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उत्तर प्रदेश : निज़ाम के साथ बदलेगा नौकरशाही का रंग
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उत्तर प्रदेश : निज़ाम के साथ बदलेगा नौकरशाही का रंग

समाजवाद के नए अवतार बनकर उभरे अखिलेश यादव की ताजपोशी हो गई है. जश्न का माहौल खत्म होने के बाद अब कुछ कर दिखाने की बारी है. यह बात मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से छिपी नहीं है. जनता उन्हें भले ही फूलों से लाद रही हो, लेकिन वह जानते हैं कि वह मुख्यमंत्री के रूप में कांटों का ताज पहन रहे हैं. लोगों ने अखिलेश सरकार से उम्मीदें कुछ ज़्यादा ही पाल रखी हैं. नई सरकार को जहां चुनाव में जनता से किए तमाम वादों को पूरा करना होगा, वहीं सरकारी मशीनरी के पेंच कसने की ज़िम्मेदारी भी उसके कंधे पर होगी. इसमें ऊपर से लेकर नीचे तक ऐसे कर्मचारी विराजमान हैं, जो जनता की सेवा करने की बजाय सेवा करवाने में ज़्यादा तवज्जो देते हैं, खासकर नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों से निपटना उनके लिए आसान नहीं होगा. इस बात को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि उन्हें इसी ब्यूरोक्रेसी और पुलिस अधिकारियों से काम चलाना होगा, जो लौट फेर कर विभिन्न सरकारों के इर्द-गिर्द बने रहते हैं. अखिलेश ने बदले की भावना से काम नहीं करने और ईमानदार अधिकारियों की तैनाती की बात कही ज़रूर है, लेकिन ईमानदार अधिकारी उन्हें चिराग़ लेकर तलाशने पर भी मिल जाएं तो बड़ी बात होगी. सपा सरकार बनते ही जिन अधिकारियों के नाम चर्चा में आ रहे है, उसमें से कई ऐसे हैं जिनके कारण मुलायम को 2002 में हार का सामना करना पड़ा था.

बदले हालात में अखिलेश यादव के सामने यूपी के नौकरशाहों की लगाम कसना सबसे बड़ी चुनौती होगी. यह बात विपक्षी ही नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर भी कही जा रही है. सपा राज आते ही कई बड़े नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों में अच्छे पद पाने की होड़ सी मच गई है. इसमें से कुछ नाम ऐसे हैं, जो समय के साथ पाला बदलने में माहिर हैं तो कई की निष्ठा किसी एक पार्टी से जुड़ी रहती है. महत्वपूर्ण पदों के लिए जो नाम चर्चा में है, उसमें वरिष्ठ आईएएस अधिकारी जावेद अंसारी, अनिल कुमार गुप्ता, अरुण कुमार मिश्रा, वीके शर्मा और आलोक रंजन में से कोई एक ब्यूरोक्रेट्‌स मुख्य सचिव की कुर्सी संभाल सकता है. ये वे नाम हैं, जो मुलायम सिंह के पिछले शासनकाल में विश्वासपात्र रह चुके हैं. मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव के लिए जावेद उस्मानी, शैलेश कृष्ण, कुमार अरविंद सिंह देव आदि के नामों की चर्चा है. जावेद उस्मानी 1978 बैच के आईएएस अधिकारी हैं, जो पिछले कई वर्षों से केंद्र में कई ज़िम्मेदार पदों पर काम कर चुके हैं. वह अभी कुछ दिनों पहले ही अमेरिका से लौटे हैं. उस्मानी न केवल एक ईमानदार माने जाते हैं, बल्कि उनकी कार्यप्रणाली और क्षमता के भी सभी प्रशंसक हैं. सपा शासन में उनका मुख्य सचिव बनना पार्टी के लिए हर प्रकार से उचित माना जा रहा है. 1978 बैंच के ही आलोक रंजन जो वर्तमान में कृषि उत्पादन आयुक्त के पद पर कार्यरत हैं, को भी जावेद उस्मानी के इनकार करने पर मुख्य सचिव की बागडोर सौंपे जाने की प्रबल संभावना है. आलोक रंजन की छवि भी स्वच्छ और निर्विवाद है. अरुण कुमार मिश्रा 1976 बैच के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं. वह केंद्र सरकार में सचिव पद पर रहते हुए आवास नगरीय ग़रीबी उन्मूलन विभाग में कार्यरत हैं. वह रूखे और ज़िद्दी स्वभाव के हैं, इसलिए उनकी संभावना कम है. ठीक यही स्थिति 1977 बैंच की नीता चौधरी की है, जो वर्तमान में राजस्व परिषद में तैनात हैं.

