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अमेरिका की दादागिरी चलती रहेगी
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अमेरिका की दादागिरी चलती रहेगी

कल तक दुनिया को यह पता था कि वे अमेरिका द्वारा साइबर हमले के विरोध में अपनी बात उस तक पहुंचाने में सफल हो गए हैं, लेकिन वे ग़लत थे, क्योंकि हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने यह कह कर सनसनी फैला दिया है कि उनका देश विश्‍व के अन्य देशों की जासूसी करता रहेगा. अमेरिका की इस दादागिरी से आने वाले दिनों में पूरे विश्‍व में अगर साइबर वार छ़िड जाए, तो इससे इंकार नहीं किया जा सकता.

p11एक तो चोरी, क तो चोरी, ऊपर से सीनाजोरी, ये जुमला अमेरिका पर हमेशा से ही सही साबित होता आया है. ताज़ा मामला दूसरे देशों की जासूसी का है, जिसका खुलासा एडवर्ड स्नोडेन ने किया था, जब उसने अमेरिका द्वारा चलाए जा रहे प्रिज्म कार्यक्रम के बारे में दुनिया को बताया था. इस खुलासे के बाद दुनिया के अधिकांश देशों ने अमेरिका का क़डा विरोध किया था. इसी कार्यक्रम को लेकर पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने यह कहकर सनसनी फैला दी कि वह विदेशी सरकारों की जासूसी करता रहेगा और इस कार्यक्रम को बंद नहीं करेगा. ओबामा के इस कथन से अमेरिका की साइबर दादागिरी का पता चलता है. जर्मनी चासंलर एंजेला मर्केल ने जी 8 सम्मेलन के दौरान अमेरिकी जासूसी का मुखर विरोध किया था और कहा था कि अमेरिका ने अपनी इस करतूत के कारण पूरे विश्‍व के देशों का विश्‍वास खो दिया है. अमेरिका की जासूसी के चलते जर्मनी ही नहीं, बल्कि विश्‍व के अन्य देश भी समय-समय विरोध दर्ज़ कराते रहे हैं, लेकिन ओबामा ने उनके विरोध को दरकिनार कर जिस तरह से अपना फरमान सुनाया है, वह आने वाले दिनों में विश्‍व के देशों को एक बार फिर अमेरिका की मनमानी पर सोचने के लिए बाध्य कर देता है. सबसे ब़डी बात यह है कि ओबामा ने जर्मनी जैसे देशों को अमेरिका के सर्विलांस प्रोग्राम से परेशान न होने का आश्‍वासन दिया है, जिससे उसकी दोहरी नीतियों का भी पता चलता है. अमेरिका के इस कदम पर कई सवाल उठने लगे हैं. पहला सवाल यह कि अमेरिका की मंशा क्या है? अधिकारों की बात करने वाला अमेरिका दूसरे के घरों में क्यों झांकना चाहता है? क्या लोकतंत्र की पैरवी करने वाले अमेरिका ने दूसरे देशों की संप्रभुता को ताक पर रख दिया है? वह दूसरे देशों की जासूसी कर आखिर अपना कौन सा मक़सद पूरा करना चाहता है? क्या अमेरिका साइबर वार की तैयारी में है?

ऑपरेशन प्रिज्म
ऑपरेशन प्रिज्म अमेरिकी खुफिया एजेंसी एनएसए द्वारा शुरू किया गया खुफिया प्रोजेक्ट है, जिसका उद्देश्य विभिन्न देशों से संबंधित खुफिया जानकारी हासिल करना है. अपने इसी उद्देश्य के तहत अमेरिका के एनएसए ने विभिन्न देशों के लाखों घरेलू फोन उपभोक्ताओं के रिकॉर्ड हासिल किया. ब़डी बात तो यह है कि अमेरिका के इन करतूतों के खुलासे के बावजूद ओबामा प्रशासन ने इसे उचित ठहराया है. ओबामा का कहना है कि आप सौ फ़ीसद सुरक्षा और सौ फ़ीसद गोपनीयता को एक साथ लेकर नहीं चल सकते हैं. दूसरी चिंता इस बात की है कि अमेरिकी कंपनियां भी अपने देश की सरकार को इस काम में पूरा सहयोग दे रही हैं. ऐसा वे अपने आर्थिक लाभ के लिए कर रही हैं. हालांकि, वे कंपनियां इस बात का खंडन करती हैं और कहती हैं कि वे क़ानून के दायरे में रहकर ही इस तरह के आंकड़ों को सरकारों के साथ साझा करती हैं. हैरत की बात तो यह है कि गूगल जैसी कंपनी को एनएसए के प्रोजेक्ट के बारे में कुछ नहीं पता है. जिस तरह से उसने इस खुफिया प्रिज्म प्रोजेक्ट पर प्रतिक्रिया दी है, उससे तो कम से कम यही लगता है. गूगल पर यह आरोप है कि उसने अपने सर्वरों की जानकारी सरकारी एजेंसियों को पिछले दरवाजे से मुहैया कराई है. गूगल, माइक्रोसॉफ़्ट और याहू जैसी अमेरिकी कंपनियां कहती हैं कि अमेरिकी सरकार की ओर से इकट्ठा की गई जानकारी को रोकने के लिए वे उचित कदम उठा रही हैं. हालांकि उनका यह कदम संदेह से परे नहीं कहा जा सकता.

