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तुर्की सीरिया सीमा विवाद क्या आतंकवाद की जड़ है

तुर्की सीरिया सीमा विवाद क्या आतंकवाद की जड़ है

सीरिया और तुर्की की लंबी सरहदें आपस में मिलती हैं. कुछ क्षेत्र ऐसे हैं, जिन पर दोनों देश अपने स्वामित्व का दावा कर रहे हैं और इस क्षेत्र को लेकर दोनों एक-दूसरे के आमने-सामने हैं. अभी हाल ही में सीरिया ने तुर्की पर आरोप लगाया है कि वह सीरिया में आईएसआईएस की मदद कर रहा है और यूरोप से भागी हुई लड़कियों को अपनी सीमा से आईएसआईएस में शामिल होने का अवसर उपलब्ध करता है, लेकिन सवाल यह है कि यह लड़कियां आईएसआईएस में शामिल क्यों होती हैं? वह आईएसआईएस के जाल में किस तरह फंस जाती हैं?

102दो देशों के बीच सीमा विवाद भौगोलिक होता है. इसका राजनीतिक हल तलाश करना चाहिए, लेकिन वैश्‍विक मानचित्र पर कुछ ऐसे देश हैं, जहां भौगोलिक विवाद का हल आतंकवाद की आड़ में तलाश किया जाता है. ऐसे देशों का उदाहरण पाकिस्तान से दिया जा सकता है, जो भारत में आतंकवादी गतिविधियां अंजाम देकर समस्या का हल चाहता है. यही स्थिति तुर्की और सीरिया के बीच है. दोनों देशों की सीमाएं 877 किलोमीटर तक मिली हुई हैं और सीमा विवाद कई दशकों से जारी है. 1939 में सीरिया और तुर्की के बीच विवाद के कारण बने क्षेत्र हताय प्रांत में जनमत संग्रह करवाने के बाद फ्रांसिसियों ने इस क्षेत्र को तुर्की के हवाले कर दिया था.
सीरिया ने हताय के इस विभाजन को कभी भी सच्चे दिल से स्वीकार नहीं किया, जिस कारण दोनों देशों के बीच मतभेद, जो पहले से ही मौजूद थे, अधिक गहरे होते चले गये. दरअसल यूरोपियन देश किसी देश को छोड़कर जाते हैं तो वह कुछ ऐसा कर जाते हैं, जिस कारण वह देश में आपस में उलझे हुए रहते हैं. यही काम ब्रिटेन ने भारत में किया और जाने पहले कश्मीर का ऐसा पेंच फंसा गया जो आज तक भारत व पाकिस्तान के बीच विवाद की कारण बना हुआ है. ठीक इसी प्रकार, जब फ्रांस सल्तनत-ए-उस्मानिया को ख़ाली करके जा रहा था तो उसने सीरिया और तुर्की के बीच हताय का विवाद खड़ा कर दिया, जिसकी वजह से यह दोनों आज तक एक-दूसरे के दुश्मन बने हुए हैं और जिसको जब मौक़ा मिलता है, एक-दूसरे को नीचा दिखाता है. जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि इस विवादित क्षेत्र के कारण तुर्की और सीरिया के बीच संबंध कभी भी मधुर नहीं रहे बल्कि हाफिज़ अल असद के दौर में यह संबंध उस समय और ख़राब हो गये थे, जब सीरिया सरकार ने तुर्की के बाग़ी सरग़ना अब्दुल्लाह ओजालान को वादी बिक़ा में बसा दिया था और पीकेके, जो कि आतंकवादी समूह था, को कैंप लगाने की अनुमति दी गई थी. उसी समय सीरिया ने तुर्की में आतंकवाद को हवा देने के लिए एक बुनियाद डाल दी थी. उस स्थिति से निपटने के लिए तुर्की ने 1998 में अपनी सेना को सीरिया की सीमाओं पर लाकर खड़ा किया और सीरिया के ख़िलाफ़ सैन्य कार्यवाई करने का निर्णय किया, लेकिन इस समय मिस्र के राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक की मध्यस्थता के प्रयासों के नतीजे में सीरिया ने बाग़ी सरग़ना अब्दुल्लाह ओजालान को अपनी सीमाओं से निकाल दिया और यूं दोनों देश एक हिंसक युद्ध से बच गये, लेकिन दोनों एक-दूसरे को नीचा दिखाने का कोई अवसर हाथ से जाने नहीं देते.
