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विकलांग रोहित विदेशियों को सैर करा आया
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विकलांग रोहित विदेशियों को सैर करा आया

लोग विकलांगता को अभिशाप बताते हैं, लेकिन अगर आप में विकलांगता से लड़ने का जोश, ज़ज़्बा और जुनून है तो फिर यह अभिशाप नहीं रह जाता है. उसके बाद तो सारा आकाश आपकी पहुंच के अंदर होता है. कुछ इसी तरह का जोश और ज़ज़्बा दिखाया है रोहित ने. उनकी खराब आर्थिक दशा भी उनके उत्साह को नहीं डिगा पा रही.

ऐसा कहा जाता है कि बचपन में दोनों पांव गंवाने के बाद इंसान अपनी ही ज़िंदगी से ऩफरत करने लगता है. इतना ही नहीं वह सही तरीक़े से ज़िंदगी जीने की तमन्ना भी छोड़ देता है, लेकिन एक उक्ति है – असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो! क्या कमी रह गई है देखो और सुधार करो! इस पंक्ति ने रोहित के आत्मबल को कुछ इस तरह मज़बूत किया कि वह खुद तो बैशाखी के सहारे चलता रहा, लेकिन कई विदेशी सैलानियों को भारत की सैर करा आया. बिहार के खगड़िया जैसे अत्यंत पिछड़े ज़िले के एक बेहद ग़रीब परिवार में जन्मे रोहित को ज़िला प्रशासन की तऱफ से कभी भी ट्राईसाइकिल या फिर बैसाखी नहीं मिली, लेकिन इससे उसके भ्रमण की लालसा पर कोई असर नहीं पड़ा. उसे कभी भी यह एहसास नहीं हुआ कि वह विकलांग है और अपने पांव पर चलकर दुनिया देखने की लालसा पूरी नहीं कर सकता है.

ऐसा कहा जाता है कि बचपन में दोनों पांव गंवाने के बाद इंसान अपनी ही ज़िंदगी से ऩफरत करने लगता है. इतना ही नहीं वह सही तरीक़े से ज़िंदगी जीने की तमन्ना भी छोड़ देता है, लेकिन एक उक्ति है – असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो! क्या कमी रह गई है देखो और सुधार करो! इस पंक्ति ने रोहित के आत्मबल को कुछ इस तरह मज़बूत किया कि वह खुद तो बैशाखी के सहारे चलता रहा, लेकिन कई विदेशी सैलानियों को भारत की सैर करा आया.

