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आतंक के लिए पैसा
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आतंक के लिए पैसा

पाकिस्तान-अ़फग़ानिस्तान की सीमा पर आतंकवाद के ख़िला़फ चल रही लड़ाई की तस्वीर लगातार बदसूरत होती जा रही है. आतंकवाद के ख़ात्मे के बजाय यह कट्टरवादी शब्दाडंबरों, साजिशों और अलग-अलग समूहों की स्वार्थ सिद्धि का माध्यम बनती जा रही है. इसके साथ यदि मीडिया में इसे मिल रही सुर्ख़ियों को जोड़ दें तो यह वैसा ही प्रतीत होता है, जिसकी आशंका कई लोग व्यक्त करते रहे हैं यानी एक-दूसरे पर दोषारोपण का खेल, संभावनाओं का खेल और दांव लगाने का खेल. लेकिन इसके साथ ही हमें बार-बार इसकी हक़ीक़त और इसमें हो रही मौतों के अंतहीन सिलसिले से भी रूबरू होना पड़ता है. दारा अदमखेल और पेशावर के बाहरी इलाक़े में हुआ हादसा इसका सबसे ताजा उदाहरण है. अखोरवाल में नमाज के दौरान हुए आत्मघाती हमले में बड़ी संख्या में निर्दोष लोगों की मौत हुई, जिनमें कई बच्चे भी शामिल थे. कुछ ही घंटों बाद बधबेर में एक और मस्जिद पर ग्रेनेड दागे गए, जिसमें तीन लोग मारे गए. हैरत की बात तो यह है कि इन वीभत्स वारदातों के बाद भी आतंकवाद से जुड़ी सप्ताह की सबसे बड़ी ख़बर ओबामा प्रशासन द्वारा भारत विरोधी आतंकी संगठनों, लश्करे तैयबा एवं जैश-ए-मोहम्मद के ख़िला़फ और कड़ा रुख़ अपनाने की घोषणा रही. इन वारदातों के बाद लोग यह सोचने को मजबूर हो गए कि पाकिस्तान विरोधी आतंकी संगठनों के ख़िला़फ कार्रवाई करने की ज़रदारी प्रशासन की घोषणा का क्या हुआ. अमेरिकी प्रशासन द्वारा आतंकी संगठनों के ख़िला़फ प्रतिबंध और कड़े करने की घोषणा के लिए समय का चुनाव काफी सोच-समझ कर किया गया. ओबामा की भारत यात्रा से ठीक पहले इसे सार्वजनिक करने का उद्देश्य भारत को यह विश्वास दिलाना था कि अमेरिका पाकिस्तान के चलते भारत के हितों की अनदेखी नहीं कर रहा. कूटनीति के लिहाज़ से देखा जाए तो यह महत्वपूर्ण है कि प्रतिबंधों में आतंकी संगठनों के आर्थिक पहलुओं पर चोट करने की कोशिश की गई है. अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने जैश और लश्कर की संपत्तियों को सील कर दिया है और उनके सभी वित्तीय लेनदेन पर रोक लगा दी गई है. अल रहमान जैसे उनके सहयोगी संगठनों के साथ भी हर तरह के वित्तीय लेनदेन पर रोक लगा दी गई है. अमेरिका ने आजम चीमा, मसूद अजहर और हफीज अब्दुल रहमान मक्की जैसे आतंकी संगठनों के नेताओं को भी देश के वित्तीय संस्थानों के इस्तेमाल से प्रतिबंधित कर दिया है. लश्करे तैयबा के लिए पैसे उगाहने के काम में मक्की के नाम की बार-बार चर्चा होती रही है.

भारत के साथ संबंधों को अच्छा बनाने के लिहाज़ से अमेरिकी प्रशासन द्वारा आतंकी संगठनों पर आर्थिक प्रतिबंध लगाना काफी महत्वपूर्ण है. इन संगठनों को पैसे न मिलें तो इनकी गतिविधियां ख़ुद-ब-ख़ुद कम हो जाएंगी.

भारत के साथ संबंधों को अच्छा बनाने के लिहाज़ से अमेरिकी प्रशासन द्वारा आतंकी संगठनों पर आर्थिक प्रतिबंध लगाना काफी महत्वपूर्ण है. इन संगठनों को पैसे न मिलें तो इनकी गतिविधियां ख़ुद-ब-ख़ुद कम हो जाएंगी. आतंक की दुनिया में धन की ज़रूरत केवल असलहे जमा करने के लिए ही नहीं होती, बल्कि यहां-वहां जाने, आतंकियों एवं उनके परिवार के लिए रोटी की व्यवस्था करने, नए सदस्यों की भर्ती और उनके प्रशिक्षण, आतंकी विचारधारा के प्रचार-प्रसार और सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देने के लिए भी होती है. एक ओर जब पाकिस्तान में सुरक्षा के हालात लगातार बद से बदतर होते जा रहे हैं, इस्लामाबाद को न केवल भारत विरोधी, बल्कि हर तरह के आतंकी संगठनों की आर्थिक गतिविधियों पर नकेल कसने के लिए अपने स्तर से क़दम उठाने चाहिए. हालांकि ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान ने इसके लिए कोशिश नहीं की है. अवैध धन के इस्तेमाल के ख़िला़फ क़ानून बनाया गया है, जिसमें आतंकी संगठनों के साथ पैसों के लेनदेन को अपराध घोषित किया गया है. इस साल सितंबर में पाकिस्तान के सिक्यूरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन ने स्टॉक एक्सचेंजों और देश की 600 से भी ज़्यादा वित्तीय कंपनियों को इंटरनेशनल फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) के सुझावों के अनुरूप आतंकरोधी आर्थिक प्रावधान अपनाने का निर्देश दिया. इन कोशिशों का असर भी साफ दिखने लगा है. 2001 के बाद से बैंकों के मार्फत होने वाले लेनदेन में चार गुना इज़ा़फा हुआ है, जबकि अन्य माध्यमों से होने वाले पैसों के लेनदेन में खासी कमी आई है.

