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सूखा देख सूखने लगे मंत्रियों के गले
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सूखा देख सूखने लगे मंत्रियों के गले

बुंदेलखंड को लेकर केंद्र और प्रदेश की सियासी जंग तेज़ हो गई है. सरकार को प्रदेश के 47 जिलों के बाद अंत में झांसी को भी सूखाग्रस्त घोषित करना ही पड़ा. पिछले 12 वर्षों से पड़ रहे सूखे के कारण यहां की जलवायु के साथ-साथ नदियां, तालाब सिकुड़ कर आधे रह गए हैं. अधिकतर तालाबों और खेती की ज़मीन पर दबंगों ने क़ब्ज़ा कर कालोनियां और फार्म हाउसों का निर्माण कर रखा है.

वर्ष 2006-07 में पड़े भयंकर सूखे के कारण बुंदेलखंड का 30 फीसदी किसान पलायन कर चुका है. उनके न रहने से कृषि उत्पादन में भी 40 फीसदी कमी आई है. इस साल भी अगर सूखे की स्थिति बनी रही, तो शहरी क्षेत्र के बेरोज़गार और कमज़ोर वर्ग के लोग पलायन करने पर मजबूर हो जाएंगे. वैसे भी पिछले वर्षों की अपेक्षा इस वर्ष जलस्तर 30 फीट नीचे खिसक गया है. नदी, तालाब, डैम और बांधों में भी स़िर्फ तीन से चार माह तक के लिए प्रयोग करने लायक जल बचा है. अगर यही स्थिति भू-जल और जल स्रोतों की बनी रही तो यहां की अर्थव्यवस्था पर काफी बुरा असर पड़ेगा. बुंदेलखंड के गंभीर सूखाग्रस्त क्षेत्रों पर नज़र डालें तो एक जून से 15 जुलाई तक चित्रकूट में 47.5 फीसदी, झांसी में 40.4, हमीरपुर में 65.4 और ललितपुर में 70.5 फीसदी बारिश हुई है, जबकि जुलाई तक 350 मिलमीटर बारिश होना आवश्यक था. ख़री़फ की फसल पूरी तरह ख़त्म हो चुकी है. सूखे के इन गंभीर हालातों के सामने आने के बाद अब केंद्र और प्रदेश सरकारों के मंत्रियों के गले सूखने लगे हैं. हाल ही में बुंदेलखंड के दो मंत्रियों ने यहां के ज़मीनी हालात का मुआयना किए बग़ैर झांसी में सूखे की स्थिति को साफ नकार दिया था. दावा यहां तक कर दिया कि जिले के सभी नदी-तालाबों मं भरपूर पानी है. उन्हें कहीं भी सूखा नज़र नहीं आ रहा था, जबकि यहां के हालात इन मंत्रियों के बयानों के विपरीत हैं. इसका सबूत प्रदेश सरकार ने झांसी को सूखाग्रस्त घोषित कर पेश भी कर दिया है. अब इन मंत्रियों के बयानों पर न तो अधिकारी ध्यान दे रहे हैं और न ही यहां की जनता. कांग्रेस ने प्रदेश सरकार के इन मंत्रियों को झूठा करार दिया है.

इस तरह की बयानबाज़ी के बीच फंसे बुंदेलखंड की हालत अब बद से बदतर होती जा रही है. जहां बुंदेलखंड से चुने गए केंद्रीय राज्य मंत्री प्रदीप जैन आदित्य के दावे सही हो रहे हैं, वहीं उनके दावों के ठीक विपरीत प्रदेश सरकार ने अपनी बयानबाज़ी ने यहां के विकास को ठप कर दिया है. अब पसोपेश में फंसे बुंदेलखंड के विकास के लिए जहां कांग्रेस ने अपना पासा फेंककर इसके समग्र विकास के लिए बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण का गठन कर 8000 करोड़ रुपये का विशेष पैकेज देने की मांग की है, वहीं प्रदेश सरकार की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न लगाकर मायावती के कुशल प्रशासन को नाकारा और भ्रष्ट घोषित किया है. राजनीति के चंगुल में जकड़ चुके बुंदेलखंड की ख़री़फ की फसल तो प्रदेश और केंद्र सरकार चाट गई. बाकी अर्ध वर्षांत में होने वाली बुआई के लिए किसान सरकारी सहायता की उम्मीद में मुंह खोले बैठा है. सरकारों की खींचतान की बेशर्माई अब इन्हीं किसानों को ख़ुद मौत के मुंंह में धकेल रहा है. देखना है कि कब केंद्र सरकार बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण की स्थापना करती है और वहीं प्रदेश सरकार की हिलती ज़मीन को देख मायावती कौन सा पैंतरा फेंकती हैं. अपनी सरकार की साख बचाने के लिए यह एक गंभीर मामला है, जो देश के सबसे अधिक विकासशील क्षेत्र बुंदेलखंड को बेरोज़गारी और वीरानी की और धकेल रहा है. वर्ष 2006 में गठित सामरा समिति की रिपोर्ट की जहां केंद्र सरकार दोबारा समीक्षा कर रही है, वहीं 8000 करोड़ रुपये के पैकेज से बनने वाले बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण की मांग का कब क्रियान्वयन होगा, इसका ज़िम्मा अब केंद्र सरकार के पाले में है.

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