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सातवां एनएफसी अवार्ड और पाकिस्तान
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सातवां एनएफसी अवार्ड और पाकिस्तान

पाकिस्तान में उग्र तालिबान की आतंकवादी वारदातों की अंतहीन दास्तां हर रोज़ की ख़बरों में होती है. यहां धमाकों और मौत की कहानी भी आम हो चुकी है. इन ख़बरों के बीच समाज के ग़रीब और आम लोगों के लिए लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था एक छोटी सी राहत लेकर आई है. पाकिस्तान के सभी चार प्रोविंस एवं संघीय सरकार ने लाहौर में सर्वसम्मति से सातवें राष्ट्रीय वित्त आयोग अवार्ड (एनएफसी) को मंजूरी दे दी. इस समारोह की मेज़बानी पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री मोहम्मद शाहबाज़ शरी़फ ने की. पाकिस्तान के चारों प्रोविंस एवं संघीय सरकार का यह क़दम उनकी परिपक्वता और राजनीतिक नेतृत्व की बुद्धिमत्ता को दर्शाता है. एनएफसी अवार्ड का मुद्दा पिछले 19 वर्षों से लटका हुआ था. अब इस मसले को सभी राज्यों की सर्वसम्मति और भागीदारी से सुलझा लिया गया है. सबसे बड़ी बात यह कि चारों मुख्यमंत्री और पाकिस्तानी वित्त मंत्री शौकत तरीन के संघीय प्रतिनिधियों ने बेहद समझदारी दिखाई है. इस अहम समझौते की स्वीकृति के लिए संघीय इकाइयों, सरकार एवं चारों प्रोविंस ने सकारात्मक रुख़ अख्तियार किया. इस अवसर पर पंजाब के  मुख्यमंत्री शाहबाज़ शरी़फ ने कहा कि जम्हूरियत की बहाली के बाद मुल्क को यह दूसरा तोह़फा दिया गया है.

पाकिस्तानी मीडिया और अर्थव्यवस्था के जानकारों ने एनएफसी अवार्ड को मंजूरी मिलने का स्वागत किया है. उन्होंने उम्मीद जताई है कि इससे समग्र विकास और लोकतंत्र की मज़बूती का रास्ता खुलेगा. मीडिया रिपोर्टों ने एनएफसी अवार्ड की विभिन्न ख़ूबियों पर रोशनी डाली है. इसमें सबसे अहम बात यह कि संघीय सरकार राज्यों का हिस्सा 47.5 फीसदी से 57.5 फीसदी तक बढ़ाने पर राजी हो गई है. नए प्रावधान में अवार्ड के लिए जो मापदंड तय किए गए हैं, उनमें आबादी, राजस्व, पिछड़ापन और व्युत्क्रम जनसंख्या घनत्व (कम आबादी और अधिक आवंटन) को शामिल किया गया है. आबादी के लिए 82 फीसदी, ग़रीबी के लिए 10.3 फीसदी, राजस्व संग्रह के लिए 5 फीसदी (2.5 फीसदी राजस्व उत्पादन एवं 2.5 फीसदी संग्रह) और क्षेत्रों के लिए 2.7 फीसदी आवंटन की योजना है. इस तरह अवार्ड पंजाब को 51.74 फीसदी, सिंध को 24.55 फीसदी, एनडब्ल्यूएफपी को 14.62 और बलूचिस्तान को 9.09 फीसदी संसाधन सुरक्षित करने में सक्षम बनाएगा. नए अवार्ड ने सिंध एवं पंजाब से राजस्व संग्रह और उत्पादन की असमानता भी दूर की है. साथ ही पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत से पनबिजली की रॉयल्टी और बलूचिस्तान से गैस विकास अधिभार की ग़ैर बराबरी को भी ख़त्म कर दिया गया है. इसमें कोई बुराई नहीं है, यदि पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत को आतंक के ख़िला़फ जंग के लिए विभाज्य पूल से एक फीसदी आवंटन मिला है.

इस्लामिक गणराज्य पाकिस्तान एक संसदीय संघ है. इसमें चार प्रोविंस हैं. हाल ही में गिलगित-बलतिस्तान, संघ शासित क्षेत्र और इस्लामाबाद राजधानी क्षेत्र का निर्माण किया गया है. केंद्रीय प्रारूप की सरकार होने की वजह से अधिकांश राजस्व केंद्र द्वारा लिया जाता है. उसके बाद इन राजस्वों का पुन: वितरण ज़रूरत के मुताबिक़ संघीय और प्रांतीय सरकारों में होता है. 1973 में पाकिस्तानी संविधान के अनुच्छेद 160 के तहत सरकार के लिए कुछ बातें अनिवार्य की गईं. उसके मुताबिक़, संघ और उसकी संबंधित इकाइयों के बीच संसाधनों के वितरण के लिए 5 साल से अधिक का अंतराल नहीं होना चाहिए. इस प्रावधान के बाद राज्य सरकार राजस्व वितरण साझेदारी के तहत अपनी छोटी इकाइयों में संसाधनों का पुन: वितरण करती है. और, इस तरह राज्य सरकारें काम करती हैं.

