमिलनाडु में 12 और दिल्ली, मध्य प्रदेश एवं उड़ीसा में बच्चों से दुर्व्यवहार के 9-9 मामले सामने आए. राजस्थान, हरियाणा, बिहार एवं आंध्र प्रदेश में इस तरह के 4-4 मामले दर्ज़ किए गए थे. जानकारों की मानें तो ज़्यादातर डॉक्टरों, मनोवैज्ञानिकों, वकीलों, न्यायाधीशों एवं पुलिस अधिकारियों को यही नहीं पता होता कि इन मामलों से कैसे निपटा जाए, क्योंकि आमतौर पर यह उनकी ट्रेनिंग का हिस्सा नहीं होता. बच्चों के साथ स्कूलों में कई तरह के दुर्व्यवहार होते रहते हैं, जिससे उनमें शर्म या डर की भावना बैठ जाती है. शरीर के साथ हानिकारक या आक्रामक संसर्ग और ऐसी कोई बात या फिर व्यवहार, जो बच्चे को शारीरिक अथवा मानसिक आघात पहुंचाता हो, आदि को इस श्रेणी में रखा जा सकता है. पूरी दुनिया में बच्चों के साथ दुर्व्यवहार के ऐसे मामले बढ़ते जा रहे हैं. पहले तो उक्त मामले घर की चाहरदीवारी में अभिभावकों तक ही सीमित रहा करते थे, लेकिन अब शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले विद्यालय भी बच्चों के लिए भयावह साबित हो रहे हैं. इस संक्रमण ने गुरु-शिष्य परंपरा का देश कहे जाने वाले भारत की सामाजिक व्यवस्था को भी चुनौती दी है.

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स्कूलों में बच्चों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार के मामले उड़ीसा जैसे दूरदराज के जनजातीय इलाक़े तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि देश के अनेक गांवों, कस्बों एवं शहरों के स्कूलों में भी इस तरह के मामले सामने आ रहे हैं, जहां विद्यार्थियों को कभी अध्यापकों, कर्मचारियों या फिर उम्र में बड़े अन्य छात्रों के शोषण का शिकार बनना पड़ता है. स्कूलों में बच्चों के शोषण का यह सिलसिला राजधानी दिल्ली में भी अपने पैर जमा चुका है. हाल में दिल्ली के एक एमसीडी स्कूल में पांचवी कक्षा के बच्चे के साथ कुकृत्य की बात सामने आई है. गत वर्ष दिल्ली के मालवीय नगर इलाक़े में 5 वर्षीय बच्चे के साथ कुकृत्य का मामला हो या फिर बात उत्तर- पश्चिमी दिल्ली में 10 वर्षीय बच्चे के साथ स्कूल के कर्मचारियों द्वारा किए जाने वाले दुर्व्यवहार की हो, हर जगह मासूम बच्चों को बेखौफ शिकार बनाया जा रहा है. जुलाई 2008 में एमसीडी के ही एक स्कूल की चौथी कक्षा की छात्रा के साथ स्कूल परिसर में बलात्कार की बात सामने आई थी. तब एमसीडी ने स्कूल परिसरों में सुरक्षा का भरोसा दिलाया था, लेकिन हालिया घटनाएं स्कूलों, विशेषकर सरकारी स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े कर रही हैं. इससे पहले वर्ष 2007 में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने बच्चों के उत्पीड़न को लेकर देश भर में एक सर्वेक्षण कराया था, जिसमें चौंकाने वाले तथ्य सामने आए थे. इस सर्वेक्षण के अंतर्गत 13 राज्यों में 5 से 12 साल तक की उम्र के 12,247 और 12 वर्ष से अधिक उम्र के 2,324 बच्चों से बातचीत की गई थी. सर्वेक्षण रिपोर्ट के आधार पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर कई कदम उठाए जाने की बात कही जा रही थी, लेकिन अभी तक इस तरह के मामले न रुकने से वास्तविकता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. अध्ययन के मुताबिक़, प्रत्येक दो बच्चों में से एक को स्कूल में यौन शोषण का शिकार होना पड़ता है. चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें लड़कियों की अपेक्षा लड़कों की संख्या अधिक रहती है, जिसमें छेड़छाड़ से लेकर पोर्नोग्राफी के माध्यम से उकसाने और सेक्सुअल दुराचरण के मामले शामिल रहते हैं.

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कुछ समय पूर्व दिल्ली बाल संरक्षण आयोग के अध्यक्ष आमोद कंठ ने एक ऐसी रणनीति एवं संरचना इऱ्जाद करने की जरूरत पर ज़ोर दिया था, जहां बच्चे हिंसामुक्त एवं भयमुक्त वातावरण में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पा सकें. ऑल इंडिया प्राइमरी टीचर्स फेडरेशन के अध्यक्ष रामपाल बच्चों को दिए जाने वाले शारीरिक दंड को उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन मानते हैं. दिल्ली स्थित संस्था प्लान इंडिया ने भी इस मुद्दे पर स्कूल प्राधिकारियों, सरकारी निकायों एवं गैर सरकारी संगठनों के साथ परामर्श का आयोजन किया और सुरक्षित स्कूल परिसर से जुड़ी गाइड लाइंस के क्रियान्वयन की मांग सरकार से की थी. सबसे ज़्यादा ठेस अभिभावकों के उस भरोसे को पहुंचती है, जिसके चलते वे अध्यापकों एवं शैक्षिक संस्थानों पर विश्वास करके अपने बच्चों को वहां शिक्षा के लिए भेजते हैं.

