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केन्द्रीय विशिष्ट वनाधिकार कानून : वन विभाग और पुलिस की मनमानी जारी
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केन्द्रीय विशिष्ट वनाधिकार कानून : वन विभाग और पुलिस की मनमानी जारी

उत्तर प्रदेश में वन विभाग एवं पुलिस-प्रशासन द्वारा वनाश्रित समाज पर लगातार हो रहे हमलों में बीते 22 अक्टूबर को एक नया अध्याय तब जुड़ गया, जब जनपद गोंडा की तहसील मनकापुर के वनक्षेत्र में बसे बुटाहनी टांगिया गांव में रहने वाले दलितों पर एसडीएम के नेतृत्व में जमकर लाठियां बरसाई गईं, जिसमें विशेष रूप से महिलाओं को निशाना बनाया गया. महिलाओं ने पलटवार कर कड़ा जवाब देते हुए पुलिस को उल्टे पांव लौटने को मजबूर कर दिया. इस शर्मनाक घटना को तब अंजाम दिया गया, जब केंद्र सरकार द्वारा 2006 में पारित किए गए अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत निवासी (वनाधिकारों को मान्यता) अधिनियम-2007 के तहत अधिकार पाने के लिए गांव में वनाधिकार क्षेत्रीय सम्मेलन हो रहा था. राज्य निगरानी समिति की अधिसूचित सदस्य रोमा और वन-जन श्रमजीवी मंच के सैकड़ों कार्यकर्ता वहां मौजूद थे. रोमा को केंद्र सरकार द्वारा देश में इस क़ानून के क्रियान्वयन की समीक्षा के लिए एन सी सक्सेना की अध्यक्षता में बनाई गई संयुक्त समीक्षा समिति में भी विशेषज्ञ सदस्य मनोनीत किया गया था. ज़िलाधिकारी गोंडा ने रोमा, गांव की महिलाओं एवं अन्य कई लोगों के खिला़फ रिपोर्ट दर्ज कराई है. रोमा द्वारा पूरे मामले की रिपोर्ट डिप्टी कैबिनेट सचिव नेतराम के माध्यम से उत्तर प्रदेश सरकार को दे दी गई है. इससे पहले भी बीते 13 अगस्त को यहां के खुशी राम सहित 5 लोगों को डिप्टी रेंजर की तहरीर पर पुलिस ने गिरफ्तार किया था.

वनाधिकार क़ानून का प्रचार, लोगों में जागरूकता पैदा करने, प्रशिक्षण शिविर एवं सम्मेलन आदि के आयोजन की ज़िम्मेदारी ज़िला प्रशासन की है, लेकिन ऐसा करने के बजाय प्रशासन द्वारा मीडिया में प्रचारित किया गया कि यह सम्मेलन जंगल में लगे पेड़ों को कटवाने के लिए किया गया था और टांगिया समुदाय के लोगों ने हज़ारों हेक्टेयर जंगल को रोमा के नेतृत्व में सा़फ करा दिया है. ज़िलाधिकारी ने अभी तक इन गांवों का दौरा तक नहीं किया है. वन विभाग द्वारा 2009 तक टांगिया परिवारों से उन्हीं के खेतों में पेड़ लगवाए गए. इस तरह पेड़ लगवाना ग़ैर क़ानूनी कार्य था, लेकिन इस बात की जांच ज़िला प्रशासन ने नहीं की. नतीजतन, लोग भूखों मरने लगे, क्योंकि खेतों में तो पेड़ लगवा दिए गए थे. मनरेगा के तहत बनाए गए जॉब कार्ड भी वन विभाग के अधिकारियों ने अपने पास रख लिए थे, वे इनकी मज़दूरी को फर्ज़ी ढंग से निकाल लेते थे.

