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लड़कियों से ऩफरत करता है तालिबान

लड़कियों से ऩफरत करता है तालिबान

तालिबान के निशाने पर पाकिस्तान की महिलाएं हैं. तालिबान हमारे अधिकारों पर हमला कर रहा है, और वह हमें उनसे मरहूम रखने की हर कोशिश में लगा है. हमारे वे बुनियादी अधिकार भी सुरक्षित नहीं हैं जो हमें खुद इस्लाम नेे नवाज़े हैं. पाकिस्तान में आज हमारी हालत कुछ इस तरह है कि आप यक़ीन नहीं कर सकते कि दुनिया इक्कीसवीं सदी के भी दस साल काट चुकी है और पाकिस्तान में हम इस्लाम के पहले की दुनिया में जी रहे हैं, जब महिलाओं को एक ग़ुलाम माना जाता था और वह पुरुषों की महज संपत्ति हुआ करती थी. महिलाओं की खुद की इच्छा यहां कोई मायने नहीं रखती और इस बात का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि हमें निकाह के मसौदे में कोई पक्ष भी नहीं माना जाता. ज़्यादातर मुलसमानों को लड़की की पैदाइश एक बोझ लगती है, शर्म से उसका सिर समाज के सामने झुक जाता हैै.  यहां तक कि क़ुरान में दर्ज है कि- जब भी किसी को बेटी पैदा होने की ख़बर मिलती, उसका चेहरा दुख से काला पड़ जाता, वह समाज से छिपने लगता है, क्योंकि बेटी को जन्म देना एक गुनाह है. उस शख्स के सामने सवाल खड़ा हो जाता है कि वह इस गुनाह के साथ समाज में मुंह छिपा कर रहे या फिर अपनी संतान को ज़मीन में द़फन कर दे. ज़ाहिर है, फैसला शैतानी होगा. ऐसा ही कुछ हाल तालिबान का है. वे इस्लाम के पूर्व की दुनिया के जाहिल हैं. उन्हें लड़की जात से ही ऩफरत है. अंतर महज़ इतना है कि वे उसे जिंदा द़फन करने के बजाय उसकी ज़िंदगी को ही नर्क से बदतर बना देते हैं. इन जाहिलों को यह भी नहीं पता कि इस्लाम ने महिलाओं को पुरुषों की बराबरी के अधिकार से नवाज़ा है और समाज में उन्हें भी वह इज़्ज़त बख्शी है जो पुरुष खुद के लिए मानते हैं. मुसलमान महिलाओं को अधिकार अल्लाह ने दिया जो नेक है, रहमदिल है, जो इंसाफ परस्त है और जो सब कुछ जानता है. ये अधिकार उसे हज़ारों साल पहले उसी वक्त दे दिए गए थे जब उसे बनाया गया.  क़ुरान शरीफ में अल्लाह कहते हैं- अरे यक़ीन करने वालो, किसी महिला को उसकी इच्छा के ख़िला़फ जाकर अपनाने पर पाबंदी है, और तुम्हें उनके साथ बुरा बर्ताव नहीं करना चाहिए. इससे ज़ाहिर है कि खुदा ने महिलाओं के साथ नरम दिली की बात कही है और इस्लाम के ये जाहिल समर्थक हम पर कोड़े बरसा रहे हैं. क्या यही उनके लिए खुदा के फरमान की तामील है?  इस्लाम के हिमायती बने तालिबानी आज अपने ख़ास मक़सद से शरीअत को लागू कररहे हैं और जो भी उनके इस शरीअत के ख़िला़फ जा रहे है उन्हें सज़ा दी जा रही है. इस तालिबानी शरीअत ने फरमान जारी कर महिलाओं को बाज़ार जाकर ख़रीददारी करने पर रोक लगा दी है. हालात ऐसे हैं कि महिलाएं आज उन दुकानों का रुख़ भी नहीं कर सकतीं जो ख़ास महिलाओं की ख़रीददारी के लिए बने हैं. तालिबानी फरमान में उन दुकानदारों को भी धमकी दी गई है जो महिला को सामान बेचते पाए जाते हैं. इस फरमान के पोस्टर आज स्वात घाटी में देखे जा सकते हैं.  इनमें साफ-साफ लिखा है कि महिलाओं का बाज़ार जाना इस्लाम के ख़िला़फ है. मेरा सवाल है कि क्या तमाम मुस्लिम मुल्कों में चल रहे शॉपिंग सेंटर औैर बाज़ार ग़ैर इस्लामी है. अगर वह ग़ैर इस्लामी हैं तो उनके ख़िला़फ कोई कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं. क्यों महज़ पाकिस्तानी महिलाओं को हाशिए पर रखा जा रहा है. इस्लाम में महिलाओं के लिए सबसे अहम अधिकार तालीम का है. तालीम पा लेने के बाद उसे अपने हक़ को मांगने या हक़ के लिए लड़ने की ज़रूरत नहीं है. क्योंकि यह हक़ उसे  खुद अल्लाह ने दिया है. और इन जाहिलों को इसी बात का डर है कि अगर महिलाओं को खुदा के नवाज़े इस हक का एहसास हो जाएगा तो वह समाज के इस आधे तबके पर अपना असर गंवा बैठेंगे. इसी वजह से तालिबान, महिलाओं को हर कदम पर तालीम लेने से रोक रहा है. लड़कियों के स्कूलों को तोड़ा जा रहा है. वे हमारे स्कूलों में घुसते हैं और हमारे चेहरे पर तेज़ाब फेंकने की धमकी देते हैं.  