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अमेरिका उत्तर कोरिया तनाव: ट्रंप-किम की जिद से तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने पर दुनिया
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अमेरिका उत्तर कोरिया तनाव: ट्रंप-किम की जिद से तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने पर दुनिया

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तीन सितंबर को उत्तर कोरिया के छठे परमाणु परीक्षण के बाद दोनों देश युद्ध के कगार पर खड़े हैं. उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षण जारी रखने की धमकी के बीच अमेरिका ने परमाणु हथियारों से लैस अपने दो फाइटर जेट कोरियाई आसमान में उड़ा कर संकेत दे दिए हैं कि युद्ध की घोषणा कभी भी की जा सकती है. जवाब में उत्तर कोरिया ने भी धमकियों के साथ-साथ कूटनीतिक गोटियां चलनी शुरू कर दी हैं. उत्तर कोरिया ने कई देशों के प्रभावशाली नेताओं को एक पत्र भेजा है. 28 सितंबर को लिखे इस पत्र को ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री जूली बिशप ने अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट किया है. इस पत्र में उत्तर कोरिया ने स्वयं को परमाणु हथियार सक्षम राष्ट्र घोषित किया है और ट्रंप पर दुनिया को परमाणु युद्ध की ओर ढकेलने का आरोप लगाते हुए अमेरिका को सीख दिया है कि वह यूएन के युद्ध जैसे हालात से बचने के की सलाह पर अमल करे.

अमेरिका और उत्तर कोरिया केवल युद्ध के पूर्व हालात से नहीं बल्कि खतरनाक साजिशों के उस दौर से भी गुजर रहे हैं, जिसकी कीमत समूची दुनिया को न केवल अपनी शांति बल्कि अपने वजूद तक से चुकानी पड़ सकती है. उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच अगर लडाई हुई तो इस धरती के कितने लोग सुबह अपने बिस्तर से नहीं जग पाएंगे, ठीक-ठीक बता पाना किसी के लिए भी मुश्किल है, पर इन दोनों देशों के शासकों की जिद से छिड़ा युद्ध किन-किन देशों तक फैलेगा इसका संकेत साफ है. पहला निशाना बनेंगे दक्षिण कोरिया और जापान, और यहां यह बताने की जरूरत नहीं कि यह विश्वयुद्ध का आगाज होगा. विश्व अर्थव्यवस्था नष्ट हो जाएगी और दुनिया एक बार फिर तबाही वाले दौर में पहुंच जायेगी.

‘उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन हमेशा सत्‍ता के केंद्र में बने रहना चाहते हैं. वह चाहते हैं कि हर सुबह वह अपने बेड पर सोकर उठें और शासन करें, लेकिन अचानक अगर किसी दिन मिस्टर किम काम के लिए नहीं जगें तो इसके बारे में अमेरिकी खुफिया चीफ माइक से मत पूछिएगा.’ अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसी सीआईए के डायरेक्टर माइक पोम्पियो की यह टिप्पणी जितनी संशयपूर्ण है उतनी ही खतरनाक भी. क्या हमारा सभ्य कहे जाने वाला समाज वापस उसी कबीलाई युग, या शीतकालीन युद्ध वाले दौर में पहुंचनेवाला है, जब अपनी नीतियों के खिलाफ चलने वाले को दुश्मन मान छल से मारा जाएगा. माइक का इशारा यह बताने के लिए काफी है कि अमेरिका अपने विरोधी उत्तर कोरिया के शासक किम जोंग उन को लेकर किस तरह की बातें सोच रहा है.

