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पश्चिमी उत्तर प्रदेश : दुधारू पशुओं की क़त्लगाह
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पश्चिमी उत्तर प्रदेश : दुधारू पशुओं की क़त्लगाह

दोआब स्थित मेरठ और उसके आसपास के क्षेत्रों में कभी दूध-दही की नदियां बहती थीं. बुलंदशहर, बाग़पत एवं मुज़फ्फरनगर में डेयरी उद्योग चरम पर था. पशुपालन और दुग्धोपार्जन को गांवों का कुटीर उद्योग माना जाता था, लेकिन जबसे यहां अवैध पशु वधशालाएं बढ़ीं, तबसे दूध-दही की नदियों वाले इस क्षेत्र में मांस और शराब का बोलबाला हो गया. दूध आज आम आदमी से दूर होता जा रहा है. अगर यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं, जब स्वास्थ्यवर्द्धक दूध एक किवदंती बन जाएगा. लगातार बढ़ती मांग को मिल्क पाउडर से तैयार दूध भी पूरा नहीं कर पा रहा है. पाउडर वाला दूध स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है. कंपनियां इस तरह का दूध तैयार करके मालामाल हो रही हैं. दुधारू पशुओं के कम होने से दूध का संकट दिनोंदिन गहराता जा रहा है. दूध का ज़ायक़ा चाय की चुस्कियों में सिमट कर रह गया है. मेरठ, मुरादाबाद, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, बाग़पत एवं सहारनपुर आदि ज़िले पशुओं के लिए क़त्लगाह बन गए हैं. यहां जगह-जगह छोटी-छोटी क़त्लगाहें हैं, जहां रात-दिन दुधारू पशु काटे जाते हैं. दुधारू पशुओं का मांस मेरठ और उसके आसपास के निर्यातकों के पास भेज दिया जाता है, जहां से वे उसे अरब एवं अन्य मुस्लिम देशों को भेज देते हैं.

यूं तो पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दुधारू पशुओं का कटान हो रहा है, लेकिन हापुड़ रोड स्थित मेरठ पशु वधशाला देश की 2708 पशु वधशालाओं में प्रमुख मानी जाती है, जहां प्रतिदिन औसतन 1200 पशु काटे जाते हैं. पूरे राज्य में इस समय वैध एवं अवैध रूप से क़रीब दो सौ पशु वधशालाओं का संचालन हो रहा है. गली-मुहल्ले में चल रहीं पशु वधशालाओं की कोई गिनती नहीं है.

अरब में भारत, खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दुधारू पशुओं के मांस की बहुत मांग है, क्योंकि यहां के पशुओं का खानपान अच्छा है और क्षेत्र में हरियाली की प्रचुरता है, इसलिए यहां के पशुओं का मांस चर्बी युक्त न होकर ठोस होता है. अकेले मेरठ में ही ऐसी कई फैक्ट्रियां हैं, जो विदेशों में पशुओं के मांस की आपूर्ति करती हैं. व्यापार बढ़ाने के लिए कई निर्यातक गौ मांस का निर्यात कर रहे हैं, जबकि गौ मांस पर प्रतिबंध है. हापुड़ रोड के अलावा मेरठ में कई मिनी स्लाटर हाउस भी चल रहे हैं, जहां अन्य दुधारू पशुओं के अलावा बड़ी संख्या में गाय भी काटी जा रही हैं.

अरब में भारत, खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दुधारू पशुओं के मांस की बहुत मांग है, क्योंकि यहां के पशुओं का खानपान अच्छा है और क्षेत्र में हरियाली की प्रचुरता है, इसलिए यहां के पशुओं का मांस चर्बी युक्त न होकर ठोस होता है. अकेले मेरठ में ही ऐसी कई फैक्ट्रियां हैं, जो विदेशों में पशुओं के मांस की आपूर्ति करती हैं.

वर्ष 2006 से 2011 तक की बात करें तो दूध के दामों में दोगुने से भी ज़्यादा इज़ा़फा हो गया है. 2006-07 में दूध का दाम 16 से 18 रुपये प्रति लीटर था, जो 2010-11 में 30 से 36 रुपये प्रति लीटर हो गया. आज दूध का दाम 40 से 45 रुपये प्रति लीटर है.घटते पशुधन की वजह से गांवों में भी दूध के दाम आसमान छू रहे हैं. पहले लगभग हर घर में दो-तीन दुधारू पशु खूंटे पर बंधे रहते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है. आंकड़े बताते हैं कि दूध की कमी पूरी करने के लिए 2011 में 50 हज़ार टन मिल्क पाउडर, 15 हज़ार टन बटर एवं बटर ऑयल का आयात किया गया. इसके अलावा कुल मांस निर्यात में गौ मांस के निर्यात का प्रतिशत 2001 में 17 था, जबकि 2010 में 30.5 प्रतिशत.

