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सेल्‍युलाइट के जमाने में रंगमंच का जलवा
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सेल्‍युलाइट के जमाने में रंगमंच का जलवा

मनोरंजन के क्षेत्र में नए आविष्कारों के बावज़ूद कई इलाक़े ऐसे हैं, जहां आज भी परंपरागत ग्रामीण माध्यमों की प्रासंगिकता बरकरार है. सेल्युलाइड तथा थ्रीडी फिल्मों के इस दौर में भी रंगमंच को कला के पुजारियों ने अभी तक जिंदा रखा हुआ है. पटना के बाढ़ अनुमंडल में पंडारक और अचुआरा, इन दो गांवों में नाटकों का मंचन किसी त्योहार से कम उल्लासजनक नहीं होता. पंडारक में तो रंगमंच का जलवा कुछ इस कदर था कि थिएटर की दुनिया के पितामह पृथ्वीराज कपूर भी यहां आने का लोभ संवरण नहीं कर पाए थे. 1956 में पंडारक आए पृथ्वीराज कपूर के साथ उनके पुत्र अभिनेता शशि कपूर और पृथ्वी आर्ट थिएटर के दर्जनों प्रमुख कलाकारों की मंडली वहां लगी थी. आज भी इस गांव में जब कभी भी नाटकों का मंचन होता है तो दिल्ली, कोलकाता, बंगलुरू, चेन्नई, हैदराबाद जैसे दूरदराज के शहरों में सरकारी सेवाओं में कार्यरत रहने वाले यहां के लोग अपने गांव आते हैं तथा नाटकों में भाग लेकर खुद को धन्य समझते हैं. पंडारक में नाटकों के मंचन का इतिहास नब्बे वर्ष पुराना है. रंगमंच परंपरा की शुरुआत का श्रेय जाता है, पंडारक के स्वतंत्रता सेनानियों को. 1920 के कांग्रेस सम्मेलन में भाग लेने गए स्वतंत्रता सेनानियों ने नाटकों के मंचन की आधारशिला रखी. चौधरी रामप्रसाद शर्मा की प्रेरणा से नुनूलाल बाबू, कृष्णनदंन शर्मा, जानकी नंदन सिंह तथा दिवाकर शर्मा सरीखे स्वतंत्रता सेनानियों ने रंगमंचीय परंपरा की शुरुआत की.

1956 में पंडारक आए पृथ्वीराज कपूर के साथ उनके पुत्र अभिनेता शशि कपूर और पृथ्वी आर्ट थिएटर के दर्जनों प्रमुख कलाकारों की मंडली वहां लगी थी. आज भी इस गांव में जब कभी भी नाटकों का मंचन होता है तो दिल्ली, कोलकाता, बंगलुरू, चेन्नई, हैदराबाद जैसे दूरदराज के शहरों में सरकारी सेवाओं में कार्यरत रहने वाले यहां के लोग अपने गांव आते हैं तथा नाटकों में भाग लेकर खुद को धन्य समझते हैं.

स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख केंद्र के रूप में चर्चित पंडारक के बारे में आकाशवाणी के पूर्व निदेशक श्री चतुर्भुज ने लिखा था कि बिहार में तीन जगहों पर नाटकों के मंचन का इतिहास पुराना है. ये जगह हैं जमशेदपुर, सोनपुर और पंडारक. पंडारक में रंगमंच परंपरा की शुरुआत का उद्देश्य था आजादी की लड़ाई के लिए युवाओं को प्रेरित करना. तीस के दशक में राष्ट्रकवि बेनीपुरी, पं. छविनाथ पांडेय तथा देवव्रत शास्त्री जैसे साहित्यकारों ने भी पंडारक के हिंदी नाटक समाज के सृजनात्मक नाटकीय मंचन की भरपूर प्रशंसा की थी. यही परंपरा बाढ़ के पश्चिम में स्थित अचुआरा गांव में आज भी कायम है. यहां 1956 मे नाटकों के मंचन की शुरुआत हुई.

अरुणोदय कला कुंज के पचपन वषों के इतिहास में लगातार नाटकों का मंचन किया जाता रहा है. संस्थापक बालमुकुंद शर्मा बताते हैं कि दाहौर निवासी रामसागर सिंह, लाला सिंह, राजेश्वर शर्मा, डा. चंद्रिका सिंह, रामपदारथ सिंह, चंद्रशेखर सिंह, रमेश सिंह, रामविलास सिंह, रामचंद्र सिंह, जनक सिंह, घीना सिंह, इजहार खां, शिवाजी शर्मा, रामबहादुर सिंह आदि ग्रामीणों ने नाटक मंचन परंपरा की शुरुआत की थी. नवीन सिंह और ललन शर्मा बताते हैं कि नाटकों के मंचन के दौरान पूरे इलाक़े से लोगों की भीड़ जुटती थी. इससे क्षेत्र में सांस्कृतिक प्रतिस्पर्द्धा की भावना भी पैदा होती थी. पीएमसीएच में चिकित्सक तथा नाट्‌यकर्मी डा. अरूण शर्मा और युवा रंगकर्मी श्रीनिवास हालांकि अब दर्शकों की कमी का रोना रोते हैं. वर्तमान निर्देशक तथा युवा नाट्‌यकर्मी हेमंत कुमार बताते हैं कि गांव में पहले धार्मिक नाटकों के मंचन किया जाता था, लेकिन कलाकारों ने सामाजिक नाटकों के मंचन की परंपरा की शुरुआत की. हेमंत हालांकि दुख प्रकट करते हुए कहते हैं कि रंगमंच की सशक्त परंपरा कायम रहने के बावजूद पूरे बाढ़ जनपद में एक भी रंगशाला का नहीं होना चिंताजनक है. सरकारी उदासीनता से व्यथित रंगकर्मियों में निराशा जरूर है, लेकिन अभी भी उनमें उम्मीद की एक किरण शेष है. रंगकर्मियों को उम्मीद है कि रंगकर्म जिंदा रहेगा, नाटक जारी रहेगा.

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