मैं खुद लाहौैर के कैनार्ड कॉलेज में पढ़ती हूं. यह कॉलेज, महिलाओं का एक प्रतिष्टित कॉलेज है और इस बात पर यकीन रखता है कि महिलाएं पुरुषों के साथ हर पेशे में कदम मिलाकर चल सकती है. मेरा कॉलेज महिलाओं की आज़ादी में विश्वास रखता है और हमें ज़िंदगी के हर क्षेत्र में बेहतर करने के लिए तैयार करता है. तालिबान हमारे कॉलेज को भी नहीं छोड़ रहा है. कॉलेज प्रशासन पर दबाव डाला जा रहा है कि लड़कियों पर तालिबानी ड्रेस कोड लागू किया जाए नहीं वे सख्त कार्रवाई करेंगे.  तालिबानी, कॉलेज की लड़कियों को शरीफ रहने की हिदायत दे रहे हैं, जिसके लिए वे जींस या शरीर पर कसे हुए कपड़ों को पहनने पर पाबंदी लगा रहे है. यह तो केवल मेरे कॉलेज की बात है. पाकिस्तान के हर शहर में जिस तरह से लड़कियों को शिकार बनाया जा रहा है, उससे आज उनके साथ-साथ उनके परिवार भी खौफ में जी रहे हैं. आज ज्यादातर परिवारों ने अपनी लड़कियों को स्कूल भेजना बंद कर दिया है.  आज पाकिस्तान में तालिबानी शरीअत लागू करने की कोशिशों से सभी परेशान है. इसके विरोध में महिलाएं पीछे नहीं हैं. वह भी अपने घरों से बाहर निकल कर बेखौफ होकर तालिबानी ताकतों का विरोध कर रही है. पिछले हफ्ते ही विमेंस एक्शन फोरम की कराची शाखा ने सभ्य समाज से लोगों को बुलाया और तालिबान को मुंह तोड़ जवाब देने के लिए साझा रणनीति बनाने की बात कही. फोरम की इस बैठक में कई कलाकारों, फिल्मी हस्तियों और प्रोफेशनल महिलाओं ने शिरकत की. इस बैठक में माहौल उस वक्त गमगीन हो गया जब महिला अधिकारों के लिए लड़ रही एक एक्टिविस्ट ने कहा कि हम वापस जिया उल हक़ के दौर में आ गए है.  फर्क महज़ इतना है कि उस वक्त हम स्टेट से लड़ रहे थे. आज हम महिलाओं के लिए नफरत से लड़ रहे हैं जिसे वे लोग फैला रहे हैं जो आज इतनेे ताक़तवर हो गए हैं कि स्टेट भी उनका कुछ नहीं कर पा रहा है. शायद इसलिए कि वे लोग बिना किसी नियम क़ानून के खेलते हैं. विमेंस एक्शन फोरम, कराची की इस बैठक में निज़ाम-ए-अदल समझौतों के बाद के हालात से निपटने के लिए नए प्रस्ताव रखे गए. ये महिला संगठन मांग कर रहे हैं कि समूचे पाकिस्तान के लिए एक संविधान और एक क़ानून बनाया जाए. पाकिस्तान सरकार के फरमान के ऊपर किसी को तरज़ीह न दी जाए. आतंकियों के हथियारों को तत्काल छीन लिया जाए. और वे सभी घोषणाएं जो किसी एक  तबके के पाकिस्तानियों के लिए की गई हैं, उन्हें खारिज़ किया जाए. यहां तालिबान के इर्द-गिर्द घूम रहे एक भ्रम को साफ करना ज़रूरी है. तालिबान किसी बाहरी ख़तरे का स्वरूप नहीं है, न ही उसे रूस या भारत से फंडिंग की जा रही है. 1990 के दशक में अफगानिस्तान में तालिबानी नॉदर्न एलायंस से लड़ रहे थे. उसी दौर में पाकिस्तान के कबाइली इलाकों से हज़ारों की संख्या में पश्तून के पैदल लड़ाके तालिबान की तरफ से लड़ने अफगानिस्तान पहुंचे थे. 2001 में अफगानी तालिबानी पाकिस्तान भाग आए. उस वक्त पाकिस्तानी तालिबान कमज़ोर था. उन्होंने अफगान से आ रहे तालिबानियों की ख़िदमत की और उसके बदले उनसे काफी पैसे कमाए.  2001 से 2004 तक पाकिस्तानी तालिबानियों की संख्या कई गुना हो गई और अफगानी तालिबानियों की संगत में वे ज़्यादा कट्टर हो गए. इसी दौर में उन्होंने तालिबान के लिए एक अलग राज्य की संकल्पना की और वही संकल्पना आज उन्हें हक़ीक़त होती दिख रही है.  आज तालिबान के सभी प्रमुख लीडर पाकिस्तान में हैं और वह पाकिस्तान सरकार को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहते है. पाकिस्तान में आज ये लड़ाके और भी संगठनों के साथ हाथ मिला रहे हैं. आज तालिबानियों की मुहिम में कश्मीर से लश्कर-ए-तैयबा और हरकत-उल-मुजाहिदीन भी जुड़ चुके हैं. यहां तक कि उनके साथ कुछ पंजाबी लड़ाके भी शामिल हो चुके हैं. मेरी समझ से, अब वक्त आ चुका है जब इन संगठनों को जो पाकिस्तान के लिए ख़तरा बन चुके हैंै, जड़ सहित उखाड़ फेंकना चाहिए. इनके ख़िला़फ कड़ी सैनिक कारवाई होनी चाहिए और इनका नामोनिशान इस पाक ज़मीन से हमेशा-हमेशा के लिए मिटा देना  चाहिए. आज मुश्किल की इस घड़ी में पाकिस्तानियों को एकजुट होकर इन ताक़तों का विरोध करना चाहिए, ताकि इस्लाम पर मंडरा रहे ख़तरे को टाला जा सके.

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