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पाकिस्तान में नवाज शरीफ का राज: बहेगी अमन की बयार !

पाकिस्तान में नवाज शरीफ का राज: बहेगी अमन की बयार !

पाकिस्तान में ऐसा पहली बार हो रहा है, जब कोई व्यक्ति, यानी नवाज शरीफ तीसरी बार प्रधानमंत्री बन रहे हों. चुनावी जंग तो उन्होंने जीत ली, लेकिन उन्हें अंदरूनी कलह, आतंकवाद और कश्मीर मुद्दे पर भी सोचना होगा. भारत के साथ रिश्ते सुधारने के लिए भी उन्हें पाकिस्तान के लोगों की नाराज़गी झेलनी पड़ सकती है, लेकिन फिर भी उन्हें ये सारे काम करने होंगे. ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या नवाज पाकिस्तान में अमन की बयार बहा पाएंगे?

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नवाज शरीफ की जीत ने पाकिस्तान में जनतंत्र का बिगुल फूंक दिया है, जिसकी गूंज भारत में भी साफ़ सुनाई दे रही है. दरअसल, ज़रूरत इसी बात की थी, क्योंकि सुस्थिर, शांत, खुशहाल पाकिस्तान हिंदुस्तान के अपने राष्ट्रहित में है. पाकिस्तान के ऐतिहासिक आम चुनाव में नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) 272 सीटों में से 122 सीटों पर जीत हासिल कर देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. नवाज की जीत को पड़ोसी मुल्कों में पाक में स्थिर सरकार की स्थापना के रूप में देखा जा रहा है. हालांकि यह सरकार के वहां की सेना के साथ रिश्तों पर निर्भर करता है, जो कि इतना आसान नहीं लगता है, क्योंकि पाकिस्तानी नागरिकों का अधिकांश समय सैनिक शासन के पहरे में ही गुजरा है, जहां किसकी आज़ादी कब छिन जाए और किसकी ज़िंदगी पर कब ग्रहण लग जाए, यह दावे के साथ कहा ही नहीं जा सकता. सच तो यह है कि नवाज शरीफ खुद इस क्रूर और तानाशाह सैन्य शासन के भुक्तभोगी हैं. इसलिए यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि पाकिस्तान सरकार की स्थिरता वहां की सेना के साथ उसके संबंधों पर निर्भर करती है. दरअसल, अगर सरकार और सेना के बीच मेलजोल रहा, तो सरकार स्थिर रहेगी, अन्यथा यदि तनातनी बढ़ी और रिश्ते तल्ख हुए, तो समझिए कि सरकार का पत्ता साफ़. इसलिए नवाज शरीफ को बहुत सोच- समझ कर चलना होगा, अन्यथा वह एक कोरे प्रधानमंत्री से ज़्यादा और कुछ नहीं रह जाएंगे.

सुधर सकते हैं भारत-पाक रिश्ते

विश्‍लेषकों का कहना है कि पीएमएल-एन प्रमुख नवाज शरीफ की अगुवाई वाली नई सरकार भारत और पाकिस्तान के रिश्ते न केवल सुधार सकती है, बल्कि आतंकवाद निरोधक रणनीति भी बेहतर तरीके से आगे बढ़ा सकती है. यह हम सभी जानते हैं कि वर्ष 1999 में शरीफ ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पाकिस्तान की ऐतिहासिक यात्रा के लिए आमंत्रित किया था. इसलिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अब यह उम्मीद है कि परमाणु संपन्न इन पड़ोसियों के बीच संबंधों के एक नए दौर का सूत्रपात भविष्य में ज़रूर होगा.

दरअसल, जीत के बाद नवाज शरीफ ने भरोसा दिलाया है कि वह अपनी सरजमीं से भारत में आतंक फैलाने वाली किसी गतिविधि की इजाजत नहीं देंगे, क्योंकि उन्हें इस बात का भलीभांति एहसास है कि किस तरह से करगिल युद्ध से उन्होंने अपने हाथ जला लिए थे. इसीलिए अब वह हर क़दम फूंक-फूंक कर रखेंगे. दरअसल, उनके बयानों से भी यही लगता है. यहां यह बताना ज़रूरी है कि भारत के साथ रिश्ते मजबूत करने के लिए नवाज ने पहल भी शुरू कर दी है. यदि बयानों के इशारों को समझें, तो परवेज मुशर्रफ की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं. लेकिन स्थिति चाहे जो भी हो, भारत से हाथ मिलाने के लिए नवाज हरसंभव कोशिश करेंगे. शरीफ ने कहा कि हम भारत से रिश्ते बेहतर करने के लिए काम करेंगे. हम भारत के साथ दोस्ती चाहते हैं, इसलिए कारगिल और 26/11 जैसी घटनाओं की इजाजत हम कभी नहीं देंगे. यह हम सभी जानते और मानते हैं कि आतंकवाद भारत और पाकिस्तान दोनों को नुकसान पहुंचाता है. उन्होंने कहा कि वह दोनों देशों के बीच कश्मीर समेत सभी मुद्दे सुलझाना चाहते हैं. लाहौर घोषणा पत्र एक अच्छी शुरुआत थी और वह एक बार फिर उस पर अमल करेंगे. एक बड़े क़दम के तौर पर उन्होंने भारत को भरोसा दिलाया कि जेहादी तत्वों को नेस्तनाबूद करने की हरसंभव कोशिश की जाएगी.

