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कलम का सच्चा सिपाही
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कलम का सच्चा सिपाही

आलोक तोमर के निधन की ख़बर समूचे मीडिया जगत में जंगल में लगी आग की तरह फैल गई. एक पत्रकार साथी ने जैसे ही मुझे बताया कि कलम के सिपाही आलोक तोमर सदा के लिए सो गए तो मुझे सहसा विश्वास ही नहीं हुआ. तोमर ने हमेशा जनता की आवाज़ बनने के लिए कलम चलाई. मानवता के प्रबल पक्षधर तोमर ने जिस तरह सिख दंगा पीड़ितों का दर्द जनता तक पूरे साहस के साथ पहुंचाया, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता. लोगों ने इस सच्चाई को बहुत क़रीब से महसूस किया कि कलम के सिपाही अगर सो गए तो वतन के सिपाही वतन बेच देंगे. हिमालय के प्रति उनके प्रेम ने उन्हें हिम भूमि की ओर इतना खींचा कि रामगढ़ में एक टुकड़ा ज़मीन ख़रीद कर वह हिमपुत्र भी बन गए. सोनभद्र प्रेस क्लब के अध्यक्ष विजय चतुर्वेदी ने तोमर के व्यक्तित्व की चर्चा करते उन्हें एक महान कलमकार बताया. मिर्ज़ापुर के वरिष्ठ पत्रकार अरुण जायसवाल ने कहा कि तोमर जी के लेख अक्सर जनादेश सहित विभिन्न पोर्टलों पर पढ़ने को मिल जाते थे, जिन्हें पढ़कर प्रेरणा मिलती थी. अरुण को तो विश्वास नहीं हो रहा था कि आलोक तोमर अब हमारे बीच नहीं हैं. इस पर हमने दिल्ली में रहने वाले पत्रकार साथी विजय शुक्ला से फोन पर बात की. शुक्ला ने रुंधे कंठ से बीमारी से लेकर उनके सदा के लिए सो जाने तक की सूचना दे डाली. उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में एक शोक सभा हुई. श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के राष्ट्रीय पार्षद आर के शर्मा ने आलोक जी को सच्चा कलमकार बताते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की. प्रयाग के वरिष्ठ पत्रकार एवं भट्ट सत्ता के संपादक प्रभाकर भट्ट ने कहा कि आलोक जी नई पीढ़ी के पत्रकारों के लिए प्रेरणास्रोत थे. उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति स्वामी ब्रह्म स्वरूप ब्रह्मचारी ने आलोक तोमर को राष्ट्रीय पहचान वाला सच्चा कलमकार बताया.

 

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