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देश दीपक वर्मा, 1978 बैच के आईएएस अधिकारी हैं और उनका नाम मुख्य सचिव पद के लिए बहुत ज़ोर शोर से लिया जा रहा है. वह आजकल दिल्ली में स्पोट्‌र्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया में डीजी पद पर आसीन हैं. ज्ञात हो कि वर्मा को पिछले साल मायावती सरकार में मुख्य सचिव पद के लिए दिल्ली से प्रदेश में वापस बुलाया गया था. उन्हें केंद्र में प्रतिनियिुक्ति से वापस बुलाने के लिए भारत सरकार को लिखे पत्र में मायावती सरकार ने यह बात सा़फ-सा़फ लिखी थी कि उन्हें मुख्य सचिव बनाने के लिए वापस बुलाया जा रहा है, परंतु बिना कोई कारण बताए उन्हें यह पद नहीं दिया गया. कुछ समय बाद वह पुन: प्रतिनियुक्ति पर केंद्र चले गए. यह एक प्रकार से उनका अपमान था, परंतु बताया जाता है कि सपा सरकार में उन्हें वापस बुलाने के प्रयास हो रहे हैं. जहां तक मौजूदा मुख्य सचिव अनूप मिश्रा का सवाल है तो उनका प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली जाना तय हो चुका है. नौकरशाही में एक चर्चा यह भी है कि सपा सरकार में कुछ समय तक अनूप मिश्रा ही मुख्य सचिव रह सकते हैं. दूसरी ओर यह भी सच है कि चुनाव आयोग ने अनूप मिश्रा को कड़ी फटकार लगाते हुए जो चिट्ठी लिखी थी, उसमें कहा गया था कि उनके पत्र से ऐसा लगता है कि वह सरकारी अधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि बसपा कार्यकर्ता के रूप में कार्य कर रहे हैं. ऐसे में यह असंभव लगता है कि सपा सरकार अनूप मिश्रा को मुख्य सचिव के पद पर स्वीकार करे.

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मुख्यमंत्री सचिवालय की बात की जाए तो अन्य आईएएस अ़फसरों में शैलेष कृष्ण, आनंद मिश्र, नितिन गोकणर्र्, नीरज गुप्ता, संजय भाटिया, अनीता सिंह, कामरान रिज़वी, अरुण सिंघल, शंभू सिंह यादव, चक्रपाणि, संतोष यादव, प्रांजल यादव का नाम पंचम तल के लिए चर्चा में है. अरविंद सिंह देव, आमोद कुमार, अनुराग यादव को भी अहम पदों पर तैनाती मिल सकती है. निलंबित चल रहे राकेश बहादुर एवं संदीप शरण जो अभी तक हाशिये पर पड़े, फिर मुख्यधारा में आ सकते हैं. दीपक सिंघल और अरुण सिंह की भी अच्छे पदों पर तैनाती की उम्मीद जताई जा रही है.

पुलिस महकमे में भी बदलाव की हवा सा़फ दिखाई दे रही है. सबसे बड़ा सवाल नया डीजीपी कौन होगा? डीजीपी की कुर्सी पर कौन नया अधिकारी बैठेगा? यह पहेली अबूझ बनी हुई है. यह संभावना जताई जा रही है कि अतुल सपा सरकार में भी डीजीपी पद पर कार्य करते रहेंगे. सपा के चहेते और और एक सक्षम अधिकारी एसी शर्मा भी इस पद पर लाए जा सकते हैं. दूसरी ओर डीजीपी पद के लिए डीजी एसी शर्मा, अरुण कुमार गुप्ता, ओपी दीक्षित के नामों की भी चर्चा है. वही एडीजी क़ानून व्यवस्था के लिए जगमोहन का नाम सबसे आगे है. पुलिस महकमे में वर्तमान व्यवस्था में भी बदलाव सुनिश्चित है. आईजी रेंज, डीआईजी ज़िले की व्यवस्था खत्म कर पूर्ववत एसपी, एसएसपी ज़िला, डीआईजी रेंज और आईजी जोन की व्यवस्था पूर्ववत बहाल की जाएगी. माया सरकार की वर्तमान व्यवस्था में जिन ज़िलों में डीआईजी पुलिस का मुखिया होता है, वहां उसे अपने से का़फी जूनियर जिलाधिकारी से सामंजस्य बिठाना पड़ता था, जिसमें टकराव की स्थिति पैदा होती थी. इससे निजात पाने के लिए इस व्यवस्था को परिवर्तित किया जाएगा. मायावती सरकार में आईएएस और आईपीएस एसोसिएशन पूरी तरह पंगु हो गए थे, न आईएएस वीक और न ही आईपीएस मीट हुई. अब उम्मीद की जा रही है कि इन दोनों संगठनों के दिन बहुरेंगे.