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ग़ौरतलब है कि नवाज शरीफ ने वर्ष 1999 में लाहौर घोषणा पत्र में काफी सफलता प्राप्त की थी. इसके बाद उन्हें निर्वासन झेलना पड़ा था, इसलिए यह बात आगे नहीं बढ़ सकी. जानकार भी कहते और मानते हैं कि शरीफ संबंध सुधारना तो चाहते हैं, लेकिन उन्हें साथ ही साथ यह भी लगता है कि पाकिस्तान में सेना के वर्चस्व, खुफिया एजेंसी आईएसआई के हस्तक्षेप और आतंकवादी संगठन तालिबान के कारण दोनों देशों के बीच बेहतर रिश्ते कायम करने में मुश्किलें ही मुश्किलें हैं. पाकिस्तान मामलों के जानकार भरत वर्मा मानते हैं कि शरीफ को पाकिस्तान में लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए उच्चतम न्यायालय का सहारा लेना होगा. एक अन्य जानकार फिरोज अहमद ने कहा कि यदि शरीफ सेना और आईएसआई पर नियंत्रण रखने में सफल होंगे, तभी दोनों देशों के बीच बेहतर संबंध बन पाएंगे. पूर्व राजनयिक राजीव डोगरा का कहना है कि फिलहाल कश्मीर मुद्दे को एक तरफ़ रखकर अन्य मुद्दे सुलझाने को तवज्जो दी जाए, तो कश्मीर समस्या सुलझाने में मदद मिल सकती है. हालांकि भारत की भी अपनी कुछ चिंताएं हैं, जिनसे वह नवाज शरीफ को अवगत कराना चाहेगा. 2010 में तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम ने पाक यात्रा के दौरान एक सूची सौंपी थी. भारत पहले उन मुद्दों पर कार्रवाई चाहता है, जो 2008 के आतंकी हमले के साजिशकर्ताओं पर कार्रवाई से संबंधित हैं.

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पाक अवाम होगी खुशहाल

पाकिस्तानी हलकों में यह बात सरेआम है कि अब वहां अमन-चैन की नई बयार बहेगी. विशेषज्ञ सुशांत सरीन कहते हैं कि पाकिस्तान में इस चुनाव में काफी बदलाव देखने को मिला है और वहां मौजूदा परिस्थितियों में जिस तरह से अवाम ने वोट डाला है और दल विशेष को समर्थन दिया है, उससे लगता है कि इस बार पाकिस्तान में काफी बदलाव आने वाला है. नवाज शरीफ की राह इतनी आसान भी नहीं है, क्योंकि उन्हें चार मोर्चों पर एक साथ जूझना पड़ेगा. पहला, सेना. दूसरा, अमेरिकी दखल एवं अफगानिस्तान. तीसरा, आतंकवाद, भ्रष्टाचार एवं बिजली संकट जैसी आंतरिक समस्याएं. चौथा, भारत से रिश्ते. भारत से रिश्ते सीधे-सीधे पाकिस्तान की विदेश नीति से जुड़े हैं, जिसे आईएसआई और सेना संचालित करती है.

 

 

नवाज शरीफ क्यों जीते?

नवाज शरीफ ने खुद को पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में एक सफल राजनीतिज्ञ के रूप में स्थापित किया है.

पाकिस्तान में बेहतरीन इंफ्रास्टक्चर प्रोजेक्ट्स लागू करने का श्रेय नवाज शरीफ को ही जाता है.

मध्य वर्ग और छोटे शहरों के व्यापारियों की पसंद हैं नवाज शरीफ.

अमेरिकियों ने विरोधी अभियानों को हवा दी, जिसे पाकिस्तानी अवाम ने तहेदिल सेे लिया.

पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और महंगाई के लिए बदनाम आसिफ अली जरदारी का विकल्प जनता को तलाशना ज़रूरी था.

राष्ट्रीय राजनीतिक दल इस घड़ी में खस्ताहाल पारिवारिक जागीर में तब्दील हो चुका था.

तख्ता पलट की आशंका से परेशान जरदारी ने मेमोगेट प्रकरण में अपनी लाचारी बेनकाब कर दी थी. ऐसा नेता सुशासन कैसे दे सकता था.

