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दक्षिणी सूडान एक नए देश का स्वागत कीजिए

दक्षिणी सूडान एक नए देश का स्वागत कीजिए

अफ्रीका के नक्शे में कुछ परिवर्तन हुआ है. सूडान के विभाजन के साथ ही इस महादेश में स्वतंत्र देशों की संख्या 55 हो गई है. दक्षिणी सूडान को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दे दी गई है. इसके साथ ही 6 जनवरी, 2005 को हुए समग्र शांति समझौते के तहत चल रही वार्ताओं का दौर समाप्त हो गया और अंत हो गया वर्षों से चल रहे उस खूनी संघर्ष का, जिसमें लाखों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी. आंकड़े बताते हैं कि इस संघर्ष में तक़रीबन 25 लाख लोगों की जानें गईं और लगभग 50 लाख लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा, लेकिन इन तमाम लोगों की कुर्बानी आ़खिरकार रंग लाई और 9 जुलाई, 2011 को दक्षिणी सूडान के रूप में एक नए राष्ट्र का जन्म हुआ. सल्वा कीर मयर्दित ने दक्षिणी सूडान के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली. साथ ही रीक मछार को उप राष्ट्रपति बनाया गया. पूरा राष्ट्र खुशी से झूम उठा, जब डॉ. जॉन गरांग मसोलियम में राष्ट्रपति सल्वा कीर ने दक्षिणी सूडान की स्वतंत्रता की औपचारिक घोषणा की. इस तरह दक्षिणी सूडान के रूप में दुनिया का 193वां देश अस्तित्व में आ गया. हालांकि दक्षिणी सूडान के लोगों के लिए तो यह खुशी का क्षण है कि वे आज़ाद हो गए हैं, पर उत्तरी सूडान से संपदा का समझौता उनके लिए बड़ी चुनौती साबित होगा. नया देश बनने के बाद फिलहाल दक्षिणी सूडान दुनिया के सबसे ग़रीब देशों में गिना जाएगा, लेकिन संतोष की बात यह है कि सबसे ज़्यादा तेल के कुएं यहीं पर हैं. इसलिए यह माना जा रहा है कि उत्तरी सूडान इन तेल के कुंओं पर नज़रें टिकाए रखेगा और ज़रूरत पड़ने पर दक्षिणी सूडान से संघर्ष भी करेगा.

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जनमत संग्रह से आज़ादी

दक्षिण सूडान को स्वतंत्र किया जाए या नहीं, इसका फैसला वहां की जनता को ही करना था, न कि शीर्ष पर बैठे राजनेताओं को. इसके लिए वहां जनमत संग्रह कराया गया, जिसमें वहां के लोगों को या तो स्वतंत्रता के पक्ष में मतदान करना था अथवा सूडान के साथ रहने के पक्ष में. 9 से 15 जनवरी तक चले इस जनमत संग्रह से यह स्पष्ट हो गया कि जनता स्वतंत्र राष्ट्र चाहती है, क्योंकि 98.83 प्रतिशत लोगों ने दक्षिणी सूडान को अलग राष्ट्र बनाने के पक्ष में मतदान किया था. इसके बाद नए राष्ट्र के निर्माण की प्रक्रिया और तेज़ हो गई, जिस पर 9 जुलाई, 2011 को अंतिम रूप से मुहर लगा दी गई.

जश्न का माहौल

फिलहाल दक्षिणी सूडान की राजधानी जुबा में जश्न का माहौल है. दक्षिणी सूडान दुनिया का सबसे नया देश बन गया है. इस खुशी में बीती 9 जुलाई को राजधानी जुबा में स्वतंत्रता समारोह का आयोजन हुआ, जिसमें सूडान के राष्ट्रपति उमर अल बशीर के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून ने भी हिस्सा लिया. दरअसल, दक्षिणी सूडान को सबसे पहले सूडान ने अपने पड़ोसी देश के रूप में मान्यता दी है. इस बाबत 2005 में सूडान और दक्षिणी सूडान के बीच शांति समझौता हुआ था. इसके बाद दक्षिणी सूडान को एक देश के रूप में मान्यता देने की प्रक्रिया शुरू हुई, जो अब जाकर पूरी हुई है. दक्षिणी सूडान को अब एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता मिल गई है. एक जनवरी, 1956 को सूडान और दक्षिणी सूडान के बीच जो सीमा रेखा खींची गई थी, दोनों देशों ने फिलहाल उसी सीमा रेखा को मंजूर कर लिया है. इसी दिन ब्रिटेन ने सूडान को आज़ाद किया था. आंकड़े बताते हैं कि दक्षिणी और उत्तरी सूडान के बीच दशकों तक चले गृह युद्ध में 25 लाख से अधिक लोगों की मौत हुई. संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार, दक्षिणी सूडान दुनिया का 193वां और अफ्रीका का 55वां देश होगा.

