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इराक को ख़त्म कर रहा है अमेरिका
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इराक को ख़त्म कर रहा है अमेरिका

अस्सी के दशक की शुरुआत में एक इराकी दीनार की कीमत 3 अमेरिकी डॉलर के बराबर थी. वर्तमान समय में 1 अमेरिकी डॉलर की कीमत तकरीबन सा़ढे ग्यारह सौ इराकी दीनार के बराबर है. आखिर पिछले तीन दशकों में ऐसा क्या हो गया जिसकी वजह इस तेल संपदा सम्पन्न  देश की आर्थिक स्थिति  बैहाल हो गई. वर्ष 1990 में इराक के शासक रहे सद्दाम हुसैन द्वारा कुवैत पर हमला करने और कब्जा करने के बाद अमेरिका और इराक के बीच शुरू हुआ विवाद आज इस स्थिति में आ पहुंचा है. सुदृढ़ अर्थव्यवस्था वाला देश आज ऐसी स्थिति में  पहुंचा गया है सरकार से ज्यादा चरमपंथी मज़बूत हो गए हैं. सरकार इतनी कमजोरी हो चुकी है कि उसे अपने सैनिकों का मनोबल ब़ढाने के लिए अमेरिका से टरमपंथियों के क़ब्जे वाले मांग करनी पड़ रही है.  अब इस मसले पर अमेरिका कह रहा है कि इराक में मौजूदा स्थितियों के लिए वह जिम्मेदार नहीं है. अमेरिका ने कहा है कि वह निर्देश दे सकता है लेकिन जबरदस्ती दखलंदाजी नहीं कर सकता है. यदि उसके पूर्व के कदमों पर नजर दौ़डाई जाए तो स्पष्ट दिखाई देता है कि उसने न सिर्फ एक समृद्ध देश के भीतर न केवल दखलंदाजी की बल्कि झूठे आरोप ग़ढकर उसे तबाह करने का काम भी किया. अमेरिका ने जिन जैविक हथियारों को आ़ड बनाकर इराक पर हमला किया था उनकी कोई पुष्टि नहीं हो सकी है. आइए जानने की कोशिश करते हैं मानवता को बचाने के लिए इराक पर किए गए अमेरिकी हमले से मानवता का कितना नुकसान हुआ और कितने मानवों की निर्मम हत्याएं इसकी वजह से हुईं… 

back-11जब आप ताकतवर होते हैं तो आप पर इस बात की जिम्मेदारी होती है कि यदि आप किसी कमजोर की मदद करने जा रहे हैं तो उसकी सुरक्षा का भी पूरा ख्याल रखेंगे. दुनिया का सबसे ताकतवर देश अमेरिका इराक में अपनी इस जिम्मेदारी को निभा पाने में पूरी तरह नाक़ामयाब रहा है. क्योंकि उसने अगर इराक पर इस बात के लिए हमला किया था कि सद्दाम हुसैन तबाही मचा सकते हैं तो उस तबाही को अमेरिका भी क्यों नहीं रोक सका. इराक में ऐसी स्थितियां निर्मित हो गईं थीं कि उसे वहां से भागना प़डा. अमेरिका ने इराक में सद्दाम युग का समापन तो कर दिया लेकिन उसके बाद वहां शुरू हुई जातीय हिंसा से पर रोक नहीं लगा पाया. साल 2003 में जब अमेरिका ने सद्दाम हुसैन को इराक की सत्ता से बाहर किया था, उसके बाद से यहां ईरान का प्रभुत्व ब़ढने लगा था. ईरान और इराक दोनों देशों में शिया बहुसंख्यक हैं. ईरान, इराक के शियाओं को व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष में सहयोगी के तौर पर देखने लगा. ऐसे में बहुत संभव है कि ईरान से मिले समर्थन के कारण सत्ता में आए प्रधानमंत्री नूरी अल मलिकी के शिया वर्चस्वादी रवैये ने सद्दाम हुसैन के समय में सत्ता में रहे सुन्नियों को नाराज कर दिया जिसका परिणाम हमें आज की परिस्थितियों के तौर पर देखने को मिल रहा है.