भारत में बच्चों के साथ होने वाले दुराचार की बात को आमतौर पर गंभीरता से नहीं लिया जाता. शायद तभी पूर्व महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी ने कहा था कि बच्चों पर होने वाले अत्याचारों पर चुप रहकर हम इसे बढ़ावा देते हैं. लेकिन जो भी हो, यह एक कड़वी सच्चाई है. अनुशासनात्मक कार्रवाई के नाम पर अध्यापकों द्वारा कई बार तो ऐसे कृत्य किए जाते हैं, जिनकी वजह से न सिर्फ बच्चों के मानसिक स्तर पर प्रभाव पड़ता है, बल्कि उनमें हीन भावना घर कर जाती है. ताजा घटना मध्य प्रदेश के जनजातीय ज़िले बड़वानी की है, जहां एक क्रिश्चियन स्कूल में बच्चों को उत्पीड़ित करने की एक अनूठी घटना सामने आई है. इसमें कथित तौर पर बच्चों को चप्पलों की माला पहनाए जाने की बात कही जा रही है. भारत में चप्पलों की माला पहना कर सज़ा ऐसे व्यक्ति को दी जाती है, जिसने सामाजिक एवं नैतिक नियमों का उल्लंघन किया हो. लेकिन, मासूम बच्चों के मामले में क्या ऐसा सोचा जा सकता है? सेंट ऑगस्टाइन स्कूल से संबद्ध सिस्टर मेरी जॉन के मुताबिक़, अभिभावकों ने इस बारे में पुलिस में शिक़ायत दर्ज़ नहीं कराई. दूसरी ओर पुलिस का कहना है कि जब तक अभिभावक कोई शिकायत दर्ज़ नहीं कराते, हम कुछ नहीं कर सकते.

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स्कूलों में दुर्व्यवहार के दंश से पीड़ित बच्चों की कोई उम्र विशेष नहीं होती. यह किसी भी उम्र के बच्चे के साथ घटित हो सकता है, जिसके कारण उसे मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक पीड़ा झेलनी पड़ती है. कई बार तो नौबत बच्चे की मृत्यु तक पहुंच जाती है. हरियाणा में रुचिका गिरहोत्रा की मौत को बानगी के तौर पर देखा जा सकता है. डर और सामाजिक दबाव के कारण स्कूलों से विशेषकर लड़कियों की ड्रॉप आउट दर अधिक देखने को मिलती है. ग्रामीण स्कूलों में तो शौचालय की सुविधा तक नहीं होती, जिसके चलते छात्राओं को विशेष तौर पर दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. वर्ष 2007 की सर्वेक्षण रिपोर्ट के आधार पर ग्रामीण स्कूलों में आवश्यक जन सुविधाओं की बेहतरी की सिफरिश की गई थी, जिससे स्कूलों में लड़कियों की उपस्थिति एवं नामांकन को बढ़ाया जा सके. गांव के पांच किलोमीटर के दायरे में स्कूलों की स्थापना के अलावा बच्चों की उपस्थिति बढ़ाने के लिए ज़रूरी सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने की बात भी कही गई थी, लेकिन अभी इस दिशा में बहुत कुछ किया जाना बाकी है.

भारत में ऐसा कोई क़ानून नहीं है, जो हर दृष्टिकोण से बाल उत्पीड़न को रोकने में कारगर हो. हालांकि कुछ जानकार समस्या की जड़ क़ानूनों की अपेक्षा उन्हें क्रियान्वित करने वाली एजेंसियों के ढुलमुल रवैये को मानते हैं. बच्चों के यौन उत्पीड़न को ठीक से परिभाषित किए जाने की ज़रूरत है. किसी बच्चे द्वारा दूसरे बच्चे के साथ दुर्व्यवहार के मामले में क़ानून की स्थिति और भी अस्पष्ट हो जाती है. ऐसे मामलों में जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की भूमिका शुरू हो जाती है, जिसमें कई खामियां हैं.

दूसरी ओर राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो में बच्चों के उत्पीड़न से जुड़े स़िर्फ ऐसे मामले शामिल रहते हैं, जिनकी रिपोर्ट पुलिस में दर्ज़ कराई जाती है. लेकिन ऐसे मामलों की भरमार है, जो किसी कारणवश प्रकाश में नहीं आ पाते. पिछली सरकार ने बाल अपराध निरोधक बिल संसद में लाने की बात की थी. बच्चों की सुरक्षा पर बजट राशि 0.03 प्रतिशत में बढ़ोत्तरी और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा एकीकृत बाल सुरक्षा योजना शुरू करने की घोषणा की गई थी. इस तरह नीतियां बनाने की बातें तो बहुत होती हैं, लेकिन उन्हें अमलीजामा पहनाए जाने से पहले ही सारा उत्साह ठंडा हो जाता है.

1 comment

  • यह चिंता की बात है कि माता पिता अध्यापकों पर विशवास करके अपने बच्चों को स्कूल पढने के लिए भेजते है, जिससे उनका बच्चा कुछ सीख सके. लेकिन इन वहशी अध्यापकों एवं बेपरवाह स्कूल प्रबंधकों के साए में रहकर कुछ सीखने कि बात तो दूर बच्चों की सुरक्षा का प्रश्न भी खड़ा हो गया है. सर्कार को इसके खिलाफ सख्त कदम उठाने चाहिए, अन्यथा कहीं ऐसा न हो कि विद्यालय की संस्था से अभिभावकों का विश्वास ही उठ जाये.

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