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क्या है स्थिति

दक्षिण सूडान के स्वतंत्र होने के बाद यह प्रश्न उठ रहा है कि जिस आधार पर यह देश आज़ाद हुआ, क्या वे सारे मुद्दे समाप्त हो गए? ऐसा लगता तो नहीं है. वहां ग़रीबी है, स्वास्थ्य सुविधाओं और शिक्षा की स्थिति बहुत खराब है. वहां 7 में से 1 बच्चे की मौत 5 साल की उम्र से पहले हो जाती है. 6 से लेकर 13 वर्ष के आधे बच्चे प्राथमिक शिक्षा से वंचित हैं. प्रत्येक 7 में से एक गर्भवती महिला की मौत हो जाती है. 84 प्रतिशत महिलाएं निरक्षर हैं, केवल 6 प्रतिशत बच्चियां स्कूल जा पाती हैं और अपनी शिक्षा पूरी कर पाती हैं. विश्व में सबसे अधिक मातृत्व मृत्यु दर यहीं है.

क्या है समस्याएं

दक्षिणी सूडान इस आधार पर स्वतंत्रता की मांग कर रहा था कि उसकी संस्कृति अलग है और उत्तरी सूडान वाले उसके साथ भेदभाव करते हैं, यह स्थिति अभी भी बरक़रार है. दक्षिणी सूडान के उत्तरी और दक्षिणी इलाक़ों में वही स्थिति है, जो पूर्व में उत्तरी और दक्षिणी सूडान के बीच थी. दक्षिणी सूडान के उत्तरी और दक्षिणी भाग के बीच आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक असमानता है. सत्ता का केंद्र उत्तर में होगा. ऐसे में विवाद पुन: उत्पन्न हो सकता है. सूडान के साथ भी विवाद समाप्त नहीं हुआ है. सीमा की समस्या, कर्ज का बंटवारा, तेल का बंटवारा आदि कई मुद्दे अभी शेष हैं. साथ ही दक्षिणी सूडान के समक्ष लंबे गृह युद्ध के कारण फैली ग़रीबी और बेरोज़गारी आदि से निपटने की भी समस्या है. सड़कों, अस्पतालों और स्कूलों की स्थिति बदतर है. इन सभी चुनौतियों का सामना उसे करना पड़ेगा. नए राष्ट्र को सावधान रहने की आवश्यकता है.

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फिर हो सकती है हिंसा

सूडान के राष्ट्रपति ओमर अल बशीर ने अपने देश के बंटवारे पर दु:ख जताते हुए कहा कि शांति हासिल करने के लिए यह वाजिब क़ीमत है. साथ ही उन्होंने चेतावनी भी दी कि विवादित अबेई सीमा क्षेत्र को लेकर फिर से हिंसा शुरू हो सकती है. दक्षिणी सूडान का जन्म पिछले कई दशकों से चल रहे गृह युद्ध के बाद हुआ. बशीर ने कहा कि वह सूडान की एकता को बनाए रखना चाहते थे, लेकिन उन्हें दक्षिण में रहने वाले लोगों की भावनाओं का सम्मान करना पड़ा. ऐसा नहीं किया जाता तो एक बार फिर से हिंसा शुरू होने का डर था. बशीर ने स्पष्ट किया कि यदि विवादित क्षेत्रों, ख़ासकर अबेई सीमा क्षेत्र पर हुए समझौतों पर अमल नहीं हुआ तो फिर से ख़ूनख़राबा हो सकता है. अबेई उत्तरी सूडान का हिस्सा है और दक्षिण में उसका विलय तभी हो सकता है, यदि आने वाले दिनों में वहां रहने वाले बंजारे, अरब कबीले जनमत संग्रह के ज़रिए इसकी स्वीकृति देते हैं, लेकिन ऐसा होना फ़िलहाल संभव नहीं दिखता.

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