सिर्फ इतना ही नहीं इराक के विकास अथवा उसकी संप्रभुता और लोकतंत्र के विकास को लेकर भी जो अमेरिकी दावे किए गए थे वो सारे दावे आखिरकार खोखले साबित हुए. कच्चे तेल के उत्पादन में विश्‍व के अग्रणी देशों में शामिल इराक आज अपनी अर्थव्यवस्था तो दूर खुद की सुरक्षा कर पाने में नाकामयाब साबित हो रहा है. सरकार इस कदर कमजोर हो चुकी है कि उसके पास दूसरे देशों से मदद की गुहार करने के अलावा और कोई उपाय शेष नहीं रह गया है. देश की समस्या के तौर पर कई राजनीतिक टिप्पणीकार इसे असल समस्या मानते ही नहीं हैं. उनके मुताबिक अलगाववाद के कारण उपजे मतभेद देश की समस्या के मूल कारण नहीं हैं. दरअलस, इराक की आर्थिक और सामाजिक विफलता ने ही सामाजिक विभेद को ब़ढावा दिया है. तेल का ब़डा भंडार होने के बावजूद भी इराकी जनता गरीबी की मार झेल रही है. देश में भ्रष्टाचार का स्तर भी काफी ऊंचा रहा है.
दरअसल इराकी जनता शुरूआत से ही अमेरिका की उपस्थिति को अपने देश में बाहरी प्रभुत्व के तौर पर देखती रही है. अमेरिकी सैनिकों को न सिर्फ वहां के अतिवादी बल्कि वहां की जनता, जो उसे कभी उन्हें अपने रहनुमा के तौर पर देखती थी, भी इस तरह से देखने लगी जैसे किसी ने अपने घर की सुरक्षा के लिए कोई बाहरी प्रहरी तैनात कर दिया हो. यह पूरी तरह से अमेरिका की जिम्मेदारी थी कि वहां की जनता को इस बात का भरोसा दिलाए कि वे उनकी रक्षा और देश की बेहतरी के लिए वहां आए हैं. लेकिन दुखद रूप से ऐसा कर पाने में अमेरिका सफल नहीं रहा. अमेरिका तोे नाकामयाब रहा लेकिन वहां मौजूद आतंकी गुट अतिवादी सोच रखने वालों को यह बात समझाने में सफल हो गए कि अमेरिका ने देश से सुन्नी संप्रदाय के सद्दाम हुसैन को हटाकर नूरी अल मलिकी को देश का प्रधानमं़त्री बना दिया है, जो सिर्फ देश में बहुसंख्यक शियाओं के प्रतिनिधित्व को ब़ढाने में लगे हैं. उन्होंने न सिर्फ एक समुदाय को हाशिए पर रखा बल्कि इस स्थिति तक ले आए कि आज वही लोग सरकार से नाराज होकर देश के टुकड़े करने के लिए तैयार हो गए हैं.
2003 में जब अमेरिकी सेना इराक में घुसी थीं, तब वर्तमान समय हो रही आतंकी गतिविधियों के लिए जिम्मेदार आतंकी समूह आईएसआईएस (इस्लॉमिक स्टेट ऑफ इराक एण्ड द लैवेंट) का सरगना अबु बक्र अल बगदादी उस समय एक मस्जिद में मौलवी का काम करता था. निश्‍चित तौर पर यह बाहरी सेनाओं के देश में इस तरह से घुसने का नतीजा ही था कि आज वह इतने ब़डे स्तर पर आतंकी घटनाओं को अंजाम दे रहा है. यह आतंकी समूह शुरुआत में अल कायदा का ही हिस्सा था लेकिन बाद इन दोनों के बीच मतभेद हो गए और दोनों अलग हो गए. अप्रैल 2013 में जब आईएसआईएस अस्तित्वत में आया तो अल बगदादी ने यह घोषणा की थी कि सीरिया में ल़ड रहा जिहादी समूह जभात-अल-नुसरा का आईएसआईएस में विलय हो जाएगा. इस बात पर इस समूह के सरगना अबू मोहम्मद अल जवलानी ने अल कायदा के अयमान अल जवाहिरी से शिकायत की थी. इसके बाद अल जवाहिरी ने कहा कि आईएसआईएस को समाप्त कर दिया जाना चाहिए और इसे अपनी गतिविधियां इराक तक ही सीमित रखनी चाहिए. लेकिन अल बगदादी ने जवाहिरी की बात नहीं मानी. बीती फरवरी में अल कायदा ने आईएसआईएस के साथ किसी भी तरह के संबंध होने से इंकार कर दिया था.
वैसे मध्य-पूर्व में कुछ भी यूं ही नहीं होता. इराक की जनता अपनी समस्याओं के बीच फंसी रही. उसने देखा कि अरब में क्रांति की बयार आई और चली भी गई, मिस्र की राजनीतिक स्थिति कमोवेेश गोल-गोल घूमती रही. इसके साथ सबसे महत्वपूर्ण पड़ोसी देश सीरिया में उथल-पुथल मची हुई है. इराक में जिहादी उभार का असर उसके पड़ोसी देशों पर पड़ना भी तय है.