वनाधिकार क़ानून का प्रचार, लोगों में जागरूकता पैदा करने, प्रशिक्षण शिविर एवं सम्मेलन आदि के आयोजन की ज़िम्मेदारी ज़िला प्रशासन की है, लेकिन ऐसा करने के बजाय प्रशासन द्वारा मीडिया में प्रचारित किया गया कि यह सम्मेलन जंगल में लगे पेड़ों को कटवाने के लिए किया गया था और टांगिया समुदाय के लोगों ने हज़ारों हेक्टेयर जंगल को रोमा के नेतृत्व में सा़फ करा दिया है. ज़िलाधिकारी ने अभी तक इन गांवों का दौरा तक नहीं किया है. वन विभाग द्वारा 2009 तक टांगिया परिवारों से उन्हीं के खेतों में पेड़ लगवाए गए. इस तरह पेड़ लगवाना ग़ैर क़ानूनी कार्य था, लेकिन इस बात की जांच ज़िला प्रशासन ने नहीं की. नतीजतन, लोग भूखों मरने लगे, क्योंकि खेतों में तो पेड़ लगवा दिए गए थे. मनरेगा के तहत बनाए गए जॉब कार्ड भी वन विभाग के अधिकारियों ने अपने पास रख लिए थे, वे इनकी मज़दूरी को फर्ज़ी ढंग से निकाल लेते थे. वन विभाग के डिप्टी रेंजर अछेवर यादव द्वारा 150 बीघा वन भूमि पर इन्हीं टांगिया काश्तकारों से खेती कराई जाती थी, जिसकी पूरी फसल रेंजर और उसके उच्चाधिकारियों के घर पहुंचती थी. 2006 में वनाधिकार क़ानून लागू हुआ, जिसके तहत टांगिया परिवारों को उनके अधिकार प्राप्त होने थे, लेकिन उन्हीं ज़मीनों पर वन विभाग ने 2009 तक पेड़ लगवाए, जिन पर टांगिया परिवारों ने वनाधिकार क़ानून के तहत दावे किए.

आए दिन इन टांगिया परिवारों को तरह-तरह से उत्पीड़ित किया जाता है. वनाधिकार क़ानून आने के बाद यह अन्याय टांगिया मज़दूरों से बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने अपनी भूमि पर लगे वन विभाग के व्यापारिक वृक्षों को उखाड़ फेंका. ऐसे कई सवाल हैं, जिनका जवाब वन विभाग और ज़िला प्रशासन को देना है. 1986 में रोक लगा दिए जाने के बावज़ूद वन विभाग ने 2009 तक टांगिया पद्धति से वृक्षारोपण क्यों कराया? टांगिया परिवारों को अपनें खेतों में लगे पेड़ काटने की क्यों ज़रूरत पड़ी? टांगिया परिवारों द्वारा ज़मीनों के हक़ के लिए वनाधिकार क़ानून के तहत दायर किए गए दावों का निस्तारण अभी तक क्यों नहीं किया गया? टांगिया परिवारों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय का ज़िक्र क़ानून की प्रस्तावना में है, फिर भी ज़िला प्रशासन द्वारा उनके ऊपर झूठे मुकदमे लादकर उन अन्यायों की पुनरावृति क्यों की गई?