2011 में अरब क्रांति की बयार चली. इस क्रांति में कई देशों के तख़्ते पलट गये लेकिन बशर अल असद अपनी सरकार को बचाने में सफल रहे. फिर 2014 में वहां अलनुसरा के सहयोग से आईएसआईएस ने सीरिया के बड़े हिस्से पर अपनी सरकार क़ायम कर ली. बशर अल असद ने इस नये तूफ़ान का भी मुक़ाबला किया और दमिश्क़ आईएसआईएस के हाथों में जाने से बचा लिया, लेकिन ख़तरा अभी टला नहीं है. आईएसआईएस अब भी शक्तिशाली है और इसके लड़ाके समूह में आलम-ए-इस्लाम के अलावा यूरोप से बड़ी संख्या में युवक लड़के और लड़कियां शामिल हो रहे हैं. इन यूरोपियन नौजवानों को आईएसआईएस लड़ाकों में शामिल करने के पीछे तुर्की का हाथ बताया जाता है. यह आरोप सीरिया की ओर से तुर्की पर लगाया जाता है. क्योंकि इनमें शामिल होने वाले नौजवानों में अधिकतर नौजवान तुर्की की सीमा से ही सीरिया में घुसते हैं.
हालांकि तुर्की इस आरोप को ग़लत बताता है, लेकिन पिछले दिनों ब्रिटेन की तीन लड़कियों के तुर्की की सीमा से सीरिया में घुसने की जो ख़बर आई है, इससे संदेह बढ़ता है कि तुर्की कहीं न कहीं इस प्रक्रिया में शामिल है. 15 वर्षीय शमीम बेगम और आमिरा अब्बासी और 16 वर्षीय ख़ाज़िदा सुल्ताना 17 फरवरी को लन्दन से इस्तांबुल रवाना हुईं थीं. सूत्रों का कहना है कि तीनों लड़कियां तुर्की और सीरिया के बॉर्डर क्रॉसिंग के नज़दीक से सीरिया में घुसीं. ज़ाहिर है यह स्थिति बताती है कि तुर्की इन जैसी घटनाओं में बॉर्डर क्रॉसिंग में नर्मी से काम लेता है, जिसका फ़ायदा उठाकर यूरोपियन लड़के और लड़कियां तुर्की के रास्ते आतंकवादी संगठनों में शामिल होने के लिए आसानी से चले जाते हैं. ख़ुद तुर्की की संसद में विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी के प्रतिनिधि रफ़ीक़ का कहना है कि मौजूदा सरकार आईएएआईएस का समर्थन करके तुर्की को आतंकवादी संगठनों का अड्डा बना देती है.
अगर तुर्की पर यह आरोप सही है तो यह कहना ग़लत न होगा कि 2011 में अरब क्रांति और 2014 में आईएसआईएस का सीरिया का कुछ क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा कर लेना उसके लिए एक शुभसंकेत है. क्योंकि आईएसआईएस सीरिया में जितना मज़बूत होगा बशर अलअसद सरकार उतनी ही कमज़ोर होगी और यह तुर्की के मन की बात होगी. यही कारण है कि वह आईएसआईएस को लेकर नरमपंथी है और इसी नरमपंथी के कारण विपक्ष के नेता रफ़ी ने सरकार पर यह आरोप लगाया है कि तुर्की आईएसआईएस के लिए पनाहगाह बनता जा रहा है. अगर यह विश्‍लेषण सही है तो फिर ब्रिटेन, फ्रांस या अन्य देशों से सीमा पार करके तुर्की के रास्ते आईएसआईएस में शामिल होने वाले लड़ाकों को नज़रअंदाज़ करने की पोल स्वयं ही खुल जाती है और यहीं से यह बात भी सामने आ जाती है कि यूरोपियन नौजवानों को आईएसआईएस के लड़ाकों में शामिल होने के लिए तुर्की से जाने का अवसर क्यों दिया जाता हैं?