लेकिन आतंकियों की आर्थिक गतिविधियों पर लगाम कसने के लिए पाकिस्तान अपने स्तर पर कुछ खास नहीं कर रहा. उसने जो कुछ भी किया है, वह अमेरिकी वित्त मंत्रालय के दबाव में आकर किया है और उन सुझावों की तामील कर रहा है, जो एफएटीएफ की ओर से मिल रहे हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि जब तक ख़ुद पाकिस्तान का राजनीतिक नेतृत्व इसके लिए इच्छाशक्ति नहीं दिखाता और अपनी ओर से कोई पहल नहीं करता, तब तक आतंकी संगठनों के खातों में पैसे जमा होते रहेंगे और वे उतनी ही बेदर्दी से पाकिस्तानी नागरिकों को भी अपना निशाना बनाते रहेंगे, जितनी अ़फग़ानिस्तान में विदेशी सैनिकों को. वाशिंगटन से निर्देश मिलने की प्रतीक्षा करने के बजाय इस्लामाबाद को अवैध धन की आवाजाही पर रोक लगाने के लिए अपनी रणनीति बनानी चाहिए. उदाहरण के लिए सरकार चाहे तो वित्तीय संस्थानों के लिए लाइसेंस की व्यवस्था या इसी तरह के अन्य प्रावधान अपना सकती है. दूरसंचार विभाग के साथ मिलकर सरकार मोबाइल बैंकिंग को भी प्रोत्साहित कर सकती है. इससे नकद लेनदेन में कमी आएगी और अवैध धन के हस्तांतरण पर भी रोक लगाने में मदद मिलेगी. सरकार इस्लामिक संस्थानों की वित्तीय गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए निगरानी कमेटियों का गठन भी कर सकती है, क्योंकि इन संस्थाओं पर आतंकी संगठनों के मुखौटे के रूप में काम करने के आरोप अक्सर लगते रहते हैं. खाड़ी क्षेत्र से होने वाले पैसों के लेनदेन पर खास नज़र रखने की ज़रूरत है. इसके अलावा स्टेट बैंक को अपनी आर्थिक निगरानी शाखा को मज़बूत बनाने और अधिकारियों को जांच-पड़ताल के प्रशिक्षण का अधिकार भी दिया जाना चाहिए.

आतंकी संगठनों की वित्तीय गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए सुनियोजित प्रयास करने से देश के अंदर, खासकर शहरी इलाक़ों में भी अपराधों की संख्या में कमी आ सकती है. यह बात जगजाहिर है कि उक्त संगठन धन के लिए मादक पदार्थों एवं हथियारों की तस्करी, बैंक डकैती, अपहरण और यहां तक कि क्रेडिट कार्ड में घपले का भी सहारा लेते हैं. यदि पैसों के लेनदेन पर नज़र रखी जाए तो अधिकारी शहरी इलाक़ों में सक्रिय आपराधिक संगठनों की पहचान कर सकते हैं और यह भी जान सकते हैं कि कौन से संगठन आतंकियों के साथ जुड़े हैं. यह भी सत्य है कि आतंकी संगठनों की वित्तीय गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए अकेली सरकार ही ज़िम्मेदार नहीं है. जैसा कि सउदी अरब में हो रहा है, पाकिस्तान के धार्मिक नेतृत्व को भी इसके लिए आगे आना होगा और धन के अवैध लेनदेन के ख़िला़फ आवाज़ बुलंद करनी होगी. इस साल मई में सउदी अरब के वरिष्ठ उलेमाओं की परिषद ने फतवा जारी करके कहा था कि आतंकियों को धन देना आत्मघाती हमलों की श्रेणी का गंभीर अपराध है. देश के धार्मिक नेतृत्व ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि शरियत में आतंकी संगठनों को आर्थिक मदद देने की मनाही है. उसने तो यहां तक कह दिया कि ऐसी मदद देने वाले लोग आतंकियों से भी ज़्यादा ख़तरनाक हैं, क्योंकि वे उनके नापाक मंसूबों में मददगार होते हैं. पाकिस्तान के धार्मिक नेता भी यदि इसी तरह का कोई फतवा जारी करते हैं तो आर्थिक जिहाद के मंसूबे पाल रहे आतंकियों पर नकेल कसने में सहूलियत होगी. इस मामले में मीडिया की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण हो सकती है. आतंकी संगठनों को मिलने वाली करोड़ों डॉलर की राशि वही होती है, जो आम जनता दान में धार्मिक या सामाजिक संस्थाओं को देती है. लोग इस बात को नहीं समझते, लेकिन मीडिया चाहे तो इस संबंध में जागरूकता पैदा कर सकता है. वह दानकर्ताओं से इस बात की अपील कर सकता है कि पैसे देने से पहले वे संबंधित संस्था के बारे में अच्छी तरह जांच-पड़ताल कर लें. इतना तय है कि यदि आतंकियों के आर्थिक नेटवर्क को पंगु बनाना है तो इसके लिए सबसे पहले सरकार को अपनी इच्छाशक्ति दिखानी होगी. यदि ऐसा नहीं हुआ तो अखोरवाल की तरह आतंकी हमले होते ही रहेंगे, आतंकी निर्दोष लोगों के साथ ख़ून की होली खेलते ही रहेंगे, अ़फग़ानिस्तान में चल रही लड़ाई का भविष्य चाहे जो भी हो.

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