आर्थिक संकट हो या समाज के वंचित तबके को राहत दिलाने वाले कार्यक्रम, प्राकृतिक आपदा के समय सार्थक हस्तक्षेप अथवा संघीय ढांचे वाले राज्य की विभिन्न इकाइयों की आकांक्षाओं का सामंजस्य, सभी मोर्चों पर उनकी सरकार नाकाम साबित हो चुकी थी. यह बात हर पाकिस्तानी के लिए नाकाबिल-ए-बर्दाश्त थी कि जरदारी-भुट्टो परिवार पाकिस्तान की संप्रभुता या सम्मान की हिफाजत करने में पूरी तरह नाकाम नज़र आता रहा. पाकिस्तान में बिजली संकट भी गहराता गया, जिसका समय रहते सरकार ने कोई हल ही नहीं निकाला.

आंतरिक समस्याएं

जरदारी की हार का सबसे बड़ा कारण बना बिजली संकट. हालांकि इससे निजात दिलाने के लिए फिलहाल नवाज शरीफ के पास कोई रोडमैप नहीं है. एक कटु सच यह भी है कि पाकिस्तान में 18 से 20 घंटे तक बिजली कटौती हो रही है और इसे दुरुस्त करने के लिए उत्पादन और ज़्यादा बढ़ाना होगा, यानी अपने पूरे शासन के दौरान नवाज शरीफ बिजली समस्या से दो-चार होते रहेंगे.

भ्रष्टाचार और महंगाई

पाकिस्तान के आर्थिक हालात बेहद खस्ताहाल हैं. महंगाई ने मुल्क को अब तक की सबसे भयावह स्थिति में पहुंचा दिया है. भ्रष्टाचार तेजी से पांव पसारता जा रहा है. ग़ौरतलब है कि कुछ समय पहले पाकिस्तान में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लोग सड़कों पर भी उतर चुके हैं, इसलिए इससे निजात पाने के लिए उन्हें कड़े क़दम उठाने होंगे, लेकिन खुद उन पर भी कई आरोप हैं. इसी के चलते 1993 में वह बर्खास्त भी हो चुके हैं. यही नहीं, नवाज शरीफ की पार्टी के कई नेता इस आरोप से जूझ रहे हैं.

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आतंकवाद से निपटना ज़रूरी आतंकवाद से पाकिस्तान का चोली-दामन का साथ रहा है. अभी भी बड़े एवं खूंखार आतंकी वहां पनाह पा रहे हैं. इसे लेकर कई देशों ने अपनी चिंता पाकिस्तान से साझा भी की है, लेकिन पाकिस्तान के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी. एक तरफ़ खैबर पख्तूनख्वा एवं अफगान से लगे इलाकों में अलकायदा और तालिबान सक्रिय हैं, तो वहीं दूसरी ओर चुनाव में बेशक तालिबान नाकाम रहा हो, लेकिन आएदिन होने वाले धमाके उसकी उपस्थिति बता ही देतेे हैं. नवाज को इस स्थिति से भी निपटना होगा, लेकिन यह सेना के सहयोग के बिना असंभव दिख रहा है.

क्या है विकल्प?

नवाज शरीफ फिलहाल सेना या आईएसआई से दो-दो हाथ करने से बचेंगे, यानी विदेश नीति में वह फिलहाल कोई बदलाव नहीं करने वाले हैं. वह भारत एवं अमेरिका से रिश्तों में वैसी ही तल्खी बनाए रख सकते हैं, जैसी अभी है. हांं, अफगान के मुद्दे पर ज़रूर वह सक्रियता दिखा सकते हैं, क्योंकि सेना भी यही चाहती है.

 

धनी परिवार के हैं नवाज

पाकिस्तान में तीसरी बार प्रधानमंत्री का ताज पहन चुके नवाज शरीफ का जन्म पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में एक धनी परिवार में 25 जनवरी, 1949 को हुआ था. लाहौर के सरकारी कॉलेज से स्नातक और पंजाब यूनिवर्सिटी से क़ानून की डिग्री हासिल करने वाले शरीफ का निजी एवं राजनीतिक जीवन बहुत उतार-चढ़ाव से भरा रहा.

भारत से गहरा रिश्ता

नवाज शरीफ पाकिस्तान की सियासत में इतिहास रचने जा रहे हैं. सरहद के उस पार इतिहास रचने वाली इस शख्सियत का इतिहास भारत की मिट्टी से ही निकला हैै. बस एक पीढ़ी पहले नवाज के पिता पंजाब के तरनतारन के एक गांव में रहा करते थे. नवाज शरीफ के पिता मियां मुहम्मद शरीफ कारोबार के सिलसिले में लाहौर चले गए. कारोबार चल निकला, तो वे लोग वहीं बस गए. लाहौर के उनके घर का नाम भी जात्ती उमरा ही है. सियासत की ज़मीन बनाते-बनाते नवाज शरीफ भले ही अपनी असली ज़मीन भूल गए हों, लेकिन यहां की मिट्टी आज भी उन्हें याद करती है.

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