इतिहास गवाह रहा है कि पाकिस्तान में वित्तीय संघवाद की हालत हमेशा से चुनौतीपूर्ण रही है. 1973 के बाद सात आयोगों का गठन किया गया, लेकिन इनमें महज़ चार ने ही संघीय इकाइयों के बीच संसाधनों के वितरण के मानदंडों को अपनाया है. संघों के बीच संसाधनों का वितरण हमेशा से विवाद का बड़ा कारण रहा है. जबकि वित्तीय संसाधन संघों के विकास के लिए का़फी अहम होते हैं. किसी भी क्षेत्र विशेष के विकास के लिए वित्तीय संसाधनों का वाज़िब और समान वितरण आवश्यक होता है. साथ ही यह संघीय घटकों का विश्वास जीतने में भी कारगर भूमिका निभाता है. और, सातवें एनएफसी अवार्ड ने यही उपलब्धि हासिल की है.

राष्ट्रीय वित्त आयोग अवार्ड अपने मौजूदा स्वरूप से और सशक्त होकर सामने आया है. आजादी के पहले भारत सरकार के अधिनियम 1935 के तहत नइमेयर अवार्ड प्रारूप अपनाया जाता था. यह प्रारूप ब्रिटिश भारत में संघ और राज्य सरकारों के बीच राजस्वों के वितरण के लिए अपनाया जाता था. 1947 में आज़ादी के बाद नए बने पाकिस्तान द्वारा सर जरमी रायसमान को अधिकृत किया गया कि वह संघ और उनके घटकों के बीच राजस्वों के वितरण में कोई व्यवहारिक फॉर्मूला सुझाएं. यह फॉर्मूला 1947 में पेश किया गया और 1 अप्रैल 1952 से लागू किया गया.

यहां यह भी ध्यान दिलाना ज़रूरी है कि संघीय विभाज्य पूल में आयकर, सामान्य बिक्री कर, संपत्ति कर, जमा पूंजी कर और सीमा शुल्क शामिल हैं. 1974 में जुलिफकार अली भुट्टो ने पहली बार अवार्ड पेश किया. उस दौरान कुछ कर ही विभाज्य पूल में शामिल थे. मसलन आयकर, बिक्रीकर और निर्यात कर. जबकि संसाधनों के वितरण के लिए आबादी का मापदंड अपनाया जाना चाहिए था. संघ और राज्य सरकारों के बीच संसाधनों का वितरण उनकी ज़रूरतों के मुताबिक़ 20 और 80 के अनुपात में किया गया. वितरण में आबादी का एकमात्र मापदंड होने के कारण पंजाब का हिस्सा 56.50 फीसदी से बढ़कर 60.25 फीसदी हो गया, जबकि इस वितरण का सबसे अधिक नकारात्मक असर तीन अन्य राज्यों पर पड़ा. सबसे अधिक मार सिंध पर पड़ी.

बाद में, 1990 में चौथे एनएफसी अवार्ड का श्रेय पाकिस्तान मुस्लिम लीग को मिला. एनएफसी अवार्ड की घोषणा के लगभग 16 साल के बाद अप्रैल 1991 में प्रधानमंत्री नवाज़ शरी़फ की अगुवाई में यह अवार्ड कुछ सकारात्मक सुझावों के साथ एक बार फिर पेश किया गया. 1974 में घोषित अवार्ड की तुलना में 1990 में संघ द्वारा एकत्रित राजस्व में उल्लेखनीय तौर पर लगभग 18 फीसदी का इज़ा़फा हुआ. राज्यों को वित्तीय स्वायत्तता देकर वित्तीय विकेंद्रीकरण की दिशा में इन अवार्डों ने अहम भूमिका निभाई.

तबसे लेकर आज तक कोई भी सरकार राष्ट्रीय वित्तीय मुद्दों पर समरसता नहीं ला सकी. आठ वर्षों की तानाशाही ने मुल्क को बर्बाद कर दिया. इस दौरान बलूचिस्तान में केंद्रीय सुरक्षाबलों के ़िखला़फ लोगों का गुस्सा भड़का और नवाब अकबर बुग्ती की निर्मम हत्या ने आग में घी का काम किया. 18 फरवरी, 2008 लोकतंत्र के लिए एक नई सुबह बनकर आई. इसने लोकतंत्र को मज़बूत करने की दिशा में अहम योगदान दिया. स्वतंत्र न्यायपालिका की बहाली हुई, संघों को मज़बूत करने का काम किया गया. यहीं से उम्मीद की एक नई किरण जगी. एनएफसी अवार्ड की स्वीकार्यता का पूरे देश में स्वागत किया गया. राष्ट्रपति ज़रदारी और प्रधानमंत्री यूसु़फ रज़ा गिलानी सहित राष्ट्रीय नेतृत्व के अलावा विभिन्न राजनेताओं और वित्तीय जानकारों में सातवें एनएफसी अवार्ड को लेकर व्यापक सर्वसम्मति है. यह सरकार की उल्लेखनीय उपलब्धि है.

सबसे सराहनीय बात यह है कि पंजाब प्रोविंस ने अवार्ड के अनुमोदन के लिए बेहद ही लचीला रुख़ अपनाया. यह सफलता शाहबाज़ शरी़फ के सकारात्मक रवैये के बग़ैर मुमकिन नहीं था. पंजाबी नेतृत्व ने दूसरे राज्यों के प्रति नरम रवैया दिखाया और उसके इस क़दम से संघ को मज़बूत करने में मदद मिलेगी. साथ ही इससे दूसरे राज्यों की जनता को यह एहसास होगा कि उनके विकास में पंजाब ने ज़िम्मेदार भूमिका निभाई है. इसमें कोई शक़ नहीं है कि पाकिस्तान में जम्हूरियत ही सबसे बेहतर उम्मीद है.

1 comment

  • हम्म बोहत ज़बरदस्त है अक्दास. कीप आईटी उप

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