खाड़ी देशों के कट्टर सुन्नी लड़ाकों से मिले समर्थन ने आईएसआईएस जैसे मजबूत संगठन के उभरने और संगठित होने में मदद की. इसके साथ इसे एक व्यापक क्षेत्रीय उद्देश्य उपलब्ध कराया. सीरिया की असद सरकार और जिहादियों के बीच सीधी टक्कर को प्रमाणित करना मुश्किल है. ऐसी खबरें आती रही हैं कि सीरिया की सेना को ऐसे संगठनों पर कम और अधिक उदार पश्‍चिमी समर्थक लड़ाकों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा गया है. इस वजह से आईएसआईएस को इस इलाके में अपनी प्रशासकीय व्यवस्था स्थापित करने में मदद मिली है.
अमेरिका की वजह से इराक सद्दाम के चंगुल से निकल तो गया लेकिन इसके बाद धार्मिक और जातीय कट्टरवाद में धंस गया. इस पर सद्दाम ने कड़ा अंकुश लगा रखा था. आज इराक में अराजकता की स्थिति है और पूरा तंत्र भ्रष्ट हो चुका है. अमेरिका अपनी जनता के और अंतरराष्ट्रीय दबाव में आकर इराक छोड़कर तीन साल पहले ही जा चुका है, आम जनता हिंसा में वैसे ही पिस रही है जैसे पहले पिस रही थी.
आइए इस बात पर नजर डालें कि अमेरिका ने इराक की जनता के लिए क्या किया. 90 के दशक में इराक अमेरिकी युद्ध के बाद बिल क्लिंटन सरकार ने आम इराकी जनता का ख्याल रखते हुए ऑयल-फॉर-फूड नामक कार्यक्रम भी चलाया था. इस कार्यक्रम को संयुक्त राष्ट्र संचालित कर रहा था. लगातार युद्ध में रहने के कारण इराक की खराब हुई आर्थिक अवस्था को ठीक करने और वहां की आम जनता को दवाएं और अनाज जैसी मूलभूत जरूरतों की पूर्ति के लिए यह कार्यक्रम चलाया गया था. साल 1996 में जब इस कार्यक्रम के कारण पहली बार इराक में अनाज पहुंचा था तो लगभग ढाई करोड़ इराकी जनता का साठ प्रतिशत हिस्सा इसी राशन पर निर्भर था. लेकिन इस कार्यक्रम को भी अमेरिका ठीक तरीके संचालित नहीं कर सका. कई तरह की समस्याएं सामने आ गईं. कुर्दों ने कई बार यह आपत्ति दर्ज कराई कि उन्हें अनाज का उतना हिस्सा नहीं मिल रहा है जितना उनके इलाकों से तेल लिया जाता है. बाद में साल 2003 में जब अमेरिका ने एक बार फिर इराक पर हमला किया तो इस योजना को संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफी अन्नान ने बंद कर दिया. यह एक बेहतर योजना थी जिसे अमेरिका इराकी नागरिकों के लिए संचालित कर सकता था और दुनिया को यह दिखा सकता था कि वह इराकी नागरिकों का भी पूरा ख्याल रखता है लेकिन यह कर पाने मेंे भी यह दुनिया की महाशक्ति नाकामयाब ही रही. इसके अलावा इस बात को लेकर हमेशा ही अमेरिका पर आरोप लगाए जाते हैं कि ईराक पर हमले का कारण जैविक हथियार न होकर उसका तेल संपदा संपन्न होना था. अमेरिका का ध्यान सिर्फ सद्दाम हुसैन को रास्ते से हटाने को लेकर था क्योंकि सद्दाम के जिंदा रहते हुए उसका इराक के तेल के कुओं पर कब्जा कर पाना लगभग नामुमकिन था. यह बात सही है सद्दाम ने भी अपने शासन के दौरान कू्ररता की सारी हदें पर कर दी थीं लेकिन इतिहास भी उन्हें तानाशाह के ही नाम से जानता है तो क्या अमेरिका भी इतिहास में एक तानाशाह देश के रूप में ही याद किया जाना चाहता है. ऐसा कहने का कारण सिर्फ इतना है कि जिस इराकी जनता की बात अमेरिका करता रहता है वह सुुनने में तो ठीक लगती है लेकिन अगर पूरी कार्रवाई पर निगाह दौडाई जाए तो यही बात सामने आती है अमेरिका ने इराक में जो कुछ किया अपने स्वार्थ के लिए किया और ईराक की जनता को बली का बकरा बना दिया.

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