उन नौकरशाहों की भी चर्चा करना यहां ज़रूरी है, जो समय के साथ पाला बदल लेने में माहिर हैं. कई अधिकारी सपा नेताओं से संपर्क बनाए हुए हैं. मगर कई ऐसे भी हैं, जो दिल्ली की तऱफ कूच कर गए हैं या कूच करना चाहते हैं. कई वरिष्ठ अधिकारियों को जब कोई और रास्ता नहीं दिखा, तो उन्होंने इस्ती़फा ही दे दिया. जो इस्ती़फा नहीं दे पाए, वे लंबी छुट्टी लेकर अपने पैतृक निवासों की ओर कूच कर चुके हैं. मायावती के कार्यकाल में सबसे शक्तिशाली अधिकारी शशांक शेखर सिंह, जिनके लिए कैबिनेट सचिव का एक नया पद सृजित किया गया था. सपा सरकार आरूढ़ होते ही उन्होंने अपनी कुर्सी छोड़ दी है. प्रमुख सचिव गृह फतेह बहादुर सिंह और बृजलाल भी सपा सरकार के निशाने पर आ सकते हैं. वरिष्ठ अ़फसर मोहिंदर सिंह, जो नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गंगा और यमुना एक्सप्रेस वे में अध्यक्ष की कुर्सी संभाले हुए हैं, उनकी कुर्सी खतरे में है. इसी तरह न्यायिक सेवाओं से इस्ती़फा देकर आए प्रदीप दुबे माया सरकार के चहेते अधिकारी माने जाते हैं. सपा आलाकमान उनसे खुश नहीं हैं. नवनीत सहगल और नेतराम को भी अपनी कुर्सी बदलनी पड़ सकती है. हालांकि मुलायम सरकार में ये दोनों अ़फसर मुलायम के क़रीबी रह चुके हैं. आईपीएस की लिस्ट में प्रमुख रूप से प्रेम प्रकाश एवं चंद्र प्रकाश के नाम भी हैं, जो माया सरकार में व़फादार रहे हैं.

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अब इन अधिकारियों का ज़िक्र, जो पिछली मुलायम सरकार में का़फी अहम पद पर विराजमान रह चुके हैं. इन अ़फसरों में अनिता सिंह, शैलेष कृष्ण, शंभूसिंह यादव, संतोष यादव, अनुराग यादव नाम सर्वोपरि हैं. इसके अलावा जावेद उस्मानी, अनिल कुमार गुप्ता, दीपक सिंघल के नामों पर भी अमल किया जा सकता है. वहीं दलजीत सिंह चौधरी, मुकुल गोयल, ओपी सिंह, जगमोहन सिंह यादव और एसी शर्मा मुलायम सरकार के प्रिय अधिकारियों में माने जाते हैं. इनमें एसी शर्मा डीजीपी पद के लिए और मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव के पद के लिए कुंवर अरविंद सिंह देव, किशन सिंह अटोरिया और केके सिन्हा के नाम चर्चा में हैं. यह भी खबर है कि केंद्र में कार्यरत आईएएस अधिकारी प्रदेश में वापस बुला लिए जाएं और कुछ अन्य अधिकारी जिन्हें केंद्र में जाने की हरी झंडी मिल चुकी है. संभवत: उन्हें नई सरकार के चलते रुकने का अवसर मिल जाए. इनमें दुर्गाशंकर मिश्र, अनिल कुमार, आरपी सिंह, रविंद्र सिंह, मुख्य सचिव अनूप मिश्रा, अनिल संत, सुशील कुमार, रजोश कुमार सिंह और जीबी पटनायक शामिल हैं.

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  • नयी सरकार, विशेष कर एक युवा मुख्यमंत्री से,प्रदेश की जनता की अपेक्षाएं अधिक होना स्वाभाविक ही है. लेकिन क्या २२४ में से १११ आपराधिक गतिविधियों में लिप्त (उनमे भी ५६ गंभीर अपराधों में) के रहते कोई ठोस कम हो पायेगा?पार्टी से नाहर सिंह यादव जैसे पुराने वफादार सपाईयों को बेरोजगारों से पंजीयन शुल्क मांगे जाने पर रोजगार कार्यालय में कथित हंगामा करने पर पार्टी से बहार करना आसान है लेकिन क्या हंगामा और आपराधिक कार्य करने वाले मुस्लिमों के विरुद्ध पार्टी इस प्रकार की कारवाही कर सकेगी? ये एक बड़ी चुनोती पार्टी के सामने आएगी जिसका हल अखिलेश को निकलना होगा.यदि बढती मुस्लिम गुंडागर्दी, लव जेहाद, आपराधिक कार्यों में संलिप्तता को काबू में किया जा सका तो कुछ ठोस काम हो पाएंगे वर्ना सब अच्छे कामों पर भी धुल पद जाएगी. ये केवल संयोग नहीं है की मिडिया ने अखिलेश को एक दिन का भी ‘हनीमून’ समय दिए बिना ‘गुंडागर्दी की वापसी’ का प्रचार शुरू कर दिया है जो ये दर्शाता है की सारा मिडिया किसी और के इशारे पर प्रचार कर रहा है और नए युवा मुख्यमंत्री को कोई स्पेस नहीं देना चाहता. इस बारे में सतर्क रहना जरूरी है.

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