मेरठ पशु वधशाला और राजनीति

यूं तो पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दुधारू पशुओं का कटान हो रहा है, लेकिन हापुड़ रोड स्थित मेरठ पशु वधशाला देश की 2708 पशु वधशालाओं में प्रमुख मानी जाती है, जहां प्रतिदिन औसतन 1200 पशु काटे जाते हैं. पूरे राज्य में इस समय वैध एवं अवैध रूप से क़रीब दो सौ पशु वधशालाओं का संचालन हो रहा है. गली-मुहल्ले में चल रहीं पशु वधशालाओं की कोई गिनती नहीं है. शहर के बीचोबीच स्थित मेरठ पशु वधशाला को प्रदेश के एक पूर्व मंत्री का संरक्षण हासिल रहा. भाजपा की राजनीति भी इस पशु वधशाला के इर्द-गिर्द घूमती रही. 2006 में भाजपा ने इस वधशाला को मुद्दा बनाकर मेयर की सीट हथिया ली थी. इन तमाम वधशालाओं में प्रतिदिन हज़ारों पशु काटे जाते हैं, साथ ही चर्बी गलाने के लिए अवैध रूप से बड़ी-बड़ी भट्ठियों का इस्तेमाल किया जाता है, जिनसे निकलने वाला धुआं प्रदूषण को बढ़ावा दे रहा है, वहीं पशुओं के अवशेषों एवं हड्डियों के चलते नालियां और नाले अवरुद्ध होने से गंदगी फैल रही है, जिससे इलाक़ाई लोग परेशान हैं. मेरठ वधशाला में प्रतिदिन केवल 350 पशु काटने का आदेश है, लेकिन इसके विपरीत पूरे मंडल में प्रतिदिन क़रीब पांच हज़ार पशु काटे जा रहे हैं. नगर निगम प्रति पशु 25 रुपये कटान शुल्क वसूलता है. इस वधशाला में सैकड़ों बच्चे भी काम करते हैं. नन्हें-नन्हें हाथों में छुरियां-चाक़ू थमा दिए गए हैं. ये बच्चे खून, मांस और बदबू से सने रहते हैं. कई सालों की जद्दोजहद और क़ानूनी लड़ाई लड़ने के बाद इस पशु वधशाला का ठेका निरस्त करने का आदेश आया और इसे शहरी आबादी से दूर घोसीपुरा में स्थानांतरित कर दिया गया. ठेकेदार ने काग़ज़ी रूप से तो यहां काम खत्म कर दिया, लेकिन स्थानीय लोगों को नारकीय जीवन से निजात नहीं मिली. इन वैध-अवैध पशु वधशालाओं को लेकर शहर में कई बार अराजकता का माहौल पैदा हो चुका है. पशुओं से भरे ट्रक रात हो या दिन, किसी भी समय घनी आबादी के बीच आ जाते हैं. इन ट्रकों से कई हादसे भी हो चुके हैं, जिनमें कई लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. स्थानीय लोग अक्सर विरोध स्वरूप धरना-प्रदर्शन करते हैं, लेकिन शासन-प्रशासन के कानों पर जूं नहीं रेंगती.

दुधारू पशुओं के दामों में बढ़ोत्तरी

अंधाधुंध कटान के चलते दुधारू पशुओं के दामों में भी अप्रत्याशित रूप से वृद्धि हुई है. 90 के दशक में जो भैंस मात्र 20 हज़ार रुपये में आसानी से मिल जाती थी, आज वही भैंस 80-90 हज़ार रुपये में मिलती है. यही वजह है कि जो भैंस ग़रीबों के लिए आजीविका का साधन थी, वह आज उनकी पहुंच से दूर हो गई है. मेरठ छावनी क्षेत्र के रजबन निवासी डेयरी संचालक सुधीर रस्तोगी बताते हैं कि 1990 में उनके पास प्रतिदिन 300 लीटर से अधिक दूध आता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है. वह कहते हैं कि पहले किसान 10 रुपये प्रति लीटर का दाम लेकर आसानी से दूध दे देता था, लेकिन अब वह 50 रुपये प्रति लीटर के भाव पर भी संतुष्ट नहीं होता. कटान के कारण पशुओं की संख्या लगातार घटती जा रही है, जिसका असर दूध के दामों पर पड़ रहा है. दुधारू पशुओं का कटान अगर न रोका गया तो एक दिन दूध देखने को नहीं मिलेगा.