देश भर में 1920 के बाद वन विभाग द्वारा वनों को आबाद करने के लिए बसाए गए क़रीब 6000 टांगिया गांवों के लोग आज़ाद भारत में भी सरकारी बर्बरता का शिकार हो रहे हैं. गोंडा ज़िले के जिस गांव बुटाहनी में यह हमला किया गया, उसे भी क़रीब 8 दशक पूर्व वन विभाग द्वारा यहां के जंगल को आबाद करने के लिए बसाया गया था, जिसे अंग्रेज अपने लालच के चलते बर्बाद कर चुके थे. यहां के वन क्षेत्र में उस समय ऐसे 5 गांव बसाए गए थे, जो आज भी बुटाहनी, अशरफाबाद, रामगढ़, मणीपुर और महेशपुर के रूप में मौज़ूद हैं और जिनका उल्लेख वन विभाग द्वारा हर दस वर्ष में तैयार किए जाने वाले दस्तावेजों एवं वर्किंग प्लान में मिलता है. बीते 21 मार्च को मुख्यमंत्री कार्यालय में हुई राज्य निगरानी समिति की बैठक में मुख्य सचिव द्वारा यह निर्णय लेकर वहां मौजूद तमाम जिलाधिकारियों को आदेश दिया गया था कि अगर किसी टांगिया गांव का किसी भी वर्किंग प्लान में उल्लेख पाया जाता है तो उसे तत्काल प्रभाव से वनाधिकार क़ानून के तहत नियमित किया जाए. गोंडा के इन पांचों टांगिया गांवों के लोगों द्वारा यहां दिखने वाला तमाम हरा-भरा जंगल आबाद किया गया, लेकिन देश आज़ाद होने के 64 साल बीत जाने के बाद आज तक उनकी देश का नागरिक होने की कोई पहचान तक नहीं है. उन्हें किसी जनगणना में भी शामिल नहीं किया गया. आज भी उनसे वन विभाग द्वारा बंधुआ मज़दूरी कराई जाती है और उनके हक़ की ज़मीनों पर उनसे खेती कराकर सारी फसल पर क़ब्ज़ा कर लिया जाता है. नाममात्र की ज़मीनें जो उनके पास मौज़ूद हैं, उन पर भी नियमों को ताक पर रखते हुए प्लांटेशन करा दिया जाता है. पूरे विश्व के पर्यावरण की रक्षा करने में अहम किरदार निभाने वाले इन टांगिया मज़दूरों के साथ हमेशा सौतेला व्यवहार किया गया. वन विभाग के आतंक का साया तो उनके सिर पर हमेशा बना रहता है. उत्तर प्रदेश के वन क्षेत्रों में ग़रीब दलित आदिवासी वर्गों की एक बड़ी संख्या है. अगर समय रहते सरकार निचले स्तर के अधिकारियों को दुरुस्त नहीं करती तो आने वाले चुनावों में उन्हें वनाश्रित समुदायों द्वारा दिया जाने वाला बड़ा झटका सहने के लिए तैयार रहना होगा. गोंडा की ताज़ा घटना इस बात का जीता-जागता उदाहरण है, जहां दलित आदिवासी और मुस्लिम सभी तबकों ने, खासकर महिलाओं ने वन विभाग, पुलिस और प्रशासन को उल्टे पांव दौड़ लगाने को मजबूर कर दिया. गोंडा में आएदिन जंगलों से लकड़ी चोरी होती है, जिसके पीछे वन विभाग और जिला प्रशासन की मिलीभगत रहती है.

वनाधिकार क़ानून और टांगिया वनग्राम

वनों में रहने वाले समुदायों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकार करते हुए केंद्रीय विशिष्ट वनाधिकार क़ानून-2006 संसद में पारित किया गया. क़ानून की धारा 2 (च) में टांगिया वनग्राम बस्ती का उल्लेख है और धारा 3 (ज) में वनग्रामों को राजस्व ग्राम में बदलने का भी प्रावधान है. धारा 3 (2) में वनों के अंदर बसे गांवों के विकास के लिए प्रावधान किए गए हैं, जिनमें सड़क, सामुदायिक विकास केंद्र, बिजली, विद्यालय, पेयजल, लघु सिंचाई, प्रशिक्षण केंद्र एवं टेलीफोन आदि सुविधाएं शामिल हैं. प्रति विकास कार्य एक हेक्टेयर वनभूमि उपलब्ध कराने का भी प्रावधान है और वह भी इस शर्त के साथ कि अगर प्रति हेक्टेयर जंगल यानी 75 वृक्षों को काटना पड़े तो भी वनभूमि उपलब्ध कराई जाएगी. राज्य सरकार द्वारा वनाधिकार क़ानून के क्रियान्वयन के लिए कई शासनादेश जारी किए गए हैं. 19 जून, 2008 को मुख्य सचिव द्वारा सभी ज़िलाधिकारियों को पत्र लिखा गया, 2 जून, 2009 को समाज कल्याण आयुक्त द्वारा टांगिया वनग्रामों के अधिकारों के निर्धारण के लिए शासनादेश जारी हुआ, बीती 21 फरवरी को राज्य निगरानी समिति की बैठक हुई और फिर 19 मार्च को मुख्य सचिव द्वारा पुन: आदेश जारी हुआ. गोरखपुर एवं महराजगंज में टांगिया वासियों को उनकी भूमि पर मालिकाना हक़ प्राप्त हो गए हैं, लेकिन सहारनपुर, खीरी और गोंडा में ज़िला प्रशासन द्वारा क़ानून और शासनादेशों की अनदेखी की जा रही है.

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