इसीलिए रूस, चीन, यहां तक कि अमेरिका में भी तमाम लोग इस युद्ध के खिलाफ हैं. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने तो दोनों देशों के बीच गतिरोध को दूर करने के लिए ट्रंप प्रशासन की ओर से उत्तर कोरिया जाने की इच्छा भी जताई है. डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से 1977 से 1981 तक अमेरिका के राष्ट्रपति रहे कार्टर ने ट्रंप के सुरक्षा सलाहकार लेफ्टिनेंट जनरल एचआर मैकमास्टर से कहा कि समस्या के समाधान का प्रयास करने के लिए मैं उपलब्ध हूं. लेकिन कार्टर को अभी तक कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला है. कार्टर का कहना है कि वाशिंगटन में सत्ता से जुड़े लोग राष्ट्रपति ट्रंप और उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन के बीच चल रहे वाक् युद्ध से डरे हुए हैं. वह खुद भी हालात को लेकर आशंकित हैं. अमेरिका और उत्तर कोरिया दोनों के ही नेता अपने दबदबे को बरकरार रखना चाहते हैं. उत्तर कोरिया पर चीन के प्रभाव को ज्यादा करके आंका जा रहा है. लेकिन जहां तक उन्हें जानकारी है, किम जोंग उन का चीन के साथ खास रिश्ता नहीं है. हां, उनके पिता किम जोंग-इल जरूर चीन जाते थे और उनके वहां खास रिश्ते थे.

जिमी कार्टर के अनुसार किम जोंग उन के बारे में कुछ भी अंदाजा लगाना मुश्किल है. अगर किम को लगा कि ट्रंप उत्तर कोरिया के खिलाफ कुछ बड़ा करने जा रहे हैं तो वह उससे पहले ही बड़ा कदम उठा सकते हैं. इस स्थिति में उत्तर कोरिया परमाणु हमला कर सकता है, जिससे दक्षिण कोरिया, जापान और प्रशांत क्षेत्र में स्थित अमेरिकी ठिकाने बरबाद हो सकते हैं. राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के कार्यकाल में उनकी आपत्ति के बावजूद कार्टर एक बार प्योंगयांग गए थे और उन्होंने उत्तर कोरिया के तत्कालीन शासक किम इल सुंग से समझौते का प्रयास किया था. किम इल सुंग वर्तमान शासक किम जोंग के दादा थे.

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रूस ने भी इस हालात के लिए दोनों पक्षों के अहं को जिम्मेदार माना है. राष्ट्रपति पुतिन उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षण की निंदा और यूएन प्रतिबंधों का समर्थन करने बावजूद युद्ध की हिमायत नहीं करते. उनका कहना है कि, हमारा यह दृढ़ विश्वास है कि चाहे कितनी भी जटिल समस्या हो, चाहे सीरिया, लीबिया, कोरियाई प्रायद्वीप या यूक्रेन की समस्या हो, इसे अलग-थलग करने की बजाए बातचीत या कूटनीतिक रास्ते से सुलझाना चाहिए. युद्ध तो कोई समाधान है ही नहीं. ख़ास बात तो यह है कि व्हाइट हाउस ने भी पहले यही कहा था कि अमेरिका उत्तर कोरिया पर अधिकतम आर्थिक और कूटनीतिक दबाव डालना जारी रखेगा. पर अब हालात बदल गए हैं.

दुनिया में रक्षा मामलों को देख रही एक एजेंसी की रिपोर्ट ने खुलासा किया गया है कि यदि दोनों देशों के बीच युद्ध होता है तो टोक्‍यो ही नहीं सियोल भी उत्तर कोरिया के निशाने पर होगा, जिसमें करीब 20 लाख लोगों की जान एक झटके में चली जाएगी और करीब 70 लाख लोग घायल हो जाएंगे. हालांकि अमेरिका में भारतीय राजदूत रह चुकी मीरा शंकर यह तो मानती हैं कि कोरियाई प्रायद्वीप में तनाव बढ़ रहा है, पर उनके हिसाब से यह कोई नई बात नहीं है. बराक ओबामा के कार्यकाल में भी यह तनाव कायम था. उन्‍होंने भी उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए प्रतिबंध लगाए थे, जिसे मौजूदा राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने और कड़ा कर दिया है. इसलिए दोनों ही देश एक-दूसरे के बारे में चाहे जितनी कड़वी बातें करें, पर युद्ध से बचेंगे.हम उम्मीद रखें की ऐसा ही हो, क्योंकि पहले ही गरीबी, भूखमरी, आतंकवाद और पर्यावरण प्रदूषण का बोझ ढो रही दुनिया एक और विश्वयुद्ध न

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