ओबामा ने प्रिज्म कार्यक्रम को जायज ठहराते हुए दलील दी है कि यह अमेरिका और उसके सहयोगियों की सुरक्षा के लिए बेहद ज़रूरी है. ग़ौरतलब है कि अमेरिका द्वारा जर्मनी और कुछ अन्य क़रीबी देशों की जासूसी कराए जाने से जुड़े एडवर्ड स्नोडेन के खुलासे के बाद यूएस के अपने क़रीबियों से रिश्ते तल्ख़ हो चले थे. ओबामा ने अपने सफाई में कहा है कि दूसरे देशों की सुरक्षा एजेंसियों की तरह ही अमेरिका की भी जासूसी एजेंसी है और वह इन एजेंसियों के प्रयोग के लिए स्वतंत्र है. यहां सवाल यह है कि कोई भी देश अपनी जासूसी एजेंसी के प्रयोग के लिए स्वतंत्र है, लेकिन क्या किसी देश को अपनी जासूसी एजेंसी के बहाने दूसरे देशों की जासूसी करने का हक़ मिल जाता है? जब विश्‍व के अन्य देश अमेरिका की जासूसी नहीं करते तो अमेरिका उनकी जासूसी क्यों कर रहा है? जूलियन असांजे के आरोपों से तो यही बात सामने आ रही है कि विश्‍व के देशों का अमेरिका ही जासूसी कर रहा है. दूसरा सवाल यह है कि जब अमेरिका दूसरे देशों की जासूसी कर रहा है तो उसे जायज ठहराता है, लेकिन जब अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी के पूर्व एजेंट एडवर्ड स्नोडेन उसके जासूसी प्रकरण की पोल खोलकर दुनिया के सामने रख देता है, तो अमेरिका को यह नागवार गुजरता है और वह स्नोडेन के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की ठान लेता है.

जूलियन असांजे:जूलियन पॉल असांजे विकीलीक्स के संस्थापक और मुख्य संपादक हैं. विकीलीक्स की स्थापना से पहले वे एक कंप्यूटर प्रोग्रामर और हैकर थे. विकीलीक्स पर उसके किए गए कार्यों के लिए 2008 में उन्हें इकॉनोमिस्ट फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन अवॉर्ड और 2010 में सेम एडम्स अवॉर्ड प्रदान किया गया. उन्होंने इराक युद्ध से जुड़े लगभग चार लाख दस्तावेज़ अपनी वेबसाइट पर जारी किए थे, जिसमें अमेरिका, इंग्लैंड एवं नाटो की सेनाओं के गंभीर युद्ध अपराध के प्रमाण मौजूद हैं. इन प्रमाणों को ख़ारिज करना नामुमकिन था, क्योंकि इसके अपने आधार थे. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इसके ख़िलाफ़ उन्हें चेतावनी दी, जिसके बाद गिरफ्तारी के डर से उसे छिप-छिप कर जीवन बिताना पड़ा. 30 नवंबर, 2010 को अंतरराष्ट्रीय लोक अभियोजन अधिकारी ने असांजे के ख़िलाफ़ रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया. उसके ख़िलाफ़ यौन अपराधों का मुक़दमा दर्ज़ किया गया और 7 दिसंबर, 2010 को असांजे को लंदन में गिरफ्तार कर लिया गया.

