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शक का लाभ

ओसामा बिन लादेन का कहना था कि अमेरिका के खिला़फ उसके जिहाद को रोकने का एकमात्र रास्ता है कि अमेरिका के लोग इस्लाम कबूल कर लें. इसके अलावा कोई और रास्ता नहीं है. लादेन को यह विश्वास उसके क़ुरान पढ़ने से आया. उसने इतिहास से भी यह पाठ सीखा. उसका सोचना था कि अगर सोवियत संघ को अ़फग़ानिस्तान में विफल किया जा सकता है तो अमेरिका को क्यों नहीं हराया जा सकता है. अगर आप उसके साक्षात्कार को पढ़ें तो ऐसा लगता है कि यह साक्षात्कार किसी पागल आदमी के द्वारा दिया गया नहीं है, बल्कि यह तार्किक और काफी प्रभावशाली है. ओसामा जो कर रहा था, उस पर उसे किसी तरह का शक नहीं था, बल्कि वह पूरे विश्वास के साथ अपना काम कर रहा था. यही स्थिति अंडर्स ब्रेविक की है. उस पर ओस्लो की अदालत में 77 लोगों की हत्या का मुकदमा चल रहा है. इसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का सबसे भयानक हत्याकांड कहा जा सकता है. उसने भी तर्क दिया कि वह बहुसंस्कृति वाद के दुष्परिणामों से यूरोप को बचाना चाहता है, इसलिए उसने यह हत्याएं कीं. बेशक उसका मतलब मुस्लिम प्रवासियों से है. पिछले साल ब्रेविक की गिरफ्तारी के बाद उसके पास से कई दस्तावेज ज़ब्त किए गए. उसने कोर्ट में भी अपना बयान दिया. उसके दस्तावेजों और बयान को सार्वजनिक किया गया. उसने इतिहास पढ़ा, लेकिन अपने तरीक़े से उस इतिहास की व्याख्या की तथा अपने ही तरीक़े से उसे समझा. उसने इतिहास में ईसाइयों और मुस्लिमों के बीच हुए युद्ध के बारे में पढ़ा और जिस तरह ओसामा ने जिहाद किया था, उसी तरह उसने भी अपना तर्क गढ़ा तथा बहुसंस्कृति वाद के खिला़फ हत्याएं कीं. वह कोई धार्मिक व्यक्ति नहीं है. ब्रेविक की यह निश्चितता उसके उस विश्वास से ही उत्पन्न हुई है कि उसे यूरोप को आक्रमणकारी प्रवासियों से बचने के लिए चुना गया है.

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इसी तरह माओवादियों को बताया जाता है कि बुर्जुआ सामंती भारतीय राज्य के खिला़फ उनका संघर्ष सफल होगा. इसके लिए तर्क भी दिए जाते हैं. इसके अलावा इतिहास का उदाहरण तो उनके पास है ही. यह विश्वास ही उन्हें हत्या, अपहरण आदि करने की अनुमति देता है. बेशक जिस तरह ओसामा उम्मा के लिए लड़ रहा था, उसी तरह माओवादी भी कमज़ोर और दबे-कुचले लोगों के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं. इस तरह के उन्मादी रवैये में किसी तरह का कोई निजी स्वार्थ नहीं होता है. ये लोग मक़सद के लिए अपना बलिदान देने को तैयार बैठे होते हैं. यह ऐसा समय है, जबकि कई अच्छे और समझदार लोग साम्यवादी आंदोलन से जुड़े हुए हैं. वे अपनी पार्टी के आदेशों का पालन करते हैं. कामरेड से कहा जा सकता है कि उन्हें बच्चा नहीं रखना है तो वे भ्रूण हत्या कर देंगे और अपना बच्चा नहीं रखेंगे. वे लोग पार्टी के सभी निर्देशों का पालन करने को तैयार रहते हैं, क्योंकि उन्हें विश्वास है कि इतिहास उनके पक्ष में रहा है. उन्हें इस बात का पूरा विश्वास है कि क्रांति सफल होगी और समाज में बदलाव आएगा. लोगों को न्याय मिलेगा और समाज में समानता आएगी.

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सभी तरह के चरमपंथ, चाहे वह हरा हो, लाल हो या फिर भगवा, के पास अपना तर्क होता है. अपनी विशेषता होती है, लेकिन सभी के अंदर विश्वास भरपूर मात्रा में होता है, चाहे वह धार्मिक हो अथवा वैचारिक. यह विश्वास ही है कि आतंकवादी अपने मकसद के लिए हर तरह का कष्ट सहने को तैयार रहते हैं और सहते भी हैं. दूसरी तरफ लोकतंत्र शंकाओं से घिरा होता है. लोकतंत्र को कभी इस बात का विश्वास नहीं होता कि लोकतांत्रिक जीवनशैली नष्ट करने वालों को जो सज़ा दी जा रही है, वह सही है या नहीं. लोकतंत्रवादी असहमत होते हैं और उनमें भिन्नता होती है. वे लोग वाद-विवाद तथा तर्क करते हैं. जब तर्क शुरू होता है तो किसी भी एक व्यक्ति के सुझाव पर सहमति नहीं होती है. किसी भी अनजान व्यक्ति की हत्या करना बहुत मुश्किल होता है. इसके लिए निश्चित उद्देश्य की आवश्यकता होती है. लोकतंत्र धीमा, स्थूल और अनिश्चित है. लोकतांत्रिक व्यवस्था के नियम-क़ानून काफी सुस्त हैं. इसमें न्याय की उम्मीद लगाए बैठे लोगों को न्याय सही समय पर नहीं मिल पाता है और बहुतों को तो मिलता ही नहीं है. हम लोग देखते हैं कि हज़ारों दोषी लोग स्वतंत्र रूप से घूमते रहते हैं और एक निर्दोष व्यक्ति को अपराधी क़रार दे दिया जाता है.

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हालांकि उन्माद या चरमपंथ ग़लत है, लेकिन फिर भी उन्हें इसकी क़ीमत मिलती है. उन्हें विश्वास होता है कि वे जो कर रहे हैं, वह सही है, भगवान ने उन्हें ऐसा करने के लिए कहा है और इतिहास उनके पक्ष में है. 20वीं सदी इस बात की साक्षी है कि संदेह करने वाले और विश्वास करने वालों के बीच, लोकतंत्रवादियों और तानाशाहों के बीच कई युद्ध हुए हैं, जिनमें संदेह करने वालों की आसानी से जीत हुई. नाजी और वोल्शेविकों को धूल चाटनी पड़ी. हरा और भगवा आतंकवादी नहीं जीतेगा, लेकिन इसलिए नहीं कि लोकतंत्र उससे ताक़तवर है, बल्कि इसलिए, क्योंकि उसमें हठ का, निश्चितता का अभाव है. शक अपने आप में जीत है.

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