लेकिन एक बड़ा सवाल अब भी बाक़ी रहता है कि आख़िर यूरोपियन देशों की कम उम्र लड़कियां आईएसआईएस में शामिल होने के लिए आकर्षित क्यों होती हैं? इन तीन लड़कियों से पहले भी ब्रिटेन और फ्रांस से बहुत सी लड़कियां अपने परिवार वालों से छिपकर आईएसआईएस में शामिल हो चुकी हैं. इसका जवाब हमें लंदन से प्रकाशित होने वाले अख़बार गार्जियन की एक रिपोर्ट में मिलता है. हैरियट शेरवुड की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि आईएसआईएस के लिए सोशल साइट्स पर सक्रिय आतंकी इन ल़डकियों को अपने जाल में फंसाते हैं. वे उन्हें बताते हैं कि इस्लामिक स्टेट बनाने में अपना सहयोग दें. आतंकियों के जाल में फंसकर ये ल़डकियां उनकी ओर आकर्षित होती हैं और शादी करने के ख्याल से वहां पहूंच जाती हैं. इस रिपोर्ट के अनुसार बहुत सी 14 से 15 वर्षीय लड़कियां सीरिया के लिए रवाना होती हैं, ताकि आतंकवादी तत्वों के साथ शादी करें और बच्चे पैदा करें और लड़ाकों की संख्या में बढ़ोतरी करें. यही नहीं, यह लड़कियां इतनी भावुक होती हैं कि हथियार लेकर मैदान में उतरती हैं और दुश्मनों का मुक़ाबला करती हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ महीने पहले 60 फ्रांसीसी लड़कियां आतंकवादी समूहों में शामिल हुई थीं. फ्रांस की नेशनल सुरक्षा एजेंसी के मुखिया लूई कैप्रिओली का विचार है कि आतंकवादी संगठनों में शामिल होने के लिए बहुत सी महिलाएं यूरोप से सीरिया आती हैं और यह काम अपने घर वालों से छिपकर करती हैं. 50 से अधिक ब्रिटिश लड़कियां आतंकवादी संगठन आईएसआईएस में शामिल हो चुकी हैं. सीरिया के शहर अलरक़, जो कि आईएसआईएस का एक महत्वपूर्ण केन्द्र माना जाता है, में इन लड़कियों को देखा गया था.
कुछ दिनों पहले फ्रांस से भागने वाली एक लड़की आयशा ने अपने बयान में यही लिखा था कि फ्रांस में इसे अपनी मर्ज़ी से जीने का अधिकार नहीं मिलता है. वह पर्दे में रहना चाहती है, लेकिन फ्रांस का क़ानून पर्दे पर पाबंदी लागू करता है जिससे यह एहसास होता है कि लोकतंत्र के नाम पर इनकी स्वतंत्रता छीनी जा रही है, इसलिए वह इस माहौल से निकलकर ऐसी जगह यानि आईएसआईएस के पास आई है, जहां वह अपने धर्म के अनुसार स्वतंत्रता के साथ जीवन गुज़ार सकेगी.
क्योंकि वेबसाइट पर आकर्षक भविष्य का सपना दिखाया जाता है. यही कारण है कि इन वेबसाइटों को पढ़कर कमसिन लड़कियां उनके झांसों में आ जाती हैं और आसानी से आईएसआईएस का शिकार बन जाती हैं. झांसे में आने वाली लड़कियों की उम्र 16 से 22 वर्ष के बीच होती हैं और इनमें से अक्सर लड़कियां उच्च शिक्षा प्राप्त होती हैं और इनका संबंध अमीर घरानों से होता है. कुछ दिनों पहले ज़ोहरा और सलमा हलाना 16 वर्षीय जुड़वा बहनें मैनचेस्टर में अपने घर से फरार होकर माता-पिता को बताए बिना सीरिया चली गई थीं, यह दोनों बहनें तुर्की के रास्ते सीरिया में आई थीं और सीरिया में आतंकवादी संगठन आईएसआईएस के लड़ाकों के साथ शादी कर ली. ज़ोहरा ने एक सोशल साइट पर नकाब पहने और हाथ में हथियार व इसकी पीठ पर आईएसआईएस का झंडा लिए फोटो अपलोड की थी.
अगर इन सभी बातों को मिलाकर देखा जाये तो सीरिया व तुर्की के बीच सीमा विवाद के कारण से आईएसआईएस को फ़ायदा मिल रहा है और उसके लड़ाकों की तादाद में बढ़ोतरी हो रही है. अगर यह स्थिति बनी रही तो आईएसआईएस दुनिया को बहुत नुक़सान पहुंचा सकता है.

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