अमेरिका हर दिन लगभग 22 करोड़ एसएमएस की जासूसी करता है. विभिन्न देशों द्वारा विरोध के बावजूद भी अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एनएसए) हर दिन पूरी दुनिया से संदेशों की जासूसी कर अपने यहां सूचनाएं एकत्र कर रही हैं. इसके अलावा लोगों की यात्रा, आपसी संपर्क तथा क्रेडिट कार्डों के आधार पर की गई लेन-देन की भी जानकारी एजेंसी एकत्र कर रही है. अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी 2007 से ही दुनिया भर के कंप्यूटर नेटवर्क से ईमेल और अन्य सूचनाओं की खुफिया जासूसी कर रही है. इसके लिए उसका डाटा निगरानी तंत्र बाउंडलेस इंफॉर्मेट सक्रिय है. अमेरिका ने अपने इस निगरानी तंत्र के ज़रिये इस वर्ष मार्च में विश्‍व भर के कंप्यूटर नेटवर्क से 97 अरब सूचनाएं एकत्रित किया है. अमेरिका ने लगभग 14 अरब सूचनाएं अपने कट्टर दुश्मन ईरान से जुटाई. अमेरिका की यह जासूसी सिद्घ करता है कि वह किसी भी देश की जासूसी अपने सुरक्षा के लिए नहीं करता, जैसा कि वह कहता रहता है, बल्कि वह इन देशों की जासूसी इस आधार पर करता है कि उसका उस देश से किस हद तक अच्छे या बुरे संबंध हैं. अमेरिका ने पाकिस्तान से करीब 13.5 अरब जानकारियां एकत्रित कीं. अमेरिका द्वारा जानकारियां जुटाने के मामले में भारत पांचवें स्थान पर है. इंफॉर्मेट ने भारत से क़रीब 6.3 अरब सूचनाएं जुटाई हैं. अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी एनएसए फेसबुक, गूगल, याहू इत्यादि से जुड़े दूसरे देशों के उपभोक्ताओं की भी जानकारी जमा करती रही है. हालांकि गूगल, एप्पल और अन्य कंपनियों ने दावा किया है कि वे अपने उपभोक्ताओं के आंकड़ों की सुरक्षा को लेकर प्रतिबद्ध हैं और वे इन जानकारियों को किसी भी सरकार या एजेंसी के साथ साझा नहीं करते हैं. एनएसए ने उन अमेरिकी नागरिकों की जानकारियों पर भी नज़रें रखीं, जो दूसरे देशों में रहने वाले लोगों के संपर्क में थे. अमेरिका द्वारा की जा रही जासूसी के बारे में गोपनीय दस्तावेज़ों से पता चलता है कि एनएसए की ओर से कनाडा की एक एजेंसी ने लगभग 21 देशों की जासूसी की. कहा तो यहां तक जाता है कि अमेरिका के इस कार्यक्रम में ब्रिटेन की सरकार भी साथ है.
अभी हाल ही में अमेरिकी जासूसी से जर्मनी काफी परेशान हुआ था. जब यह बात सामने आई कि एनएसए ने जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल के फोन की जासूसी की थी तो दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध ख़राब हो गए थे. हालांकि अमेरिका अपने क़रीबी देशों को इस जासूसी प्रकरण से अलग रखने के लिए आश्‍वासन देता है कि वह उसके साथ ऐसा नहीं करता, ताकि उक्त देश के साथ वह अपने व्यापारिक और सामरिक संबंधों को मजबूती प्रदान कर सके. ऐसा ओबामा के हाल ही में दिए गए उस कथन से स्पष्ट होता है, जिसमें उन्होंने कहा कि जब तक वे अमेरिका के राष्ट्रपति हैं, जर्मनी को अमेरिकी जासूसी की तरफ से चिंता करने की ज़रूरत नहीं है. सिर्फ जर्मनी ही नहीं, बल्कि विश्‍व के अन्य देश भी अमेरिकी जासूसी से परेशान हैं. ब्राजील का भी आरोप है कि ई-मेल और टेलीफोन कॉल्स की जानकारी के लिए एनएसए ने ब्राजील की सरकारी तेल कंपनी पेट्रोब्रास के कंप्यूटर नेटवर्क में सेंध डाली थी.
भारत का सख्त रुख :अमेरिका द्वारा जासूसी मसले पर भारत ने अपने सख्त रुख़ से अमेरिका को अवगत कराया है. भारत हैरान है कि अच्छे संबंधों के बावजूद अमेरिका उसके कंप्यूटर नेटवर्क की खुफिया निगरानी करा रहा है. भारतीय विदेश मंत्रालय का मानना है कि साइबर जासूसी को लेकर चिंतित होना स्वाभाविक है. ऐसा करके अमेरिका भारत के निजता क़ानूनों का उल्लंघन कर रहा है, जो किसी भी संप्रभु राष्ट्र को स्वीकार्य नहीं होगा.

 

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