बिजनौर के सिविल लाइंस क्षेत्र निवासी डेयरी संचालक उदयवीर सिंह का कहना है कि दूध और पशुओं के दामों में वृद्धि का एकमात्र कारण यही अंधाधुंध कटान है. इसे अविलंब रोका जाना चाहिए. आज हालत यह है कि 15-20 हज़ार रुपये में मिलने वाली भैंस 90 हज़ार रुपये में मिल रही है, साथ ही पशु आहार के दाम भी आसमान छू रहे हैं. इसी वजह से दूध के दाम अप्रत्याशित रूप से बढ़ रहे हैं. भला आप ही बताइए, 80-90 हज़ार रुपये खर्च करके भैंस खरीदना किसी ग़रीब के लिए संभव कैसे हो सकता है. इस्लामाबाद (मेरठ) निवासी सलीम कहते हैं कि जब तक अवैध कटान पर पाबंदी नहीं लगेगी, पशुधन में इज़ा़फा नामुमकिन है. भैंस पालना ग़रीबों के लिए एक सपना जैसा हो गया है. म़ुजफ़्फरनगर के खलापार निवासी डेयरी संचालक सलीम खान बताते हैं कि भैंसों की क़ीमत बढ़ने के कारण चोर भैंसों पर ज़्यादा हाथ सा़फ कर रहे हैं. गायों को भी बड़ी संख्या में काटा जा रहा है. अवैध कटान और मांस निर्यात पर सरकार को रोक लगानी चाहिए.

दुग्ध उत्पादन (लीटर प्रतिदिन)दूध का दाम (प्रति लीटर)
2006-07         11.40 लाख2006-07    16-18 रुपये
2007-08         08.32 लाख2007-08    18-21 रुपये
2008-09         08.15 लाख2008-09    20-22 रुपये
2009-10         06.25 लाख2009-10    24-26 रुपये
2010-11         05.39 लाख2010-11    30-36 रुपये
2011-12         04.79 लाख2011-12    40-45 रुपये

3 comments

  • शर्म तो हमें भि आनी चाहिए कि हम लोग आपने आस् पास ऐसी कत्ल गाहो को पलने और बढ़ने का मौका दे देते हैं और चुप चाप देखते रहते हैं. ना तो कोइ आवाज़ उथाता है और ना ही इस तरह के पशु वध खाने रोकने का कोई उपाय करता है. बस सरकार और कलयुग का रोना रोते रहते हैं सब लोग. आप लोगों को यह तो पता ही होगा कि एक और गद्दार कपिल सिब्बल कि पत्नि ने एक बहुत बड़ा कत्ल खाना गाज़ियाबाद में हाल ही में खोला है. और हम जैसे मूरख लोग इस बार भी इसी गद्दार कांग्रेस को ही वोट देंगे !!!!

  • इस मुद्दे पर ऐसे लेख का बहुत अरसे से इंतजार था.इसको लिखने के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद. ये soch कर बहुत आश्चर्य hota था की rashtriya rajdhani के बगल में itna बड़ा katleaam होते हुए भी मीडिया बिलकुल खामोश है. hamari सरकार और हमारे policy makers के पास विकास की कोई निति ही नहीं है. कृषि भूमि की कमी hone के कारन graamin kshetro में बेरोजगारी की समस्या का ek निदान दुग्ध उत्पादन में है लेकिन ise बढ़ावा देने की बजाए सरकारे वोट बैंक की खातिर आँख मूंदे हुए है. दुःख तो is baat का है की सब कुछ जानते हुए भी आम ग्रामीण जनता भी iske khilaf jaagruk नहीं है . ये kisi chunav में मुद्दा नहीं बनता.

  • लेख जानकारीपरक तथा सरकार के लिए दर्पण की तरह है |सरकार को सोचना चाहिए कि इतनी बड़ी आबादी वाले देश में नाग्रिलों के लिए दूध ज़रूरी है या विदेशियों के लिए हमरे बेशकीमती पशुधन का मांस ?

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