हालांकि उसे इस बात का मलाल है कि कई विदेशियों को भारत का सैर कराने के कारण लोग उसे टूरिस्ट गाइड तो कहने लगे, लेकिन लाचारी ने उसे वहीं का वहीं छोड़ दिया. विदेशियों को भारत की सैर कराते-कराते रोहित कब फ्रेंच एवं अंग्ऱेजी भाषा जानने और बोलने लगा, इसका पता उसे भी नहीं चला. इस होनहार युवक की बदक़िस्मती उसे वापस खगड़िया ले आया. वैसे रोहित कहता है कि स्नातकोत्तर करने की इच्छा थी इसलिए वह वापस खगड़िया लौटा था, लेकिन जबसरकारी स्तर पर उसे कोई मदद नहीं मिली तो वह निराश हो गया. वह फिर से टूरिस्ट गाइड का काम करना चाहता है. रोहित अपने बीते दिनों की याद ताज़ा कर कहता है कि लगभग दो वर्ष की उम्र में ही वह पोलियो का शिकार हो गया. घर की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि चाहकर भी उसके पिता हेमचंद्र सहनी और माता उर्मिला उसे एक अदद बैसाखी नहीं दे पाए. हालांकि अभी भी उसकी आर्थिक स्थिति नहीं सुधरी है. पिता रिक्शा चलाकर किसी तरह बच्चों का पेट भरते हैं. सरकारी योजना के तहत उसे कोई घर उपलब्ध नहीं कराया गया है, इसलिए वह अभी भी सड़क किनारे किसी तरह तंबू गाड़कर रहने को विवश है. रोहित कहता है कि बचपन में जब उसे वैसाखी नहीं मिल पा रही थी तब किसी की कही बातों पर भरोसा कर वह वैसाखी पाने की चाहत लिए जयपुर स्थित भगवान महावीर विकलांग संस्थान पहुंच गया. जब वापस लौटा तो उसके पास वैसाखी तो थी, लेकिन जीने की चाह आसान नहीं दिख रही थी. इसी बीच वैसाखी के साथ वापस घर लौटने के क्रम में उसकी मुलाकात जयपुर स्टेशन पर जनकल्याण साहित्य नामक एक संस्था के कुछ सदस्यों से हो गई. रोहित को पढ़ाने की ज़िम्मेदारी लेते हुए संस्था के सदस्यों ने उसका नामांकन राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, मानसरोवर में करा दिया. उसके बाद रोहित ने मन लगाकर पढ़ाई शुरू कर दी. रोहित ने दसवी में 69.5 और बारहवीं में 65.38 प्रतिशत अंक प्राप्त किए. इस दौरान रोहित ने टूरिस्ट गाइड का भी काम कर कॉपी-किताब के खर्चे निकालने शुरू कर दिए. जयपुर आने वाले टूरिस्ट को घूमाने के क्रम में रोहित ने फ्रेंच, अंग्रेजी आदि भी बोलना सीख लिया. बारहवीं पास करने के बाद संस्था के सचिव ने कहा कि 18 वर्ष का हो जाने के कारण अब तुम्हारी पढ़ाई के लिए संस्था कोई आर्थिक मदद नहीं कर सकती है. उसके बाद रोहित को याद आई कि घूमने-घुमाने के क्रम में कैलिफोर्निया के स्कॉट हर्मिसन ने उसे मदद का भरोसा दिलाया था. इसी बात को याद करते हुए उसने कैलिफोर्निया के स्काट हर्मिसन से मदद की गुहार लगाई. रोहित के गुहार के बाद स्कॉट हर्मिसन ने उसकी मदद की. अपनी पढ़ाई के साथ-साथ उसने अपने छोटे भाई को भी 9वीं से 12वीं तक की तालीम दिलाई. इस दौरान पार्ट टाइम जॉब के रूप में रोहित ने हेल्प लाइन में नौकरी और गाइड के रूप में टूरिस्टों को घुमाने का कार्य जारी रखा, लेकिन स्नातक की पढ़ाई समाप्त होते-होते अंग्रेज दोस्त ने भी मदद रोक ली. भाई और अपनी पढ़ाई का खर्च वहन नहीं करने के कारण रोहित वापस खगड़िया लौट आया, लेकिन यहां भी उसकी परेशानी कम नहीं हुई. विकलांगता सर्टिफिकेट बनाने के लिए चार सौ रुपये की मांग कर्मचारी द्वारा की गई. बाद में एक छात्र संगठन की पहल पर उसे विकलांग प्रमाण-पत्र तो मिल गया, मगर कोई सरकारी सहायता नहीं मिली. रोहित फिलहाल एक कंप्यूटर संस्थान में बच्चों को कंप्यूटर के गुर सिखा रहा है. वहीं घर पर ग़रीब छात्रों को नि:शुल्क शिक्षा देने के अभियान में जुटा हुआ है. वह अंग्रेज़ी से पीजी और पीएचडी करना चाहता है. रोहित ने बताया कि उसकी मां कहती है कि जिस दिन एक साक्षर दो निरक्षरों को पढ़ाना शुरू कर देगा, उस दिन पूरा देश साक्षर हो जाएगा. इसलिए वह प्रोफेसर बनकर समाज के हर युवा को साक्षर करना चाहता है. बहरहाल, रोहित का कहना है कि राज्य या केंद्र सरकार अगर सही मायने में विकलांगों को आत्मनिर्भर बनाने की सोच रखती है तो उसे हवाई बातों को छोड़ वास्तव कुछ सार्थक पहल करनी होगी. तभी समाज के लिए विकलांगता अभिशाप नहीं कहा जाएगा, वैसे विकलांगों को भी यह चाहिए कि उसे अभिशाप नहीं मानें, बल्कि एक चुनौती के तौर पर स्वीकार करें और समाज के लिए प्रेरणा बनने की मुहिम में जुटे रहें.

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